कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५)
महाकवि सोमदेव भट्ट द्वारा
स्रोत: कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1960 (उद्गम)
प्रथम लम्बक ९७
प्रथम लम्बक ९७ शर्ववर्मा की सफलता का समाचार सुनकर मुझे और राजा को क्रमशः खेद और हर्ष उस प्रकार हुआ जैसे मेघ को देखकर हंस और चातक को होता है ।।१६२।। इसके अनन्तर स्वामिकुमार के वर से सिद्धि प्राप्त करके आये हुए शर्ववर्मा ने स्मरण करते ही उपस्थित हुई सब विद्याएँ राजा को दीं ।।१६३।। शर्ववर्मा के पढ़ाने पर राजा को सभी विद्याएँ स्वयं उपस्थित हो गईं। परमात्मा की कृपा से तत्क्षण क्या नहीं होता है ।।१६४।। इस प्रकार राजा का सभी विद्याओं की प्राप्ति का समाचार सुनकर सारे राष्ट्र में महान् उत्सव मनाया गया। उत्सव के अवसर पर घरों पर फहराती हुई ध्वजाएँ मानों प्रसन्नता से नाच कर रही थीं ।।१६५।। तदनन्तर प्रणाम करते हुए राजा ने राजाओं के धारण करने योग्य रत्नों से शर्ववर्मा की गुरु-पूजा की और उसे नर्मदा के सुरम्य तट पर बसे हुए भरुकच्छ (भड़ौच) देश का राजा बना दिया ।।१६६।। तदनन्तर सबसे पहले गुप्तचरों द्वारा वर-प्राप्ति का समाचार देनेवाले विष्णुगुप्त को राजा सातवाहन ने राजा बना दिया और विद्या-प्राप्ति का मूल कारण विष्णुशक्ति की पुत्री उस रानी को भी सभी रानियों के ऊपर स्वयं पट्टाभिषिक्त महारानी बनाया ।।१६७।। महाकवि श्री सोमदेवभट्ट विरचित कथासरित्सागर के कथापीठलम्बक का षष्ठ तरंग समाप्त सप्तम तरंग शर्ववर्मा की कथा ( कातन्त्र—कालापक व्याकरण की उत्पत्ति) शर्ववर्मा के सफल हो जाने पर प्रतिज्ञानुसार तीनों भाषाओं के छोड़ देने के कारण मौन धारण करके मैं राजा के समीप आया। उस समय वहाँ पर किसी ब्राह्मण ने राजा के सामने स्व-रचित श्लोक पढ़ा ।।१।। राजा ने उस श्लोक को विशुद्ध संस्कृत भाषा में स्वयं अनुवादित किया। इस कारण सभा में बैठे हुए सभी सदस्य अत्यन्त प्रसन्न हुए ।।२।। तब राजा ने शर्ववर्मा से नम्रता के साथ कहा कि 'स्वामि कार्तिक ने आप पर जो कृपा की है उसका वृत्तान्त स्वयं अपने मुख से कहिए' ।।३।। राजा की इस कृपा से आप्यायित होकर शर्ववर्मा ने कहा—'महाराज मैं उस समय वहाँ से निराहार और मौनी होकर निकल पड़ा ।।४।। १३
१८ कथासरित्सागर
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१८ कथासरित्सागर ततोऽध्वनि मनाक्छेषे जाते तीव्रतपः कृशः । क्लान्तः पतितवानस्मि निर्मनो धरणीतले ॥५॥ उत्तिष्ठ पुत्र सर्वं ते सम्पत्स्यत इति स्फुटम् । दर्शितहस्तः पुमानन्यः जाने मामब्रवीत्तदा ॥६॥ तेनाहममृतासारसिक्त इव तत्क्षणम् । प्रबुद्धः क्षुत्पिपासाविहीनो स्वस्थ इवाभवम् ॥७॥ अथ देवस्य निकटं प्राप्य भक्तिभराकुलः । स्नात्वा गर्भगृहं तस्य प्रविष्टोऽभूवमुन्मनाः ॥८॥ कृतान्तं प्रभुणा सूनुं स्कन्देन मम दर्शनम् । दत्तं ततः प्रविष्टा मे मुखं मूर्त्ता सरस्वती ॥९॥ अथासौ भगवात्साक्षात्षडभिराननपङ्कजैः । 'सिद्धो वर्णसमाम्नाय' इति सूत्रमुदैरयत् ॥१०॥ तच्छ्रुत्वैव मनुष्यत्वसुलभाच्चापलाद् यतः । उत्तरं सूत्रमभ्यूह्य स्वयमेव मयोदितम् ॥११॥ अथाब्रवीत्स देवो मां नावदिष्यः स्वयं यदि। अभविष्यदिदं शास्त्रं पाणिनीयोपमर्दकम् ॥१२॥ अधुना स्वल्पतन्त्रत्वात् कातन्त्राख्यं भविष्यति । मद्वाहनकलापस्य नाम्ना कालापकं तथा ॥१३॥ इत्युक्त्वा शब्दशास्त्रं तत्प्रकाश्यैवाभिनवं भुवि । साक्षादेव स मां देवः पुनरेवमभाषत ॥१४॥ युष्मदीयः स राजापि पूर्वजन्मन्यभून्नृपः । भरद्वाजमुनेः शिष्यः कृष्णसंज्ञो महातपाः ॥१५॥ सुत्याभिलाषामालोक्य स चैकां मुनिकन्यकाम् । ययावकस्मात्पुष्पेषुशरघातवशंगताम् ॥१६॥ अतः स शप्तो मुनिभिरवतीर्ण इहाधुना । सा चावतीर्णा देवीत्वे तस्यैव मुनिकन्यका ॥१७॥ इत्थमुभयावताराऽयं नृपतिः सातवाहनः । दृष्टे त्वय्यस्मिंश्चा विद्या प्राप्स्यत्येव स्वदिच्छया ॥१८॥ अक्लिष्टलभ्या हि भवन्त्युत्तमार्था महात्मनाम् । जन्मान्तरार्जिताः स्फारसंस्काराक्षिप्तसिद्धयः ॥१९
प्रथम लम्बक ९९
प्रथम लम्बक ९९ जब स्वामि कार्तिक के मन्दिर का मार्ग कुछ ही शेष रह गया तब मैं कठोर तप (निराहार) से दुर्बल होकर थका हुआ अचेतन (बेहोश) होकर पृथ्वी पर गिर पड़ा ॥५॥ तब मुझे अचेतनावस्था में ऐसा लगा कि हाथ में शक्ति (अस्त्र) लिये हुए कोई पुरुष मुझे कह रहा है—'पुत्र उठो तुम्हारा सब कार्य सफल होगा' ॥६॥ अमृतवर्षा से सिक्त-सा मैं उस समय चैतन्य हुआ। भूख-प्यास नष्ट हो जाने के कारण मैं पुनः स्वस्थ-सा हो गया ॥७॥ भक्ति-भाव से भरा हुआ मैं देवस्थल पर पहुँचकर और स्नान करके मन्दिर के आन्तरिक भाग में आकर कुछ व्याकुल हो गया ॥८॥ मन्दिर के अन्तर्गृह में स्कन्द स्वामी ने मुझे दर्शन दिये। उनके दर्शन होते ही मेरे मुँह में साक्षात् मूर्तिमती सरस्वती ने प्रवेश किया ॥९॥ तदनन्तर भगवान् स्कन्द ने अपने छहों मुखकमलों से 'सिद्धो वर्णसमाम्नाय' यह सूत्र कहा ॥१०॥ यह सुनकर मानव-स्वभाव-सुलभ चंचलता से मैंने इसके आगे का सूत्र स्वयं अपनी धृष्टता के आधार पर कह दिया ॥११॥ मेरे स्वयं सूत्र बोल देने पर स्कन्द स्वामी ने कहा कि यदि तुम मानव-स्वभाव-सुलभ चंचलता से स्वयं न बोल बैठते तो यह मेरा बनाया हुआ व्याकरण शास्त्र पाणिनीय व्याकरण को नीचा दिखा देता ॥१२॥ अब यह स्वल्प विस्तार के कारण कातन्त्र के नाम से प्रसिद्ध होगा। मेरे वाहन मयूर के पंखों के नाम पर इसका दूसरा नाम कालापक या कलाप भी होगा' ॥१३॥ ऐसा कहकर और अभिनव एवं संक्षिप्त व्याकरण को प्रकाशित करके स्कन्ददेव ने मुझसे फिर कहा—॥१४॥ 'यह तुम्हारा राजा (सातवाहन) पूर्वजन्म में परम तपस्वी कृष्ण नाम का ऋषि था और भरद्वाज मुनि का शिष्य था ॥१५॥ एक बार वह कृष्णमुनि अपनी ओर आसक्त किसी मुनि-कन्या को देखकर सहसा कामवश हो गया ॥१६॥ इसी कारण मुनियों ने उसे शाप दिया और पृथ्वी पर मानव (सातवाहन) के रूप में अवतीर्ण हुआ और वही मुनि-कन्या उसकी महारानी के रूप में अवतीर्ण हुई है ॥१७॥ इस प्रकार यह राजा सातवाहन ऋषि का अवतार है। तुम्हें देखते ही तुम्हारी इच्छा से समस्त विद्याओं को प्राप्त कर लेगा ॥१८॥ पूर्वजन्म के उत्तम संस्कारों से प्राप्त सिद्धि के कारण भाग्यशाली व्यक्तियों के प्रयोजन बिना कष्ट या विघ्न के ही सिद्ध हो जाते हैं' ॥१९॥
कथासरित्सागर
१ कथासरित्सागर इत्युक्त्वान्तर्हिते देवे निरगच्छमहं बहिः । तण्डुला मे प्रदत्ताश्च तत्र देवोपजीविभिः ॥२०॥ ततोऽहमागतो राजंस्तदुरास्ते च मे पथि । क्षिप्रं धावन्त एवासन्मुष्यमाणा दिने दिने ॥२१॥ एवमुक्त्वा स्ववृत्तान्तं विरते शर्ववर्मणि । उदतिष्ठन्नृपः स्नातुं प्रहृष्टः सातवाहनः ॥२२॥ ततोऽहं कृतमौनत्वाद् व्यवहारबहिष्कृतः । अनिच्छन्तं समामन्त्र्य प्रणानेनैव भूपतिम् ॥२३॥ निर्गत्य नगरात्तस्माच्छिष्यद्वयसमन्वितः । तपसे निश्चितो द्रष्टुमागतो विन्ध्यवासिनीम् ॥२४॥ स्वप्नादेशेन देव्या च एष्वव प्रेषितस्ततः । विन्ध्याटवीं प्रविष्टोऽहं त्वां द्रष्टुं भीषणामिमाम् ॥२५॥ पुलिन्दवाक्यादासाद्य सार्थं कैवर्तकञ्चन । इह प्राप्तोऽहमद्राक्षं पिशाचान् सुबहूनमून ॥२६॥ अन्योन्यालापमेतेषां दूरादाकर्ण्य शिक्षिता । मया पिशाचभाषेयं मौनमोक्षस्य कारणम् ॥२७॥ उपगम्य ततश्चैतां त्वां श्रुत्वोज्जयिनीगतम् । प्रतिपालितवानस्मि यावदभ्यागतो भवान् ॥२८॥ दृष्ट्वा त्वां स्वागतं कृत्वा चतुर्भ्यां भूतभाषया । मया जातिः स्मृतेत्येष वृत्तान्तो मज्जन्मनि ॥२९॥ एवमुक्ते गुणाढ्येन काणभूतिरुवाच तम् । त्वदागमो मया ज्ञातो यथायं निशि तच्छृणु ॥३०॥ राक्षसो भूतिवर्माख्यो दिव्यदृष्टिः सखास्ति मे । गतवानस्मि चोद्यानमुज्जयिन्यां तदासवम् ॥३१॥ तत्रासौ निजशापान्तं प्रतिपृष्टो मयाब्रवीत् । दिवा नास्ति प्रभावो नस्तिष्ठ रात्रौ वदाम्यत ॥३२॥ तथति चाहं तत्रस्थः प्राप्तायां निशि सङ्गताम् । तमपृच्छं प्रसङ्गेन भूतानां हर्षकारणम् ॥३३॥ पुरा विरञ्चिप्रभवावे यदुक्तं शङ्करेण तत् । शृणु वच्मीति मामुक्त्वा भूतिवर्माथ सोऽब्रवीत् ॥३४॥
ऐसा कहकर कार्त्तिकेय स्वामी के अन्तर्धान हो जाने पर मैं भी मन्दिर से बाहर आया । बाहर आने पर मन्दिर के पुजारियों न प्रसाद के रूप में मुझे पायस प्रदान किया ॥२ ॥ महाराज मैं भी वहाँ से चलकर यहाँ आ गया किन्तु आश्चर्य यह है कि मार्ग में प्रतिदिन खाये जाने पर भी पायस अन्त तक उतना ही रहा जितना पुजारियों ने दिया था ॥२१॥ इस प्रकार अपना वृत्तान्त सुनाकर शर्ववर्मा के मौन होने पर प्रसन्न राजा सातवाहन स्नान करने के लिए उठा ॥२२॥ तब मैं मौनी रहने के कारण राजकार्य तथा सांसारिक व्यवहारों से पृथक् रहता था। इसलिए न चाहते हुए भी राजा से प्रणाम द्वारा अपने जाने की इच्छा प्रकट करता हुआ मैं दो शिष्यों के साथ उस नगर से निकलकर तपस्या करने के विचार से विन्ध्यवासिनी देवी के दर्शन के लिए आया ॥२३-२४॥ स्वप्न में विन्ध्यवासिनी देवी के आदेश से उनके द्वारा भेजा हुआ मैं तुम्हें देखने के लिए इस भीषण विन्ध्य-जंगल में प्रविष्ट हुआ ॥२५॥ भीलों के कथनानुसार यात्रियों के झुंड के साथ किसी प्रकार यहाँ पहुँचा और इन बहुत-से पिशाचों को देखा ॥२६॥ मैंने दूर बैठे-बैठे ही पिशाचों के परस्पर वार्तालाप से इनकी पिशाच-भाषा सीखी जो मेरे मौन छोड़ने का कारण है क्योंकि यह भाषा संस्कृत प्राकृत तथा लोकभाषा से विलक्षण चौथी भाषा थी ॥२७॥ इस पैशाची भाषा को जानकर और तुम्हें उज्जैन गया हुआ सुनकर प्रतीक्षा कर रहा था कि इतने में तुम आ ही गये ॥२८॥ तुम्हें यहाँ आये हुए देखकर चौथी भूत (पैशाची) भाषा से तुम्हारा स्वागत करके मैंने पूर्व-जन्म का स्मरण किया। यह मेरे इस मानुष्य-जन्म का वृत्तान्त है ॥२९॥ गुणाढ्य के इस प्रकार कहने पर काणभूति ने उससे कहा—'मैंने तुम्हारा यहाँ आगमन आज रात को जिस प्रकार जाना उसे सुनो ॥३०॥ श्रुतवर्मा नामक राक्षस मेरा मित्र है जो दिव्य-दृष्टि है। मैं उसे देखने के लिए उज्जयिनी नगरी में उसके निवासस्थान—उद्यान—में गया था ॥३१॥ वहाँ मैंने उससे अपने शाप के अन्त के सम्बन्ध में पूछा तो उसने कहा 'दिन में हमलोगों का प्रभाव नहीं रहता। इसलिए ठहरो। रात में तुम्हें बता दूँगा' ॥३२॥ अतएव मैं दिन-भर वहीं रहा और रात होने पर प्रसङ्गतः राक्षस से पूछा कि 'रात में तुम लोगों के प्रभाव के बढ़ने और तृषित होने का क्या कारण है? ॥३३॥ श्रुतवर्मा राक्षस ने कहा 'प्राचीन समय में ब्रह्मा के प्रश्न पर शंकर ने जो कहा था वह मैं तुम्हें सुनाता हूँ ॥३४॥
१२ कथासरित्सागर
१२ कथासरित्सागर दिवा नैषां प्रभावोऽस्ति ध्वस्तानामक॑तेजसा । यक्षरक्षःपिशाचानां तेन दृष्यन्त्यमी निशि ॥३५॥ न पूज्यन्ते सुरा यत्र न च विप्रा यथोचितम् । भुज्यते विधिना वापि तत्रत प्रभवन्ति च ॥३६॥ अमांसभक्षः साक्षी वा यत्र तत्र न यान्त्यमी । शुचीन्शूरानप्रबुद्धांश्च नाक्रामन्ति कदाचन ॥३७॥ इत्युक्त्वा मे स तत्काल मूर्तिमब्रवीत्पुनः । गच्छागतो गुणाढ्यस्त शापमोक्षस्य॒ कारणम् ॥३८॥ श्रुत्वैतवागतश्चास्मि त्वञ्च दृष्टो मया प्रभो ! कथयाम्यधुना तां ते पुष्पदन्तोदितां कथाम् ॥३९॥ किं त्वेकं कौतुकं मेऽस्ति कथ्यतां केन हेतुना । स पुष्पदन्तस्त्वं चापि माल्यवानिति विश्रुतः ॥४० ॥ काणभूतेरिति श्रुत्वा गुणाढ्यस्तमभाषत । गङ्गातीरेऽग्रहारोऽस्ति नाम्ना बहुसुवर्णकः ॥४१॥ तत्र गोविन्ददत्ताख्यो ब्राह्मणोऽभूद्बहुश्रुतः । तस्य भार्याग्निदत्ता च बभूव पतिदेवता ॥४२॥ स कालेन द्विजस्तस्यां पञ्च पुत्रानजीजनत् । ते च मूर्खा सुरूपाश्च बभूवुरभिमानिनः ॥४३॥ अथ गोविन्ददत्तस्य गृहानतिथिराययौ । विप्रो वैश्वानरो नाम वैश्वानर इवापरः ॥४४॥ गोविन्ददत्त तत्कालं गृहादपि बहिः स्थिते । सत्पुत्राणामुपागम्य कृत ऽनाभिवादनम् ॥४५॥ हासमात्रं च तैस्तस्य कृतं प्रत्यभिवादनम् । तत स कोपात्रिर्गन्तुं प्रारेभे तद्गृहाद्द्विजः ॥४६॥ आगतेनाथ गोविन्ददत्तेन स तथाविधः । रुद्ध पृष्टोऽनुनीतोऽपि जगाद द्विजोत्तमः ॥४७॥ पुत्रास्ते पतिता मूर्खास्तत्सम्पर्काद् भवानपि । तस्मान्न भोक्ष्य त्वद्गेहे प्रायश्चित्तं नु मे भवेत् ॥४८॥
प्रथम लम्बक १०५
प्रथम लम्बक १०५ दिन में सूर्य के तेज से पराभूत इन यक्ष राक्षसों और पिशाचों का प्रभाव क्षीण हो जाता है। अतः ये रात में प्रभावशाली होकर हृषित होते हैं॥३५॥ जहां देवताओं और ब्राह्मणों का पूजन समुचित रूप से नहीं होता या जहां अनुचित और भ्रष्ट रूप से भोजन किया जाता है, वहाँ ये प्रबल हो जाते हैं॥३६॥ जहाँ धर्मासम्भोगी या (पतिव्रता स्त्री) रहती है वहाँ ये नहीं जाते और पवित्र और तथा प्रबुद्ध व्यक्तियों को भी कभी नहीं छेड़ते ॥३७॥ ऐसा कहकर भूतिवर्मा उसी समय बोला—जाओ! तुम्हारे शापनाश का कारण सुप्रतीक आ गया है। यह मालूम होते ही मैं यहाँ आया और तुम्हें देखा। अब मैं पुष्पदन्त द्वारा कही हुई उस कथा को सुनाता हूँ ॥३८ ३९॥ किन्तु मुझे यह एक कौतूहल (जिज्ञासा) है कि वह पुष्पदन्त के नाम से और तुम माल्यवान् के नाम से कैसे प्रसिद्ध हुए, अर्थात् नामकरण का कारण बताओ ॥४०॥ पुष्पदन्त की पूर्वकथा काणभूति के प्रश्न को सुनकर सुप्रतीक ने उससे कहा—गंगा के तटपर बहुसुवर्ण नाम का एक गाँव है॥४१॥ उस गाँव में गोविन्ददत्त नाम का विभिन्न शास्त्रों का जाननेवाला ब्राह्मण रहता था। उसकी अग्निशिखा नाम की परम पतिव्रता पत्नी थी ॥४२॥ उस ब्राह्मण ने उस ब्राह्मणी से पाँच पुत्र उत्पन्न किये। वे सभी मूर्ख किन्तु सुन्दर और अभिमानी थे ॥४३॥ कुछ समय के अनन्तर गोविन्ददत्त के घर पर दूसरी अग्नि के समान (क्रोधी) वैश्वानर नाम का एक ब्राह्मण आया ॥४४॥ उस समय गोविन्ददत्त के कहीं बाहर रहने पर उस अतिथि ने घर में जाकर उसके पुत्रों का अभिवादन किया ॥४५॥ इन ब्राह्मणकुमारों ने उस अतिथि के आगत-स्वागत में और अभिवादन के उत्तर में केवल हूँक दिया। इस प्रकार के व्यवहार से क्रुद्ध होकर वह ब्राह्मण उनके घर से निकल चला ॥४६॥ इसके अनन्तर ही आये हुए गोविन्ददत्त ने इस प्रकार जाते ब्राह्मण से पूछा और क्षमा- प्रार्थना आदि द्वारा अनुनय-विनय किया ॥४७॥ 'तुम्हारे पुत्र मूर्ख हैं अतएव पतित हैं और उनके सम्पर्क में रहने के कारण तुम भी पतित हो। अतः तुम जैसे पतित के यहाँ मैं भोजन न करूँगा। उसके लिए मुझे प्रायश्चित्त करना होगा'—ब्राह्मण ने उसे इस प्रकार कहा ॥४८॥
१०४ कथासरित्सागरे
१०४ कथासरित्सागरे अथ गोविन्ददत्तस्तमुवाच शपथोत्तरम्। न स्पृशाम्यपि बालेष्वेतानहं कुतनयानिति ॥४९॥ तद्भार्यापि समेवैत्य तमुवाचातिविप्रिया। ततः कथञ्चिदातिथ्यं तत्र वैश्वानरोऽग्रहीत् ॥५०॥ सर्वदृष्ट्वा देवदत्ताख्यस्तस्यैकस्तनयस्तदा । अभूद्गोविन्ददत्तस्य नैर्घृण्येनानुतापवान् ॥५१॥ व्यर्थं जीवितमालोक्य पितृभ्यामथ दूषितम्। सनिर्वेदः स तपसे ययौ बदरिकाश्रमम् ॥५२॥ ततः पर्णाशनः पूर्वं धूमपश्चाप्यनन्तरम्। तस्थौ चिराय तपसे तोषयिष्यन्नुमापतिम् ॥५३॥ ददौ च दर्शनं तस्य शम्भुस्तीव्रतपोजितः। तस्यैवामुचरश्चाथ स वव्रे वरमीश्वरात् ॥५४॥ विद्याः प्राप्नुहि भोगांश्च भुवि भुङ्क्ष्व शतस्तव। भविताभिमतं सर्वमिति शम्भुस्तमादिशत् ॥५५॥ ततः स गत्वा विद्यार्थी पुरं पाटलिपुत्रकम्। सिषेवे वेदकुम्भाख्यमुपाध्यायं यथाविधि ॥५६॥ ततस्तं तमुपाध्यायपत्नी जातु स्मरातुरा। हठाद् वव्रे यतः स्त्रीणां चञ्चलाश्चित्तवृत्तयः ॥५७॥ तेन सन्त्यज्य तं देशमनङ्गीकृतविप्लवः । स देवदत्तः प्रययौ प्रतिष्ठानमतन्द्रितः ॥५८॥ तत्र वृद्धमुपाध्यायं वृद्धया भार्ययान्वितम्। मन्त्रस्वाम्याख्यमभ्यर्थ्य विद्याः सम्यग्ग्रहीतवान् ॥५९॥ कृतविद्यश्च तं तत्र ददर्श नृपतेः सुता। सुसर्माख्यस्य सुभगं धीर्नाम धीरिवाच्युतम् ॥६०॥ सोऽपि तां दृष्टवान्कक्ष्यां स्थितां वातायनोपरि। विहरन्तीं विमानस्थं चन्द्रस्येवाधिदेवताम् ॥६१॥ बद्धाविव तयोरन्योन्यं भारपुद्गलया दृशा। मापसक्तुं समर्थौ तौ बभूवतुरुभावपि ॥६२॥ साप तस्यैषयाऽऽहूत्या मूर्तेयेव स्मराज्ञया। इतो निकटमेहीति सञ्ज्ञां चक्रे नृपात्मजा ॥६३॥ ततः समीप तस्याश्च ययावन्तःपुरस्य सः। सा च चिक्षेप दन्तेन पुष्पमादाय तं प्रति ॥६४॥
प्रथम लम्बक १०५
प्रथम लम्बक १०५ तब गोबिन्ददत्त ने शपथपूर्वक कहा कि मैं इन कुपुत्रों का कभी स्पर्श नहीं करता। गोबिन्ददत्त की भार्या ने भी उसी प्रकार कहा। तब वैश्वानर ने किसी प्रकार उसका आतिथ्य ग्रहण किया ।।४९-५० ।। इस घटना को देखकर गोबिन्ददत्त का एक पुत्र देवदत्त अपनी इस स्थिति पर ग्लानि के कारण पश्चात्ताप करने लगा ॥५१॥ माता-पिता के द्वारा इस प्रकार क्षेपित (तिरस्कृत) जीवन को देखकर और विरक्त होकर देवदत्त तपस्या के लिए बदरिकाश्रम को चला गया ॥५२॥ वह देवदत्त बदरिकाश्रम में पहले पत्ते खाकर, फिर धूमपान करके शिवजी को प्रसन्न करने की इच्छा से चिरकाल तक तपस्या करता रहा ॥५३॥ जब उसकी तीव्र तपस्या से सन्तुष्ट होकर शिवजी ने दर्शन दिये तब उसने उनसे उनका ही अनुचर होने का वर माँगा ॥५४॥ 'विद्याओं का अध्ययन करो और संसार के भोगों को भोगो तब तुम्हारी कामना सिद्ध होगी'—शिवजी ने उसे ऐसी आज्ञा दी ॥५५॥ शिवजी का आदेश प्राप्त कर देवदत्त विद्याध्ययन के लिए पाटलिपुत्र नामक नगर में आया और वेदकुंभ नामक अध्यापक की विधिपूर्वक सेवा करके पढ़ने लगा ॥५६॥ जब वह गुरु-गृह में विद्याध्ययन करता हुआ सेवा कर रहा था तब किसी समय कामातुरा गुरु-पत्नी ने हठपूर्वक उसका वरण कर लिया। खेद है कि स्त्रियों की चित्तवृत्ति चंचल होती है ॥५७॥ इस प्रकार काम-व्याकुल देवदत्त पाटलिपुत्र को छोड़कर सावधानी के साथ प्रतिष्ठान नगर को चला गया ॥५८॥ वहाँ पर उसने बड़ी शाखीवाले एक वृद्ध गुरु से प्रार्थना करके विद्याओं का अध्ययन किया ॥५९॥ प्रतिष्ठान में रहते हुए विद्वान् सुन्दर देवदत्त को एक बार नगर के राजा सुधर्मा की धी नामक कन्या ने देखा जो स्वर्ग से अवतीर्ण दूसरी लक्ष्मी के समान थी ॥६० ॥ उसने भी खिड़की पर खड़ी उस कन्या को इस प्रकार देखा मानो विमान पर बैठकर विहार करती हुई चन्द्रमा की अधिष्ठात्री देवी हो ॥६१॥ कामकीलित दृष्टि से परस्पर आबद्ध उन दोनों का वहाँ से हटना अशक्य हो गया ॥६२॥ तब राजकन्या ने कामदेव की मूर्तिमान् आज्ञा के समान एक अंगुली से 'यहाँ समीप आओ' ऐसा संकेत किया ॥६३॥ उधर देवदत्त राजभवन की तरफ गया उधर वह रनिवास से बाहर आई और उसने दाँतों-तले फूल दबाकर फिर उसकी ओर फेंका ॥६४॥ १४
१०६ कथासरित्सागर
१०६ कथासरित्सागर सञ्ज्ञामेतामजानानो गूढां राजसुताकृताम् । स कर्तव्यविमूढः सन्नुपाध्यायगृहं ययौ ॥६५॥ रुलोठ तत्र धरणीं न किञ्चिद्वक्तुमीश्वरः । यापन् दह्यमानोऽन्तमूकः प्रमुषितो यथा ॥६६॥ वितर्क्य कामनैश्चित्यमुपाध्यायेन धीमता । युक्त्या पृष्टः कथञ्चिन्नु यथावृत्तं शशंस सः ॥६७॥ तद्बुद्ध्वा तमुपाध्यायो विदग्धो वाक्यमब्रवीत् । दन्तेन पुष्पं मुञ्चन्त्या तया सञ्ज्ञा कृता तव ॥६८॥ यद्दन्तपुष्पवन्ताख्यं पुष्पादयं सुरमन्दिरम् । तत्रागत्य प्रतीक्षस्वा साम्प्रतं गम्यतामिति ॥६९॥ श्रुत्वेति ज्ञातसञ्ज्ञार्थः स तत्याज शुचं युवा । ततो देवगृहस्यान्तस्तस्य गत्वा स्थितोऽभवत् ॥७०॥ साप्यष्टमीं समुद्दिश्य तत्र राजसुता ययौ । एकैव देवं द्रष्टुं च गर्भागारमथाविशत् ॥७१॥ दृष्टोऽत्र द्वारपट्टस्य पश्चात्सोऽथ प्रियस्तया । गृहीतानन चोत्थाय सा कण्ठे सहसा ततः ॥७२॥ चित्रं त्वया कथं ज्ञाता सा सञ्ज्ञेत्युदितं तया । उपाध्यायेन सा ज्ञाता न मयेति जगाद सः ॥७३॥ मुञ्च मामविदग्धस्त्वमित्युक्त्वा सत्वरात्क्रुधा । म त्रमदभयात्साथ राजकन्या ततो ययौ ॥७४॥ सोऽपि गत्वा विविक्ते तां दृष्टनष्टां स्मरन्प्रियाम् । दद्यदत्तो वियोगाग्निबिगरुद्धजीवितोऽभवत् ॥७५॥ दृष्ट्वा स तादृशं दाग्भुं प्राणप्रसन्नं किलादिदात् । गणः पञ्चशिखो नाम तस्याभीप्सितसिद्धये ॥७६॥ स चागत्य समाश्वास्य स्त्रीवेषं तं गणोत्तमः । अकारयत्स्वयं चाभूद् वृद्धब्राह्मणरूपभृत् ॥७७॥ ततस्तेन समं गत्वा तं मृगममहीपतिम् । जनकं मुत्तमञ्जय्याः स जगाद गणाग्रणीः ॥७८॥ पुत्रो मे प्रोषितः क्वापि तमन्वष्टुं व्रजाम्यहम् । तमं स्नुषां निक्षेपो राजन्सम्प्रति रक्ष्यतम् ॥७९॥
राजपुत्री के गुप्त संकेत (इशारे) को न समझकर देवदत्त कर्तव्यमूढ़ होकर गुरुगृह को आया ॥६५॥ घर आकर संकोचवश कुछ कहने में असमर्थ वह देवदत्त काम-संताप से अन्दर-ही-अन्दर जलता एवं ठगा हुआ-सा मूक हो गया ॥६६॥ बुद्धिमान् आचार्य ने काम-विकारों से उसकी स्थिति को समझकर युक्ति से उससे पूछा तो उसने जो कुछ हुआ था सब कह डाला ॥६७॥ वृत्तान्त सुनकर चतुर आचार्य ने कहा- 'दाँत से फूल फेंकते हुए उसने तुम्हें सूचित किया है-॥६८॥ कि जो यह पुष्पों से शोभित पुष्पवन्त नाम का देव-मन्दिर है उसमें मेरी प्रतीक्षा करना। इस समय जाओ ॥६९॥ गुरु से यह सुनकर और संकेत का अर्थ समझकर उस युवक ने घाम का परित्याग कर दिया और उस मन्दिर के अन्दर जाकर उसकी प्रतीक्षा में बैठ गया ॥७०॥ वह राजकुमारी भी अष्टमी तिथि के कारण अकेली ही पुष्पवन्तेश्वर के दर्शन करने को मन्दिर में आई और अन्दर गई ॥७१॥ मन्दिर में जाकर उसने द्वार के किवाड़ के पीछे उस प्रियतम को देखा। उसने भी उठकर उसे सहसा गले लगा लिया ॥७२॥ राजपुत्री ने पूछा कि आश्चर्य है, तुमने संकेत को कैसे जान लिया। उसने कहा-'मैंने नहीं मेरे गुरु ने जाना'। यह सुनकर राजकन्या क्रोध करके उससे बोली- 'मुझे छोड़ो तुम मूर्ख (गँवार) हो'। ऐसा कहकर गुप्त बात के प्रकट हो जाने के भय से वह राजगृह को चली गई ॥७३-७४॥ देवदत्त भी एकान्त में जाकर, प्राप्त होकर चली गई प्रियतमा का स्मरण करता हुआ वियोग-अग्नि से विनष्टजीवन-सा हो गया ॥७५॥ पूर्व-तपस्या से प्रसन्न होकर शिवजी ने अपने भक्त को इस प्रकार पीड़ित देखकर उसकी अभीष्ट-सिद्धि के लिए पंचशिख नामक गण को आज्ञा दी ॥७६॥ पंचशिख नामक गण ने उसे आश्वासन दिया। देवदत्त को स्त्री-वेष धारण कराया और स्वयं बूढ़े ब्राह्मण का रूप धारण किया ॥७७॥ तब वह पंचशिख स्त्री-वेषधारी देवदत्त को साथ लेकर उस सुन्दरी के पिता राजा सुशर्मा के पास जाकर बोला ॥७८॥ मेरा लड़का कहीं चला गया है मैं उसे खोजने के लिए जा रहा हूँ अतः तुम मेरी इस स्नुषा (पतोहू) को धरोहर (अमानत) के रूप में रख लो ॥७९॥
१८ कथासरित्सागर
१८ कथासरित्सागर तच्छ्रुत्वा शापभीतेन तेनादाय सुधर्मणा। स्वकन्यान्तःपुरे गुप्ते स्त्रीति संस्थापितो युवा ॥८०॥ ततः पञ्चशिखे याते स्वप्रियान्तःपुरे वसन्। स्त्रीवेषः स द्विजस्तस्या विश्रम्भास्पदतां ययौ ॥८१॥ एकदा चोत्सुका रात्रौ तेनात्मानं प्रकाश्य सा। गुप्तं गान्धर्वविधिना परिणीता नृपात्मजा ॥८२॥ तस्यां च धृतगर्भायां तं द्विजं स गणोत्तमः। स्मृतमात्रागतो रात्रौ ततोऽप्यपवरक्षितम् ॥८३॥ ततस्तस्य समुत्सार्य यूनः स्त्रीवेषमाशु तम्। प्रातः पञ्चशिखः सोऽभूत्पूर्ववद् ब्राह्मणाकृतिः ॥८४॥ तेनैव सह गत्वा च सुधर्मानुपमभ्यधात्। अद्य प्राप्तो मया राजन्पुत्रस्तद्देहि मे स्नुषाम् ॥८५॥ ततः स राजा तां बुद्ध्वा रात्रौ क्वापि पलायिताम्। तच्छापभयसम्भ्रान्तो मन्त्रिभ्यः एवमब्रवीत् ॥८६॥ न विप्रोऽयमयं कोऽपि देवो मद्वञ्चनागतः। एवम्पाया भवन्तीह वृत्तान्ताः सततं यतः ॥८७॥ शिबिकथा तथा च पूर्वं राजाऽभूत्तपस्वी करुणापरः। दाता धीरः शिबिर्नाम सर्वसत्त्वाभयप्रदः ॥८८॥ तं वञ्चयितुमिन्द्रोऽथ कृत्वा श्येनवपुः स्वयम्। मायाकपोतवपुषं धर्ममन्वपतद्द्रुतम् ॥८९॥ कपोतश्च भयाद् गत्वा शिबेरङ्कमशिश्रियत्। मनुष्यवाचा श्येनोऽथ स च राजानमब्रवीत् ॥९०॥ राजन्भक्ष्यमिदं मुञ्च कपोतं क्षुधितस्य मे। अन्यथा मां मृतं विद्धि कस्ते धर्मस्ततो भवेत् ॥९१॥ ततः शिबिरुवाचायमेष मे शरणागतः। अत्याज्यस्तद्वदाम्यन्यं मांसमेतत्समं तव ॥९२॥ श्येनो जगाद यद्येवमात्ममांसं प्रयच्छ मे। तथेति तद्हृष्टः संस्तं राजा प्रत्यपद्यत ॥९३॥ यथा यथा च मांसं स्वमुत्कृत्यारोपयन्नृपः। तथा तथा तुलायां स कपोतोऽप्यधिकोऽभवत्।
प्रथम लम्बक १९
प्रथम लम्बक १९ यह सुनकर राजा सुशर्मा ने ब्राह्मण के शाप के भय से उस युवा को स्त्री समझकर सुरक्षित कन्या के महल में रखवा दिया॥८०॥ पंचशिख के चले जाने पर वह ब्राह्मण-कुमार देवदत्त अपनी प्रियतमा के भवन में स्त्री-वेश धारण करके रहता हुआ अत्यन्त विश्वासपात्र बन गया॥८१॥ एक बार रात को उसे अत्यन्त उत्सुक देखकर देवदत्त ने अपने को प्रकट करके गान्धर्व विधि से उससे विवाह कर लिया॥८२॥ वह राजकन्या जब गर्भिणी हो गई, तब उस ब्राह्मण ने पंचशिख-यक्ष को स्मरण किया और स्मरण करते ही वह आ गया तब देवदत्त को गुप्त रूप से ले गया॥८३॥ तब प्रातःकाल पंचशिख पहले के समान ब्राह्मण का वेश बनाकर और उस जवान के स्त्री-वेष को हटाकर राजा सुशर्मा के पास जाकर बोला—'राजन् ! आज मुझे लड़का मिल गया। अब मेरी स्नुषा (पतोहू) को लौटा दो' ॥८४-८५॥ जब राजा को यह पता चला कि वह ब्राह्मण-स्नुषा कहीं भाग गई तब वह ब्राह्मण के शाप के भय से मन्त्रियों को बुलाकर परामर्श करने लगा॥८६॥ राजा ने मन्त्रियों से कहा—'यह ब्राह्मण नहीं कोई देवता है, जो मेरी परीक्षा लेने या वंचना के लिए आया है। देखा जाता है, प्रायः ऐसी बातें सर्वदा हुआ करती हैं' ॥८७॥ राजा शिबि की कथा इसी प्रकार प्राचीन युग में परम तपस्वी, दयालु, दाता धीर एवं समस्त प्राणियों को अभय देनेवाला शिबि नामक राजा हुआ। उसकी परीक्षा के लिए स्वयं इन्द्र ने बाज का रूप धारण करके कबूतर-रूपधारी धर्म का पीछा किया॥८८-८९॥ कबूतर ने बाज के भय से राजा शिबि की गोद में शरण ली। तब बाज मनुष्य की बोली में राजा से बोला—॥९० ॥ 'राजन् ! यह कबूतर मेरा भक्ष्य है। मैं भूखा हूँ। यदि तुम इसे नहीं छोड़ते तो मुझे मरा हुआ समझो। इस प्रकार मेरी हिंसा करके तुम्हें कौन-सा धर्म प्राप्त होगा ? ॥९१॥ तब शिबि ने उससे कहा कि 'यह मेरी शरण में आ गया है, इसलिए इसे अब छोड़ नहीं सकता। तुम्हारी क्षुधा-निवृत्ति के लिए इसके समान दूसरा मांस देता हूँ' ॥९२॥ बाज ने कहा— यदि ऐसी बात है, तो अपना मांस मुझे दो।' राजा ने भी प्रसन्न हो 'ऐसा ही सही' —यह कहकर इसकी बात को स्वीकार किया॥९३॥ राजा जैसे-जैसे अपना मांस काटकर तराजू पर चढ़ाता था वैसे-ही-वैसे कबूतर भारी होता जाता था॥९४॥
११० कथासरित्सागर
११० कथासरित्सागर
स्वं शरीरं सकलं तुलां राजाध्यरोपयत् । 'साधु साधु' शमं स्वतस्त्रिव्या वागुदुभूवत ॥९५॥ इन्द्रयमौ ततस्त्यक्त्वा रूपं श्येनकपोतयो । तुष्टावतश्चतुरुद्वे तं राजानं चक्षतु शिविम् ॥९६॥ दत्त्वा चास्मै वरानन्यांस्तावन्तर्धानमीयतु । एवं मामपि कोप्येष देवो जिज्ञासुरागत ॥९७॥ इत्युक्त्वा सचिवांस्त्वैरं स सुशर्मा महीपति । समुवाच भयत्रस्तं विप्ररूपं गणोत्तमम् ॥९८॥ अभयं देहि साधो स्नुषा स हारिता निशि । माययेव गता क्वापि रहस्यमाजाप्यहर्निशम् ॥९९॥ कृच्छ्रात्स दयमेवाथ विप्ररूपो गणोऽब्रवीत् । तर्हि पुत्राय राजन् देहि स्वां समभामिति ॥१००॥ तच्छ्रुत्वा शापभीतेन राज्ञा तस्मै निजा सुता । सा दत्ता देवदत्ताय तत पञ्चशिखो ययौ ॥१०१॥ देवदत्तोऽपि तां भूय प्रकाश प्राप्य वल्लभाम् । अजृम्भेऽनन्यपुत्रस्य श्वशुरस्य विभूतिषु ॥१०२॥ कालेन तस्य पुत्रं च दौहित्रमभिषिच्य स । राज्ये महीधरं नाम सुशर्मा शिश्रिये वनम् ॥१०३॥ ततो दृष्ट्वा सुतैश्वर्यं कृतार्थ स तपोवनम् । राजपुत्र्या तया साकं देवदत्तोऽप्यशिश्रियत् ॥१०४॥ तत्राराध्य पुरं शम्भुं त्यक्त्वा मर्त्यकलेबरम् । तत्प्रसादेन तस्यैव गणभावमुपागत ॥१०५॥ प्रियादन्तोऽस्मिन्मातृपुष्पारसर्गा न ज्ञातवान्यत । अत स पुष्पदन्ताख्य सम्पन्नो गणसंसदि ॥१०६॥ तद्भार्या च प्रतीहारी देव्या जाता जयाभिधा । इत्थं स पुष्पदन्ताख्यो मदाख्यामधुना शृणु ॥१०७॥
माल्यवतः पूर्वकथा
य स गोविन्ददत्ताख्यो देवदत्तपिता द्विज । तस्यैव सोमदत्ताख्य पुत्रोऽहमभवं पुरा ॥१०८॥ तेनैव मन्युना गत्वा तपश्चाहं हिमाचले । अकार्ये बहुभिर्मास्यैः शङ्कर नन्दमन्ववा ॥१०९॥
प्रथम लम्बक १११
प्रथम लम्बक १११ तब राजा ने अपना सारा शरीर तराजू पर चढ़ा दिया और 'साधु-साधु'—इस प्रकार की आकाशवाणी हुई ॥१९५॥ तब इन्द्र और धर्म ने बाज एवं कबूतर का रूप छोड़कर और प्रसन्न होकर राजा के शरीर को पहले ही जैसा अक्षत कर दिया ॥१९६॥ इसी प्रकार मेरी परीक्षा करने के लिए यह कोई देवता आया है ॥१९७॥ मन्त्रियों से इस प्रकार कहकर भय से नम्र राजा सुशर्मा उस ब्राह्मण-रूपी यक्ष से बोला— 'महाराज ! अभय-दान दो ! भली भाँति सुरक्षित वह तुम्हारी स्नुषा (पतोहू) आज की रात किसी माया के द्वारा हरण कर ली गई। क्षमा करो' ! ॥१९९॥ यह ब्राह्मण कठिनाई और दया भाव से बोला—'राजन् ! यदि ऐसा है तो मेरे पुत्र के लिए अपनी कन्या दो' ॥१ ॥ यह सुनकर शाप से त्रस्त राजा ने अपनी कन्या देवदत्त को दे दी और तब पंचशिख भी शिवलोक को गया ॥१ १॥ देवदत्त भी अपनी प्यारी राजकन्या को प्रयास-रूप से प्राप्त करके श्वशुर-संपत्ति का आनन्द लेने लगा क्योंकि राजा को उस कन्या के अतिरिक्त कोई दूसरी सन्तान न थी ॥१ २॥ कुछ समय के अनन्तर देवदत्त के पुत्र और अपने दौहित्र महीधर का राज्य में अभिषिक्त करके राजा सुशर्मा अन्तिम अवस्था में वन को चला गया ॥१ ३॥ कुछ समय के अनन्तर अपने बालक को राज्य करते हुए देखकर कृतार्थ होकर वह देवदत्त भी उस राजपुत्री के साथ तपोवन में गया ॥१ ४॥ देवदत्त तपोवन में पुनः शिवजी की आराधना करके शिवजी को प्रसन्न करके और इस मानव-देह को छोड़कर शिव का गण बन गया ॥१ ५॥ पिता के दोषों से फैले हुए पुण्य से वह गणेश का न समझ सका अतः उसका नाम पुण्यदन्त हुआ और उसकी पत्नी जया नाम से पार्वती की प्रतिहारी बन गई। अब मेरे नाम का कारण सुनो ॥१ ६ १ ७॥ माल्यवान् की पूर्वकथा मैं उसी देवदत्त के पिता गोविन्ददत्त का सोमदत्त नामक बालक था ॥१ ८॥ मैं भी उसी पश्चात्ताप के कारण घर से निकलकर हिमाचल पर तप करने लगा और उस समय बहुत-सी पुण्यशालाओं से शिवजी को प्रसन्न करता था ॥१ ९॥
११२ कथासरित्सागर
११२ कथासरित्सागर तथैव प्रकटीभूतात्प्रसन्नादिन्दुशेखरात् । त्यक्तान्यमोक्षलिप्सेन त्वद्गणत्वं मया वृतम् ॥११०॥ यत् पूजितोऽस्मि भवता स्वयमाहृतेन माल्येन दुर्गवनभूमिसमुद्भवेन । सन्माल्यवानिति भविष्यसि मे गणस्त्व- मित्यादिशच्च स विभुर्गिरिजापतिर्माम् ॥१११॥ अथ मर्त्यवपुर्विमुच्य पुण्या सहसा त्वद्गणसामहं प्रपन्नः । इति धूर्जटिना कृतः प्रसादादभिधानं मम माल्यवानीतीदम् ॥११२॥ सोऽहं गतः पुनरिहाथ मनुष्यभावं । शापेन शल्यदुहितुर्वत काणभूते ! तन् कथां हरकृतां कथयाधुना त्वं येनावयोर्भवति शापद्दोषोपशान्तिः ॥११३॥ इति महाकविश्रीसोमदेवभट्टविरचिते कथासरित्सागरे कथापीठलम्बके सप्तमस्तरङ्गः
अष्टमस्तरङ्गः एव गुणाढ्यवचसा सा च सप्तकथामयी । स्वभाषया कथा दिव्या कथिता काणभूतिना ॥१॥ तथैव च गुणाढ्येन पैशाच्या भाषया तया । निबद्धा सप्तभिर्वर्षैर्ग्रन्थलक्षणि सप्त सा ॥२॥ मैतां विद्याधरा हार्थुरिति तामात्मशोणितैः । अटव्यां मध्यमाबाध्य लिखन्न स महाकविः ॥३॥ तया च श्रोतुमायातैः सिद्धविद्याधरादिभिः । निरन्तरमभूत्तत्र सवितानमिवाम्बरम् ॥४॥ गुणाढ्येन निबद्धां च तां दृष्ट्वैव महाकथाम् । जगाम मुक्तशापः सन्काणभूतिर्निजां गतिम् ॥५॥ पिशाचा येऽपि तत्रासन्नन्ये तत्सहचारिणः । तेऽपि प्रापुर्दिवं सर्वे दिव्यामाकर्ण्य तां कथाम् ॥६॥ प्रतिष्ठां प्रापणीयेयं पृथिव्यां मे बृहत्कथा । मयमर्त्योऽपि मे दत्त्वा शापान्तोक्तावुदीरितः ॥७॥ तत्कथं प्रापयाम्येनां कस्मै तावत्समर्पये । इति चाचिन्तयत्तत्र स गुणाढ्यो महाकविः ॥८॥
प्रथम लम्बक ११५
प्रथम लम्बक ११५ उसी प्रकार प्रकट हुए शिवजी से मैंने सांसारिक भोगों की लिप्सा छोड़कर उनके गण होने का वर माँगा ॥११० ॥ गिरिजापति शंकर भगवान् ने मुझे यह आदेश दिया कि चूंकि तुमने वन में उत्पन्न हुए पुष्पों की मालाओं से मेरी पूजा की है, अतः तुम माल्यवान् नामक मेरे गण होओ॥१११॥ तदनन्तर पवित्र मानव-शरीर को छोड़कर मैं तुरन्त शिवजी का गण बन गया। इस प्रकार स्वयं शिवजी ने मेरा नाम माल्यवान् रखा था ॥११२॥ मैं पार्वती के शाप से इस मर्त्यलोक में पुनः मनुष्यत्व को प्राप्त हुआ। हे काणभूत ! अब तुम शिवजी की कही हुई उस कथा को कहो, जिससे मेरी और तुम्हारी—दोनों की शापावस्था समाप्त हो ॥११३॥ महाकवि श्री सोमदेवभट्ट-विरचित कथासरित्सागर के कथापीठ लम्बक का सप्तम तरंग समाप्त
अष्टम तरंग
इस प्रकार गुणाढ्य के अनुरोधसे काणभूति ने अपनी पिशाच-भाषा में सात विद्याधरोंवाली वह दिव्य कथा सुनाई जो उसने पुष्पदन्त (वररुचि) से सुनी थी ॥१॥ गुणाढ्य ने सात वर्षों में—सात लाख छन्दों में—पैशाची भाषा में कही गई कथा को लिखा ॥२॥ इस कथा को कहीं विद्याधर हरण न कर लें और घोर जङ्गल में स्याही न मिलने के कारण महाबुद्धिमान् गुणाढ्य ने उसे अपने रक्त से लिखा ॥३॥ इस कथा का सुनने के लिए आये हुए सिद्ध विद्याधर आदि से भरा हुआ आकाश ऐसा मालूम होता था जैसे चँदोवा टँगा हो ॥४॥ गुणाढ्य द्वारा उस समस्त महाकथा के लिख जाने पर उसे देखकर काणभूति शापमुक्त होकर अपनी पूर्वगति को प्राप्त हुआ अर्थात् यक्ष हो गया ॥५॥ काणभूति के साथ जो उनके साथी पिशाच इस दिव्य कथा को सुन रहे थे, वे भी इसे सुनकर स्वर्ग चले गये ॥६॥ तदनन्तर महाकवि गुणाढ्य ने यह सोचा कि इस बात को अन्य बताते हुए पार्वती ने मुझसे कहा था कि पृथ्वी पर इस कथा का प्रचार करना। सो अब मैं इसका प्रचार कैसे करूँ और इसे किसे समर्पित करूँ जो इसका प्रचार कर सके ॥७-८॥
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११४ कथासरित्सागर
११४ कथासरित्सागर अथैको गुणदेवाख्यो नन्दिदेवाभिधः परः । तमूचतुरुपाध्याय शिष्यावनुगतावुभौ ॥९॥ तत्काव्यस्यार्पणस्थानमेकः श्रीसातवाहनः । रसिको हि वहेत्काव्यं पुष्पामोदमिवानिलः ॥१०॥ एवमस्त्विति तौ शिष्यावन्तिकं तस्य भूपतेः । प्राहिणोत्पुस्तकं दत्वा गुणाढ्यो गुणशालिनौ ॥११॥ स्वयं च गत्वा तत्रैव प्रतिष्ठानपुराद् बहिः । कृतसङ्केत उद्याने तस्थौ देवीविनिर्मिते ॥१२॥ तच्छिष्याभ्यां च गत्वा तत्सातवाहनभूपतेः । गुणाढ्यकृतिरेषेति दर्शितं काव्यपुस्तकम् ॥१३॥ पिशाचभाषां तां श्रुत्वा तौ च दृष्ट्वा तदाकृती । विद्यामदेन सासूयः स राजन्यमभाषत ॥१४॥ प्रमाणं सप्तलक्षाणि पैशाचं नीरसं वचः । शोणितेनाक्षरन्यासो धिक्पिशाचकथामिमाम् ॥१५॥ ततः पुस्तकमादाय गत्वा ताभ्यां यथागतम् । शिष्याभ्यां तद्गुणाढ्याय यथावृत्तमकथ्यत ॥१६॥ गुणाढ्योऽपि तदाकर्ण्य सद्यः खेदवशोऽभवत् । तत्त्वज्ञेन कृतावज्ञः को नामास्तं न तप्यते ॥१७॥ सशिष्यश्च ततो गत्वा नातिदूरं शिलोच्चयम् । विविक्तरम्यभूभागमग्निकुण्डं व्यधात्पुरः ॥१८॥ तत्राग्नौ पत्रमेकैकं शिष्याभ्यां साश्रु वीक्षितः । वाचयित्वा स चिक्षेप श्रावयन्मृगपक्षिणः ॥१९॥ नरवाहनदत्तस्य चरितं शिष्ययोः कृते । ग्रन्थलक्षं कथामेकां वर्जयित्वा सदीप्सिताम् ॥२०॥ तस्मिंश्च तां कथां दिव्यां पठत्यपि दहत्यपि । परित्यक्ततृणाहाराः शृण्वन्तः साश्रुलोचनाः ॥२१॥ आसन्नभ्येत्य तत्रैव निश्चला बद्धमण्डलाः । निर्जिताः पशवः सारङ्गवराहमहिषादयः ॥२२॥ अत्रान्तरे च राजाभूदस्वस्थः सातवाहनः । दोषं चास्यावदन् वैद्या दुष्कमांसोपभोगजम् ॥२३॥
प्रथम लम्बक ११५
प्रथम लम्बक ११५ तदनन्तर गुणदेव और नन्दिदेव नामक गुणाढ्य के दो शिष्यों ने गुरु गुणाढ्य से कहा ॥९॥ इस काव्य के समर्पण का एकमात्र स्थान राजा सातवाहन है। वह रसिक है। वह, फूलों की सुगन्ध को वायु जिस प्रकार फैला देती है उसी प्रकार इसका प्रसार और प्रचार कर सकता है ॥१० ॥ 'यही ठीक है'—ऐसा कहकर गुणाढ्य ने पुस्तक देकर उन दोनों गुणी शिष्यों को राजा सातवाहन के पास भेज दिया ॥११॥ और स्वयं प्रतिष्ठान-नगर के बाहर देवी-उद्यान में मिलने का संकेत करके ठहर गया ॥१२॥ गुणाढ्य के दोनों शिष्यों ने राजा सातवाहन के पास जाकर 'यह गुणाढ्य की रचना है' ऐसा कहकर वह उत्तम काव्य दिखाया ॥१३॥ उस पिशाच-भाषा को सुनकर और उन दोनों शिष्यों को पिशाचाकार देखकर विद्या- मदान्ध राजा ने द्वेष के साथ कहा—सात लाख छन्द, नीरस पिशाच-भाषा और रक्त से अक्षरों का लेखन—ऐसी इस पिशाच-कथा को धिक्कार है ! ॥१४-१५॥ तब उन शिष्यों ने पुस्तक ले जाकर, जो कुछ हुआ था सब उस गुणाढ्य को सुना दिया ॥१६॥ यह सब सुनकर गुणाढ्य को अत्यन्त खेद हुआ। तत्वज्ञ गुणग्राही व्यक्ति के द्वारा अपमान होने पर किसका हृदय संतप्त नहीं होता ॥१७॥ गुणाढ्य भी शिष्यों को साथ लेकर समीपवर्ती पर्वत पर चला गया और एक साफ़-सुथरे एकान्त स्थान में उसने एक अग्निकुण्ड बनाया ॥१८॥ गुणाढ्य बृहत्कथा के एक-एक पत्र को पढ़कर और मृग-पक्षियों को सुनाकर उसे आग में बहा देता था। शिष्य आँखों से आँसू बहाकर उसकी ओर देखते थे ॥१९॥ शिष्यों के अनुरोध से नरवाहनदत्त-चरित नामक एक भाग को उसने बचा लिया जो एक लाख श्लोकों में था ॥२०॥ जब गुणाढ्य उस दिव्य कथा के एक-एक पत्र को पढ़ रहा और जला रहा था उस समय जंगल के सभी पशु-हिरन सूअर, भैंसे आदि—झुंड में निश्चल होकर और घास चरना छोड़ कर आँसू बहाते हुए कथा को सुन रहे थे ॥२१-२२॥ इसी बीच राजा सातवाहन अस्वस्थ हो गया। वैद्यों ने बताया कि इसका कारण सूखे मांस का भोजन है ॥२३॥
आक्षिप्तास्तन्निमित्तं च सूपकारा बभाषिरे। अस्माकमीदृशं मांसं ददते लुब्धका इति ॥२४॥ पृष्टाश्च लुब्धका ऊचुर्नातिदूरे गिरावितः। पठित्वा पत्रमेकैकं कोऽप्यग्नौ क्षिपति द्विजः ॥२५॥ तत्समेत्य निराहारा शृण्वन्ति प्राणिनोऽखिलाः। नान्यतो यान्ति तन्तेषां शुष्कं मांसमिदं क्षुधा ॥२६॥ इति व्याधवचः श्रुत्वा कृत्वा तानेव चाग्रतः। स्वयं स कौतुकाद्राजा गुणाढ्यस्यान्तिकं ययौ ॥२७॥ ददर्श स समाकीर्णं जटाभिरनवभासतः। प्रशान्तशेषदापाग्निधूमिकाभिरिवाभितः ॥२८॥ अथैनं प्रत्यभिज्ज्ञाय सवाष्पमृगमध्यगम्। नमस्कृत्य च पप्रच्छ तं वृत्तान्तं महीपतिः ॥२९॥ सोऽपि स्वं पुष्पदन्तस्य राज्ञे शापादिवेष्टितम्। ज्ञानी कथावतारं समाचख्यौ भूतभाषया ॥३०॥ ततो गणावतारं च मत्वा पादानतो नृपः॥ ययाचे तां कथां तस्माद्दिव्यां हरमुखोद्गताम् ॥३१॥ अथोवाच स तं भूपं गुणाढ्यः सातवाहनम्। राजन् षड्ग्रन्थलक्षानि मया दग्धानि षट् कथाः ॥३२॥ लक्षमेकमिदं त्वस्ति कथैका सैव गृह्यताम्। मच्छिष्यौ तव चात्रतौ व्याख्यातारौ भविष्यतः ॥३३॥ इत्युक्त्वा नृपमामन्त्र्य त्यक्त्वा योगेन तां तनुम्। गुणाढ्यः शापनिर्मुक्तः प्राप दिव्यं निजं पदम् ॥३४॥ अथ तां गुणाढ्यदत्तामादाय कथां बृहत्कथां नाम्ना। नृपतिरगाद्निजनगरं नरवाहनदत्तचरितमयीम् ॥३५॥ गुणाढ्यनन्दिदेवौ तत्र च तौ तत्कथाकवेः शिष्यौ। स्थिति-कनक-वस्त्र-वाहन-भवन-धनैः सर्वभजत् सः ॥३६॥ ताभ्यां सह च कथां तामाश्वास्य च सातवाहनस्तस्याः। तद्भाषायावतारं वक्तुं पत्र प्रथापीठम् ॥३७॥ सा च चित्ररसनिर्भरा कथा विस्मृतामरकथा कुतूहलात्। तद्विधाय नगरे निरन्तरां ख्यातिमत्र भुवनत्रये गता ॥३८॥ इति महाकविश्रीसोमदेवभट्टविरचिते कथासरित्सागरे कथामुखलम्बके अष्टमस्तरङ्गः। समाप्तश्चायं कथामुखलम्बकः प्रथमः।