भारतकोश
कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५)

कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५)

महाकवि सोमदेव भट्ट द्वारा

स्रोत: कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1960 (उद्गम)

DevanagariHindipublished876 पृष्ठ

पृष्ठ 134, कुल 876 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 134

प्रथम लम्बक ९७ शर्ववर्मा की सफलता का समाचार सुनकर मुझे और राजा को क्रमशः खेद और हर्ष उस प्रकार हुआ जैसे मेघ को देखकर हंस और चातक को होता है ।।१६२।। इसके अनन्तर स्वामिकुमार के वर से सिद्धि प्राप्त करके आये हुए शर्ववर्मा ने स्मरण करते ही उपस्थित हुई सब विद्याएँ राजा को दीं ।।१६३।। शर्ववर्मा के पढ़ाने पर राजा को सभी विद्याएँ स्वयं उपस्थित हो गईं। परमात्मा की कृपा से तत्क्षण क्या नहीं होता है ।।१६४।। इस प्रकार राजा का सभी विद्याओं की प्राप्ति का समाचार सुनकर सारे राष्ट्र में महान् उत्सव मनाया गया। उत्सव के अवसर पर घरों पर फहराती हुई ध्वजाएँ मानों प्रसन्नता से नाच कर रही थीं ।।१६५।। तदनन्तर प्रणाम करते हुए राजा ने राजाओं के धारण करने योग्य रत्नों से शर्ववर्मा की गुरु-पूजा की और उसे नर्मदा के सुरम्य तट पर बसे हुए भरुकच्छ (भड़ौच) देश का राजा बना दिया ।।१६६।। तदनन्तर सबसे पहले गुप्तचरों द्वारा वर-प्राप्ति का समाचार देनेवाले विष्णुगुप्त को राजा सातवाहन ने राजा बना दिया और विद्या-प्राप्ति का मूल कारण विष्णुशक्ति की पुत्री उस रानी को भी सभी रानियों के ऊपर स्वयं पट्टाभिषिक्त महारानी बनाया ।।१६७।। महाकवि श्री सोमदेवभट्ट विरचित कथासरित्सागर के कथापीठलम्बक का षष्ठ तरंग समाप्त सप्तम तरंग शर्ववर्मा की कथा ( कातन्त्र—कालापक व्याकरण की उत्पत्ति) शर्ववर्मा के सफल हो जाने पर प्रतिज्ञानुसार तीनों भाषाओं के छोड़ देने के कारण मौन धारण करके मैं राजा के समीप आया। उस समय वहाँ पर किसी ब्राह्मण ने राजा के सामने स्व-रचित श्लोक पढ़ा ।।१।। राजा ने उस श्लोक को विशुद्ध संस्कृत भाषा में स्वयं अनुवादित किया। इस कारण सभा में बैठे हुए सभी सदस्य अत्यन्त प्रसन्न हुए ।।२।। तब राजा ने शर्ववर्मा से नम्रता के साथ कहा कि 'स्वामि कार्तिक ने आप पर जो कृपा की है उसका वृत्तान्त स्वयं अपने मुख से कहिए' ।।३।। राजा की इस कृपा से आप्यायित होकर शर्ववर्मा ने कहा—'महाराज मैं उस समय वहाँ से निराहार और मौनी होकर निकल पड़ा ।।४।। १३