कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५)
महाकवि सोमदेव भट्ट द्वारा
स्रोत: कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1960 (उद्गम)
२१० कथासरित्सागर
२१० कथासरित्सागर प्रीतिपूर्वं च तामूचुर्भगवत्यस्मदीप्सितम्। साध्यते यत्त्वया तत्ते दास्यामोऽर्थान् बहूनिति॥८९॥ साप्युवाच ध्रुवं यूनां कापि स्त्री वाञ्छितेह य। तद्ब्रूत साधयाम्येष धनलिप्सा च नास्ति मे॥९०॥ अस्ति सिद्धिकरी नाम शिष्या मे बुद्धिशालिनी। तत्प्रसादेन सम्प्राप्तमसख्यं हि धन मया॥९१॥ सिद्धि कथा कथ शिष्याप्रसादेन भूरि प्राप्तं धनं त्वया। इति तैः सा वणिक्पुत्रैः पृष्टा प्रव्राजिकाब्रवीत् ॥९२॥ कौतुकं यदि तत्पुत्राः श्रूयतां वर्णयामि वः। इह कोऽपि वणिक्पूर्वमाययावुत्तरापथात् ॥९३॥ तस्यह्रस्वस्य मञ्जिष्ठय्या सा गत्वा शिक्षिय गृहे। युक्त्या कर्मकरीभावं कृतरूपविवर्तना ॥९४॥ विश्वास्य वणिजं तं च तद्गृहात् स्वजसञ्चयम्। सर्वं मुषित्वा प्रच्छन्नं प्रत्यूषे साच निर्ययौ ॥९५॥ नगरीनिर्गतां दृष्ट्वा खट्वापीठप्रगतिं च ताम्। मृदङ्गहस्तो मायाय डोम्बः कोऽप्यन्वगाद्द्रुतम् ॥९६॥ न्यग्रोधस्य तलं प्राप्य सा दृष्ट्वा समुपागतम्। डोम्बं सिद्धिकरी धूर्ता सदैवमेवमब्रवीत् ॥९७॥ भर्त्रा सहाद्य कलहं कृत्वाहं निर्गता गृहात्। मर्त्तुं तन्मम पाशोऽत्र त्वया मे बध्यतामिति ॥९८॥ पाशेन म्रियतामेषा किमेनां हन्म्यहं स्त्रियम्। मत्वेति तत्र वृक्षोऽसौ डोम्बः पाशमसज्जयत् ॥९९॥ ततः सिद्धिकरी डोम्बं सा मुग्धेव जगाद तम्। क्रियते कथमूद्वन्धरस्त्वया मे दर्श्यतामिति ॥१००॥ ततः स डोम्बस्तं दत्त्वा मृदङ्गं पादयोरधः। इत्थं क्रियत इत्युक्त्वा स्वकण्ठे पाशमर्पयत् ॥१ १॥ सापि सिद्धिकरी सद्यस्तं मृदङ्गमचूर्णयत्। पादाघातेन डोम्बोऽथ सोऽपि पाशं व्यपद्यत ॥१ २॥ तत्कालेमागतोऽन्वष्टुं वृक्षमूले ददर्श सः। मुषिताशेषकोशों तां दूररसिद्धिकरीं वणिक् ॥१ ३॥
द्वितीय लम्बक १९१
द्वितीय लम्बक १९१ और उससे कहने लगे—'हे देवि यदि तुम हमारा कार्य सिद्ध कर दोगी तो तुम्हें हम बहुत-सा धन देंगे' ॥८९॥ वह स्त्री बोली—'यदि तुम लोग किसी स्त्री को चाहते हो तो बताओ। मैं तुम्हारा कार्य करा दूँगी। मुझे धन का लालच नहीं है'॥९० ॥ सिद्धिकरी नाम की मेरी एक बुद्धिमती शिष्या है। उसकी कृपा से मैंने अगण्य धन प्राप्त किया है ॥९१॥ सिद्धि की कथा 'तुमने शिष्या की कृपा से अगण्य धन कैसे प्राप्त किया ?' वीरपुत्रों द्वारा इस प्रकार पूछने पर संन्यासिनी बोली—॥९२॥ बेटो ! यदि तुम्हें सुनने की इच्छा है तो सुना करती हूँ। एक बार उत्तामरण से कोई बनिया यहाँ आया था ॥९३॥ मेरी शिष्या किसी उपाय से उसके घर जाकर टिक गई। उसने अपना रूप बिगाड़कर सेविका (मजदूरनी) का रूप धारण किया ॥९४॥ धीरे-धीरे वह उस बनिए पर विश्वास जमाकर उसके घर में रखे हुए समस्त स्वर्ण भांडार को लेकर अत्यन्त प्रातःकाल में छिपकर निकल गई ॥९५॥ नगर से बाहर पकड़े जाने के भय से शीघ्रतापूर्वक भागती हुई उसे देखकर मार्ग में एक डोम उसका धन छीनने के लिए उसका पीछा करने लगा ॥ ९६॥ चतुरा सिद्धिकरी ने समझ लिया और एक पीपल के वृक्ष के नीचे पहुँचकर उसने बड़ी ही दीनता के साथ उस डोम से कहा— आज मैं अपने पति के साथ कलह करके मरने के लिए घर से भाग आई हूँ। इसलिए हे भले आदमी ! तुम मेरे लिए फाँसी का फन्दा बाँध दो। 'यह फाँसी के फन्दे से स्वयं ही मर जाय तो स्त्री-हत्या क्यों करूँ'—यह सोचकर उसने वृक्ष में फाँसी का फन्दा लटका दिया ॥९७—९८॥ तब वह सिद्धिकरी अनजान और भोली-भाली सी बनकर कहने लगी— इस फन्दे को गले में कैसे बाँधा जाता है जरा मुझे बाँधकर दिखलाओ ॥९९॥ तब उस मूर्ख डोम ने पीपल के नीचे हाथ रखकर फन्दे को गले में डालकर फाँसी का फन्दा बाँध दिया ॥१००॥ इतने ही में सिद्धिकरी ने उस हाथ को तुरन्त अलग कर दिया और उसके लटकते ही उस स्थान से नीचे के कपड़े को सम्भालकर भाग गई ॥१०१॥ [L30: कुछ समय पश्चात् सिद्धिकरी को ढूँढ़ते-ढूँढ़ते परिजन वहाँ आए और पेड़ से लटके हुए डोम के नीचे सिद्धिकरी को नहीं देखा ॥१०२॥ १. चाण्डाल का कार्य करनेवाली नीच जाति का पुरुष जिसे डोम कहते हैं।—सं०
प्रस्तुत चित्र पूर्णतः रिक्त (सफ़ेद/blank) है, इसमें कोई पाठ (टेक्स्ट) या श्लोक दिखाई नहीं दे रहा है। कृपया सही अथवा स्पष्ट पृष्ठ का चित्र पुनः अपलोड करें।
द्वितीय लम्बक २१५
द्वितीय लम्बक २१५ सिद्धिकरी भी उसे देखकर वृक्ष पर चढ़ गई और घने पत्तों में अपने को छिपाकर बैठ गई॥१४॥ नौकर के साथ उस बनिये ने आकर देखा तो केवल डोम फाँसी के फन्दे में झूल रहा है। उसने सिद्धिकरी को कहीं नहीं देखा। 'वह कहीं वृक्ष पर न चढ़ी हो' ऐसा सोचकर बनिये का नौकर वृक्ष पर चढ़ गया। उसे पेड़ पर चढ़कर समीप आया हुआ देखकर सिद्धिकरी बोली—'हे सुन्दर, मैं सचमुच तुम पर आसक्त हूँ। आओ यह धन भी लो और मेरे शरीर का भोग भी करो। ऐसा कहकर उसने उस भृत्य का आलिंगन करके चुम्बन लेते हुए उसकी जीभ को दाँतों से काट दिया ॥१५-१८॥ वेदना से पीड़ित और मुँह से रक्त बहाता हुआ बनिये का वह नौकर उस वृक्ष से नीचे गिरा और ल ल ल करता हुआ अस्पष्ट भाषण करने लगा ॥१९॥ उसे देखकर बनिया डरा कि इसपर भूत सवार हो गया है और बचे हुए नौकरों को लेकर शीघ्रता से घर की ओर भागा ॥११ ॥ उसके भागते ही वह तपस्विनी सिद्धिकरी वृक्ष से नीचे उतरी और धन की गठरी लेकर अपने घर पहुँची ॥१११॥ हे बेटे ! इस प्रकार मेरी शिष्या अति प्रतिभाशालिनी है और उसी की कृपा से मैंने बहुत-सा धन प्राप्त किया है॥११२॥ ऐसा कहकर उस परिव्राजिका ने उसी समय आई हुई अपनी शिष्या को उन्हें दिखाया और उसका परिचय उनसे कराया ॥११३॥ इसके पश्चात् उनसे बोली—'बेटे ! अब तुम अपना कार्य बताओ। किस स्त्री को तुमलोग चाहते हो। मैं उसे अभी सिद्ध करती हूँ' ॥११४॥ उसकी बाते सुनकर वैश्यपुत्र बोले—'गुहसेन व्यापारी की देवस्मिता नाम की जो स्त्री है, उससे हम लोगो का संगम कराओ' ॥११५॥ उनकी बात सुनकर परिव्राजिका ने कार्य साधने की प्रतिज्ञा की और उन वैश्यपुत्रों के ठहरने का प्रबन्ध अपने ही घर में कर दिया ॥११६॥ उनके वहाँ ठहरने पर उन्हें भोजन आदि सत्कार से प्रसन्न करके वह दुष्टत्री अपनी तपस्विनी शिष्या के साथ गुहसेन के घर गई ॥११७॥ जब वह देवस्मिता के द्वार पर पहुँची तब जंजीर में बँधी हुई कुतिया ने भूँकते हुए अन्दर जाने से रोका ॥११८॥
२१४ कथासरित्सागर
२१४ कथासरित्सागर ततो देवस्मिता दृष्ट्वा सा तां प्रावेशयत्स्वयम्। किमागता स्यादेषेति विचिन्त्य प्रेष्य चेटिकाम्॥११९॥ प्रविष्टा चाशिषं दत्त्वा कृत्वा व्याजकृतादराम्। सा तां देवस्मितां साध्वीं पापा प्रव्राजिकाब्रवीत्॥१२०॥ सदैव त्वद्दिदृक्षा मे भवत्यद्य पुनर्मया। स्वप्ने दृष्टासि तेनाहमुत्का त्वां द्रष्टुमागता॥१२१॥ भर्त्रा विनाकृता त्वां च दृष्ट्वा मे दूयते मनः। प्रियोपभोगवन्ध्ये हि विफले रूपयौबने॥१२२॥ इत्यादिभिर्वचोभिस्तां साध्वीमाश्वास्य सा चिरम्। आमन्त्र्य प्राययौ तावद् गृहं प्रव्राजिका निजम्॥१२३॥ द्वितीयेऽहनि गृहीत्वा च मरिचक्षोदनिर्भरम्। मांसखण्डं पुनः सा तद्ययौ देवस्मितागृहम्॥१२४॥ द्वारशुने ददौ तस्यै मांसखण्डं च तत्र तम्। सापि तं भक्षयामास सद्यः समरिचं शुनी॥१२५॥ ततो मरिचतोयेण तस्या दृग्भ्यामवारितम्। अश्रु प्रववृते तस्याः प्रस्रोति स्म च नासिका॥१२६॥ सापि प्रव्राजिका तस्मिन् क्षणे देवस्मितान्तिकम्। प्रविश्य तत्कृतातिथ्या प्रारभे रोदितुं शठा॥१२७॥ पृष्टा च देवस्मितया सा कृच्छ्रादेवमब्रवीत्। पुत्रि! सम्प्रति पश्यैतां बहिः प्रस्रवतीं शुनीम्॥१२८॥ एषा ह्यद्य परिज्ञाय मां जन्मान्तरसङ्गताम्। प्रवृत्ता रोदितुं तेन कृपयाश्रु ममोद्गतम्॥१२९॥ तच्छ्रुत्वा बहिरालोक्य शुनीं तां रुदतीमिव। किमेतच्चित्रमिति सा दध्यौ देवस्मिता क्षणम्॥१३०॥ प्रव्राजिकाथ सावादीत् पुत्रि पूर्वत्र जन्मनि। अहमेषा च भार्ये द्वे विप्रस्याभूव कस्यचित्॥१३१॥ स चाभवत् पतिर्दूरे देशान्तरमितस्ततः। वारं वारं प्रयाति स्म राजादेशेन दूत्यया॥१३२॥ तत्प्रवासे च दुर्मत्या स्वेच्छं पुरुषसङ्गमम्। मया भूतेन्द्रियग्रामो मोपभोगैरखण्द्यत॥१३३॥ भूतेन्द्रियानभिद्रोहो धर्मो हि परमो मतः। अतो जातिस्मरा पुत्रि! जाताहमिह जन्मनि॥१३४॥ एषा तु शीलमेवैकं ररक्षामानग्रस्तता। तेन श्वयोनौ पतिता किन्तु जातिं स्मरत्यसौ॥१३५॥
द्वितीय लम्बक २१५
द्वितीय लम्बक २१५
देवस्मिता ने अपनी परिचारिका (सेविका) को भेजकर स्वयं उस अपने घर पर बुलाया और शंकित हुई कि 'यह यहाँ क्यों आई है' ॥११९॥
दुष्टा परिव्राजिका ने भीतर आकर उसे आशीर्वाद दिया और कपटपूर्ण आदर दिखाती हुई देवस्मिता से वह पापिन बोली—'तुम्हें देखने की इच्छा मुझे सदा बनी रहती है। आज मैंने तुम्हें स्वप्न में दुःखी चित्त देखा है, इसीलिए उत्कण्ठा के साथ मिलने आई हूँ। पति के बिना रहती हुई तुम्हारा प्रियतम के उपभोग से रहित रूप और यौवन दोनों ही व्यर्थ हैं। इस प्रकार की बनावटी बातों से देवस्मिता को धैर्य आदि बाँध वह देर तक बैठी रही और फिर उससे पूछकर अपने घर लौट आई ॥१२२ - १२३॥
दूसरे दिन मिर्च के चूर्ण से भरे हुए मांस के टुकड़े का आहार कर फिर देवस्मिता के घर पर गई। द्वार पर बैठी हुई कुतिया को मांस का टुकड़ा देकर वह घर में प्रविष्ट हुई और कुतिया भी मिर्च मिले हुए उस टुकड़े को खाने लगी ॥१२४-१२५॥
मिर्च के कारण उस कुतिया की आंखों से अविराम आंसुओं की धारा बहने लगी और नाक से पानी भी बहने लगा। वह धूर्ता परिव्राजिका भी उसी समय घर में जा देवस्मिता के सम्मुख रोने लगी। देवस्मिता द्वारा रोने का कारण पूछने पर वह बोली—'बेटी ! बाहर जाकर रोती हुई कुतिया को तो देखो ॥१२६-१२८॥
उसे रोती हुई देखकर मेरी आँखों से भी आँसू निकल आये॥१२९॥
यह सुनकर देवस्मिता ने बाहर आकर रोती हुई कुतिया को देखा और यह क्या कारण है ऐसा सोचती हुई वहीं आ गई ॥१३०॥
तदनन्तर वह परिव्राजिका बोली— 'बेटी ! पूर्वजन्म में यह कुतिया और मैं दोनों किसी एक ब्राह्मण की पत्नियां थीं। हमारा वह पति राजा का नौकर होने के कारण राजा की आज्ञा से इधर-उधर दूत-सेवा का काम करता था। उसके प्रवास-काल में यथेच्छ कामोपभोगमग्न होकर मैंने अपनी इन्द्रियों को उपभोग से कभी वंचित नहीं किया। शरीर के नाश और इन्द्रियों का दमन न करना ही परम धर्म है। इसी पुण्य-कार्य के कारण मैं इस जन्म में भी पूर्व-जन्म का स्मरण करती हूँ। मेरी इस सौत ने अज्ञान के कारण अपने चरित्र की ही रक्षा करती रही। इसी कारण अब यह कुत्ती की योनि के जन्म हुई है, किन्तु पूर्वजन्म का स्मरण भी साथ है ॥१३१-१३५॥
`ततः प्रव्राजिकावादीत् सिद्धद्वीपान्तरागता ।` *इह स्थिता वणिक्पुत्रास्तर्हि तानानयामि ते ॥१३८॥*`इत्युक्त्वा सा प्रमुदिता ययौ प्रव्राजिका गृहम् ।` *सा च देवस्मिता स्वैरं स्वचेटीरित्युमापत ॥१३९॥-> Wait,स्वचेटीरित्युमापत? No,स्वचेटीरित्युवाच ह? Let's look:स्वचेटीरित्युमापत? No,स्वचेटीरित्युवाच ह? Let's look at the letters:स्वचेटीरित्युमापत? No,स्वचेटीरित्युवाच ह? Let's look at the letters:स्वचेटीरित्युमापत? No,स्वचेटीरित्युवाच ह? Let's look at the letters:स्वचेटीरित्युमापत? No,स्वचेटीरित्युवाच ह? Let's look at the letters:स्वचेटीरित्युमापत? No,स्वचेटीरित्युवाच ह? Let's look at the letters: `स्वचेटीरित
'भला यह भी कोई धर्म है—कुट्टिनी ने मेरे साथ यह मूर्खता की चाल चली है। ऐसा सोचकर बुद्धिमती देवस्मिता परिव्राजिका से बोली—'भगवति ! इतने दिनों तक मैं इस धर्म को नहीं जानती थी किन्तु आज जान गई। इसलिए तुम किसी सुन्दर पुरुष के साथ मेरा संगम कराओ' ।।१३६-१३७।। तब परिव्राजिका कहने लगी कि कटाह द्वीप से कुछ वैश्य-पुत्र आये हैं। वहीं ठहरे हैं। अतः मैं उन्हें तुम्हारे लिए लाती हूँ ।।१३८।। ऐसा कहकर प्रसन्न होती हुई कुट्टिनी अपने घर गई और इधर बुद्धिमती देवस्मिता ने अपनी सेविकाओं से निःशंक होकर कहा—'मेरे पति के हाथ में सदा खिले हुए कमल-गुच्छ को देखकर और उस मद्यप से सारा वृत्तान्त पूछकर दूसरे द्वीप से कुछ दुष्ट वैश्यपुत्र मेरा सतीत्व विनाश करने के लिए यहाँ आये हैं। उन्होंने ही इस कुट्टिनी दुष्टा तपस्विनी को मित्र किया है। इसलिए तुमलोग धतूरा मिला हुआ मद्य शीघ्रता से लाओ और बाजार में जाकर कुत्ते के लोहे के पैर बनवा लाओ।।१३९-१४२।। देवस्मिता के आज्ञानुसार सेविकाओं ने ऐसा ही किया और एक सेविका ने उसके आज्ञा- नुसार देवस्मिता का रूप धारण किया।।१४३।। उधर परिव्राजिका भी 'पहले मैं पहले मैं' करते हुए उन चारों में से एक को अपनी शिष्या के वेश में छिपाकर गुप्त रूप से देवस्मिता के घर पर आई।।१४४।। इस प्रकार सायंकाल ही उसे देवस्मिता के घर में प्रविष्ट कराकर वह धीरे-से गुप्त रूप से लौट गई। वैश्यपुत्र के घर आने पर देवस्मिता के रूप में बैठी हुई दासी ने उस धतूरा मिला हुआ प्रचुर मद्य-पान कराया। मद्य के नशे से उन्मत्त वैश्यपुत्र के शरीर के सारे वस्त्र और आभूषण उतरवाकर दासियों ने उसे नंगा कर दिया। फिर उन्हीं दासियों ने कुत्ते के लोहे के पैरों को आग में लाल करके उससे उसका अगल द्रव्य (दाग) करके उस रात्रि के अन्धकार में किसी मल के कूप (गड्डाम) में फेंक दिया। उसी कूप में पड़े हुए उस वैश्य-पुत्र ने प्रातः मूर्च्छा के अन्त उतरने पर अपने को देखा कि वह अपने पापों के प्रतिबन्धन-स्वरूप अन्धकूप में पड़ा है ।।१४५-१४९।। किसी प्रकार उस गढ़े से निकलकर और स्नान करके वस्त्रों के न रहने पर नग्न घोटता हुआ वह भाग ही परिव्राजिका के घर पहुँचा। अकेला मैं ही हास्य का पात्र (वेषमन्द) न बनूँ—यह जानकर उसने कहा कि रात को उसके घर में आते हुए मुझे चोरों ने मार दिया और मेरी यह दशा कर दी।।१५०-१५१।। २८
२१८ कथासरित्सागर
२१८ कथासरित्सागर जागरेणातिपानेन शिरोऽर्तिं व्यपदिश्य च। प्रातः स तस्थौ वस्त्रेण वेष्टयित्वाङ्कितं शिरः ॥१५२॥ तथैव च पुनः सायं द्वितीयोऽपि वणिक्सुतः। एत्य देवस्मितागेहे अलीकां१ रमवाप्तवान् ॥१५३॥ सोऽप्येत्य नग्नो वक्ति स्म तत्रैवाभरणान्यहम्। स्थापयित्वापि निर्यातो मुषितस्तस्करैरिति ॥१५४॥ प्रातः सोऽपि शिरःशूलव्यपदेशेन वेष्टनम्। कृत्वा प्रच्छादयामास ललाटतटमङ्कितम् ॥१५५॥ एवं सापह्नवाः सर्वे वणिक्पुत्राः क्रमेण ते। प्रापुः शङ्कुं सलीकारमर्थभ्रंशं च लज्जिताः ॥१५६॥ अस्या अपि भवेदेवमिति ते च अलीकृतिम्। तस्याः प्रव्राजिकायास्तामप्रकाश्या ततो ययुः ॥१५७॥ साऽथ प्रव्राजिकान्येद्युर्जगाम सह शिष्यया। कृतप्रयोजनास्मीति हृष्टा देवस्मितागृहम् ॥१५८॥ तत्र देवस्मिता सा तां कृत्वादरमपाययत्। मधु धत्तूरसंयुक्तं परितोषादिवाहृतम् ॥१५९॥ तेन मत्तां सशिष्यां च च्छिन्नश्रवणनासिकाम्। तामप्यशुचिपङ्कान्ते क्षेपयामास सा सती ॥१६०॥ गत्वा मैते२ वणिक्पुत्राः पतिं हन्युः कदाचन। इत्याकुला च सा श्वश्र्वै तं वृत्तान्तमब्रवीत् ॥१६१॥ ततः श्वश्रूरवादीत्तां पुत्रि ! साधु कृतं त्वया। किं तु पुत्रस्य मे तस्य कदाचिदहितं भवेत् ॥१६२॥ ततो देवस्मिताबोधयत्तां शक्तिमती पतिम्। रक्ष प्रज्ञया पूर्वममुं रक्षाम्यहं तया ॥१६३॥ १ अति पूर्वश्लिष्टमित्यर्थः। २ मा-एतै-इति सन्धिः।
द्वितीय लम्बक २१९
द्वितीय लम्बक २१९ 'रात्रि के जागरण और अति मद्यपान से मेरे सिर में वेदना हो रही है'—ऐसा कहकर वह कपड़े के टुकड़े से मस्तक को बाँधकर सो गया ॥१५२॥ इसी प्रकार दूसरे दिन दूसरा वैश्यपुत्र गया। उसने भी उसी प्रकार दुर्दशा भोगी ॥१५३॥ वह नंगा ही कुट्टिनी के घर पहुँचकर बोला कि चोरों ने मेरी यह दुर्दशा की है ॥१५४॥ वह भी सिर-दर्द का बहाना करके सिर में कपड़ा लपेटकर सो गया ॥१५५॥ इस प्रकार क्रमशः वे चारों वैश्यपुत्र वंचित और अपमानित हुए, किन्तु एक दूसरे से अपनी व्यथा छिपाता ही रहा ॥१५६॥ वे इस प्रकार दुर्मति और धन-नाश होने से अत्यन्त लज्जित थे। उन्होंने उस कुट्टिनी परिव्राजिका से भी यह बात प्रकाशित नहीं की और उसके घर से अपने घर चले गये ॥१५७॥ उनके चले जाने पर वह परिव्राजिका कुट्टिनी भी सफल-मनोरथ होने के कारण अपनी धूर्त शिष्या सिद्धिकरी के साथ अभिनन्दन करने के लिए देवस्मिता के घर पर गई ॥१५८॥ देवस्मिता ने भी उसका भलीभाँति स्वागत करके मानों प्रसन्नता और सन्तोष प्रकट करने के लिए धतूरे के चूर्ण से मिला हुआ वही मद्य खूब पिलवाया ॥१५९॥ उसके पश्चात् मद्यपान से उन्मत्त उस कुट्टिनी और उसकी शिष्या के भी नाक-कान कटवा कर उन्हें उसी मल-कुण्ड में फेंकवा दिया जिसमे वैश्यपुत्रों को फेंका गया था ॥१६०॥ देवस्मिता ने इस भय से कि 'वे लज्जित और अपमानित वैश्यपुत्र अपने देश जाकर बदला लेने के लिए मेरे पति को मार न डालें' इसलिए उसने यह सारा वृत्तान्त अपनी सास को सुना दिया ॥१६१॥ तब सास ने कहा—'बेटी ! तुमने बहुत अच्छा कार्य किया। किन्तु इस कांड से मेरे पुत्र (तुम्हारे पति) को हानि हो सकती है ॥१६२॥ तब देवस्मिता ने कहा—"जैसे पहले समय में शक्तिमती ने अपने पति की रक्षा की थी उसी प्रकार मैं भी 'उनकी' रक्षा करती हूँ" ॥१६३॥
कथासरित्सागर
२२ कथासरित्सागर
कथ शक्तिमती पुत्रि! ररक्ष पतिमुच्यताम्। इति पृष्टा तया श्वश्र्वा साऽथ देवस्मिताऽब्रवीत् ॥१६४॥ अस्मद्देशे पुरस्यान्तर्मणिभद्र इति श्रुतः। पूर्वैः कृतप्रतिष्ठोऽस्ति महायक्षः प्रभावतः ॥१६५॥ तस्योपयाचितान्येत्य तत्रत्या कुर्वते जनाः। तत्तद्वाञ्छितसिद्धि-हेतोस्तैस्तैरुपायनै ॥१६६॥ यो नरः प्राप्यते तत्र रात्रौ सह परस्त्रिया। स्थाप्यते सोऽस्य यक्षस्य गर्भागारे तया समम् ॥१६७॥ प्रातस्ततश्च सस्त्रीकः स नीत्वा राजसंसदि। प्रकटीकृत्य तद्वृत्तं निगृह्यत इति स्थितिः ॥१६८॥ एकदा तत्र नक्तं च सक्तः परजायया। वणिक्समुद्रदत्ताख्यः प्राप्तोऽभूत्पुररक्षिणा ॥१६९॥ नीत्वा च तेन क्षिप्तोऽभूत्सपरस्त्रीक एव सः। यक्षसद्मनि तस्मिन् दुर्वृत्तागेह वणिक ॥१७०॥ तत्क्षणं वणिजश्चास्य महाप्रज्ञा पतिव्रता। भार्या शक्तिमती नाम तं वृत्तान्तमबुध्यत ॥१७१॥ साऽथ धीरान्यरूपेण तद्यक्षायतनं निशि। पूजामादाय साश्वासा सखीजनयुता ययौ ॥१७२॥ तत्रैत्य दक्षिणाशोभावेत्तस्या एव पूजकः। ददौ प्रवेशमुद्घाट्य द्वारमुक्त्वा पुराधिपम् ॥१७३॥ सा च प्रविश्य स-स्त्रीके दुष्टे पत्त्यौ विलक्षिते। स्वं वेषं कारयित्वा तां निर्याह्यात्यक्त्वापरस्त्रियम् ॥१७४॥ सा च निर्गत्य रात्रौ स्त्री तद्वेषैव ततो ययौ। तस्थौ शक्तिमती तत्र तेन भर्त्रा समं तु सा ॥१७५॥ प्रातश्च राजाधिकृतैरेत्य यावन्निरूप्यते। तावत्स्वपत्न्याैव युतः शर्वे स ददृशे वणिक् ॥१७६॥ तद्बुद्ध्या यक्षमवमान्मृत्योरिव मुखादप। दण्डयित्वा पुराध्यक्षं वणिजं तममोचयत् ॥१७७॥ एवं शक्तिमती पूर्वं ररक्ष प्रज्ञया पतिम्। अहं तद्वेव भर्त्तारं गत्वा रक्षामि युक्तितः ॥१७८॥
द्वितीय लम्बक २२१
द्वितीय लम्बक २२१ सेठ समुद्रदत्त और शक्तिमती की कथा 'बेटी शक्तिमती ने कैसे अपने पति की रक्षा की थी ?—सास के इस प्रकार प्रश्न करने पर देवस्मिता ने कहा—'हमारे देश में नगर के भीतर मणिभद्र नाम के एक महायक्ष की मूर्ति एक मन्दिर में प्रतिष्ठित है। नगर-निवासी अपनी-अपनी कार्यसिद्धि के लिए उस मणिभद्र-मन्दिर में जाकर मन्नतें मानते हैं, और अपने-अपने कार्य के अनुसार वहाँ उपहार चढ़ाते हैं। जो व्यक्ति उस मन्दिर में दूसरी स्त्री के साथ पाया जाता था उसे रात में मन्दिर के भीतरी भाग में बन्द कर दिया जाता था। वह प्रातःकाल उसी स्त्री के साथ राजसभा में ले जाया जाता था। वहाँ उसका वृत्तान्त प्रकट करके उसे मार डालने का दण्ड दिया जाता था। ऐसी व्यवस्था वहाँ थी ॥१६४-१६८॥ एक बार उस मन्दिर में रात के समय दूसरी स्त्री के साथ समुद्रदत्त नामक बनिये को नगर-रक्षक (कोतवाल) ने पकड़ा और उसे मन्दिर के भीतर उस स्त्री के साथ बन्द करके सुदृढ़ साँकल लगवा दिये ॥१६९-१७०॥ उसी समय समुद्रदत्त की अत्यन्त बुद्धिमती और पतिव्रता पत्नी ने यह समाचार सुना। और साथियों के साथ पूजा-सामग्री आदि उपहार लेकर वह मन्दिर में गई ॥१७१-१७२॥ मन्दिर के पुजारी ने लम्बी दक्षिणा के लोभ से कोतवाल को कहकर मन्दिर का द्वार खुलवा दिया ॥१७३॥ उसने मन्दिर के भीतर जाकर किसी स्त्री के साथ अपने पति को देखा और अपने कपड़े उस स्त्री को पहिनाकर कहा—'तुम जाओ' ॥१७४॥ वह स्त्री शक्तिमती के वेष में बाहर निकल गई और शक्तिमती उस स्त्री के वेष में पति के पास रह गई ॥१७५॥ प्रातःकाल राजा के अधिकारियों ने जब जाकर देखा तो वह बनिया अपनी स्त्री के साथ पाया गया ॥१७६॥ यह वृत्तान्त जानकर राजा ने मृत्यु-मुख से उसे मुक्त कर दिया और प्रमाद करने के कारण कोतवाल को दंड दिया ॥१७७॥ समुद्रदत्त की कथा समाप्त। जिस प्रकार पूर्वकाल में शक्तिमती ने बुद्धि से अपने पति की रक्षा की थी उसी प्रकार मैं भी उपाय करके अपने पति की रक्षा करूँगी ॥१७८॥
२१२ कथारित्सागर
२१२ कथारित्सागर इति देवस्मिता द्व्यू रह उक्त्वा तपस्विनी। स्वचेटिकाभिः सहिता वणिग्वेषं चकार सा ॥१७९॥ आरुह्य च प्रवहणं वणिज्याव्याजतस्ततः । कटाहद्वीपमगमद्यत्र सोऽस्याः पतिः स्थितः ॥१८०॥ गत्वा तं च पतिं तत्र वणिङ्मध्यं ददर्श सा। गुहसेनं समाश्वासमिव मूर्त्तिधरं बहिः ॥१८१॥ सोऽपि तां पुंस्त्वाकारां दूराद्दृष्ट्वा पिबन्निव। प्रियायाः सदृशः सोऽथ वणिग्त्यादित्यचिन्तयत् ॥१८२॥ सा तु देवस्मिता तत्र भूपं गत्वा व्यजिज्ञपत्। विज्ञप्तिरॅस्ति तत्कार्यं संशृण्वन्तां प्रजा इति ॥१८३॥ ततः सर्वान्समानीय राजा पौरान् सरोत्सुकः। का सा विज्ञप्तिरस्तीति वणिग्वेषामुवाच ताम् ॥१८४॥ गता देवस्मितायाणीहि मध्ये मम स्थिताः। पलाय्य दासास्त्वात्तारूंस्तान् देव प्रयच्छतु ॥१८५॥ अथ तामब्रवीद्राजा सर्वे पौरा इमं स्थिताः। गन्धर्वाप्रत्यभिशाय मिजान्भागानुहाण ताम् ॥१८६॥ ततस्तया जगृहिरे स्वगृहे प्राग्गलाङ्किताः। वणिक्सुतास्तं पञ्चाट निरस्यापहृदाम्बराः ॥१८७॥ गापवाहमुक्ता एष यष दासा भवन्ति सः। इति पृच्छन् सामून्तुनन्त्या वणिजन्मन् ॥१८८॥ सा प्रत्यवयोग्गा तान् यदि न प्रत्ययोऽस्ति वः। तदाऽत्र प्रत्ययार्था गुभं गान्धुकम मया ॥१८९॥ गद्यपि तत्समुद्घाट्य गपुषां पाण्डुरङ्कवान्। सर्वैश्च दृष्टमन्तःपुरे राजा च संशयम् ॥१९०॥ तद्विहाय वणिग्भावं गत्वा तत्रान्तरिन्दुकैः। विमर्दाद्दि दिनदृष्टं च सो दर्शिता स्वदम् ॥१९१॥ सा ज्ञात्वा यथावृत्तं सर्वैरेव सगुह्यका। सान्त्वनं प्रतिपन्ना इति सा चावन्मृतः ॥१९२॥ स्वाङ्गेभ्यो वणिजांस्तांश्च शत्रुत्वे सानुकम्पितः। त्यागदण्डं पुनः भूपिः गत्वा तस्य च भक्तः ॥१९३॥
द्वितीय लम्बक २२३
द्वितीय लम्बक २२३ अपनी सास से एकान्त म इस प्रकार बातें करके देवस्मिता ने अपनी सहेलियों के साथ व्यापारी बनियों का-सा वेष बनाया। और व्यापार करने के बहाने से जहाज पर चढ़कर कटाह द्वीप में पहुँची जहाँ उसका पति ठहरा था। कटाह-द्वीप के जौहरी-बाजार में व्यापारियों के मध्य बैठे हुए उसने मूर्त्तिमान् धैर्य के समान अपने पति को देखा॥१७९-१८०॥ गुप्तसेन ने भी पुरुष के वेष में अपनी पत्नी देवस्मिता को भलीभाँति पहचाना तो नहीं किन्तु 'यह उसी के समान कौन है ?' —देखकर इस चिन्ता में निमग्न हो गया ॥१८१-१८२॥ देवस्मिता ने कटाह-द्वीप के राजा के पास जाकर प्रार्थनापूर्वक निवेदन किया कि आप अपने नगर की सारी जनता को एकत्र करें ॥१८३॥ उसकी प्रार्थना स्वीकार करके राजा ने सभी नागरिकों को कौतूहल के साथ एकत्र किया और बनिये के वेष में स्थित देवस्मिता से कहा—'नागरिक एकत्र हैं तुम अपनी प्रार्थना सुनाओ' ॥१८४॥ उत्तर में देवस्मिता ने कहा—'यहाँ मेरे चार दास भागकर आये हैं। महाराज ! उन्हें मुझे सौंप दें' ॥१८५॥ तब राजा ने उससे कहा कि ये सभी नागरिक यहाँ उपस्थित हैं। इनमें से तुम अपने चारों दासों को पहचानकर पकड़ो ॥१८६॥ तब देवस्मिता ने अपने घर में दंडित अतएव अपने-अपने माथे पर दुपट्टा बाँधे हुए उन चारों वैश्यपुत्रों को पहचानकर पकड़ लिया ॥१८७॥ उनके पकड़े जाने पर वहाँ एकत्र सभी बनिये क्रोध से बोले—'ये तो जहाजी व्यापारियों के पुत्र हैं। तुम्हारे दास कैसे हो सकते हैं ?' तब उसने उन्हें प्रत्युत्तर दिया कि 'यदि आपलोगों को विश्वास नहीं है तो इनके मस्तकों को देखें। मैंने कुत्ते के पदचिह्नों से इन्हें दाग दिया है' ॥१८८-१८९॥ तब सभी ने उसकी बात सुनकर दुपट्टे हटाकर देखा कि उनके मस्तकों पर कुत्ते के पैर दागे गये थे ॥१९० ॥ इस स्थिति से वैश्य लज्जित हो गये और राजा को अत्यन्त आश्चर्य हुआ ॥१९१॥ इसके पश्चात् राजा ने स्वयं देवस्मिता से पूछा कि 'यह क्या बात है ?' ॥१९२॥ राजा के पूछने पर देवस्मिता ने सारा और सत्य वृत्तान्त सबको सुना दिया जिसे सुनकर जनता हँसने लगी और तब राजा ने कहा कि 'न्यायतः ये तेरे दास हैं। तब वहाँ के वैश्यों ने धन- संग्रह करके देवस्मिता को दिया और उन चारों को दासता से मुक्ति दिलाई। राजा ने भी उस पतिव्रता को पर्याप्त धन और वैश्यपुत्रों को दंड दिया ॥१९३॥
२२४ कथासरित्सागर
२२४ कथासरित्सागर आदाय तद्धनमवाप्य पतिं च तं स्वं देवस्मिता सकरुसज्जनपूजिता सा। प्रत्याययौ निजपुरीमथ ताम्रलिप्तीं नास्या बभूव च पुनः प्रियविप्रयोगः ॥१९४॥ इति स्त्रियो देवि ! महाकुलोद्गता विशुद्धधीरश्चरितैरुपासत। सर्व्वं भर्त्तारमनन्यमानसाः पतिः सतीनां परमं हि दैवतम् ॥१९५॥ इत्याकर्ण्य वसन्तकस्य वदनादेतामुदारां कथां मार्गे वासवदत्तया नवपरित्यक्ते पितुर्वेश्मनि। तल्लज्जासदनं विधाय विवृधे वत्सेश्वरे भर्त्तरि प्राक्प्रौढप्रणयाबबद्धमपि सद्भक्त्येकतानं मनः ॥१९६॥ इति महाकविश्रीसोमदेवभट्टविरचिते कथासरित्सागरे कथा मुख लम्बके पञ्चमस्तरङ्गः षष्ठस्तरङ्गः अथ विन्ध्यान्तरे तत्र वत्सराजस्य तिष्ठतः। पार्श्वं चण्डमहासेनप्रतीहारः समाययौ ॥१॥ स चागत्य प्रणम्यैनं राजानमिदमब्रवीत्। राजा चण्डमहासेनस्तव सन्दिष्टवानिदम् ॥२॥ युक्तं वासवदत्ता यत्स्वयमेव त्वया हृता। त्वदर्थमेव हि मया त्वमानीत इहाभवः ॥३॥ सप्रतस्य च नैवाहं दत्तेया से मया स्वयम्। मैवमस्मासु ते प्रीतिर्मेनेति विशङ्किना ॥४॥ तदिदानीमविधिना गतास्या दुहितुर्यथा। न विवाहो भवेद्राजन् प्रतीषेधास्तथा मनाक् ॥५॥ गोपालको हि न चिरादत्रैवेष्यति मत्सुतः। स चास्याः स्वसुरुद्वाहं यथाविधि विधास्यति ॥६॥ इतीमं वत्सराजाय सुन्देशमवधार्य सः। तत्तद्वासवदत्तायै प्रतीहारो न्यवेदयत् ॥७॥
द्वितीय लम्बक २२५
द्वितीय लम्बक २२५ इस प्रकार समस्त जनता से प्रशंसित वह पतिव्रता देवस्मिता धन और पति को साथ लेकर अपनी नगरी ताम्रलिप्ति को लौट आई और फिर कभी उसे पति-वियोग नहीं हुआ ॥१९४॥ हे देवि ! इस प्रकार अच्छे कुल में उत्पन्न एवं धीर और उदार चरित्रवाली होती हैं जो अनन्य मन से पतिपरायण होती हैं क्योंकि पति ही सती स्त्रियों का परम देवता है ॥१९५॥ वसन्तक के मुख से इस प्रकार की कथा को सुनकर वासवदत्ता ने तुरन्त छोड़े हुए पिता के घर को लज्जा-गृह बनाकर वत्सेश्वर के प्रति प्रौढ़ प्रेम में पगे हुए मन को भक्ति-प्रवण बना दिया ॥१९६॥ महाकवि श्रीसोमदेवभट्ट-विरचित कथासरित्सागर के कथामुख लम्बक का पंचम तरंग समाप्त। षष्ठ तरंग वत्सराज की कथा कुछ दिनों बाद उसी विन्ध्य-शिविर में रहते हुए वत्सराज के पास चंडमहासेन का प्रति- हार (दूत) आया ॥१॥ आकर और राजा को प्रणाम करके उसने कहा—‘महाराज ! चंडमहासेन ने सन्देश देकर मुझे आपके पास भेजा है और कहलाया है—"तुमने जो वासवदत्ता का हरण किया है यह उचित ही किया है। इसीलिए तुम मेरे द्वारा अपहरण कराकर उज्जैन ले आये गये थे ॥२-३॥ कैद में बँधे हुए मैंने तुम्हें कन्या स्वयं इस शंका से नहीं दी कि तुम सम्भवतः इस प्रकार प्रसन्न न होगे। इसलिए हे राजन् ! मेरी कन्या का विवाह अवैवाहिक न हो इसलिए कुछ प्रतीक्षा करो शीघ्र ही मेरा पुत्र गोपालक वहीं आवेगा और विधिपूर्वक अपनी बहिन का विवाह तुमसे करेगा" ॥४-५॥ इस प्रकार प्रतिहार ने वत्सराज को यह सन्देश सुनाकर वासवदत्ता को भी सुनाया। तब प्रसन्न वासवदत्ता के साथ प्रसन्नचित्त राजा ने कौशाम्बी जाने की इच्छा प्रकट की ॥६॥ २९
२२६ कथासरित्सागर
२२६ कथासरित्सागर ततः सानन्दया सार्धं तया वासवदत्तया। हृष्टो वत्सश्वरश्चक्रे कौशाम्बीगमनं मनः॥८॥ गोपालकस्यागमनं प्रतीक्षेथां युवामिह। तेनैव सह पश्चाच्च कौशाम्बीमागमिष्यथः॥९॥ इत्युक्त्वा स्थापयामास स तत्रैव महीपतिः। श्वाशुरं तं प्रतीहारं स्वमित्रं च पुलिन्दकम्॥१०॥ ततोऽनुयातो राजेन्द्रः प्लवद्भिर्मेदनीभरान्। अनुरागागतविन्ध्यप्राग्भारैरिव जङ्गमैः॥११॥ तुरङ्गसैन्यसङ्घातसुराघातसधर्म्मया । स्तूयमान इवोत्क्रान्तवन्दिसन्दर्भया मुदा॥१२॥ नभोविलङ्घिभिः सान्द्ररजोराशिभिरुद्धतैः। सपक्षमूभूदुल्लासशङ्कां कुर्वञ्छतक्रतोः॥१३॥ स प्रतस्थे ततो देव्या सह वासवदत्तया। स्वपुरीं प्रति राजेन्द्रः प्रातरेवापरेऽहनि॥१४॥ ततश्च दिवसैस्त्रिभिरुल्लङ्घ्य तमध्वापं सः। विशश्राम निशामेकां रुमण्वन्मन्दिरे नृपः॥१५॥ अन्येद्युस्तां च कौशाम्बीं चिरात्प्राप्तमहोत्सवां। मार्गोत्सुको मुखजनो प्रविवेश प्रियासखः॥१६॥ तया च स्त्रीभिरारब्धमङ्गलस्नानमण्डना। चिरादुपगते पत्यौ बभौ नारीव सा पुरी॥१७॥ ददृशुश्चात्र पौरास्तं वत्सराजं वधूसखम्। प्रशान्तशोकाः शशिनं सविद्युतमिवाम्बुदम्॥१८॥ हर्म्यप्रस्थांश्च पिबुः पौरनार्यो मुखेन्दिभः। व्योमगङ्गाततोत्फुल्लहेमाम्बुरुहविभ्रमम् ॥१९॥ ततः स्वं राजभवनं वत्सराजो विवेश सः। नृपश्रियवापरया सह वासवदत्तया॥२०॥ छेवामतनुपाकीर्णमागधोद्गीतमङ्गलम् । सुप्तप्रबुद्धमिव तद्रेजे राजगृहं तदा॥२१॥ अथ वासवदत्ताया भ्राता गोपालकोऽचिरात्। आययौ सह कृत्वा तौ प्रतीहारपुलिन्दकौ॥२२॥
द्वितीय लम्बक २२७
द्वितीय लम्बक २२७ तुम दोनों यहाँ रहकर गोपालक के आगमन की प्रतीक्षा करो उसके आने पर साथ ही आ जाना—उदयन ने समुद्रगृह के प्रतिहार और अपने मित्र पुलिन्दक को ऐसा कहकर वहीं ठहरा दिया॥८—१०॥ तब दूसरे दिन प्रातःकाल ही राजा ने धूमधाम के साथ कौशाम्बी की ओर प्रस्थान किया। राजा की सवारी के पीछे मदों का झरना बहाते हुए मदोन्मत्त हाथी झूम रहे थे जो प्रेम से राजा का अनुगमन करती हुई विन्ध्य की घाटी-से प्रतीत हो रहे थे। पीछे चलते हुए घोड़ों के पदाघातों से भाँती पृथ्वी राजा के वन्दियों का काम कर रही थी। सेना के पैरों से उठी हुई और आकाश में पहुँची हुई धूल के बड़े-बड़े गुब्बारों से इन्द्र के लिए विपक्षी पर्वतों को भ्रम उत्पन्न करते हुए राजा ने प्रस्थान किया॥११—१३॥ निरन्तर यात्रा करके दूसरे दिन प्रातःकाल राजा अपनी राजधानी में पहुँचा और पहली रात को सेनापति रुमण्वान् के घर विश्राम किया। दूसरे दिन चिरकालीन विरह से उत्सुक प्रजा के लिए महोत्सव के समान वह राजा अपनी प्रिया वासवदत्ता के साथ अपने भवन में पहुँचा। उस समय मार्ग के दोनों ओर से उत्सुक जनता राजा का दर्शन कर रही थी॥१४-१६॥ राजा के आगमन की प्रसन्नता से नगर की स्त्रियों ने मङ्गलमान प्रारंभ किया जिससे मालूम होता था कि मानों नगरी अपने स्वामी के आगमन की प्रसन्नता में मङ्गलमान कर रही है॥१७॥ महारानी वासवदत्ता के साथ उदयन को देखकर नगर की जनता शोक और क्षोभ से रहित होकर इस प्रकार प्रसन्न होकर नाचने लगी जैसे बिजली-सहित मेघों को देखकर मयूर नाच उठते हैं॥१८॥ नगरी के ऊँचे मकानों पर राजदर्शनार्थ खड़ी हुई रमणियों ने आकाश-गंगा में खिले हुए कमलों के समान अपने मुख-कमलों से सारे आकाश को घेर लिया॥१९॥ इस प्रकार नगर-यात्रा करता हुआ राजा उदयन दूसरी राजलक्ष्मी के समान वासवदत्ता के साथ राजप्रासाद में आया ॥२०॥ सेवा में आये हुए सामन्त-राजाओं से भरा हुआ बन्दियों और गायकों के गीत-स्वर से गूंजता हुआ राजप्रासाद ऐसा प्रतीत हो रहा था मानो अभी वह सोकर जगा हो॥२१॥ राजा के राजभवन में पहुँच जाने के बाद शीघ्र ही चंडमहासेन का बड़ा पुत्र गोपालक प्रतिहार और पुलिन्दक के साथ कौशाम्बी आ पहुँचा॥२२॥
२२८ कथासरित्सागर
२२८ कथासरित्सागर कृतप्रत्युद्गमं राज्ञा तमानन्दमिवापरम्। प्राप वासवदत्ता सा प्रहर्षोत्फुल्ललोचना ॥२३॥ अमुं भ्रातरमेतस्याः पश्यन्त्या मास्म मूर्च्छना। इत्येव तस्यास्तत्काल रुरोधाश्रु विलोचने ॥२४॥ पितृसन्देशवाक्यैश्च तेन प्रोत्साहिताय सा। मेने कृतार्थमात्मानं स्वजनेन समागतम् ॥२५॥ ततो यथावद्ववृधेस्तया वत्सेश्वरस्य च। व्यधो गोपालकोऽन्येद्युस्तयोद्वाह महोत्सवम् ॥२६॥ रतिहस्तलीनवोर्द्धिमिश्रमिव पल्लवमुज्ज्वलम्। पाणिं वासवदत्ताया सोऽथ वत्सेश्वरोऽग्रहीत् ॥२७॥ सापि प्रियकरस्पर्शसान्द्राम्वननिमीलिता। सकम्पस्वेददिग्धाङ्गी गाढरोमाञ्चकञ्चिता ॥२८॥ सुसमोहमवाप्यन्यवाक्यास्मैनिरन्तरे विद्धेव पुष्पचापेन सद्य एव समलक्ष्यत ॥२९॥ दृष्टिं धूमामिताम्राक्षां तस्या वह्निं प्रदक्षिणे। मदिरा मध्माधुर्यसूत्रपातमिवाकरोत् ॥३ ॥ गोपाल्कार्पिते रत्ने राज्ञा चोपायनैस्तदा। पूर्णकोशो बभौ सत्यां वत्सक्षो राजराजताम् ॥३१॥ निर्वर्तितविवाहो तानादौ लोकस्य पश्यतः। वधूवरौ विविशतुः पश्चात्स्वं वासवेश्मनि ॥३२॥ अथ सम्मामयामास पट्टबन्धादिना स्वयम्। निजोत्सवे वत्सराजो गोपालकपुमिन्दको ॥३३॥ राज्ञां सम्माननार्थं च पौराणां च यथोचितम्। योगन्धरायणस्तेन हम्बजांश्च न्ययुज्यत ॥३४॥ तोऽब्रवीद्रुमण्वन्तमेव यौगन्धरायणः। ज्ञा कष्टे नियुक्तो स्त्वो लोकचित्तं हि दुर्ग्रहम् ॥३५॥ अरन्जितश्च बालोऽपि रोषमुत्पादमवृधुकम्। तथा च शुश्विमा बालबिनष्टककथां सखे ॥३६॥
द्वितीय लम्बक २२९
द्वितीय लम्बक २२९ राजा ने आगे जाकर उसका स्वागत किया और उसके आ जाने पर आनन्द से खिले हुए लोचनोंवाली वासवदत्ता दूसरे आनन्द के समान भाई से मिली। भागी हुई वासवदत्ता को भाई के साथ लज्जा का अनुभव न करना पडे मानो इसीलिए उसकी आँखें प्रेमाश्रुओं से डबडबा आईं। पिता के सन्देश-वचनों से प्रोत्साहित वासवदत्ता ने अपने भाई से मिलकर अपने को कृतकृत्य समझा॥२३—२५॥
दूसरे दिन दोनों का विवाह-संस्कार सम्पन्न हुआ। गोपालक सारे दिन विवाह-महोत्सव के प्रबन्ध में व्यस्त रहा। रतिरुपी लता से नवीन निकले हुए पल्लव के समान कोमल वासवदत्ता के हाथ को वत्सेश्वर ने ग्रहण किया। उदयन का स्पर्श होने पर वासवदत्ता उस स्पर्श के गम्भीर आनन्द में निमग्न हो गई। उसके सारे शरीर में कम्प और पसीना होने लगा। उस समय ऐसा प्रतीत हो रहा था कि मानो कामदेव ने सम्मोहन करनेवाले वायव्य और वारुण अस्त्रों की निरन्तर वर्षा से उसे बेध डाला हो (वायव्यास्त्र के प्रभाव से कम्प और वारुणास्त्र के प्रभाव से स्वेद बह रहा था।) ॥२६—२९॥
अग्नि की प्रदक्षिणा करते समय धुएं से कुछ लाल हुई आँखों में मानो मदिरा के मधुर नशे ने सूत्रपात कर दिया हो ऐसा प्रतीत हो रहा था॥३०॥
इस अवसर पर गोपालक द्वारा दिये गये रत्नों तथा अन्य मित्र-राजाओं के बहुमूल्य उपहारों से वत्सराज राजराज कुबेर-सा लग रहा था॥३१॥
विवाहित वे दोनों वर और वधू पहले तो दर्शकों की आँखों में प्रविष्ट हुए, पश्चात् अपने शयनागार में॥३२॥
तदनन्तर अपने विवाह-महोत्सव में राजा ने गोपालक और पुलिन्दक को भेंट देकर पट्टबन्ध आदि से सम्मानित किया॥३३॥
राजाओं तथा प्रतिष्ठित नागरिकों के सम्मान का कार्य यौगन्धरायण और रुमण्वान् को सौंपा गया था॥३४॥
इस अवसर पर यौगन्धरायण ने रुमण्वान् से कहा कि 'राजा ने हमलोगों को बड़े ही कठिन कार्य पर नियुक्त किया है, क्योंकि सभी लोगों के चित्तों को प्रसन्न करना दुस्तर है॥३५॥
अप्रसन्न बालक भी मन में क्रोध और क्षोभ उत्पन्न कर देता है। इस सम्बन्ध में बाल- विनष्टक की कथा कहता हूँ सुनो॥३६॥