भारतकोश
कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५)

कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५)

महाकवि सोमदेव भट्ट द्वारा

स्रोत: कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1960 (उद्गम)

DevanagariHindipublished876 पृष्ठ

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तृतीय लम्बक २६५ वासवदत्ता भी वत्सराज से सीखी हुई एवं कभी न मुरझाने वाली माला और तिलक- रचना से पद्मावती को प्रसन्न करती थी। उसकी माला और तिलक-रचना को देखकर पद्मावती की माता ने एकान्त में उससे पूछा कि यह माला और तिलक की रचना किसने की है ॥३१-३२॥ पद्मावती ने कहा कि मेरे भवन में अवन्तिका नाम की एक महिला ठहरी है। उसी ने यह मेरी तिलक रचना की है। यह सुनकर माता ने पद्मावती से कहा—बेटी! यदि ऐसा है तो वह मानुषी नहीं है वरन् देवी है, जो ऐसा विज्ञान जानती है। देवता और मुनि भी कभी-कभी ठगने के लिए लोगों के घरों में आ जाते हैं। इस प्रसंग में यह एक कथा सुनो ॥३३-३५॥ कुन्ती और दुर्वासा की कथा प्राचीन समय में कुन्ती भोज नाम का एक राजा था। उसके घर में ठहरने के लिए दुर्वासा ऋषि आकर ठहरे ॥३६॥ राजा ने ऋषि की सेवा के लिए अपनी कन्या कुन्ती को नियुक्त किया। वह भी बड़ी ही सावधानी से ऋषि की सेवा करती थी ॥३७॥ एक बार उस मुनि ने कुन्ती की परीक्षा के लिए कहा—'तू खीर पका मैं स्नान करके आता हूँ। ऐसा कहकर और शीघ्र ही स्नान करके ऋषि आ गये। कुन्ती ने खीर से भरी कड़ाही उनके सम्मुख उपस्थित की। अत्यन्त खौलती हुई (गरम-गरम) खीर को हाथ से खाने योग्य न समझकर ऋषि ने कुन्ती की पीठ पर दृष्टि डाली। कुन्ती ने भी ऋषि का मनोभाव समझकर उस कड़ाही को पीठ पर धारण कर लिया। तब ऋषि तो खीर खाने लगे किन्तु कुन्ती की पीठ जलने लगी। जलती हुई भी कुन्ती बिना हिल-डले अविचल भाव से बैठी रही उसके धैर्य से प्रसन्न होकर दुर्वासा ने उसे वरदान दिया। उसी दुर्वासा के समान यह अवन्तिका भी तेरे समीप देवता-रूप में है, तू इसकी भली-भाँति सेवा कर। माता के मुँह से ऐसा सुनकर पद्मावती वासवदत्ता से बहुत अधिक स्नेह करने लगी और अधिक सम्मान करने लगी। पतिविरहिता वासवदत्ता अर्धरात्रि की कमलिनी के समान दीन और मलिन रहती थी। कभी-कभी विदूषक वसन्तक की बालकों के समान विविध चेष्टाएँ, उस वियोगिनी के मुख पर मुस्कान का अवसर प्रदान करती थीं॥३८-४५॥ ३४