कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५)
महाकवि सोमदेव भट्ट द्वारा
स्रोत: कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1960 (उद्गम)
८८ कथासरित्सागर
८८ कथासरित्सागर
अयञ्च वर्धितोऽन्यासां सिंहीनां पयसा मया। अद्य चाहं विमुक्तोऽस्मि शापाद् बाणाहतस्त्वया ॥१०२॥ तद् गृहाण महासत्त्व मया दत्तममुं सुतम्। अयं ह्यर्थं समादिष्टस्तैरेव मुनिभि पुरा ॥१०३॥ इत्युक्त्वान्तर्हिते तस्मिन्सातनामनि गुह्यके। स राजा तं समादाय बालं प्रत्याययौ गृहम् ॥१०४॥ सातेन यस्मादूढोऽभूत्तस्मात् सातवाहनम्। नाम्ना चकार कालेन राज्ये चैनं न्यवेशयत् ॥१०५॥ ततस्तस्मिन्नातदण्ड्ये दीपकणौ क्षितीश्वरे। संवृत्त सार्वभौमोऽसौ भूपति सातवाहन ॥१०६॥ एवमुक्त्वा कथां मह्यं काणभूत्यनुयोगतः। गुणाढ्य प्रकृतं धीमाननुस्मृत्याब्रवीत्पुनः ॥१०७॥ सत कदाचिदभ्यागाद् वसन्तसमयोत्सवः। दर्पीकृत तमुद्यानं स राजा सातवाहनः ॥१०८॥ विहरन् सुचिरं तत्र महेन्द्र इव नन्दने। वापीजलेऽवतीर्णोऽभूत्क्रीडितुं कामिनीसखः ॥१०९॥ असिञ्चत्तत्र दयिताः सहेलं करवारिभिः। असिञ्चत स ताभिश्च वशाभिरिव वारणः ॥११०॥ मुक्तधौताञ्जनाताम्रनेत्रजङ्गर्जलाप्लुतैः । अङ्गैः सक्ताम्बरव्यक्तविभागैश्च तमाङ्गनाः ॥१११॥ विद्रुतपत्रतिलकाः स चक्र वनमध्यगाः। च्युताभरणपुष्पास्ताः मत्ता वायुरिव प्रियाः ॥११२॥ अथैका तस्य महिषी राज्ञः स्तनभराल्लसा। शिरीषसुकुमाराङ्गी क्रीडन्ती क्लममभ्यगात् ॥११३॥ सा जलैरभिषिञ्चन्तं राजानमसहा सती। अब्रवीन्मोदकैर्देव परिताडय मामिति ॥११४॥ तच्छ्रुत्वा मोदकान् राजा द्रुतमानाययद् बहून्। ततो विहस्य सा राज्ञी पुनरेवमभाषत ॥११५॥ राजन्नवसरः कोऽत्र मोदकानां जलान्तरे। उदकैः सिञ्च मा त्वं मामित्युक्तं हि मया तव ॥११६॥
इसलिए तुम इस महाबलवान् बालक को लो। यह बात पहले के ही शाप देनेवाले मुनिजी ने कही थी" ॥१ २-१ ३॥ ऐसा कहकर उस सात नामक यक्ष के अन्तर्धान हो जाने पर वह राजा उस बालक को लेकर लौट आया ॥१ ४॥ सात नामक यक्ष ने उसे उठा रखा था। अतः उस बालक का नाम सातवाहन रखा और समय आने पर उसे राज्य-सिंहासन पर बैठा दिया ॥१ ५॥ कुछ समय के बाद राजा दीपकणि के वन में चले जाने पर वह सातवाहन राजा सार्वभौम बन गया ॥१ ६॥ इस प्रकार कथा कहकर गालभूति के अनुरोध से बुद्धिमान् गुणाढ्य ने प्रसन्न सा पुनः स्मरण करके कहा ॥१ ७॥ कुछ समय के अनन्तर, वसन्तोत्सव के समय राजा सातवाहन उस देवी के बनाये हुए उद्यान में गया ॥१ ८॥ नन्दन-वन में महेन्द्र के समान बहुत काल तक उस उद्यान में अपनी रानियों के साथ विहार करता हुआ राजा सातवाहन बावली के जल में रानियों के साथ जलक्रीड़ा के लिए उतरा ॥१ ९॥ जल में वह रानियों को हाथ से फेंके हुए छींटों से सींचने लगा और रानियाँ भी उसे इस प्रकार सींचने लगीं जैसे हथिनियाँ हाथी को सींचती हैं ॥११ ॥ काजल के घुल जाने पर लाल नेत्रों से और पानी से वस्त्रों के अंगों में चिपक जाने के कारण स्पष्ट दीखते हुए शरीर-भिन्न अवयवों से वे राजा का मन-हरण करने लगीं ॥१११॥ वायु के समान राजा ने उन प्रियतमाओं को वन में लताओं के समान कर दिया। वन में वायु, लताओं के पत्र-रूपी तिलक को हटा देता है और पुष्यरूपी आभरणों से रहित कर देता है। उसी प्रकार राजा ने रानियों के पत्रावली-रूपी तिलक को पानी के छींटों की बौछार से धो डाला और पुष्पों के समान शोभित उनके आभरणों को उतरवा डाला ॥११२॥ जलक्रीड़ा करते-करते उस राजा की शिरीष पुष्प के समान एक सुकुमार रानी स्तन-भार से क्लान्त होकर खेलती-खेलती थक गयी ॥११३॥ वह रानी पानी के छींटों की बौछार करती हुई राजा से बोली— 'स्वामिन् ! मुझे पानी से मत मारो।' (मोदकैं — मा—मत उदकै —पानी से) ॥११५॥ यह सुनकर राजा ने जल्द ही बहुत-से लड्डू मँगवाये। तब रानी ने हँसकर फिर कहा— राजन्, पानी के अन्दर लड्डुओं की कौन तुक है? मैंने तो तुमसे कहा कि जल से मुझे मत सींचो ॥११६॥
९० कथासरित्सागर
९० कथासरित्सागर सन्धिमात्रं न जानासि माशब्दोदकशब्दयोः । न च प्रकरणं वेत्सि मूर्खस्त्वं कथमीदृशः ॥११७॥ इत्युक्तः स तया राज्ञा शब्दशास्त्रविदा नृपः । परिवारे हसत्यन्तर्लज्जाक्रान्तो झगित्युभूत् ॥११८॥ परित्यक्तजलक्रीडो वीतदर्पश्च तत्क्षणम् । जातावमानो निर्लक्षः प्राविशन्निजमन्दिरम् ॥११९॥ ततश्चिन्तापरो मुक्ताहारादिपराङ्मुखः । चित्रस्थ इव पृष्टोऽपि नैव किञ्चिदभाषत ॥१२०॥ पाण्डित्यं शरणं वा मे मृत्युर्वेति विचिन्तयन् । शयनीयपरित्यक्तगात्रः सन्तापवानभूत् ॥१२१॥ अकस्मादथ राज्ञस्तां दृष्ट्वावस्थां तथाविधाम् । किमेतदिति सम्भ्रान्तः सर्व परिजनोऽभवत् ॥१२२॥ ततोऽहं शर्ववर्मा च ज्ञातवन्तौ क्रमेण ताम् । अत्रान्तरं स च प्रायः पर्यहीयत वासरः ॥१२३॥ अस्मिन्काले न च स्वस्थो राजेत्यालोच्य तत्क्षणम् । आवाभ्यां राजहंसाख्य आहूतो राजचेटकः ॥१२४॥ शरीरवार्त्ता भूपस्य स च पृष्टोऽब्रवीदिदम् । नेदृशो दुर्मनाः पूर्वं दृष्टो देवः कदाचन ॥१२५॥ विष्णुशक्तिदुहित्रा च मिथ्यापण्डितया तया । विलक्षीकृत इत्याहुर्देव्योऽन्याः कोपनिर्भरम् ॥१२६॥ एतत्तस्य मुखाच्छ्रुत्वा राजचेटस्य दुर्मनाः । शर्ववर्मद्वितीयोऽहं तदादित्यचिन्तयम् ॥१२७॥ व्याधिर्यदि भवेद्राज्ञः प्रविशेयुश्चिकित्सकाः । आधिर्वा यदि तत्रास्य कारणं नोपलक्ष्यते ॥१२८॥ नास्त्यथ हि विपक्षोऽस्य राज्ये निहतकण्टके । अनुरक्ताः प्रजाश्चात्र न हानिः परिदृश्यते ॥१२९॥ तत्कस्मादेष सन्तापीदृशः सहसा प्रभो । एवं विचिन्तिते धीमाञ्छर्ववर्मेदमब्रवीत् ॥१३०॥ अहं जानामि राज्ञोऽस्य मन्युर्मोकानुतापजः । मूर्खोऽहमिति पाण्डित्यं तदेवाय हि वाञ्छति ॥१३१॥ १ आधिः = मानसो रोगः ।
प्रथम लम्बक ९१
प्रथम लम्बक ९१ तुम इतने मूर्ख हो कि 'मा' शब्द और उदक' शब्द की सन्धि भी नहीं जानते और न बातों का प्रसंग ही समझते हो। तुम कैसे मूर्ख हो?"॥११७॥ शब्दशास्त्र को जाननेवाली रानी से इस प्रकार धत्कारा गया राजा अन्यान्य रानियों के मन-ही-मन हँसने पर लज्जा से थक हो गया॥११८॥ ऐसी स्थिति में राजा हृतप्रभ होकर जलक्रीड़ा को छोड़कर अपमानित और मलिन-मुख होकर अपने भवन में चला गया॥११९॥ तब चिन्ताओं से चूर, भोजन आदि को छोड़कर राजा चित्र में खिंचा-सा पड़ गया। कुछ भी बोलता नहीं था॥१२०॥ पांडित्य की शरण में जाऊँ या मृत्यु की? ऐसा सोचता हुआ शय्या पर पड़ा हुआ राजा अत्यन्त सन्तप्त होने लगा॥१२१॥ राजा की अकस्मात् ऐसी अवस्था देखकर यह क्या हुआ ? —ऐसा सोचते हुए सभी सेवक-जन व्याकुल हो गये॥१२२॥ तब मैंने तथा शर्ववर्मा ने क्रमशः परिस्थिति को जाना। इतने में ही दिन समाप्त हो गया॥१२३॥ 'अब रात के समय अस्वस्थ राजा के पास जाना उचित नहीं —ऐसा विचारकर हम लोगों ने राजहंस नामक राजा के निजी सेवक को बुलवाया॥१२४॥ उससे राजा की शारीरिक अवस्था पूछने पर उसने कहा कि 'महाराज को इतना अस्वस्थ कभी नहीं देखा। अन्यान्य रानियों ने कहा कि 'झूठी पंडिता बनी हुई विष्णुशक्ति राजा की पुत्री ने महाराज को इतना अस्वस्थ कर दिया है' ॥१२५ १२६॥ राजा के निजी सेवक से यह सुनकर सर्ववर्मा के साथ मैंने यह सोचा॥१२७॥ यदि शारीरिक व्याधि होती तो वैद्यों का प्रवेश होता। यदि मानसिक व्याधि है, तो उसका कोई कारण मालूम नहीं होता॥१२८॥ कंटकों (विरोधियों) के शुद्ध कर देने के कारण उस राजा का शत्रु कोई नहीं है और प्रजा भी राजा के प्रति प्रेम रखती है। अतः राजा को कौन-सी मानसिक चिन्ता हो गई॥१२९॥ अतः 'अकस्मात् स्वामी को कौन-सा खेद उत्पन्न हुआ'—ऐसा सोचने पर बुद्धिमान् सर्ववर्मा बोला॥१३०॥ 'मैं जानता हूँ। इस राजा को मूर्खता के कारण पश्चात्ताप हुआ है, उसी के शोक से पीड़ित हैं। मैंने इसके इस आशय को पहले ही जान लिया है। 'मैं मूर्ख हूँ' यह समझकर राजा सदा पांडित्य चाहता है॥१३१॥
९२ कथासरित्सागर
९२ कथासरित्सागर उत्तरोत्थो मया दृष्टः पूर्वमेव सदाशयः। राज्ञाप्यमानितश्चाद्य सन्निमित्तमिति ध्रुवम् ॥१३२॥ एवमन्योन्यमालोक्य तौ रात्रिमतिवाह्य च। प्रातरावामगच्छाव वामदत्तं महीपते ॥१३३॥ तत्र गत्वस्य पृष्ठेऽपि प्रविशन् कथमप्यहम्। प्राविशं मम पश्चाच्च दासवर्मा रघूत्तमम् ॥१३४॥ उपविश्याथ निकटे क्षिप्रं पृष्टो मया नृप। अकारणं वधो दत्तो यस्मै विमना इति ॥१३५॥ मङ्क्त्वापि तपश्चामरं मूर्ध्नो मान्याहृत। दासवर्मा ततस्तेन मद्भूतं दास्यमब्रवीत् ॥१३६॥ धनं मम म्यागवादीति प्रागुक्तं यद् वे त्वया। तेनाहं कृतवानद्य व्यप्यमानवरा जिनि ॥१३७॥ स्वप्ने हतो मया दृष्टो नभोगन्यामम्बजम्। मदन च्छिन्दन् शराणि कुमारत विरानितम् ॥१३८॥ ततश्च निर्गता तस्माद्दिव्या स्त्री पद्यडाम्बरा। रूप देवं मृगं गां च प्रविष्टा गगनध्वजम् ॥१३९॥ इयद्दृष्ट्वा प्रबुद्धोऽस्मि मन्ये गां च गरण्डसी। दक्षस्य यत्न भावात् गच्छद्धिनं न मन्य ॥१४०॥ तच्च निशम्यैतत् शरद्मनि गच्छताम्। मामत्तमोन... गात्रान्... ॥१४१॥ शिखामत् प्रवरनं कान्तं विद्या गुमान्। अधिशेतनि तान्येताय वध्वा दया ॥१४२॥ मम मन विता द्यूता कमोन प्रतिमातः। विचर दि नू ममाद्य कायव्यथास्त्वि ॥१४३॥ ततोऽवदत् गच्छामीत्याभि गता। प्राप्तं सर्वविदानां मम दैवम् मां ॥१४४॥ सा तु निन्दामि त्वां पाखण्डिनं सहस्रिधा। ... गच्छं त्यक्त्वा विहायस्याम् ॥१४५॥ ततश्चिन्तां गतः सोऽथ तच्च वृत्तान्तमब्रवीत्। ... ॥१४६॥
प्रथम लम्बक ९१
प्रथम लम्बक ९१ आज उसी मूर्खता के कारण रानी से अपमानित हुआ है, यह मैंने सुना है॥१३२॥ इस प्रकार परस्पर विचार करते हुए उस रात को व्यतीत कर हमलोग प्रातःकाल राजा के निवास-स्थान पर गये ॥१३३॥ प्रवेश-निषेध रहते पर भी मैं अन्दर गया मेरे जाने पर धीरे-धीरे शर्ववर्मा भी आया ॥१३४॥ उसके पास बैठकर मैंने राजा से निवेदन किया कि 'हे महाराज आप अकारण ही स्वस्थ क्यों हैं? ॥१३५॥ मेरी बात सुनकर भी राजा उसी प्रकार मौन रहा। तब शर्ववर्मा ने यह अद्भुत वाक्य कहा ॥१३६॥ 'राजन् आपने मुझसे कभी सुना होगा। मैंने पहले भी आपसे कहा है। अतः आज मैंने स्वप्न-माणवक मंगाया ॥१३७॥ आज मैंने स्वप्न में देखा कि एक कमल आकाश से गिरा है। उसे किसी दिव्य कुमार ने विकसित किया और उसमें से श्वेतवस्त्रधारिणी एक स्त्री निकली जो महाराज ! आपके मुंह में चली गई॥१३८॥ इतना देखकर मैं जग गया। मैं समझता हूँ कि वह स्त्री सरस्वती देवी ही थी जो आपके मुख में प्रविष्ट हुई। इसमें तनिक भी सन्देह नहीं ॥१३९॥ इस प्रकार शर्ववर्मा के स्वप्न-वृत्तान्त बतलाने पर राजा मौन त्याग कर, स्मित भाव के साथ मुझसे बोला ॥१४०॥ 'मुझे विद्या के बिना यह लक्ष्मी अच्छी नहीं लगती। लकड़ी के गहनों के समान मूर्ख को इस वैभव से क्या लाभ ? ॥१४१॥ यत्नपूर्वक शिक्षा ग्रहण करता हुआ मनुष्य कितने समय में पांडित्य प्राप्त कर सकता है, यह मुझे बताओ' ॥१४२-१४३॥ तब मैंने राजा से कहा—'राजन्, सब विद्याओं का मूल नवीन व्याकरण बारह वर्षों में आता है॥१४४॥ लेकिन प्रभो मैं तुम्हें छह वर्षों में व्याकरण सिखा दूंगा। यह सुनकर शर्ववर्मा ईर्ष्या के साथ बोला ॥१४५॥ सुख में रहनेवाला राजा-जैसा व्यक्ति इतने समय तक पढ़ने का कष्ट कैसे उठा सकता है ? सो महाराज ! मैं तुम्हें छह महीनों में व्याकरण पढ़ा दूंगा ॥१४६॥
९४ कथासरित्सागर
यहाँ पृष्ठ का देवनागरी पाठ प्रस्तुत है:
९४ कथासरित्सागर श्रुत्वैवैतदसम्माष्य तमवोचमहं रुषा। षण्भिर्मासैस्त्वया देवः शिक्षितश्चेत्ततो मया॥१४७॥ संस्कृतं प्राकृतं तद्देशभाषा च सर्वदा। भाषात्रयमिदं त्यक्तं यन्मनुष्येषु सम्भवेत् ॥१४८॥ शर्ववर्मा ततोऽवादीन्न चैवं करोम्यहम्। द्वादशाब्दान्वहाम्येष शिरसा तव पादुके॥१४९॥ इत्युक्त्वा निर्गते तस्मिन्नहमप्यगमं गृहम्। राजाप्युभयतः सिद्धिं मत्वाश्वस्तो बभूव सः॥१५०॥ विहस्तः शर्ववर्मा च प्रतिज्ञां तां सुदुस्तराम्। पश्यन्सानुशयः सर्वं स्वभार्यायै शशंस तत्॥१५१॥ सापि तं दुःखितावोचत्सङ्कटेऽस्मिंस्तव प्रभो! । विना स्वामिकुमारं गतिरन्या न दृश्यते॥१५२॥ तथेति निश्चयं कृत्वा पश्चिमे प्रहरे निशि। शर्ववर्मा निराहारस्तत्रैव प्रस्थितोऽभवत् ॥१५३॥ तच्च चारमुखाद् बुद्ध्वा मया प्रातर्निवेदितम्। राज्ञे सोऽपि तदाकर्ण्य किं भवेदित्यचिन्तयत्॥१५४॥ ततस्तं सिंहगुप्ताख्यो राजपुत्रो हितोऽब्रवीत्। त्वयि खिन्ने तदा देव निर्वेदो मे महानभूत् ॥१५५॥ ततः श्रेयो निमित्तं ते चण्डिकाग्रे निजं शिरः। छेत्तुं प्रारब्धवानस्मि गत्वास्मान्नगराद् बहिः ॥१५६॥ मम कृपा मुपस्येच्छा सोत्स्यत्येवेत्यवारयत्। वागन्तरिक्षादथ मां तन्मध्य सिद्धिरस्ति ते॥१५७॥ इत्युक्त्वा नृपमामन्त्र्य सत्वरं शर्ववर्मणः। पदव्याञ्चारयन् सोऽथ सिंहगुप्तो व्यसर्जंयत् ॥१५८॥ सोऽपि भ्रातृमदा मन्मूलमौनं सुनिश्चित्य। प्राप स्वामिकुमारस्य शर्ववर्माम्तिकं क्रमात् ॥१५९॥ शरीरनिग्रहेण तपसा तत्र तापितः। प्रशान्तक्लेशस्य शान्तिभयो यदीप्सितम् ॥१६०॥ आगत्याग्रे तथा राज्ञे पादाभ्यां ग निवेन्ति । सिंहगुप्तविशिष्टाभ्यामुदय शर्ववर्मणः ॥१६१॥
इस अनहोनी बात को सुनकर मैंने क्रोध से शर्ववर्मा से कहा कि 'यदि तुम छह महीने में राजा को व्याकरण पढ़ा दोगे तो मैं संस्कृत प्राकृत और देशभाषा इन तीनों को सदा के लिए छोड़ दूंगा जो मनुष्यों की बोलचाल में आती हैं॥१४७-१४८॥ तब शर्ववर्मा ने कहा कि यदि मैं ऐसा न कर सकूँगा तो तुम्हारी पादुका को बारह वर्षों तक सिर पर उठाऊँगा ॥१४९॥ ऐसा कहकर शर्ववर्मा के चले जाने पर मैं भी अपने घर चला गया। राजा ने दोनों ओर से कार्य-सिद्धि समझकर धैर्य धारण किया॥१५०॥ प्रतिज्ञा से व्याकुल शर्ववर्मा ने अत्यन्त कठिन प्रतिज्ञा कर ली और उसने यह सारी बात अपनी स्त्री से कही॥१५१॥ शर्ववर्मा की स्त्री अत्यन्त दुःखित होकर बोली—'हे स्वामिन्! इस कठिन संकट के समय स्वामिकुमार के बिना दूसरी गति नहीं दीखती'॥१५२॥ शर्ववर्मा ने भी ऐसा ही निश्चय किया और रात के चौथे पहर में उठकर बिना भोजन किये कुमार कार्तिकेय के मन्दिर को चला॥१५३॥ मैंने भी गुप्तचर के द्वारा शर्ववर्मा का जाना जानकर प्रातःकाल राजा से कहा। राजा भी 'जाने क्या होगा' ऐसा सोचने लगा ॥१५४॥ तब सिंहगुप्त नामक राजपुत्र राजा से बोला कि 'हे महाराज! आपका अस्वास्थ्य देखकर उस समय मुझे महान् खेद हुआ॥१५५॥ और तब मैं नगर के बाहर चंडिका के मन्दिर में अपना सिर काटने के लिए उद्यत हुआ ॥१५६॥ इतने में ही आकाशवाणी ने कहा-ऐसा मत करो। राजा की इच्छा अवश्य ही पूरी होगी। इस प्रकार उसने मुझे रोक दिया। सो मेरी समझ से आपको सिद्धि प्राप्त होगी' ॥१५७॥ ऐसा कहकर और राजा से विचार करके सिंहगुप्त ने शर्ववर्मा के पीछे दो गुप्तचर छोड़ दिये ॥१५८॥ शर्ववर्मा भी केवल वायु-भक्षण करता हुआ मौनी और दृढ़निश्चयी होकर क्रमशः स्वामिकुमार के स्थान पर पहुँचा ॥१५९॥ शरीर की परवाह न करके किये गये कठोर तप से प्रसन्न होकर स्वामिकार्तिक ने शर्ववर्मा पर कृपा की और उसे अभीष्ट वर प्रदान किया ॥१६०॥ तब सिंहगुप्त के भेजे हुए अनुचरों ने राजा के सामने आकर शर्ववर्मा की सफलता बताई ॥१६१॥
१८ कथासरित्सागर
१८ कथासरित्सागर ततोऽध्वनि मनाक्छेषे जाते तीव्रतपः कृशः। क्लान्तः पतितवानस्मि निःसञ्ज्ञो धरणीतले ॥१५॥ उत्तिष्ठ पुत्र सर्वं ते सम्पत्स्यत इति स्फुटम्। शक्तिहस्तः पुमानन्ये जाने मामब्रवीत्तदा ॥१६॥ तेनाहममृतासारसिक्त इव तत्क्षणम्। प्रबुद्ध्य क्षुत्पिपासादिहीनः स्वस्थ इवाभवम् ॥१७॥ अथ देवस्य निकटं प्राप्य भक्तिभराकुलः। स्नात्वा गर्भगृहं तस्य प्रविष्टोऽभूवमुन्मनाः ॥१८॥ ततोऽन्त प्रभुणा तेन स्वप्ने मम दर्शनम्। दत्तं ततः प्रविष्टा मे मुखं मूर्त्ता सरस्वती ॥१९॥ अथासौ भगवात्साक्षात्षड्भिराननपङ्कजैः । 'सिद्धो वर्णसमाम्नाय' इति सूत्रमुदैरयत् ॥२०॥ तच्छ्रुत्वैव मनुष्यत्वसुलभाच्चापलाद् बत। उत्तरं सूत्रमप्यूह्य स्वयमेव मयोदितम् ॥२१॥ अथाब्रवीत्स देवो मां नावदिष्यः स्वयं यदि। अभविष्यदिदं शास्त्रं पाणिनीयोपमर्दकम् ॥२२॥ अधुना स्वल्पतन्त्रत्वात् कातन्त्राख्यं भविष्यति। मद्वाहहकलापस्य नाम्ना कालापकं तथा ॥२३॥ इत्युक्त्वा शब्दशास्त्रं तत्प्रकाश्याभिनवं प्रभुः। साक्षादेव स मां देवः पुनरेवमभाषत ॥२४॥ युष्मदीयः स राजापि पूर्वजन्मन्यभूदृषिः । भरद्वाजमुनेः शिष्यः कृष्णसखो महातपाः ॥२५॥ तुल्याभिलाषामालोक्य स चकां मुनिकन्यकाम्। यमाकस्तन्मातृपुण्येपुशरभ्रातरसङ्गताम् ॥२६॥ अतः स शप्तो मुनिभिरवतीर्ण इहाधुना। सा चावतीर्णा देवीत्वे तस्यैव मुनिकन्यका ॥२७॥ इत्थमुप्यवतारोऽस्य नृपतिः सातवाहनः । दृष्टे त्वय्यखिला विद्याः प्राप्स्यत्येष त्वदिच्छया ॥२८॥ मङ्गलारम्भा हि भवन्त्युत्तमार्था महात्मनाम् । जन्मान्तराजिता स्फारसंस्कारादिप्तसिद्धयम् ॥२९॥
प्रथम लम्बक. ९९
प्रथम लम्बक. ९९ जब स्वामि कार्तिक के मन्दिर का मार्ग कुछ ही शेष रह गया तब मैं कठोर तप (निराहार) से दुर्बल होकर थका हुआ अचेतन (बेहोश) होकर पृथ्वी पर गिर पड़ा ॥५॥ तब मुझे अचेतनावस्था में ऐसा लगा कि हाथ में पवित्र (अस्त्र) लिये हुए कोई पुरुष मुझे कह रहा है—'पुत्र उठो तुम्हारा सब कार्य सफल होगा' ॥६॥ अमृतवर्षा से सिंचन-सा मैं उस समय चैतन्य हुआ। भूख-प्यास नष्ट हो जाने के कारण मैं पुनः स्वस्थ-सा हो गया ॥७॥ भक्ति भाव से भरा हुआ मैं देवस्थल पर पहुँचकर और स्नान करके मन्दिर के आन्तरिक भाग में जाकर कुछ व्याकुल हो गया ॥८॥ मन्दिर के अन्तर्गृह में स्कन्द स्वामी ने मुझे दर्शन दिये। उनके दर्शन होते ही मेरे मुँह में साक्षात् मूर्त्तिमती सरस्वती ने प्रवेश किया ॥९॥ तदनन्तर भगवान् स्कन्द ने अपने छहों मुखकमलों से 'सिद्धो वर्णसमाम्नाय' यह सूत्र कहा ॥१०॥ यह सुनकर मानव-स्वभाव-सुलभ चञ्चलता से मैंने इसके आगे का सूत्र स्वयं अपनी कल्पना के आधार पर कह दिया ॥११॥ मेरे स्वयं सूत्र बोल देने पर स्कन्द स्वामी ने कहा कि यदि तुम मानव-स्वभाव-सुलभ चंचलता से स्वयं न बोल बैठते तो यह मेरा बनाया हुआ व्याकरण-शास्त्र पाणिनीय व्याकरण को नीचा दिखा देता ॥१२॥ अब यह स्वल्प विस्तार के कारण कातन्त्र के नाम से प्रसिद्ध होगा। मेरे वाहन मयूर के पक्षों के नाम पर इसका दूसरा नाम कालापक या कलाप भी होगा' ॥१३॥ ऐसा कहकर और अतिशय एवं संक्षिप्त व्याकरण को प्रकाशित करके स्कन्ददेव ने मुझसे फिर कहा—॥१४॥ 'वह तुम्हारा राजा (सातवाहन) पूर्वजन्म में परम तपस्वी कृष्ण नाम का ऋषि था और भरद्वाज मुनि का शिष्य था ॥१५॥ एक बार वह कृष्णमुनि अपनी ओर आवती किसी मुनि कन्या को देखकर सहसा कामवश हो गया ॥१६॥ इसी कारण मुनियों ने उसे शाप दिया और पृथ्वी पर मानव (सातवाहन) के रूप में अवतीर्ण हुआ और वही मुनि-कन्या उसकी महारानी के रूप में अवतीर्ण हुई है ॥१७॥ इस प्रकार यह राजा सातवाहन ऋषि का अवतार है। तुम्हें देखते ही तुम्हारी इच्छा से समस्त विद्याओं को प्राप्त कर लेगा ॥१८॥ पूर्वजन्म के उत्तम संस्कारों से प्राप्त सिद्धि के कारण भाग्यशाली व्यक्तियों के प्रयोजन बिना कष्ट या विघ्न के ही सिद्ध हो जाते हैं ॥१९॥
९६ कथासरित्सागर
९६ कथासरित्सागर तच्छ्रुत्वा मम राज्ञश्च विषादप्रमदौ द्वयोः । अभूतां मेघमालोक्य हंसचातकयोरिव ॥१६२॥ आगत्य शर्ववर्मापि कुमारवरसिद्धिमान् । चिन्तितोपस्थिता राज्ञे सर्वा विद्याः प्रदत्तवान् ॥१६३॥ प्रादुरासञ्च तास्तस्य सातवाहनभूपतेः । तत्क्षणं किं न कुर्याद्धि प्रसादः पारमेश्वरः ॥१६४॥ अथ तमखिलविद्यालाभमाकर्ण्य राज्ञः प्रमुदितवति राष्ट्रे तत्रकोऽप्युत्सवोऽभूत् । अपि पवनविधूतास्तत्क्षणोल्लास्यमानाः प्रतिवसति पताका बद्धनृत्ता इवासन् ॥१६५॥ राजार्हैरत्ननिचयैरथ शर्ववर्मा सम्भाषितो गुरुरिति प्रणतेन राज्ञा । स्वामीकृतश्च विषये भरुकच्छनाम्नि कूलोपकण्ठविनिवेशिनि नर्मदायाः ॥१६६॥ योऽभूच्चारमुखेन षण्मुखवरप्राप्तिं समाकर्णय- त्सन्तुष्ट्यात्मसमं धिया नरपतिस्तं सिंहगुप्तं व्यधात् । राज्ञीं तामपि विष्णुशक्तितनयां विद्यागमे कारणं देवीनामुपरि प्रसङ्गकृतवान्प्रीत्याभिषिच्य स्वयम् ॥१६७॥ इति महाकविश्रीसोमदेवभट्टविरचिते कथासरित्सागरे कथापीठलम्बके पञ्चमस्तरङ्गः ।
सप्तमस्तरङ्गः ततो गृहीतमौनोऽहं राजास्तिकमुपागमम् । तत्र च श्लोकमपठद्विजः कश्चित्स्वयं कृतम् ॥१॥ तं चाचष्ट स्वयं राजा सम्यक्संस्कृतया गिरा । तत्रालोक्य च तत्तस्या जनः प्रमुदितोऽभवत् ॥२॥ ततः स शर्ववर्माणं राजा सविनयोऽब्रवीत् । स्वयं कथय देवेन कथं तेऽनुग्रहः कृतः ॥३॥ तच्छ्रुत्वानुग्रहं राज्ञे शर्ववर्म्ान्यसापयत् । ततो राजभिराहारो मौनस्योऽभू तदा सह ॥४॥
प्रथम लम्बक ९७
प्रथम लम्बक ९७ शर्ववर्मा की सफलता का समाचार सुनकर मुझे और राजा को क्रमशः खेद और हर्ष उस प्रकार हुआ जैसे मेघ को देखकर हंस और चातक को होता है ।।१६२।। इसके अनन्तर स्वामिकुमार के वर से सिद्धि प्राप्त करके आये हुए शर्ववर्मा ने स्मरण करते ही उपस्थित हुई सब विद्याएँ राजा को दीं ।।१६३।। शर्ववर्मा के पढ़ाने पर राजा को सभी विद्याएँ स्वयं उपस्थित हो गईं। परमात्मा की कृपा से तत्क्षण क्या नहीं होता है ।।१६४।। इस प्रकार राजा का सभी विद्याओं की प्राप्ति का समाचार सुनकर सारे राष्ट्र में महान् उत्सव मनाया गया। उत्सव के अवसर पर घरों पर फहराती हुई ध्वजाएँ मानों प्रसन्नता से नाच कर रही थीं ।।१६५।। तदनन्तर प्रणाम करते हुए राजा ने राजाओं के धारण करने योग्य रत्नों से शर्ववर्मा की गुरु-पूजा की और उसे नर्मदा के सुरम्य तट पर बसे हुए भरुकच्छ (भड़ौच) देश का राजा बना दिया ।।१६६।। तदनन्तर सबसे पहले गुप्तचरों द्वारा वर-प्राप्ति का समाचार देनेवाले विष्णुगुप्त को राजा सातवाहन ने राजा बना दिया और विद्या-प्राप्ति का मूल कारण विष्णुशक्ति की पुत्री उस रानी को भी सभी रानियों के ऊपर स्वयं पट्टाभिषिक्त महारानी बनाया ।।१६७।। महाकवि श्री सोमदेवभट्ट विरचित कथासरित्सागर के कथापीठलम्बक का षष्ठ तरंग समाप्त सप्तम तरंग शर्ववर्मा की कथा ( कातन्त्र—कालापक व्याकरण की उत्पत्ति) शर्ववर्मा के सफल हो जाने पर प्रतिज्ञानुसार तीनों भाषाओं के छोड़ देने के कारण मौन धारण करके मैं राजा के समीप आया। उस समय वहाँ पर किसी ब्राह्मण ने राजा के सामने स्व-रचित श्लोक पढ़ा ।।१।। राजा ने उस श्लोक को विशुद्ध संस्कृत भाषा में स्वयं अनुवादित किया। इस कारण सभा में बैठे हुए सभी सदस्य अत्यन्त प्रसन्न हुए ।।२।। तब राजा ने शर्ववर्मा से नम्रता के साथ कहा कि 'स्वामि कार्तिक ने आप पर जो कृपा की है उसका वृत्तान्त स्वयं अपने मुख से कहिए' ।।३।। राजा की इस कृपा से आप्यायित होकर शर्ववर्मा ने कहा—'महाराज मैं उस समय वहाँ से निराहार और मौनी होकर निकल पड़ा ।।४।। १३
१८ कथासरित्सागर
यहाँ पृष्ठ का पंक्ति-दर-पंक्ति लिप्यंतरण प्रस्तुत है:
१८ कथासरित्सागर ततोऽध्वनि मनाक्छेषे जाते तीव्रतपः कृशः । क्लान्तः पतितवानस्मि निर्मनो धरणीतले ॥५॥ उत्तिष्ठ पुत्र सर्वं ते सम्पत्स्यत इति स्फुटम् । दर्शितहस्तः पुमानन्यः जाने मामब्रवीत्तदा ॥६॥ तेनाहममृतासारसिक्त इव तत्क्षणम् । प्रबुद्धः क्षुत्पिपासाविहीनो स्वस्थ इवाभवम् ॥७॥ अथ देवस्य निकटं प्राप्य भक्तिभराकुलः । स्नात्वा गर्भगृहं तस्य प्रविष्टोऽभूवमुन्मनाः ॥८॥ कृतान्तं प्रभुणा सूनुं स्कन्देन मम दर्शनम् । दत्तं ततः प्रविष्टा मे मुखं मूर्त्ता सरस्वती ॥९॥ अथासौ भगवात्साक्षात्षडभिराननपङ्कजैः । 'सिद्धो वर्णसमाम्नाय' इति सूत्रमुदैरयत् ॥१०॥ तच्छ्रुत्वैव मनुष्यत्वसुलभाच्चापलाद् यतः । उत्तरं सूत्रमभ्यूह्य स्वयमेव मयोदितम् ॥११॥ अथाब्रवीत्स देवो मां नावदिष्यः स्वयं यदि। अभविष्यदिदं शास्त्रं पाणिनीयोपमर्दकम् ॥१२॥ अधुना स्वल्पतन्त्रत्वात् कातन्त्राख्यं भविष्यति । मद्वाहनकलापस्य नाम्ना कालापकं तथा ॥१३॥ इत्युक्त्वा शब्दशास्त्रं तत्प्रकाश्यैवाभिनवं भुवि । साक्षादेव स मां देवः पुनरेवमभाषत ॥१४॥ युष्मदीयः स राजापि पूर्वजन्मन्यभून्नृपः । भरद्वाजमुनेः शिष्यः कृष्णसंज्ञो महातपाः ॥१५॥ सुत्याभिलाषामालोक्य स चैकां मुनिकन्यकाम् । ययावकस्मात्पुष्पेषुशरघातवशंगताम् ॥१६॥ अतः स शप्तो मुनिभिरवतीर्ण इहाधुना । सा चावतीर्णा देवीत्वे तस्यैव मुनिकन्यका ॥१७॥ इत्थमुभयावताराऽयं नृपतिः सातवाहनः । दृष्टे त्वय्यस्मिंश्चा विद्या प्राप्स्यत्येव स्वदिच्छया ॥१८॥ अक्लिष्टलभ्या हि भवन्त्युत्तमार्था महात्मनाम् । जन्मान्तरार्जिताः स्फारसंस्काराक्षिप्तसिद्धयः ॥१९
प्रथम लम्बक ९९
प्रथम लम्बक ९९ जब स्वामि कार्तिक के मन्दिर का मार्ग कुछ ही शेष रह गया तब मैं कठोर तप (निराहार) से दुर्बल होकर थका हुआ अचेतन (बेहोश) होकर पृथ्वी पर गिर पड़ा ॥५॥ तब मुझे अचेतनावस्था में ऐसा लगा कि हाथ में शक्ति (अस्त्र) लिये हुए कोई पुरुष मुझे कह रहा है—'पुत्र उठो तुम्हारा सब कार्य सफल होगा' ॥६॥ अमृतवर्षा से सिक्त-सा मैं उस समय चैतन्य हुआ। भूख-प्यास नष्ट हो जाने के कारण मैं पुनः स्वस्थ-सा हो गया ॥७॥ भक्ति-भाव से भरा हुआ मैं देवस्थल पर पहुँचकर और स्नान करके मन्दिर के आन्तरिक भाग में आकर कुछ व्याकुल हो गया ॥८॥ मन्दिर के अन्तर्गृह में स्कन्द स्वामी ने मुझे दर्शन दिये। उनके दर्शन होते ही मेरे मुँह में साक्षात् मूर्तिमती सरस्वती ने प्रवेश किया ॥९॥ तदनन्तर भगवान् स्कन्द ने अपने छहों मुखकमलों से 'सिद्धो वर्णसमाम्नाय' यह सूत्र कहा ॥१०॥ यह सुनकर मानव-स्वभाव-सुलभ चंचलता से मैंने इसके आगे का सूत्र स्वयं अपनी धृष्टता के आधार पर कह दिया ॥११॥ मेरे स्वयं सूत्र बोल देने पर स्कन्द स्वामी ने कहा कि यदि तुम मानव-स्वभाव-सुलभ चंचलता से स्वयं न बोल बैठते तो यह मेरा बनाया हुआ व्याकरण शास्त्र पाणिनीय व्याकरण को नीचा दिखा देता ॥१२॥ अब यह स्वल्प विस्तार के कारण कातन्त्र के नाम से प्रसिद्ध होगा। मेरे वाहन मयूर के पंखों के नाम पर इसका दूसरा नाम कालापक या कलाप भी होगा' ॥१३॥ ऐसा कहकर और अभिनव एवं संक्षिप्त व्याकरण को प्रकाशित करके स्कन्ददेव ने मुझसे फिर कहा—॥१४॥ 'यह तुम्हारा राजा (सातवाहन) पूर्वजन्म में परम तपस्वी कृष्ण नाम का ऋषि था और भरद्वाज मुनि का शिष्य था ॥१५॥ एक बार वह कृष्णमुनि अपनी ओर आसक्त किसी मुनि-कन्या को देखकर सहसा कामवश हो गया ॥१६॥ इसी कारण मुनियों ने उसे शाप दिया और पृथ्वी पर मानव (सातवाहन) के रूप में अवतीर्ण हुआ और वही मुनि-कन्या उसकी महारानी के रूप में अवतीर्ण हुई है ॥१७॥ इस प्रकार यह राजा सातवाहन ऋषि का अवतार है। तुम्हें देखते ही तुम्हारी इच्छा से समस्त विद्याओं को प्राप्त कर लेगा ॥१८॥ पूर्वजन्म के उत्तम संस्कारों से प्राप्त सिद्धि के कारण भाग्यशाली व्यक्तियों के प्रयोजन बिना कष्ट या विघ्न के ही सिद्ध हो जाते हैं' ॥१९॥
कथासरित्सागर
१ कथासरित्सागर इत्युक्त्वान्तर्हिते देवे निरगच्छमहं बहिः । तण्डुला मे प्रदत्ताश्च तत्र देवोपजीविभिः ॥२०॥ ततोऽहमागतो राजंस्तदुरास्ते च मे पथि । क्षिप्रं धावन्त एवासन्मुष्यमाणा दिने दिने ॥२१॥ एवमुक्त्वा स्ववृत्तान्तं विरते शर्ववर्मणि । उदतिष्ठन्नृपः स्नातुं प्रहृष्टः सातवाहनः ॥२२॥ ततोऽहं कृतमौनत्वाद् व्यवहारबहिष्कृतः । अनिच्छन्तं समामन्त्र्य प्रणानेनैव भूपतिम् ॥२३॥ निर्गत्य नगरात्तस्माच्छिष्यद्वयसमन्वितः । तपसे निश्चितो द्रष्टुमागतो विन्ध्यवासिनीम् ॥२४॥ स्वप्नादेशेन देव्या च एष्वव प्रेषितस्ततः । विन्ध्याटवीं प्रविष्टोऽहं त्वां द्रष्टुं भीषणामिमाम् ॥२५॥ पुलिन्दवाक्यादासाद्य सार्थं कैवर्तकञ्चन । इह प्राप्तोऽहमद्राक्षं पिशाचान् सुबहूनमून ॥२६॥ अन्योन्यालापमेतेषां दूरादाकर्ण्य शिक्षिता । मया पिशाचभाषेयं मौनमोक्षस्य कारणम् ॥२७॥ उपगम्य ततश्चैतां त्वां श्रुत्वोज्जयिनीगतम् । प्रतिपालितवानस्मि यावदभ्यागतो भवान् ॥२८॥ दृष्ट्वा त्वां स्वागतं कृत्वा चतुर्भ्यां भूतभाषया । मया जातिः स्मृतेत्येष वृत्तान्तो मज्जन्मनि ॥२९॥ एवमुक्ते गुणाढ्येन काणभूतिरुवाच तम् । त्वदागमो मया ज्ञातो यथायं निशि तच्छृणु ॥३०॥ राक्षसो भूतिवर्माख्यो दिव्यदृष्टिः सखास्ति मे । गतवानस्मि चोद्यानमुज्जयिन्यां तदासवम् ॥३१॥ तत्रासौ निजशापान्तं प्रतिपृष्टो मयाब्रवीत् । दिवा नास्ति प्रभावो नस्तिष्ठ रात्रौ वदाम्यत ॥३२॥ तथति चाहं तत्रस्थः प्राप्तायां निशि सङ्गताम् । तमपृच्छं प्रसङ्गेन भूतानां हर्षकारणम् ॥३३॥ पुरा विरञ्चिप्रभवावे यदुक्तं शङ्करेण तत् । शृणु वच्मीति मामुक्त्वा भूतिवर्माथ सोऽब्रवीत् ॥३४॥
ऐसा कहकर कार्त्तिकेय स्वामी के अन्तर्धान हो जाने पर मैं भी मन्दिर से बाहर आया । बाहर आने पर मन्दिर के पुजारियों न प्रसाद के रूप में मुझे पायस प्रदान किया ॥२ ॥ महाराज मैं भी वहाँ से चलकर यहाँ आ गया किन्तु आश्चर्य यह है कि मार्ग में प्रतिदिन खाये जाने पर भी पायस अन्त तक उतना ही रहा जितना पुजारियों ने दिया था ॥२१॥ इस प्रकार अपना वृत्तान्त सुनाकर शर्ववर्मा के मौन होने पर प्रसन्न राजा सातवाहन स्नान करने के लिए उठा ॥२२॥ तब मैं मौनी रहने के कारण राजकार्य तथा सांसारिक व्यवहारों से पृथक् रहता था। इसलिए न चाहते हुए भी राजा से प्रणाम द्वारा अपने जाने की इच्छा प्रकट करता हुआ मैं दो शिष्यों के साथ उस नगर से निकलकर तपस्या करने के विचार से विन्ध्यवासिनी देवी के दर्शन के लिए आया ॥२३-२४॥ स्वप्न में विन्ध्यवासिनी देवी के आदेश से उनके द्वारा भेजा हुआ मैं तुम्हें देखने के लिए इस भीषण विन्ध्य-जंगल में प्रविष्ट हुआ ॥२५॥ भीलों के कथनानुसार यात्रियों के झुंड के साथ किसी प्रकार यहाँ पहुँचा और इन बहुत-से पिशाचों को देखा ॥२६॥ मैंने दूर बैठे-बैठे ही पिशाचों के परस्पर वार्तालाप से इनकी पिशाच-भाषा सीखी जो मेरे मौन छोड़ने का कारण है क्योंकि यह भाषा संस्कृत प्राकृत तथा लोकभाषा से विलक्षण चौथी भाषा थी ॥२७॥ इस पैशाची भाषा को जानकर और तुम्हें उज्जैन गया हुआ सुनकर प्रतीक्षा कर रहा था कि इतने में तुम आ ही गये ॥२८॥ तुम्हें यहाँ आये हुए देखकर चौथी भूत (पैशाची) भाषा से तुम्हारा स्वागत करके मैंने पूर्व-जन्म का स्मरण किया। यह मेरे इस मानुष्य-जन्म का वृत्तान्त है ॥२९॥ गुणाढ्य के इस प्रकार कहने पर काणभूति ने उससे कहा—'मैंने तुम्हारा यहाँ आगमन आज रात को जिस प्रकार जाना उसे सुनो ॥३०॥ श्रुतवर्मा नामक राक्षस मेरा मित्र है जो दिव्य-दृष्टि है। मैं उसे देखने के लिए उज्जयिनी नगरी में उसके निवासस्थान—उद्यान—में गया था ॥३१॥ वहाँ मैंने उससे अपने शाप के अन्त के सम्बन्ध में पूछा तो उसने कहा 'दिन में हमलोगों का प्रभाव नहीं रहता। इसलिए ठहरो। रात में तुम्हें बता दूँगा' ॥३२॥ अतएव मैं दिन-भर वहीं रहा और रात होने पर प्रसङ्गतः राक्षस से पूछा कि 'रात में तुम लोगों के प्रभाव के बढ़ने और तृषित होने का क्या कारण है? ॥३३॥ श्रुतवर्मा राक्षस ने कहा 'प्राचीन समय में ब्रह्मा के प्रश्न पर शंकर ने जो कहा था वह मैं तुम्हें सुनाता हूँ ॥३४॥
१२ कथासरित्सागर
१२ कथासरित्सागर दिवा नैषां प्रभावोऽस्ति ध्वस्तानामक॑तेजसा । यक्षरक्षःपिशाचानां तेन दृष्यन्त्यमी निशि ॥३५॥ न पूज्यन्ते सुरा यत्र न च विप्रा यथोचितम् । भुज्यते विधिना वापि तत्रत प्रभवन्ति च ॥३६॥ अमांसभक्षः साक्षी वा यत्र तत्र न यान्त्यमी । शुचीन्शूरानप्रबुद्धांश्च नाक्रामन्ति कदाचन ॥३७॥ इत्युक्त्वा मे स तत्काल मूर्तिमब्रवीत्पुनः । गच्छागतो गुणाढ्यस्त शापमोक्षस्य॒ कारणम् ॥३८॥ श्रुत्वैतवागतश्चास्मि त्वञ्च दृष्टो मया प्रभो ! कथयाम्यधुना तां ते पुष्पदन्तोदितां कथाम् ॥३९॥ किं त्वेकं कौतुकं मेऽस्ति कथ्यतां केन हेतुना । स पुष्पदन्तस्त्वं चापि माल्यवानिति विश्रुतः ॥४० ॥ काणभूतेरिति श्रुत्वा गुणाढ्यस्तमभाषत । गङ्गातीरेऽग्रहारोऽस्ति नाम्ना बहुसुवर्णकः ॥४१॥ तत्र गोविन्ददत्ताख्यो ब्राह्मणोऽभूद्बहुश्रुतः । तस्य भार्याग्निदत्ता च बभूव पतिदेवता ॥४२॥ स कालेन द्विजस्तस्यां पञ्च पुत्रानजीजनत् । ते च मूर्खा सुरूपाश्च बभूवुरभिमानिनः ॥४३॥ अथ गोविन्ददत्तस्य गृहानतिथिराययौ । विप्रो वैश्वानरो नाम वैश्वानर इवापरः ॥४४॥ गोविन्ददत्त तत्कालं गृहादपि बहिः स्थिते । सत्पुत्राणामुपागम्य कृत ऽनाभिवादनम् ॥४५॥ हासमात्रं च तैस्तस्य कृतं प्रत्यभिवादनम् । तत स कोपात्रिर्गन्तुं प्रारेभे तद्गृहाद्द्विजः ॥४६॥ आगतेनाथ गोविन्ददत्तेन स तथाविधः । रुद्ध पृष्टोऽनुनीतोऽपि जगाद द्विजोत्तमः ॥४७॥ पुत्रास्ते पतिता मूर्खास्तत्सम्पर्काद् भवानपि । तस्मान्न भोक्ष्य त्वद्गेहे प्रायश्चित्तं नु मे भवेत् ॥४८॥
प्रथम लम्बक १०५
प्रथम लम्बक १०५ दिन में सूर्य के तेज से पराभूत इन यक्ष राक्षसों और पिशाचों का प्रभाव क्षीण हो जाता है। अतः ये रात में प्रभावशाली होकर हृषित होते हैं॥३५॥ जहां देवताओं और ब्राह्मणों का पूजन समुचित रूप से नहीं होता या जहां अनुचित और भ्रष्ट रूप से भोजन किया जाता है, वहाँ ये प्रबल हो जाते हैं॥३६॥ जहाँ धर्मासम्भोगी या (पतिव्रता स्त्री) रहती है वहाँ ये नहीं जाते और पवित्र और तथा प्रबुद्ध व्यक्तियों को भी कभी नहीं छेड़ते ॥३७॥ ऐसा कहकर भूतिवर्मा उसी समय बोला—जाओ! तुम्हारे शापनाश का कारण सुप्रतीक आ गया है। यह मालूम होते ही मैं यहाँ आया और तुम्हें देखा। अब मैं पुष्पदन्त द्वारा कही हुई उस कथा को सुनाता हूँ ॥३८ ३९॥ किन्तु मुझे यह एक कौतूहल (जिज्ञासा) है कि वह पुष्पदन्त के नाम से और तुम माल्यवान् के नाम से कैसे प्रसिद्ध हुए, अर्थात् नामकरण का कारण बताओ ॥४०॥ पुष्पदन्त की पूर्वकथा काणभूति के प्रश्न को सुनकर सुप्रतीक ने उससे कहा—गंगा के तटपर बहुसुवर्ण नाम का एक गाँव है॥४१॥ उस गाँव में गोविन्ददत्त नाम का विभिन्न शास्त्रों का जाननेवाला ब्राह्मण रहता था। उसकी अग्निशिखा नाम की परम पतिव्रता पत्नी थी ॥४२॥ उस ब्राह्मण ने उस ब्राह्मणी से पाँच पुत्र उत्पन्न किये। वे सभी मूर्ख किन्तु सुन्दर और अभिमानी थे ॥४३॥ कुछ समय के अनन्तर गोविन्ददत्त के घर पर दूसरी अग्नि के समान (क्रोधी) वैश्वानर नाम का एक ब्राह्मण आया ॥४४॥ उस समय गोविन्ददत्त के कहीं बाहर रहने पर उस अतिथि ने घर में जाकर उसके पुत्रों का अभिवादन किया ॥४५॥ इन ब्राह्मणकुमारों ने उस अतिथि के आगत-स्वागत में और अभिवादन के उत्तर में केवल हूँक दिया। इस प्रकार के व्यवहार से क्रुद्ध होकर वह ब्राह्मण उनके घर से निकल चला ॥४६॥ इसके अनन्तर ही आये हुए गोविन्ददत्त ने इस प्रकार जाते ब्राह्मण से पूछा और क्षमा- प्रार्थना आदि द्वारा अनुनय-विनय किया ॥४७॥ 'तुम्हारे पुत्र मूर्ख हैं अतएव पतित हैं और उनके सम्पर्क में रहने के कारण तुम भी पतित हो। अतः तुम जैसे पतित के यहाँ मैं भोजन न करूँगा। उसके लिए मुझे प्रायश्चित्त करना होगा'—ब्राह्मण ने उसे इस प्रकार कहा ॥४८॥
१०४ कथासरित्सागरे
१०४ कथासरित्सागरे अथ गोविन्ददत्तस्तमुवाच शपथोत्तरम्। न स्पृशाम्यपि बालेष्वेतानहं कुतनयानिति ॥४९॥ तद्भार्यापि समेवैत्य तमुवाचातिविप्रिया। ततः कथञ्चिदातिथ्यं तत्र वैश्वानरोऽग्रहीत् ॥५०॥ सर्वदृष्ट्वा देवदत्ताख्यस्तस्यैकस्तनयस्तदा । अभूद्गोविन्ददत्तस्य नैर्घृण्येनानुतापवान् ॥५१॥ व्यर्थं जीवितमालोक्य पितृभ्यामथ दूषितम्। सनिर्वेदः स तपसे ययौ बदरिकाश्रमम् ॥५२॥ ततः पर्णाशनः पूर्वं धूमपश्चाप्यनन्तरम्। तस्थौ चिराय तपसे तोषयिष्यन्नुमापतिम् ॥५३॥ ददौ च दर्शनं तस्य शम्भुस्तीव्रतपोजितः। तस्यैवामुचरश्चाथ स वव्रे वरमीश्वरात् ॥५४॥ विद्याः प्राप्नुहि भोगांश्च भुवि भुङ्क्ष्व शतस्तव। भविताभिमतं सर्वमिति शम्भुस्तमादिशत् ॥५५॥ ततः स गत्वा विद्यार्थी पुरं पाटलिपुत्रकम्। सिषेवे वेदकुम्भाख्यमुपाध्यायं यथाविधि ॥५६॥ ततस्तं तमुपाध्यायपत्नी जातु स्मरातुरा। हठाद् वव्रे यतः स्त्रीणां चञ्चलाश्चित्तवृत्तयः ॥५७॥ तेन सन्त्यज्य तं देशमनङ्गीकृतविप्लवः । स देवदत्तः प्रययौ प्रतिष्ठानमतन्द्रितः ॥५८॥ तत्र वृद्धमुपाध्यायं वृद्धया भार्ययान्वितम्। मन्त्रस्वाम्याख्यमभ्यर्थ्य विद्याः सम्यग्ग्रहीतवान् ॥५९॥ कृतविद्यश्च तं तत्र ददर्श नृपतेः सुता। सुसर्माख्यस्य सुभगं धीर्नाम धीरिवाच्युतम् ॥६०॥ सोऽपि तां दृष्टवान्कक्ष्यां स्थितां वातायनोपरि। विहरन्तीं विमानस्थं चन्द्रस्येवाधिदेवताम् ॥६१॥ बद्धाविव तयोरन्योन्यं भारपुद्गलया दृशा। मापसक्तुं समर्थौ तौ बभूवतुरुभावपि ॥६२॥ साप तस्यैषयाऽऽहूत्या मूर्तेयेव स्मराज्ञया। इतो निकटमेहीति सञ्ज्ञां चक्रे नृपात्मजा ॥६३॥ ततः समीप तस्याश्च ययावन्तःपुरस्य सः। सा च चिक्षेप दन्तेन पुष्पमादाय तं प्रति ॥६४॥
प्रथम लम्बक १०५
प्रथम लम्बक १०५ तब गोबिन्ददत्त ने शपथपूर्वक कहा कि मैं इन कुपुत्रों का कभी स्पर्श नहीं करता। गोबिन्ददत्त की भार्या ने भी उसी प्रकार कहा। तब वैश्वानर ने किसी प्रकार उसका आतिथ्य ग्रहण किया ।।४९-५० ।। इस घटना को देखकर गोबिन्ददत्त का एक पुत्र देवदत्त अपनी इस स्थिति पर ग्लानि के कारण पश्चात्ताप करने लगा ॥५१॥ माता-पिता के द्वारा इस प्रकार क्षेपित (तिरस्कृत) जीवन को देखकर और विरक्त होकर देवदत्त तपस्या के लिए बदरिकाश्रम को चला गया ॥५२॥ वह देवदत्त बदरिकाश्रम में पहले पत्ते खाकर, फिर धूमपान करके शिवजी को प्रसन्न करने की इच्छा से चिरकाल तक तपस्या करता रहा ॥५३॥ जब उसकी तीव्र तपस्या से सन्तुष्ट होकर शिवजी ने दर्शन दिये तब उसने उनसे उनका ही अनुचर होने का वर माँगा ॥५४॥ 'विद्याओं का अध्ययन करो और संसार के भोगों को भोगो तब तुम्हारी कामना सिद्ध होगी'—शिवजी ने उसे ऐसी आज्ञा दी ॥५५॥ शिवजी का आदेश प्राप्त कर देवदत्त विद्याध्ययन के लिए पाटलिपुत्र नामक नगर में आया और वेदकुंभ नामक अध्यापक की विधिपूर्वक सेवा करके पढ़ने लगा ॥५६॥ जब वह गुरु-गृह में विद्याध्ययन करता हुआ सेवा कर रहा था तब किसी समय कामातुरा गुरु-पत्नी ने हठपूर्वक उसका वरण कर लिया। खेद है कि स्त्रियों की चित्तवृत्ति चंचल होती है ॥५७॥ इस प्रकार काम-व्याकुल देवदत्त पाटलिपुत्र को छोड़कर सावधानी के साथ प्रतिष्ठान नगर को चला गया ॥५८॥ वहाँ पर उसने बड़ी शाखीवाले एक वृद्ध गुरु से प्रार्थना करके विद्याओं का अध्ययन किया ॥५९॥ प्रतिष्ठान में रहते हुए विद्वान् सुन्दर देवदत्त को एक बार नगर के राजा सुधर्मा की धी नामक कन्या ने देखा जो स्वर्ग से अवतीर्ण दूसरी लक्ष्मी के समान थी ॥६० ॥ उसने भी खिड़की पर खड़ी उस कन्या को इस प्रकार देखा मानो विमान पर बैठकर विहार करती हुई चन्द्रमा की अधिष्ठात्री देवी हो ॥६१॥ कामकीलित दृष्टि से परस्पर आबद्ध उन दोनों का वहाँ से हटना अशक्य हो गया ॥६२॥ तब राजकन्या ने कामदेव की मूर्तिमान् आज्ञा के समान एक अंगुली से 'यहाँ समीप आओ' ऐसा संकेत किया ॥६३॥ उधर देवदत्त राजभवन की तरफ गया उधर वह रनिवास से बाहर आई और उसने दाँतों-तले फूल दबाकर फिर उसकी ओर फेंका ॥६४॥ १४