कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५)
महाकवि सोमदेव भट्ट द्वारा
स्रोत: कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1960 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंप्रथम लम्बक ५३ ऐसा कहकर व्याडि गुरु-दक्षिणा देने के लिए चला गया और योगनन्द ने मुझे बुलाकर मन्त्रिपद समर्पित किया ॥११८॥ मन्त्रिपद ग्रहण कर लेने पर मैंने राजा से कहा कि 'तुम्हारा ब्राह्मणत्व तो गया। परन्तु उसके जाने पर भी जबतक शकटाल मन्त्री है, तबतक राज्य भी स्थिर नहीं रह सकता ॥११९॥ इसलिए नीति के साथ इसका नाश करो। इस प्रकार मेरी सम्मति से योगनन्द ने शकटाल को अँधेरे कुएँ में डाल दिया ॥१२०॥ शकटाल के साथ राजा ने उसके सौ पुत्रों को भी उसी अँधेरे कुएँ में डलवा दिया। उसका अपराध यह घोषित किया गया कि उसने जीवित ब्राह्मण को जलवा दिया था ॥१२१॥ मिट्टी के एक पात्रविशेष में सत्तू और ऐसे ही एक पात्र में पानी शकटाल और उसके पुत्रों के लिए कुएँ में रख दिया जाता था ॥१२२॥ शकटाल ने लड़कों से कहा कि 'इस सत्तू और पानी से एक का भी जीवन कठिन है, बहुतों की तो बात ही क्या ? ॥१२३॥ इसलिए बल के सहित इस सत्तू को वही प्रतिदिन खाया करे जो योगनन्द से बदला लेने की शक्ति रखता हो ॥१२४॥ लड़कों ने शकटाल से कहा कि 'राजा से बदला लेने के लिए आप ही समर्थ हैं। अतः आप ही इसे खाया करें'। सच है, महान् कामों के लिए शत्रु से बदला लेना प्राणों से भी प्यारा होता है ॥१२५॥ यह निर्णय होने पर वह अकेला शकटाल ही उस सत्तू और पानी से जीवन-निर्वाह करने लगा। सच है, शत्रु से बदला लेनेवाले अत्यन्त क्रूर प्रकृति के होते हैं ॥१२६॥ अपने कल्याण की कामना करनेवाले या उन्नतिशील व्यक्ति को चाहिए कि अपने मालिक की चित्तवृत्ति को बिना समझे और बिना उसका विश्वास प्राप्त किये उसके साथ व्यवहार न करे ॥१२७॥ भूख से प्राण त्यागते हुए बच्चों की पीड़ा देखकर अन्ध-कूप में पड़ा शकटाल इस प्रकार पश्चात्ताप करने लगा ॥१२८॥ उसके देखते-देखते ही सौ-के-सौ पुत्र मर गये। उनके कंकालों से घिरा हुआ एकमात्र शकटाल ही जीवित रह गया ॥१२९॥ इतने में योगनन्द भी धीरे-धीरे साम्राज्य में स्थिर हो गया तो व्याडि गुरु-दक्षिणा देकर उसके पास आया ॥१३०॥ व्याडि ने आते ही योगनन्द से कहा—'मित्र ! मेरी बताई नीति के अनुसार तुम चिरकाल तक राज्यभोग करो। मैं अब कहीं तपस्या करने जाता हूँ ॥१३१॥ व्याडि की बातें सुनकर गद्गद कण्ठ से राजा ने कहा—'तुम मेरे राज्य में रहकर सांसारिक भोगों को भोगो। मुझे छोड़कर न जाओ' ॥१३२॥