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कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५)

कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५)

महाकवि सोमदेव भट्ट द्वारा

स्रोत: कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1960 (उद्गम)

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द्वितीय लम्बक २१५

देवस्मिता ने अपनी परिचारिका (सेविका) को भेजकर स्वयं उस अपने घर पर बुलाया और शंकित हुई कि 'यह यहाँ क्यों आई है' ॥११९॥

दुष्टा परिव्राजिका ने भीतर आकर उसे आशीर्वाद दिया और कपटपूर्ण आदर दिखाती हुई देवस्मिता से वह पापिन बोली—'तुम्हें देखने की इच्छा मुझे सदा बनी रहती है। आज मैंने तुम्हें स्वप्न में दुःखी चित्त देखा है, इसीलिए उत्कण्ठा के साथ मिलने आई हूँ। पति के बिना रहती हुई तुम्हारा प्रियतम के उपभोग से रहित रूप और यौवन दोनों ही व्यर्थ हैं। इस प्रकार की बनावटी बातों से देवस्मिता को धैर्य आदि बाँध वह देर तक बैठी रही और फिर उससे पूछकर अपने घर लौट आई ॥१२२ - १२३॥

दूसरे दिन मिर्च के चूर्ण से भरे हुए मांस के टुकड़े का आहार कर फिर देवस्मिता के घर पर गई। द्वार पर बैठी हुई कुतिया को मांस का टुकड़ा देकर वह घर में प्रविष्ट हुई और कुतिया भी मिर्च मिले हुए उस टुकड़े को खाने लगी ॥१२४-१२५॥

मिर्च के कारण उस कुतिया की आंखों से अविराम आंसुओं की धारा बहने लगी और नाक से पानी भी बहने लगा। वह धूर्ता परिव्राजिका भी उसी समय घर में जा देवस्मिता के सम्मुख रोने लगी। देवस्मिता द्वारा रोने का कारण पूछने पर वह बोली—'बेटी ! बाहर जाकर रोती हुई कुतिया को तो देखो ॥१२६-१२८॥

उसे रोती हुई देखकर मेरी आँखों से भी आँसू निकल आये॥१२९॥

यह सुनकर देवस्मिता ने बाहर आकर रोती हुई कुतिया को देखा और यह क्या कारण है ऐसा सोचती हुई वहीं आ गई ॥१३०॥

तदनन्तर वह परिव्राजिका बोली— 'बेटी ! पूर्वजन्म में यह कुतिया और मैं दोनों किसी एक ब्राह्मण की पत्नियां थीं। हमारा वह पति राजा का नौकर होने के कारण राजा की आज्ञा से इधर-उधर दूत-सेवा का काम करता था। उसके प्रवास-काल में यथेच्छ कामोपभोगमग्न होकर मैंने अपनी इन्द्रियों को उपभोग से कभी वंचित नहीं किया। शरीर के नाश और इन्द्रियों का दमन न करना ही परम धर्म है। इसी पुण्य-कार्य के कारण मैं इस जन्म में भी पूर्व-जन्म का स्मरण करती हूँ। मेरी इस सौत ने अज्ञान के कारण अपने चरित्र की ही रक्षा करती रही। इसी कारण अब यह कुत्ती की योनि के जन्म हुई है, किन्तु पूर्वजन्म का स्मरण भी साथ है ॥१३१-१३५॥