भारतकोश
कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५)

कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५)

महाकवि सोमदेव भट्ट द्वारा

स्रोत: कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1960 (उद्गम)

DevanagariHindipublished876 पृष्ठ

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तृतीय लम्बक २६७ उधर शिकार के लिए दूर-दूर जंगलों का चक्कर लगाकर उदयन बहुत विलम्ब से लावणक को लौटा। लौटने पर उसने रानी के महल को आग से जला हुआ देखा और मन्त्रियों से महारानी का वसन्तक के साथ जल जाना भी सुना। सुनते ही राजा मूर्च्छित होकर भूमि पर गिर पड़ा। कुछ समय बाद होश में आने पर शोक से हृदय में जलने लगा और महारानी को जलानेवाली अग्नि में जलकर प्राण-त्याग के लिए उद्यत हुआ ॥४९-५१॥ कुछ समय के अनन्तर कुछ स्मरण करके सोचने लगा कि 'इस रानी से मेरा पुत्र उत्पन्न होगा जो विद्याधरों का राजा होगा—ऐसा नारद मुनि ने कहा था वह झूठ नहीं हो सकता ॥५०-५२॥ मुनि ने यह भी कहा था कि कुछ समय तक कष्ट झेलना पड़ेगा। और रानी के भाई इस गोपालक को भी अधिक शोक नहीं मालूम देता॥५३॥ यौगन्धरायण आदि मन्त्री भी अत्यन्त दुःखी नहीं दीखते। इससे यह कल्पना होती है कि रानी जीवित हो जाय यह सम्भव है॥५४॥ मेरे मन्त्रियों ने यह किसी नीति का प्रयोग किया हो यह भी सम्भव है। अतः कभी-न- कभी देवी के साथ समागम हो सकता है॥५५॥ तो अब मैं इस घटना का अन्त देखता हूँ—ऐसा सोचकर मन्त्रियों द्वारा आश्वासित राजा हृदय में धैर्य धरकर कुछ शान्त हुआ॥५६॥ लावणक में यह दुर्घटना होने पर लावणक स्थित गुप्तचरों ने यह समाचार मगध-नरेश के समीप पहुँचाया। समय-ज्ञ मगधराज ने भी इस अवसर का उपयुक्त समझकर अपनी कन्या पद्मावती देने की इच्छा की जिसे वत्सराज के मन्त्री यौगन्धरायण ने पहले ही माँगा था। मगधेश ने अपने गुप्त दूतों द्वारा अपने धैर्य के लिए यौगन्धरायण को भी संदेश भेजा ॥५७-६०॥ वत्सराज ने यह सोचकर कि 'यौगन्धरायण ने कदाचित् वासवदत्ता को छिपा रखा हो' इसलिए यौगन्धरायण का प्रस्ताव स्वीकार करके पद्मावती से विवाह करना स्वीकार कर लिया॥६१॥