कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५)
महाकवि सोमदेव भट्ट द्वारा
स्रोत: कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1960 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंऐसा कहकर कार्त्तिकेय स्वामी के अन्तर्धान हो जाने पर मैं भी मन्दिर से बाहर आया । बाहर आने पर मन्दिर के पुजारियों न प्रसाद के रूप में मुझे पायस प्रदान किया ॥२ ॥ महाराज मैं भी वहाँ से चलकर यहाँ आ गया किन्तु आश्चर्य यह है कि मार्ग में प्रतिदिन खाये जाने पर भी पायस अन्त तक उतना ही रहा जितना पुजारियों ने दिया था ॥२१॥ इस प्रकार अपना वृत्तान्त सुनाकर शर्ववर्मा के मौन होने पर प्रसन्न राजा सातवाहन स्नान करने के लिए उठा ॥२२॥ तब मैं मौनी रहने के कारण राजकार्य तथा सांसारिक व्यवहारों से पृथक् रहता था। इसलिए न चाहते हुए भी राजा से प्रणाम द्वारा अपने जाने की इच्छा प्रकट करता हुआ मैं दो शिष्यों के साथ उस नगर से निकलकर तपस्या करने के विचार से विन्ध्यवासिनी देवी के दर्शन के लिए आया ॥२३-२४॥ स्वप्न में विन्ध्यवासिनी देवी के आदेश से उनके द्वारा भेजा हुआ मैं तुम्हें देखने के लिए इस भीषण विन्ध्य-जंगल में प्रविष्ट हुआ ॥२५॥ भीलों के कथनानुसार यात्रियों के झुंड के साथ किसी प्रकार यहाँ पहुँचा और इन बहुत-से पिशाचों को देखा ॥२६॥ मैंने दूर बैठे-बैठे ही पिशाचों के परस्पर वार्तालाप से इनकी पिशाच-भाषा सीखी जो मेरे मौन छोड़ने का कारण है क्योंकि यह भाषा संस्कृत प्राकृत तथा लोकभाषा से विलक्षण चौथी भाषा थी ॥२७॥ इस पैशाची भाषा को जानकर और तुम्हें उज्जैन गया हुआ सुनकर प्रतीक्षा कर रहा था कि इतने में तुम आ ही गये ॥२८॥ तुम्हें यहाँ आये हुए देखकर चौथी भूत (पैशाची) भाषा से तुम्हारा स्वागत करके मैंने पूर्व-जन्म का स्मरण किया। यह मेरे इस मानुष्य-जन्म का वृत्तान्त है ॥२९॥ गुणाढ्य के इस प्रकार कहने पर काणभूति ने उससे कहा—'मैंने तुम्हारा यहाँ आगमन आज रात को जिस प्रकार जाना उसे सुनो ॥३०॥ श्रुतवर्मा नामक राक्षस मेरा मित्र है जो दिव्य-दृष्टि है। मैं उसे देखने के लिए उज्जयिनी नगरी में उसके निवासस्थान—उद्यान—में गया था ॥३१॥ वहाँ मैंने उससे अपने शाप के अन्त के सम्बन्ध में पूछा तो उसने कहा 'दिन में हमलोगों का प्रभाव नहीं रहता। इसलिए ठहरो। रात में तुम्हें बता दूँगा' ॥३२॥ अतएव मैं दिन-भर वहीं रहा और रात होने पर प्रसङ्गतः राक्षस से पूछा कि 'रात में तुम लोगों के प्रभाव के बढ़ने और तृषित होने का क्या कारण है? ॥३३॥ श्रुतवर्मा राक्षस ने कहा 'प्राचीन समय में ब्रह्मा के प्रश्न पर शंकर ने जो कहा था वह मैं तुम्हें सुनाता हूँ ॥३४॥