कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५)
महाकवि सोमदेव भट्ट द्वारा
स्रोत: कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1960 (उद्गम)
तृतीय लम्बक २५७
तृतीय लम्बक २५७ यह सुनकर एकमात्र क्रीड़ा का लोभी राजा वासवदत्ता के साथ लावणक जाने के लिए उद्यत हो गया ॥१२६॥ किसी दिन जाने का निश्चय होने और यात्रा का शुभ मुहूर्त निकलने पर अपनी कान्ति से दिशाओं को प्रकाशित करते हुए नारद मुनि आकाश से उतरकर दर्शकों की आँखों को आनन्दित करने लगे। मानों चन्द्रमा अपने वंश (चन्द्रवंश) से प्रेम के कारण आकाश से उतर आया हो ॥१२७-१२८॥ राजा के द्वारा आतिथ्य-सत्कार ग्रहण किए हुए नारद मुनि ने नम्रता से झुके हुए राजा उदयन को प्रसन्नता से पारिजात के फूलों की माला प्रदान की ॥१२९॥ ऋषि ने नमस्कार करती हुई वासवदत्ता से कहा—'तुम कामदेव के अंश से उत्पन्न एक पुत्र को प्राप्त करोगी जो विद्याधरों का राजा होगा'॥१३०॥ तब यौगन्धरायण के सामने नारद ने वत्सराज से कहा—हे राजन्! तुम्हारी पत्नी वासवदत्ता को देखकर मुझे स्मरण हो गया कि प्राचीन समय में तुम्हारे पर दादा युधिष्ठिर भीम आदि पाँच भाई थे । उन पाँचों की एक ही पत्नी द्रौपदी थी। वह वासवदत्ता के समान ही अनुपम सुन्दरी थी। इस दोष को देखकर मैंने इन लोगों से कहा कि तुम पाँचों को स्त्री के सम्बन्ध से परस्पर बैर न करना चाहिए । इस प्रसंग में एक कथा कहता हूँ सुनो ॥१३१-१३४॥ सुन्द और उपसुन्द की कथा प्राचीन काल में सुन्द और उपसुन्द नाम के दो असुर थे जो अपने अतुल बल के कारण तीनों लोकों को जीतने के कारण अजेय थे ॥१३५॥ उन दोनों भाइयों के विनाश की इच्छा से ब्रह्मा ने विश्वकर्मा से तिलोत्तमा नामक दिव्य नारी का निर्माण कराया ॥१३६॥ चारों ओर से उसके रूप को देखने के लिए ब्रह्मा चतुर्मुख हो गये। जब वह प्रदक्षिणा कर रही थी तब शिव भी उसे चारों ओर से देखने के लिए ही चतुर्मुख हो गये ॥१३७॥ वह तिलोत्तमा ब्रह्मा की आज्ञा से विन्ध्याचल के तटवर्ती प्रदेश में स्थित उन असुरों के प्रलोभन के लिए गई ॥१३८॥ ३३
५५८ कथासरित्सागर
५५८ कथासरित्सागर तौ चासुरौ जगृहतुस्तां दृष्ट्वैवान्तिकागताम्। उभावप्युभयोर्बाह्वो सुन्दरीं काममोहितौ ॥१३९॥ परस्परविरोधेन हरन्तौ तां च तत्क्षणम्। प्रवृत्तसम्प्रहारत्वादुद्वावपि क्षयमीयतुः ॥१४०॥ एवं स्त्रीनाम विषयो निदानं कस्य नापदाम्। युष्माकं द्रौपदी चैका बहूनामिह वल्लभा ॥१४१॥ तन्निमित्तं समयः संरक्षण्यो भवतां किल। मद्वाक्यादयमस्तस्या समयश्चास्तु वः सदा ॥१४२॥ ज्येष्ठांतिकगता माता मन्तव्य कनीयसा। ज्येष्ठेन च स्नुषा ज्ञेया कनिष्ठान्तिकवर्तिनी ॥१४३॥ इत्येतन्मद्वचो राजंस्तव ते प्रपितामहाः। तथेति प्रत्यपद्यन्त कल्याणकृतबुद्धयः ॥१४४॥ ते च मे सुहृदोऽभूवस्तत्प्रीत्या चाहमागतः। त्वां द्रष्टुमिह वत्सेश¹ तदिदं शृणु वच्मि ते ॥१४५॥ यद्यत्मे कुरु वाक्यं कुर्यांस्त्वं मन्त्रिणां सह। अचिरेण च कालेन महतीमृद्धिमाप्स्यसि ॥१४६॥ किंचित्काल च दुःखं तन्भविष्यति न च त्वया। तत्रातिमोहः कर्त्तव्यः सुखान्तं भविता हि तत् ॥१४७॥ सम्यगेवमभिधाय तत्क्षणं वत्सराजमुवयस्य भाविषु। र्धर्मिसुचनविधौ विशारदो नारदो मुनिरखशन ययौ ॥१४८॥ सर्वे च तस्य वचसा मुनिपुङ्गवस्य योगन्धरायणमुखा सचिवास्त्ववस्ते। सम्भाष्य सिद्धयुवयमारमभिकीर्षितस्य सम्पादनाय सुतरां जगृहु प्रयत्नम् ॥१४९॥ इति महाकविश्रीसोमदेवभट्टविरचिते कथासरित्सागरे लावानक लम्बके प्रथमस्तरङ्गः
तृतीय लम्बक १५९
तृतीय लम्बक १५९ उसे एकान्त में समीप आई हुई देखकर उन काम-मोहित दोनों असुरों ने उसे दोनों बाहुओं से पकड़ा। उसे अपनी-अपनी ओर खींचते हुए वे दोनों परस्पर लड़ पड़े और नष्ट हो गये' ॥१३९-१४०॥ इस प्रकार स्त्री किसके लिए विपत्तियों का कारण नहीं बनती। तुम बहुतों की एक ही प्यारी स्त्री द्रौपदी है॥१४१॥ इसको लेकर होनेवाले आपसी कलह से तुमलोगों को बचना चाहिए। मेरे कहने से आप लोग उसका एक नियम निर्धारण कर लें ॥१४२॥ बड़े भाई के पास गई हुई उसे छोटे भाई, माता के समान समझें और छोटे भाइयों के समीप जाने पर बड़ा भाई उसे बहू (पुत्र-वधू) के समान समझें। हे राजन् ! शुभ बुद्धि वाले तुम्हारे परदादों ने मेरे वचन को उसी प्रकार स्वीकार कर लिया। वे लोग मेरे मित्र थे मैं तुम्हारे पास उसी प्रेम से तुम्हें देखने आया हूँ और यह कहता हूँ सुनो ॥१४३-१४५॥ जैसे तुम मेरी बात को मानते हो उसी प्रकार अपने मंत्रियों की बात को भी मानना। इस प्रकार तुम शीघ्र ही महान् ऐश्वर्य प्राप्त करोगे ॥१४६॥ कुछ समय तक तुम्हें कष्ट होगा उस समय तुम अधिक मोह न करना क्योंकि यह दुःख सुखान्त होगा अर्थात् अन्त में सुख मिलेगा ॥१४७॥ 'आप जो कहते हैं ठीक है' वत्सराज के ऐसा कहने पर भावी अभ्युदय के चिह्नों की सूचना देने में विशारद नारद मुनि अन्तर्धान हो गये ॥१४८॥ यौगन्धरायण आदि सभी राज-मन्त्री मुनिप्रवर नारद के वचनों से अपनी योजना की सफलता समझ कर उसे कार्यान्वित करने का प्रयत्न करने लगे ॥१४९॥ महाकवि सोमदेव भट्ट-विरचित कथा सरित्सागर के लावानक लम्बक का प्रथम तरंग समाप्त।
१ यह कथा महाभारत के आदि पर्व में भी आती है।
२६ कथासरित्सागर
२६ कथासरित्सागर द्वितीयस्तरङ्ग वत्सराज-पद्मावत्योःपरिणयः ततः पूर्वोक्तया युक्त्या वत्सराजं सवल्लभम्। यौगन्धरायणाद्यास्ते निन्युर्लावाणकं प्रति ॥१॥ स राजा प्राप तं देशं स्वयशोपेण मूर्च्छता। अभिवाञ्छितसंसिद्धिं वदन्तमिव मन्त्रिणाम् ॥२॥ तत्र प्राप्तं विदित्वा च वत्सेशं सपरिच्छदम्। अवस्कन्दभयाच्छङ्की चकंपे मगधेश्वरः ॥३॥ यौगन्धरायणोपान्तं स्वबुद्धिविससर्ज च। स दूतं सोऽपि सम्मन्त्र्य कार्यशोऽभिननन्द तम् ॥४॥ वत्सेश्वरोऽपि निवसंस्तस्मिन्देशे दवीयसीम्। आखेटकार्थमटवीमटति स्म दिने दिने ॥५॥ एकस्मिन् दिवसे तस्मिन् राज्ञ्याखेटकं गते। कर्तव्यसविदं कृत्वा गोपालकसमन्वितः ॥६॥ यौगन्धरायणो धीमान् सङ्क्रमय्यवसन्तकः। देव्या वासवदत्ताया विजने निकटं ययौ ॥७॥ तत्र तां राजकार्येऽत्र साहाय्ये तदाद्युक्तिभिः। प्रह्वामभ्यर्थयामास भ्रात्रा पूर्वं प्रबोधिताम् ॥८॥ सानुमेने च विरह-क्लेश-दायितवात्मनः। किं नाम न सहन्ते हि भर्तृभक्ताः कुलाङ्गनाः ॥९॥ ततस्तां ब्राह्मणीरूपां देवीं यौगन्धरायणः। स चकार कृती दत्त्वा योगं रूपविवर्त्तनम् ॥१०॥ वसन्तकं च कृतवान् काणं बटुकरूपिणम्। आत्मना च तथैवाभूत्स्थविर-ब्राह्मणाकृतिः ॥११॥ तथा रूपां गृहीत्वाथ तां देवीं स महामतिः। वसन्तकसखः स्वरं प्रतस्थे मगधान् प्रति ॥१२॥ तथा वासवदत्ता सा स्वगृहाद्विर्गता सती। जगाम्बिपतनं भर्त्तारं पन्थानं वपुषा पुनः ॥१३॥ तन्मन्दिरमथादीप्य दह्यतेन रुमण्वता। हा हा वसन्तकयुता देवी दग्धेत्यघोषयत् ॥१४॥ तया च बहुमात्रन्दो रुमं तत्रोदतिष्ठताम्। शमं शशाम वह्नो न पुन' क्रन्दितध्वनिः ॥१५॥
तृतीय लम्बक २५१
तृतीय लम्बक २५१ द्वितीय सरग राजा उदयन और पद्मावती के विवाह की कथा नारद मुनि के प्रस्थान करने पर यौगन्धरायण आदि मन्त्री पूर्व-निर्धारित राजा को रानी के साथ लावानक ग्राम ले गये ॥१॥ राजा उदयन चारों ओर फैलते हुए सेना के सदस्यों के साथ लावानक पहुँचा। सेना की कलकल ध्वनि से वह स्थान मानो मन्त्रियों की सफलता की घोषणा कर रहा था ॥२॥ सीमा पर सेना के साथ आये हुए उदयन का पता पाकर मगध का राजा आक्रमण के भय से काँप उठा ॥३-४॥ वत्सराज भी वहाँ रहते हुए शिकार के लिए प्रतिदिन गहरे वनों में घूमता था ॥५॥ मगध-नरेश ने सद्भावना-प्रदर्शन के लिए यौगन्धरायण के पास अपना दूत भेजा। उस चतुर मन्त्री ने भी दूत का समुचित रूप से अभिनन्दन किया ॥६॥ वासवदत्ता के जलने की कथा एक दिन राजा उदयन के शिकार के लिए चले जाने पर यौगन्धरायण गोपालक रुमण्वान और वसन्तक के साथ समिति करके एकान्त में वासवदत्ता के समीप गया। भाई द्वारा पहले ही तैयार की गई रानी से उसने राजकार्य में सहायता के लिए भिन्न-भिन्न प्रकार की बातें समझाई ॥७-८॥ वासवदत्ता ने उस अत्यन्त विरह-क्लेश देनेवाली योजना को भी राजा के अभ्युदय के लिए स्वीकार कर लिया। पतिभक्त कुल-रमणियाँ पति के लिए कौन-सा कष्ट सहन नहीं करती ॥९॥ तब राजनीति-कुशल यौगन्धरायण ने वेश बदलने का सामान देकर वासवदत्ता को ब्राह्मणी का रूप धारण कराया ॥१०॥ वसन्तक को काने ब्रह्मचारी शिष्य का रूप धारण कराया और स्वयं बूढे ब्राह्मण का रूप धारण किया ॥११॥ इस प्रकार कृत्रिम वेष से यौगन्धरायण उन दोनों को साथ लेकर धीरे-धीरे मगध देश की ओर चला ॥१२॥ उस रूप में घर से निकली हुई वासवदत्ता मन से पति की ओर और शरीर से मगध-मार्ग की ओर चली ॥१३॥ उन तीनों के चले जाने पर दूसरे मन्त्री रुमण्वान् ने लावानक के राजगृह में आग लगा दी और यह घोषणा कर दी कि वसन्तक के साथ महारानी जल गईं। समूचे लावानक में आग और क्रन्दन की ध्वनि एक साथ ही उठी। आग धीरे-धीरे दब गई, किन्तु क्रन्दन-ध्वनि बन्द न हुई ॥१४-१५॥
२६२ कथासरित्सागर
२६२ कथासरित्सागर यौगन्धरायणः सोऽथ सह वासवदत्तया। वसन्तकेन च प्राप मगधाधिपतेः पुरम्॥१६॥ तत्रोद्यानगतां दृष्ट्वा समं ताभ्यामुपाययौ। पद्मावतीं राजसुतां वार्यमाणोऽपि रक्षिभिः॥१७॥ पद्मावत्याश्च दृष्ट्वैव ब्राह्मणीरूपधारिणीम्। देवीं वासवदत्तां तां वृत्तो प्रीतिरजायत॥१८॥ सा रक्षिणो निषिध्यैव ततो यौगन्धरायणम्। आनाययद्राजकन्या ब्राह्मणाकृतिमन्तिकम्॥१९॥ पप्रच्छ च महाब्रह्मन्! का ते बाला भवत्यसौ। किमर्थमागतोऽसीति सोऽपि तां प्रत्यभाषत॥२०॥ इयमावन्तिका नाम राजपुत्रि सुता मम। अस्याश्च भर्ता व्यसनी त्यक्त्वेमां कुत्रचिद् गतः॥२१॥ तदेतां स्थापयाम्यद्य तव हस्ते यशस्विनि। यावदामानयाम्यस्या गत्वाश्विष्याचिरात् पतिम्॥२२॥ भ्राता काणवटुश्वायमिहैवास्याः समीपगः। तिष्ठत्वेकाकिनीभावदुःखं येन न यात्यसौ॥२३॥ इत्युक्त्या राजतनयामङ्गीकृतवखास्तया। तामामन्त्र्य स सन्मन्त्रिी द्रुतं लावणकं ययौ॥२४॥ ततो वासवदत्तां तां स्थितामावन्तिकाख्यया। वसन्तकं चानुगतं तं काणवटुरूपिणम्॥२५॥ सहादाय कृतोदारसत्कारा स्नेहशालिनी। पद्मावती स्वभवनं विवेश बहुकौतुकम्॥२६॥ तत्र वासवदत्ता च प्रविष्टा चित्रभित्तिषु। पश्यन्ती रामचरिते सीतां सहे निजव्यथाम्॥२७॥ आश्वस्या सोष्ठुमार्येण दायमाद्यनसोष्ठवैः। शरीरसौरभन्तापि नीलोत्पलमुगन्धिना॥२८॥ तामुत्तमां विनिश्चित्य महार्हरत्नमन्त समैः। पद्मावती यथाकाममुपचारैरपाहरत्॥२९॥ अचिन्तयच्च काप्येषा छन्ना नूनमिह स्थिता। गूढा हि द्रौपदीत्यासीद् विराटवसताविति॥३०॥
तृतीय लम्बक २६३
तृतीय लम्बक २६३ उधर यौगन्धरायण उन दोनों को साथ लिए हुए मगध-नरेश की राजधानी में प्रविष्ट हुआ॥१६॥ वहाँ राजकुमारी को उद्यान में घूमते देखकर सिपाहियों के रोकने पर भी यौगन्धरायण उन दोनों के साथ अन्दर घुस गया॥१७-१८॥ पद्मावती ने उधर देखा और वासवदत्ता की ओर उसकी आँखें बरबस उलझ गईं तथा उसके प्रति प्रेम उत्पन्न हो गया। उसने सिपाहियों को मना करके उस ब्राह्मणी के रूप में स्थित राजकन्या को अपने समीप बुलाया। और बूढ़े ब्राह्मण से पूछा कि हे ब्रह्मदेव ! यह बालिका कौन है ? तथा यहाँ मेरे पास किस लिए आये हो ? यौगन्धरायण ने उत्तर दिया। हे राजकुमारी ! यह अवन्तिका नाम की मेरी बेटी है। इसका व्यसनी पति इसे छोड़ कर कहीं चला गया। इसलिए इसे मैं तुम्हारे हाथ सौंपता हूँ। तब तक उस जामाता को शीघ्र ही ढूँढ़ कर लाता हूँ ॥१९-२२॥ इसका भाई यह कानबटु भी जब तक इसके पास ही रहेगा जिससे इसे अकेलेपन का कष्ट-अनुभव न हो ॥२३॥ ऐसा सुनकर पद्मावती ने बूढ़े ब्राह्मण की प्रार्थना स्वीकार कर ली और वह बूढ़ा यौगन्धरायण पद्मावती से आज्ञा लेकर लावणक लौट आया ॥२४॥ उसके जाने पर स्नेहशीला पद्मावती अवन्तिका का उदार हृदय से स्वागत करके काने के साथ कानबटु और वासवदत्ता को अपने आश्चर्यमय भवन में ले गई॥२५-२६॥ राज-भवन में जाकर दीवारों पर लिखे हुए रामचरित के चित्रों को देखकर विरह-वेदना को सीता के समान सहन करने लगी ॥२७॥ स्वरूप से सुकुमारता से उठने-बैठने सोने आदि के सुन्दर ढंग से नील कमल के समान शरीर की सुगन्धि से उसे उच्च श्रेणी की महिला समझकर पद्मावती उसके साथ अपने ऐसे राजोचित व्यवहार करने लगी और मन में सोचती थी कि यह कोई (छिपाई हुई) रमणी है जैसे विराट् के राजभवन में द्रौपदी छिपी थी ॥२८-३०॥
अथ वासवदत्तास्याश्चक्रे देव्याः प्रसङ्गतः। अम्लानमालातिलको वत्सेशात्पूर्वशिक्षितौ ॥३१॥ तद्भूषितां च दृष्ट्वा तां माता पद्मावतीं रहः। पप्रच्छ मालातिलको केनेमौ निर्मिताविति ॥३२॥ ऊचे पद्मावती चेनामत्र मन्मन्दिरे स्थिता। लाविडावन्तिका नाम तया कृतमिदं मम ॥३३॥ तच्छ्रुत्वा सा बभाषे तां मातापुत्रि ! न सा हि सा। मानुषी कापि देवी सा यस्या विज्ञानमीदृशम् ॥३४॥ देवता मुनयश्चापि वञ्चनार्थं सतां गृहं। तिष्ठन्त्येव सथा चैतामत्र पुत्रि ! कथां शृणु ॥३५॥ कुन्तीकथा बभूव कुन्तिभोजाख्यो राजा तस्यापि वेश्मनि। आगत्य तस्थौ दुर्वासा वञ्चनैकरसो मुनिः ॥३६॥ स तस्य परिचर्यार्थं राजा कुन्तीं निजां सुताम्। आदिवेश मुनिं सापि यत्नेनोपचचार तम् ॥३७॥ एकदा स मुनिः कुन्तीं जिज्ञासुः सन्नभाषत। परमान्नं पचे शीघ्रं स्नात्वा यावदुपाम्यहम् ॥३८॥ इत्युक्त्वा त्वरितं स्नात्वा स परिभोक्तुमाययौ। कुन्ती तदन्नपूर्णां च तस्मै पात्रीमढौकयत् ॥३९॥ अतितप्तेन चान्नेन ज्वलन्तीमिव तां मुनिः। मत्वा हस्तप्रहायोग्यां कृत्वा पृष्ठे धृतं वदौ ॥४०॥ सापि पृष्ठेन तां पात्रीं दधौ सम्बाधया मुनेः। ततः स बुभुजे स्वच्छं कुन्तीपृष्ठं त्वदह्यत ॥४१॥ दह्यमानापि गाढं सा यत्तस्याप्यविकारिणी। तेन तुष्टो मुनिर्मुक्त्वा ददौ तस्यास्ततो वरम् ॥४२॥ इत्यासीत्स मुनिस्तत्र तथैषावन्तिकापि ते। तद्भावेन स्थिता कापि तत्त्वमाराधयत्यिमाम् ॥४३॥ इति मातुर्मुखाच्छ्रुत्वा पद्मावत्यन्यरूपिणीम्। तत्र वासवदत्तां तां सुतरां बहुमन्यत ॥४४॥ सापि वासवदत्तात्र निजनामविनाकृता। तस्थौ विधुरबिच्छाया निशीथेनेव पद्मिनी ॥४५॥
तृतीय लम्बक २६५
तृतीय लम्बक २६५ वासवदत्ता भी वत्सराज से सीखी हुई एवं कभी न मुरझाने वाली माला और तिलक- रचना से पद्मावती को प्रसन्न करती थी। उसकी माला और तिलक-रचना को देखकर पद्मावती की माता ने एकान्त में उससे पूछा कि यह माला और तिलक की रचना किसने की है ॥३१-३२॥ पद्मावती ने कहा कि मेरे भवन में अवन्तिका नाम की एक महिला ठहरी है। उसी ने यह मेरी तिलक रचना की है। यह सुनकर माता ने पद्मावती से कहा—बेटी! यदि ऐसा है तो वह मानुषी नहीं है वरन् देवी है, जो ऐसा विज्ञान जानती है। देवता और मुनि भी कभी-कभी ठगने के लिए लोगों के घरों में आ जाते हैं। इस प्रसंग में यह एक कथा सुनो ॥३३-३५॥ कुन्ती और दुर्वासा की कथा प्राचीन समय में कुन्ती भोज नाम का एक राजा था। उसके घर में ठहरने के लिए दुर्वासा ऋषि आकर ठहरे ॥३६॥ राजा ने ऋषि की सेवा के लिए अपनी कन्या कुन्ती को नियुक्त किया। वह भी बड़ी ही सावधानी से ऋषि की सेवा करती थी ॥३७॥ एक बार उस मुनि ने कुन्ती की परीक्षा के लिए कहा—'तू खीर पका मैं स्नान करके आता हूँ। ऐसा कहकर और शीघ्र ही स्नान करके ऋषि आ गये। कुन्ती ने खीर से भरी कड़ाही उनके सम्मुख उपस्थित की। अत्यन्त खौलती हुई (गरम-गरम) खीर को हाथ से खाने योग्य न समझकर ऋषि ने कुन्ती की पीठ पर दृष्टि डाली। कुन्ती ने भी ऋषि का मनोभाव समझकर उस कड़ाही को पीठ पर धारण कर लिया। तब ऋषि तो खीर खाने लगे किन्तु कुन्ती की पीठ जलने लगी। जलती हुई भी कुन्ती बिना हिल-डले अविचल भाव से बैठी रही उसके धैर्य से प्रसन्न होकर दुर्वासा ने उसे वरदान दिया। उसी दुर्वासा के समान यह अवन्तिका भी तेरे समीप देवता-रूप में है, तू इसकी भली-भाँति सेवा कर। माता के मुँह से ऐसा सुनकर पद्मावती वासवदत्ता से बहुत अधिक स्नेह करने लगी और अधिक सम्मान करने लगी। पतिविरहिता वासवदत्ता अर्धरात्रि की कमलिनी के समान दीन और मलिन रहती थी। कभी-कभी विदूषक वसन्तक की बालकों के समान विविध चेष्टाएँ, उस वियोगिनी के मुख पर मुस्कान का अवसर प्रदान करती थीं॥३८-४५॥ ३४
२६६ कथासरित्सागर
२६६ कथासरित्सागर वसन्तक-विकारादथ न ते व्यालोषिता मुहुः । मुखे तस्या वियोगिन्या स्मितस्यावसरं ददुः ॥४६॥ अत्रान्तरप्रविदूरतू भ्रान्त्वाखेटकभूमिषु । वत्सराजश्चिरादागात्सायं लावाणकं पुनः ॥४७॥ भस्मीभूतमपश्यच्च सप्रान्तःपुरमग्निना । देवीं दग्धां च शुश्राव मन्त्रिभ्यः सवसन्तकम् ॥४८॥ श्रुत्वैव चापतद् भूमौ मोहेन हृतचेतनः । तद्दुःखानुभव-क्लेशमपाकर्तुमिवेच्छता ॥४९॥ क्षणाच्च लब्धसंज्ञन् प्रजावाल हृदयं शुचा । आविष्ट इव सम्प्रत्य-देवी-दाहैकगाग्निना ॥५०॥ विरुरोद च दुःखार्तो देहत्यागकसम्मुखः । क्षणान्तरे स भूपतिः संस्मृत्यैतद्व्यचिन्तयत् ॥५१॥ विद्याधराधिपः पुत्रो वश्यास्तस्या भविष्यति । एतन्मे नारदमुनिर्भाषितं स्म न च तन्मृषा ॥५२॥ कश्चित्काल च दुःख मे तेनैव मुनिनोदितम् । गोपालकस्य भ्रातस्य शोकः स्वल्प इवेक्ष्यते ॥५३॥ यौगन्धरायणादीनां न चापामतिदुःखिता। दृश्यते तेन जाने सा देवी जीवत्यशङ्कन ॥५४॥ इय किमपि नीतिस्तु प्रयुक्ता मन्त्रिभिर्भवत् । अतो मम भवेज्जातु तया देव्या समागमः ॥५५॥ तत्पक्ष्याम्यत्र पर्यन्तं पर्यालोच्य स भूपतिः । निदधे हृदये धैर्यं बोध्यमानश्च मन्त्रिभिः ॥५६॥ गोपालकश्च संविश्य सद्ययावस्तु तत्क्षणम् । प्रजिघाय शतंपचार भृतिहेतोरलक्षितम् ॥५७॥ एवं गते स्ववृत्तान्ते लावाणकगतस्तदा । गत्वा मगधराजाय चारैः सर्वं निवेदितम् ॥५८॥ स तद्बुद्ध्वैव कालज्ञो वत्सराजाय तां सुताम् । दातुं पद्मावतीमेच्छत्पूर्वं सन्मन्त्रिणागिताम् ॥५९॥ ततो दूतमसन्नमभं वत्सेश्वराय सः । यौगन्धरायणायापि सन्दिवेश यधप्सितम् ॥६०॥ यौगन्धरायणोऽप्या च वत्सक्षोऽङ्गीचकार तत् । प्रच्छावितेतदर्थं स्याद्देवी जीविति चिन्तयन् ॥६१॥
तृतीय लम्बक २६७
तृतीय लम्बक २६७ उधर शिकार के लिए दूर-दूर जंगलों का चक्कर लगाकर उदयन बहुत विलम्ब से लावणक को लौटा। लौटने पर उसने रानी के महल को आग से जला हुआ देखा और मन्त्रियों से महारानी का वसन्तक के साथ जल जाना भी सुना। सुनते ही राजा मूर्च्छित होकर भूमि पर गिर पड़ा। कुछ समय बाद होश में आने पर शोक से हृदय में जलने लगा और महारानी को जलानेवाली अग्नि में जलकर प्राण-त्याग के लिए उद्यत हुआ ॥४९-५१॥ कुछ समय के अनन्तर कुछ स्मरण करके सोचने लगा कि 'इस रानी से मेरा पुत्र उत्पन्न होगा जो विद्याधरों का राजा होगा—ऐसा नारद मुनि ने कहा था वह झूठ नहीं हो सकता ॥५०-५२॥ मुनि ने यह भी कहा था कि कुछ समय तक कष्ट झेलना पड़ेगा। और रानी के भाई इस गोपालक को भी अधिक शोक नहीं मालूम देता॥५३॥ यौगन्धरायण आदि मन्त्री भी अत्यन्त दुःखी नहीं दीखते। इससे यह कल्पना होती है कि रानी जीवित हो जाय यह सम्भव है॥५४॥ मेरे मन्त्रियों ने यह किसी नीति का प्रयोग किया हो यह भी सम्भव है। अतः कभी-न- कभी देवी के साथ समागम हो सकता है॥५५॥ तो अब मैं इस घटना का अन्त देखता हूँ—ऐसा सोचकर मन्त्रियों द्वारा आश्वासित राजा हृदय में धैर्य धरकर कुछ शान्त हुआ॥५६॥ लावणक में यह दुर्घटना होने पर लावणक स्थित गुप्तचरों ने यह समाचार मगध-नरेश के समीप पहुँचाया। समय-ज्ञ मगधराज ने भी इस अवसर का उपयुक्त समझकर अपनी कन्या पद्मावती देने की इच्छा की जिसे वत्सराज के मन्त्री यौगन्धरायण ने पहले ही माँगा था। मगधेश ने अपने गुप्त दूतों द्वारा अपने धैर्य के लिए यौगन्धरायण को भी संदेश भेजा ॥५७-६०॥ वत्सराज ने यह सोचकर कि 'यौगन्धरायण ने कदाचित् वासवदत्ता को छिपा रखा हो' इसलिए यौगन्धरायण का प्रस्ताव स्वीकार करके पद्मावती से विवाह करना स्वीकार कर लिया॥६१॥
२१८ कथासरित्सागर
२१८ कथासरित्सागर
ततो लग्नं विनिर्दिश्य तूर्ण योगन्धरायणः । तस्मै मगधराजाय प्रतिदूतं व्यसर्जयत् ॥६२॥ त्वदिच्छाङ्गीकृतास्माभिस्तदितः सप्तमे दिने । पद्मावतीविवाहाय वत्सेशोऽप्यागमिष्यति ॥६३॥ शीघ्रं वासवदत्तां च येनासौ विस्मरिष्यति । इति चास्मै महामन्त्री सन्दिदेश स भूभृते ॥६४॥ प्रतिदूतः स गत्वा च यथासन्दिष्टमभ्यधात् । ततो मगधराजाय स चाप्यभिननन्द तम् ॥६५॥ ततः स दुहितृस्नेहनिजच्छाभिवर्धितम् । विवाहोत्सव-सम्भारं चकार मगधेश्वरः ॥६६॥ सा चाभीष्टवरश्रुत्या मुदं पद्मावती ययौ । प्राप वासवदत्ता च तद्वार्ताश्रवणान्त्सुदम् ॥६७॥ सा मार्त्ता क्षणमागत्य तस्या वैवर्ण्यादायिनी । प्रच्छन्नवासवैरूप्यसाहाय्यनमिवार्करोत् ॥६८॥ दृप्तं मित्रीकृतं दातुनं च भर्त्तान्यया त्वयि । वसन्तकोऽतिरित्यस्याः सखीव विदधे धृतिम् ॥६९॥ अथासन्नविवाहायाः पद्मावत्या मनस्विनी । अम्लानमालातिलको दिव्यो भूयश्चकार सा ॥७०॥ ततो वत्सेश्वरस्तत्र सम्प्राप्ते सप्तमेऽहनि । ससैन्यो मन्त्रिभिः साकं परिणेतुं किलाययौ ॥७१॥ मनसापि तदुद्योगे विरष्टौ स कथं स्पृशन् । देवीं लभेय तामेवमित्याशा न भवेद्यदि ॥७२॥ प्रत्युद्ययौ च तं सद्यः सानन्दो मगधेश्वरः । प्रदानेनोत्सवं चन्द्रमुदयस्त्यमिवाम्बुधिः ॥७३॥ विवेशाथ स वत्सेशो मगधाधिपतेः पुरम् । समन्तात्पौरलोकस्य मानसं च महोत्सवः ॥७४॥ विरहक्षामवपुषं मनःसम्मोहदायिनम् । ददृशुस्तत्र नार्य्यस्तं रतिहीनमिव स्मरम् ॥७५॥ प्रविश्य मगधेशस्य वत्सेशोऽप्यथ मन्दिरम् । सभाषं पतिवत्नीभिः कौतुकागारमाम्यौ ॥७६॥
तृतीय लम्बक २६१
तृतीय लम्बक २६१ यौगन्धरायण ने तुरन्त लग्न लिखवाकर मगधराज के पास अपना दूत भेजा कि 'हम लोगों ने आपका प्रस्ताव स्वीकार कर लिया। अतः आज के सातवें दिन वत्सराज विवाह के लिए आपके यहाँ बरात लेकर आयेगा' ॥६२ ६३॥ महामन्त्री ने यह भी कहलाया कि 'यदि राजा का विवाह शीघ्र ही हो जाय तो वह वासवदत्ता को भूल जायगा। मगधराज ने सन्देश सुनकर उसका अभिनन्दन किया और कन्या के स्नेह अपने उदार हृदय वैभव एवं मर्यादा आदि के अनुरूप विवाह की तैयारी में लग गया ॥६४-६६॥ पद्मावती मनचाहे अनुरूप पति के मिलने की आशा से प्रसन्न हुई और इस वृत्तान्त को सुनकर वासवदत्ता का हृदय शोक से सन्तप्त हो गया ॥६७॥ वासवदत्ता को मलिन कर देनेवाला यह समाचार, उसके गुप्तनिवास और विकृत परिस्थिति के लिए सहायक हुआ ॥६८॥ 'इस प्रकार यौगन्धरायण ने शत्रु को मित्र बना लिया पति का प्रेम तो तुमपर उसी प्रकार है' इत्यादि बातें समझाकर वसन्तक ने रानी को धैर्य बँधाया ॥६९॥ पद्मावती का विवाह कुछ समय के अनन्तर विवाह का समय समीप आने पर वासवदत्ता ने अम्लान माला और तिलक-रचना से पद्मावती को पुनः सजा दिया ॥७०॥ सात दिन व्यतीत होने पर वत्सराज उदयन अपने मन्त्रियों और सेनाओं के साथ विवाह के लिए मगध की राजधानी में धूमधाम से जा पहुँचा ॥७१॥ वत्सराज उदयन के मन में यदि यह आशा न होती कि वासवदत्ता प्राप्त हो जायगी तो वह इस विवाह-प्रपंच में मन से भी उत्साहित न होता ॥७२-७३॥ इधर राजा ने मगध की राजधानी में प्रवेश किया और उधर नागरिकों के हृदय में महान् आनन्द ने प्रवेश किया ॥७४॥ नागरिक स्त्रियों ने विरह से दुर्बल शरीरवाले तथापि मन को मोहन करनेवाले राजा को रति-हीन कामदेव के समान देखा। पुर प्रवेश के अनन्तर राजा राजमहल में जाकर सौभाग्यवती स्त्रियों से भरे हुए विवाहगृह (कौतुकागार) में पहुँचा ॥७५-७६॥
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तृतीय लम्बक २७१
तृतीय लम्बक २७१ वहाँ आकर राजा ने अपने पूर्णचन्द्र के समान मुख से पूर्णिमा के चन्द्र को लजानेवाली पद्मावती को देखा। उसके शरीर पर, अपनी दिव्य माला और तिलक देखकर उसे यह चिन्ता हुई कि ये वस्तुएँ इसे कैसे प्राप्त हुई ॥७७-७८॥ तदनन्तर विवाह-वेदी पर बैठकर उसने जो पद्मावती का हाथ पकड़ा वही मानों समस्त पृथ्वी के कर-ग्रहण का प्रारम्भ था ॥७९॥ यह वासवदत्ता के अतिरिक्त दूसरी पत्नी को देखना भी नहीं चाहता मानों इसीलिए धुएं ने उसकी आँखें बन्द कर दीं ॥८०॥ अग्नि की प्रदक्षिणा के समय धूएं से लाल पद्मावती का मुख मानों इसीलिए क्रोध से तमतमाने लगा था ॥८१॥ विवाह-विधि सम्पन्न हो जाने पर, वत्सराज ने वधू के हाथ को त्याग दिया। किन्तु हृदय से वासवदत्ता को नहीं छोड़ा। विवाह के दहेज में मगध-नरेश ने राजा को इतने रत्न भेंट किय कि मालूम होता था कि समूची पृथ्वी के रत्न दुह लिये गये ॥८२-८३॥ उसी अवसर पर यौगन्धरायण ने अग्नि को साक्षी करके मगधेश्वर से यह विश्वास प्राप्त किया कि वह जामाता वत्सराज से कभी भी विरोध न करेगा ॥८४॥ विवाहोत्सव में कपडे और गहने बाँटे गये चारणों ने सुन्दर गीत गाये और वेश्याओं ने नृत्य किये ॥८५॥ पति का अभ्युदय चाहनेवाली वासवदत्ता खोई हुई की तरह एकान्त में स्थित होकर उस समय वैसी प्रतीत होती थी जैसी दिन में चन्द्रमा की कान्ति ॥८६॥ तब अन्तःपुर में वत्सराज उदयन के आ जाने पर बुद्धिमान यौगन्धरायण को आशंका हुई कि कहीं राजा वासवदत्ता को न देख ले ॥८७॥ वासवदत्ता के छिपाने का मन्त्र भंग न हो जाय इस भय से यौगन्धरायण ने मगधेश से कहा कि राजा आज ही तुम्हारे यहाँ से विदा हो जायगा ॥८८॥ मगध-नरेश ने इसे स्वीकार कर लिया उसी प्रकार वत्सराज ने भी इसे स्वीकार किया ॥८९॥ बारातियों के खाने-पीने के अनन्तर वत्सराज उदयन क्षत्रियों के साथ पद्मावती को लेकर लौट आया ॥९०॥
पद्मावत्या विसृष्टं च सुखमारुह्य वाहनम्। तयैव च समादिष्टैस्तन्महत्तरकैः सह ॥९१॥ आगाद् वासवदत्तापि गुप्तं सैन्यस्य पृष्ठतः। क्रूराङ्गपविकृतं तं पुरस्कृत्य वसन्तकम् ॥९२॥ क्रमाल्लावाणकं प्राप वत्सेशो वसतिं निजाम्। प्रविवेश समं यध्वा ववी विसतस्तु क्वस ॥९३॥ एत्य वासवदत्तापि सा गोपालकमन्दिरम्। विवक्षाथ निशीथ च परिसंस्थाप्य महत्तरान् ॥९४॥ तत्र गोपालकं दृष्ट्वा भ्रातरं दर्शितादरम्। कण्ठे जग्राह रुदती बाष्पव्याकुललोचनम् ॥९५॥ तत्क्षणं स्थितसन्निध्व तत्र यौगन्धरायणः। आययौ सप्रमम्दकस्तया देव्या कृतादरः ॥९६॥ सोऽस्याः प्रोत्साहविश्लेषद्वेषं यावद्व्यपोहति। तावत्पद्मावती-पार्श्वं प्रत्यूस्ते महत्तराः ॥९७॥ आगतावन्तिका देवि किमप्यस्मान्विहाय तु। प्रविष्टा राजपुत्रस्य गृहं गोपालकस्य सा ॥९८॥ इति पद्मावती सा तैर्विज्ञप्ता स्वमहत्तरैः। वत्सश्वराग्रे साशङ्का तानेव प्रत्यभाषत ॥९९॥ गच्छन्तावन्तिकां ब्रूध निक्षेपस्त्वं हि मे स्थिता। तदत्र किं ते यन्नाह तत्रैवागम्यतामिति ॥१००॥ तच्छ्रुत्वा तेषु यातेषु राजा पद्मावतीं रहः। पप्रच्छ मालातिलकौ केनेमौ तौ कृताविति ॥१०१॥ सावोचदथ मद्गेहे न्यस्ता विप्रेण कश्चित्। भावन्तिकाभिधा यैषा तस्याः शिल्पमिदं महत् ॥१०२॥ तच्छ्रुत्वैव स वत्सशो गोपालगृहमाययौ। नूनं वासवदत्ता सा भवेदत्रेति चिन्तयन् ॥१०३॥ प्रविवेश च गत्वा तद्द्वारस्थितमहत्तरम्। अन्तस्तद्देवीगोपालकमन्त्रिव्रयवसन्तसम् ॥१०४॥ तत्र वासवदत्तां तां ददर्श प्रोषितागताम्। उपक्तञ्जनिर्मुक्तां मूर्तिं चान्द्रमसीमिव ॥१०५॥
तृतीय लम्बक २७३
तृतीय लम्बक २७३ पद्मावती के द्वारा दिये गये सुन्दर रथ पर सखी के नौकरों के साथ वासवदत्ता भी सेना के पीछे रथ बदलते हुए वसन्तक को आगे बैठाकर गुप्त रूप से चली ॥९१-९२॥ क्रमशः वत्सराज अपने निवास-स्थान लावानक नामक गाँव में पहुँचा और नवीन वधू पद्मावती के साथ राज-भवन में प्रविष्ट हुआ किन्तु वासवदत्ता के हृदय में अकेला ही प्रविष्ट हुआ ॥९३॥ वासवदत्ता भी आधी रात के समय सवारियों को ठहराकर अपने भाई गोपालक के निवास स्थान (डेरे) में चली गई ॥९४॥ सबसे पीछे आती हुई वासवदत्ता ने भी लावानक में पहुँचकर भाई गोपालक का स्वागत करते हुए देखा और रोते हुए भाई के गले से लिपटकर रोने लगी ॥९५॥ उसी समय इस योजना का नेता यौगन्धरायण रुमण्वान् के साथ आया और वासवदत्ता ने उसका स्वागत किया। इधर यौगन्धरायण उधर वासवदत्ता के कष्ट के प्रति महानुभूति प्रकट कर रहा था और उधर वासवदत्ता के पहरेदार पद्मावती के पास पहुँचे। और उन्होंने कहा 'देवि ! अवन्तिका हमलोगों के साथ आई, किन्तु यहाँ आते ही हमलोगों को छोड़कर वह राजकुमार गोपालक के घर में चली गई' ॥९६-९८॥ वत्सराज के सामने ही पहरेदारों (सवारों) द्वारा इस प्रकार निवेदित पद्मावती सशंक होकर उनसे बोली—'जाओ अवन्तिका से कहो कि तुम मेरे पास धरोहर के रूप में रखी गई हो इसलिए वहाँ तुम्हारा क्या है ? जहाँ मैं हूँ वहीं तुम भी रहो। जाओ' ॥९९-१००॥ यह सुनकर उनके चले जाने पर राजा ने एकान्त में पद्मावती से पूछा कि 'तुम्हें यह माला और तिलक किसने दिया ? ॥१०१॥ पद्मावती बोली—'किसी ब्राह्मण ने मेरे पास अवन्तिका नाम की एक कन्या धरोहर के रूप में रखी है उसी की यह कारीगरी है ॥१०२॥ यह सुनकर उदयन वहाँ से उठकर सीधे गोपालक के घर पर आया कि अवश्य ही वासवदत्ता उसके घर पर होगी ॥१०३॥ राजा पहरा लगे हुए गोपालक के द्वार पर पहुँचा। अन्दर वासवदत्ता गोपालक यौगन्धरायण रुमण्वान् और वसन्तक बैठे हुए थे। वहाँ उसने हृदय में मुख्य चन्द्र-मूर्ति के समान प्रकाश से लीपी हुई वासवदत्ता को देखा ॥१०४-१०५॥ ३५
२७४ कथासरित्सागर
२७४ कथासरित्सागर पपाताथ महीपृष्ठे स शोकद्विपविह्वलः। कम्पो वासवदत्ताया हृदये स उदपद्यत॥१०६॥ सत साप्यपतद् भूमौ गात्रैर्विरहपाण्डुरैः। विललाप च निन्दन्ती सदाचरितमात्मनः॥१०७॥ अथ तौ दम्पती शोकदीनौ रक्षितुंस्तदा। यौगन्धरायणोऽभ्यासीद् वाष्पधौतमुखो यथा॥१०८॥ तथाविधं च सङ्क्रुत्त्वा काले सोत्साहसं तदा। पद्मावत्यपि तत्रैव साकुला समुपागमत्॥१०९॥ श्रमादवगतार्था च राजवासवदत्तयोः। तुल्यावस्थय माप्यासीत्स्निग्धमुग्धा हि सन्प्रियः॥११०॥ किं जीवितेन मे कार्यं भर्तुर्दुःखप्रदायिना। इति वासंवदत्ता च जगाद रुदती मुहुः॥१११॥ मगधपसुतालाभान्नासौ साम्राज्यशंसिना। श्रुतमद्यमया न्व्वै! दय्या दोषो न कञ्चन॥११२॥ इयं स्वस्या मपत्यज्य प्रयास धीरभाषिणी। इत्युवाचाथ यत्नेन धीरो योगन्धरायणः॥११३॥ अहमत्र विनाम्यग्नावस्याः शुद्धिप्रपादनः। इति पद्मावती तत्र जगादामरगराशया॥११४॥ अहमप्यापराध्यामि मन्युत श्मृग्सानयम्। मांडो दय्यापि हि कञ्चन इति राजाप्यभाषत॥११५॥ अग्निप्रवेशः कार्यो मे रामो ह्यन्योनुदयः। इति वासवदत्ता च यभाषे बडनिश्चया॥११६॥ ततश्च कृत्तिनां धूर्यो धीमान्योगन्धरायणः। भाषम्य प्राष्टमुग णुड इति वाष्पमुद्द्मन्॥११७॥ यद्यहं शिरसाज्ञा देवी शुद्धिमन्ये यदि। शून मां मोक्षणान्गत्त यहं त्यजाम्यहम्॥११८॥ इत्युक्त्वा विरम मर्ष्मन्त्व्या वागुन्भून्दिवः। भन्दग्ध्य मुञ्च ! दस्य मन्या योगन्धरायण॥११९॥ यन्दा वासवदत्ता च भार्या प्राग्जन्मजन्निता। स एव शङ्खवत्याख्या इत्युक्त्वा वागुपारमत्॥१२०॥
तृतीय लम्बक २७५
तृतीय लम्बक २७५ उसे देखते ही शोक के विष से व्याकुल राजा भूमि पर अचेत होकर गिर गया और वासवदत्ता के हृदय में कम्पन होने लगा। विरह से पीन और विवश अंगोंवाली वासवदत्ता भी उसी समय अचेत होकर गिर गई और अपने किये हुए कार्य के लिए विलाप करने लगी ॥१ ९-१०७॥ इस प्रकार दोनों दम्पती शोक से विकल होकर रोने लगे। यौगन्धरायण का मुँह भी आँसुओं से मानो धुल गया ॥१ ०८॥ इधर इस प्रकार का कोलाहल सुनकर व्याकुल पद्मावती भी वहाँ पहुँच गई ॥१ ०९॥ राजा और वासवदत्ता की हालत देखकर पद्मावती भी उन्हीं के समान शोकाकुल हो गई क्योंकि अच्छी स्त्रियाँ स्नेह-युक्त और सरल होती हैं ॥११ ०॥ पति को दुःख देनेवाले मेरे जीवन का क्या प्रयोजन ! इस प्रकार वासवदत्ता रोती हुई बार-बार प्रलाप करती थी ॥१११॥ मगध-नरेश की कन्या की प्राप्ति से तुम्हें साम्राज्य का लाभ हो—यह सोचकर मैंने यह सब कांड किया इसमें महारानी का कोई भी दोष नहीं। इसके प्रवास-काल में महासती के चरित्र की साक्षी स्वयं महारानी को सौंप पद्मावती है—इस प्रकार फूटकर यौगन्धरायण ने कहा ॥११२ ११३॥ विशुद्ध हृदया पद्मावती ने कहा कि वासवदत्ता की सच्चरित्रता को सिद्ध करने के लिए मैं स्वयं अग्नि में प्रवेश करने को उद्यत हूँ ॥११४॥ राजा ने कहा—'इस सारे अपराध का अपराधी एकमात्र मैं ही हूँ जिसके लिए महारानी ने इतना कष्ट-सहन किया ॥११५॥ वासवदत्ता ने दृढ़तापूर्वक कहा कि महाराजा की हृदय-शुद्धि के लिए मम अग्नि- प्रवेश करना चाहिए ॥११६॥ यह सब सुनकर धीरों में धन्य यौगन्धरायण पूर्व मुख बैठकर विशुद्ध मन से आचमन करके बोला—'हे लोकपालो ! यदि मैं राजा का हितकारी हूँ और महारानी भी सच्चरित्रा है तो आस्फोट वाणी हो नहीं तो मैं शरीर-त्याग करता हूँ ॥११७-११८॥ ऐसा कहकर यौगन्धरायण के मौन होने पर आकाशवाणी हुई—'वह राजा धन्य है, जिसके मन्त्री तुम्हारे ऐसे हैं और जिसकी स्त्री वासवदत्ता पूर्वजन्म की देवी है। इसमें कुछ भी दोष नहीं है ॥११९ १२ ० ॥
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