कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५)
महाकवि सोमदेव भट्ट द्वारा
स्रोत: कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1960 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंप्रथम लम्बक ११५ उसी प्रकार प्रकट हुए शिवजी से मैंने सांसारिक भोगों की लिप्सा छोड़कर उनके गण होने का वर माँगा ॥११० ॥ गिरिजापति शंकर भगवान् ने मुझे यह आदेश दिया कि चूंकि तुमने वन में उत्पन्न हुए पुष्पों की मालाओं से मेरी पूजा की है, अतः तुम माल्यवान् नामक मेरे गण होओ॥१११॥ तदनन्तर पवित्र मानव-शरीर को छोड़कर मैं तुरन्त शिवजी का गण बन गया। इस प्रकार स्वयं शिवजी ने मेरा नाम माल्यवान् रखा था ॥११२॥ मैं पार्वती के शाप से इस मर्त्यलोक में पुनः मनुष्यत्व को प्राप्त हुआ। हे काणभूत ! अब तुम शिवजी की कही हुई उस कथा को कहो, जिससे मेरी और तुम्हारी—दोनों की शापावस्था समाप्त हो ॥११३॥ महाकवि श्री सोमदेवभट्ट-विरचित कथासरित्सागर के कथापीठ लम्बक का सप्तम तरंग समाप्त
अष्टम तरंग
इस प्रकार गुणाढ्य के अनुरोधसे काणभूति ने अपनी पिशाच-भाषा में सात विद्याधरोंवाली वह दिव्य कथा सुनाई जो उसने पुष्पदन्त (वररुचि) से सुनी थी ॥१॥ गुणाढ्य ने सात वर्षों में—सात लाख छन्दों में—पैशाची भाषा में कही गई कथा को लिखा ॥२॥ इस कथा को कहीं विद्याधर हरण न कर लें और घोर जङ्गल में स्याही न मिलने के कारण महाबुद्धिमान् गुणाढ्य ने उसे अपने रक्त से लिखा ॥३॥ इस कथा का सुनने के लिए आये हुए सिद्ध विद्याधर आदि से भरा हुआ आकाश ऐसा मालूम होता था जैसे चँदोवा टँगा हो ॥४॥ गुणाढ्य द्वारा उस समस्त महाकथा के लिख जाने पर उसे देखकर काणभूति शापमुक्त होकर अपनी पूर्वगति को प्राप्त हुआ अर्थात् यक्ष हो गया ॥५॥ काणभूति के साथ जो उनके साथी पिशाच इस दिव्य कथा को सुन रहे थे, वे भी इसे सुनकर स्वर्ग चले गये ॥६॥ तदनन्तर महाकवि गुणाढ्य ने यह सोचा कि इस बात को अन्य बताते हुए पार्वती ने मुझसे कहा था कि पृथ्वी पर इस कथा का प्रचार करना। सो अब मैं इसका प्रचार कैसे करूँ और इसे किसे समर्पित करूँ जो इसका प्रचार कर सके ॥७-८॥
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