कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५)
महाकवि सोमदेव भट्ट द्वारा
स्रोत: कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1960 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंतृतीय लम्बक २५१ द्वितीय सरग राजा उदयन और पद्मावती के विवाह की कथा नारद मुनि के प्रस्थान करने पर यौगन्धरायण आदि मन्त्री पूर्व-निर्धारित राजा को रानी के साथ लावानक ग्राम ले गये ॥१॥ राजा उदयन चारों ओर फैलते हुए सेना के सदस्यों के साथ लावानक पहुँचा। सेना की कलकल ध्वनि से वह स्थान मानो मन्त्रियों की सफलता की घोषणा कर रहा था ॥२॥ सीमा पर सेना के साथ आये हुए उदयन का पता पाकर मगध का राजा आक्रमण के भय से काँप उठा ॥३-४॥ वत्सराज भी वहाँ रहते हुए शिकार के लिए प्रतिदिन गहरे वनों में घूमता था ॥५॥ मगध-नरेश ने सद्भावना-प्रदर्शन के लिए यौगन्धरायण के पास अपना दूत भेजा। उस चतुर मन्त्री ने भी दूत का समुचित रूप से अभिनन्दन किया ॥६॥ वासवदत्ता के जलने की कथा एक दिन राजा उदयन के शिकार के लिए चले जाने पर यौगन्धरायण गोपालक रुमण्वान और वसन्तक के साथ समिति करके एकान्त में वासवदत्ता के समीप गया। भाई द्वारा पहले ही तैयार की गई रानी से उसने राजकार्य में सहायता के लिए भिन्न-भिन्न प्रकार की बातें समझाई ॥७-८॥ वासवदत्ता ने उस अत्यन्त विरह-क्लेश देनेवाली योजना को भी राजा के अभ्युदय के लिए स्वीकार कर लिया। पतिभक्त कुल-रमणियाँ पति के लिए कौन-सा कष्ट सहन नहीं करती ॥९॥ तब राजनीति-कुशल यौगन्धरायण ने वेश बदलने का सामान देकर वासवदत्ता को ब्राह्मणी का रूप धारण कराया ॥१०॥ वसन्तक को काने ब्रह्मचारी शिष्य का रूप धारण कराया और स्वयं बूढे ब्राह्मण का रूप धारण किया ॥११॥ इस प्रकार कृत्रिम वेष से यौगन्धरायण उन दोनों को साथ लेकर धीरे-धीरे मगध देश की ओर चला ॥१२॥ उस रूप में घर से निकली हुई वासवदत्ता मन से पति की ओर और शरीर से मगध-मार्ग की ओर चली ॥१३॥ उन तीनों के चले जाने पर दूसरे मन्त्री रुमण्वान् ने लावानक के राजगृह में आग लगा दी और यह घोषणा कर दी कि वसन्तक के साथ महारानी जल गईं। समूचे लावानक में आग और क्रन्दन की ध्वनि एक साथ ही उठी। आग धीरे-धीरे दब गई, किन्तु क्रन्दन-ध्वनि बन्द न हुई ॥१४-१५॥