कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५)
महाकवि सोमदेव भट्ट द्वारा
स्रोत: कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1960 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंद्वितीय लम्बक २२३ अपनी सास से एकान्त म इस प्रकार बातें करके देवस्मिता ने अपनी सहेलियों के साथ व्यापारी बनियों का-सा वेष बनाया। और व्यापार करने के बहाने से जहाज पर चढ़कर कटाह द्वीप में पहुँची जहाँ उसका पति ठहरा था। कटाह-द्वीप के जौहरी-बाजार में व्यापारियों के मध्य बैठे हुए उसने मूर्त्तिमान् धैर्य के समान अपने पति को देखा॥१७९-१८०॥ गुप्तसेन ने भी पुरुष के वेष में अपनी पत्नी देवस्मिता को भलीभाँति पहचाना तो नहीं किन्तु 'यह उसी के समान कौन है ?' —देखकर इस चिन्ता में निमग्न हो गया ॥१८१-१८२॥ देवस्मिता ने कटाह-द्वीप के राजा के पास जाकर प्रार्थनापूर्वक निवेदन किया कि आप अपने नगर की सारी जनता को एकत्र करें ॥१८३॥ उसकी प्रार्थना स्वीकार करके राजा ने सभी नागरिकों को कौतूहल के साथ एकत्र किया और बनिये के वेष में स्थित देवस्मिता से कहा—'नागरिक एकत्र हैं तुम अपनी प्रार्थना सुनाओ' ॥१८४॥ उत्तर में देवस्मिता ने कहा—'यहाँ मेरे चार दास भागकर आये हैं। महाराज ! उन्हें मुझे सौंप दें' ॥१८५॥ तब राजा ने उससे कहा कि ये सभी नागरिक यहाँ उपस्थित हैं। इनमें से तुम अपने चारों दासों को पहचानकर पकड़ो ॥१८६॥ तब देवस्मिता ने अपने घर में दंडित अतएव अपने-अपने माथे पर दुपट्टा बाँधे हुए उन चारों वैश्यपुत्रों को पहचानकर पकड़ लिया ॥१८७॥ उनके पकड़े जाने पर वहाँ एकत्र सभी बनिये क्रोध से बोले—'ये तो जहाजी व्यापारियों के पुत्र हैं। तुम्हारे दास कैसे हो सकते हैं ?' तब उसने उन्हें प्रत्युत्तर दिया कि 'यदि आपलोगों को विश्वास नहीं है तो इनके मस्तकों को देखें। मैंने कुत्ते के पदचिह्नों से इन्हें दाग दिया है' ॥१८८-१८९॥ तब सभी ने उसकी बात सुनकर दुपट्टे हटाकर देखा कि उनके मस्तकों पर कुत्ते के पैर दागे गये थे ॥१९० ॥ इस स्थिति से वैश्य लज्जित हो गये और राजा को अत्यन्त आश्चर्य हुआ ॥१९१॥ इसके पश्चात् राजा ने स्वयं देवस्मिता से पूछा कि 'यह क्या बात है ?' ॥१९२॥ राजा के पूछने पर देवस्मिता ने सारा और सत्य वृत्तान्त सबको सुना दिया जिसे सुनकर जनता हँसने लगी और तब राजा ने कहा कि 'न्यायतः ये तेरे दास हैं। तब वहाँ के वैश्यों ने धन- संग्रह करके देवस्मिता को दिया और उन चारों को दासता से मुक्ति दिलाई। राजा ने भी उस पतिव्रता को पर्याप्त धन और वैश्यपुत्रों को दंड दिया ॥१९३॥