कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५)
महाकवि सोमदेव भट्ट द्वारा
स्रोत: कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1960 (उद्गम)
द्वितीय लम्बक १४३
द्वितीय लम्बक १४३ 'ऐसा ही हो'—इस प्रकार वर देकर वह अन्तर्धान हो गई। और वह निष्ठुरक सम्पूर्ण अंगों से अक्षत रहकर जीवित हो उठा॥८२॥ प्रातःकाल चकित और प्रसन्न धीदत्त उठा और निष्ठुरक के साथ क्रमशः उज्जैन पहुँचा॥८३॥ उज्जैन जाकर उत्सुकतापूर्वक राह देखते मित्रों को उसने ऐसा आनन्दित किया जैसे मेघ मयूरों को आनन्दित करता है॥८४॥ अपने आश्चर्यपूर्ण समस्त वृत्तान्त को कहने के पश्चात् बाहुशाली विधिपूर्वक आतिथ्य सत्कार करके धीदत्त को अपने घर ले गया॥८५॥ वहाँ पर बाहुशाली के माता-पिता द्वारा अपने बालक के समान उनका प्रेम प्राप्त करता हुआ धीदत्त अपने घर के समान ही रहने लगा॥८६॥ किसी समय वसन्तोत्सव के अवसर पर धीदत्त अपने मित्रों के साथ किसी उद्यान में मेला देखने गया॥८७॥ वहाँ मेले में उसने राजा धीबिम्बट की कन्या को मूर्ति धारण करके आई हुई साक्षात् वसन्त-लक्ष्मी (शोभा) के समान देखा॥८८॥ तदनन्तर वह मृगाङ्कवती नाम की राजकुमारी विकसित नेत्रों के मार्ग से धीदत्त के हृदय में प्रवेश कर गई॥८९॥ राजकुमारी की प्रेममयी सरल दृष्टि भी दूती के समान धीदत्त के साथ यातायात करने लगी॥९०॥ घूमती-फिरती राजकुमारी के वृक्षों के झुरमुट में छिप जाने के कारण धीदत्त को विभ्रम होने लगा। उसे कुछ सूझता न था॥९१॥ 'मित्र! मैंने तुम्हारा हृदय जान लिया छिपायो नहीं आओ, इधर ही चलें जिधर राजकुमारी गई है'॥९२॥ ऐसा कहकर धीदत्त को उसका मित्र बाहुशाली राजकुमारी के समीप ले गया॥९३॥ इतने ही में वहाँ अरे रे राजकुमारी को साँप ने काट लिया—इस प्रकार कोलाहल सुनाई दिया जिसे सुनकर धीदत्त के हृदय में ज्वर-सा हो गया॥९४॥ इतने में बाहुशाली ने राजकुमारी के कंचुकी से कहा कि मेरे इस मित्र के पास विष दूर करनेवाली एक ओषधी है और यही विष उतारने का मंत्र भी जानता है॥९५॥ उसी समय वह कंचुकी धीदत्त के चरणों में झुककर प्रणाम करके धीदत्त को राजकुमारी के समीप ले गया॥९६॥
१४४ कथासरित्सागरः
१४४ कथासरित्सागरः सोऽपि तस्यास्तदङ्गुल्यां निक्षिपारङ्गुलीयकम्। ततो जजाप विद्यां च तेन प्रत्युज्जिजीव सा ॥९७॥ अथ सवजने दृष्टे धीदत्तस्तुतितत्पर। तत्रैव ज्ञातवृत्तान्तो राजा बिम्बचिराययौ ॥९८॥ सेनासौ सखिभि सार्धमगृहीताङ्गुलीयकः । प्रत्याजगाम धीदत्तो भवनं बाहुशालिनः ॥९९॥ तत्र तस्मै सुवर्णादि यत्प्रीतः प्राहिणोन्नृपः। तद्बाहुशालिनः पित्रे समग्रं स समर्पयत् ॥१०० ॥ अथ तां चिन्तयन्कान्तां स तथा पर्यतप्यत। यथा किङ्कर्यतामूढा वयस्यास्तस्य जज्ञिरे ॥१०१॥ ततो भावनिका नाम राजपुत्र्या प्रिया सखी। अङ्गुलीयार्पणव्याजात्तस्यान्तिकमुपाययौ ॥१०२॥ उवाच चाम मस्सख्यास्तस्याः सुभग! साम्प्रतम्। त्वं वा प्राणप्रदो भर्त्ता मृत्युर्वाप्येष निश्चयः ॥१०३॥ इत्युक्ते भावनिकया धीदत्तः स च सापि च। बाहुशाली च तेऽन्ये च मन्त्रं सम्भूय चक्रिरे ॥१०४॥ हरामो निभृतं युक्त्या राजपुत्रीमिमां वयम्। निवासहेतोर्गूप्तं च गच्छामो मधुरांमित ॥१०५॥ इति सम्मन्त्रित सम्यक्कार्यसिद्धय च संविदि। अन्योन्यं स्थापितायां सा ययौ भावनिका ततः ॥१०६॥ अन्यद्युर्बाहुशाला च वयस्यमितयाचत। वणिज्याव्यपदशन जगाम मधुरां प्रति ॥१०७॥ स गच्छन्स्थापयामाम वाहनानि पदे पदे। राजपुत्र्यभिमारार्थं गूढानि चतुराणि च ॥१०८॥ धीदत्तोऽपि ततः काञ्चिद्बहुहिम्ना सहितां स्त्रियम्। माम राजमुतावास पाययित्वा मधु न्यधात् ॥१०९॥ ततोऽत्र दीपोद्देशेन दत्वाग्नि वासवेश्मनि। प्रच्छन्नं भावनिकया निन्ये राजसुता बहिः ॥११०॥ तदाण तां च सम्प्राप्य धीदत्तः स बहिःस्थितः । प्राप्तप्रस्थितस्य निकटं प्राहिणोद् वाहनासिनः ॥१११॥ इतो मित्रद्वयं यास्या पश्चाद्भावनिका तया।
द्वितीय लम्बक १४५
द्वितीय लम्बक १४५ श्रीदत्त ने जाकर राजकुमारी की अँगुली में अंगूठी पहना दी और मंत्र भी पढ़ा। इससे वह पुनर्जीवित हो उठी ॥९७॥ राजकुमारी के स्वस्थ होते ही वहाँ एकत्र सभी व्यक्ति श्रीदत्त की प्रशंसा करने लगे। यह समाचार सुनकर राजा बिम्बकि भी वहाँ आ पहुँचा ॥९८॥ राजा के आने पर श्रीदत्त अपनी अंगूठी बिना लिये ही अपने मित्र बाहुशाली के साथ उसके घर लौट आया ॥९९॥ राजा बिम्बकि ने प्रसन्न होकर श्रीदत्त के लिए जो सोना आदि उपहार के रूप में भेजे थे उन्हें श्रीदत्त ने बाहुशाली के पिता को दे दिया ॥१००॥ तदनन्तर श्रीदत्त उस राजकुमारी के विरह में इतना व्याकुल रहने लगा कि उसके मित्र भी घबराकर किंकर्तव्यविमूढ़-से हो गये ॥१०१॥ कुछ समय के पश्चात् राजकुमारी की प्रिय सहेली भावनिका अंगूठी लौटाने के बहाने श्रीदत्त के समीप आई ॥१०२॥ और बोली- हे सौभाग्यशालिन् ! मेरी सहेली को प्राणदान करनेवाले तुम उसके स्वामी बनो अन्यथा उसकी मृत्यु हो जायगी इसमें सन्देह नहीं ॥१०३॥ भावनिका के इस प्रकार कहने पर श्रीदत्त भावनिका बाहुशाली तथा अन्य मित्र मिलकर गुप्त मंत्रणा करने लगे ॥१०४॥ हम लोग किसी भी उपाय से राजकुमारी का हरण कर लें और रहने के लिए गुप्त रूप से यहाँ से मथुरा चलें ॥१०५॥ कार्य सिद्धि के लिए इन लोगों की सम्मति में परस्पर ऐसा निश्चय करके भावनिका अपने घर लौट गई ॥१०६॥ दूसरे दिन अपने तीन मित्रों के साथ बाहुशाली व्यापार के बहाने मथुरा चला गया ॥१०७॥ उसने मथुरा जाते हुए मार्ग में स्थान-स्थान पर सवारी का प्रबन्ध करके राजकुमारी के आने के लिए चारों ओर से गुप्त प्रबन्ध किया ॥१०८॥ श्रीदत्त ने भी कन्या के साथ किसी परदेशी स्त्री को सायंकाल राजकुमारी के निवास-स्थान में ठहरा दिया ॥१०९॥ उधर भावनिका ने दीपक जलाने के बहाने से उस घर में आग लगा दी और गुप्त रूप से राजकुमारी को लेकर बाहर आ गई ॥११०॥ बाहर प्रतीक्षा करते हुए श्रीदत्त ने उसी समय अपने दो मित्रों के साथ राजकुमारी को आगे गये हुए बाहुशाली के समीप भेज दिया ॥१११॥ और, उसके पीछे (या साथ) भावनिका भी गई। १९
१४६ कथासरित्सागर
१४६ कथासरित्सागर सम्मन्दिरं च दग्धा सा धीवा स्त्री सुतया सह ॥११२॥ लोकस्तु तां सखीयुक्तां मेन दग्धां नृपात्मजाम्। प्रातश्च पूर्ववत्तत्र श्रीदत्तो ददृशे जनैः ॥११३॥ ततो रात्रौ द्वितीयायां स गृहीतमृगाङ्ककः। श्रीदत्तः प्रययौ पूर्वं प्रस्थितां तां प्रियां प्रति ॥११४॥ तया च रात्र्यातिक्रम्य दूरमध्वानमुत्सुकः। विन्ध्याटवीमथ प्राप स प्रातः प्रहरे गते ॥११५॥ तत्राधावनिमिषाक्षि पश्चादपि ददर्श तान्। सर्वान्निहाराभिहतान्सपद्मवनिकान् सखीन् ॥११६॥ ते च दृष्ट्वा निजगुस्तं सम्भ्रान्तमुपागतम्। मुषिताः स्मो निपत्याथ बह्वश्वारोहसेनया ॥११७॥ एकेन चाश्वारोहेण राजपुत्री भयाकुला। अस्मास्वतदवस्थेषु नीताश्वमभिरोप्य सा ॥११८॥ दूरं न यावन्नीता च तावद् गच्छानया दिशा। अस्माकमन्तिकं मा स्थाः सर्वषामभ्यधिका च सा ॥११९॥ इति तैः प्रेषितो मित्रैर्मुहुः पश्यन्निवृत्त सः। जवेन राजतनयां श्रीदत्तोऽनुससार ताम् ॥१२०॥ गत्वा सुदूरं लेभे च तामश्वारोहवाहिनीम्। युवानमेकं तन्मध्ये क्षत्रियं स ददर्श च ॥१२१॥ तेनोपरि तुरङ्गस्य गृहीतां तां नृपात्मजाम्। अपश्यच्च ययौ चास्य क्षत्रसूनोऽन्तिकं क्रमात् ॥१२२॥ सास्त्रेण राजपुत्रीं ताममुञ्चन्तं च पावतः। अश्वादाक्षिप्य दृषदि श्रीदत्तस्तमचूर्णयत् ॥१२३॥ तं हत्वा च तमेवाश्वमारुह्य निजघान तान्। अन्यान्यपि बहून्क्रुद्धानश्वारोहान् प्रभाववान् ॥१२४॥ हतशेषास्ततस्ते च तद्दृष्ट्वा तस्य तादृशम्। वीरस्यामानुषं वीर्यं पलाय्य त्रस्य युः ॥१२५॥ स चापि तुरगारूढो राजपुत्र्या तया सह। मृगाङ्कवत्या श्रीदत्तः प्रययौ तान् सखीन् प्रति ॥१२६॥ स्तोकं गत्वा च तस्याश्वः सङ्ग्रामे व्रणितो भृशम्। समाग्रस्यावतीर्णस्य पपात प्राप पञ्चताम् ॥१२७॥
द्वितीय लम्बक १४७
द्वितीय लम्बक १४७ इधर कुमारी के भवन में आग लगने से धीदत्त की भेजी हुई वह पायक-स्त्री कन्या के साथ जल गई॥११२॥ वहाँ के लोगों ने भावनिका के साथ राजकुमारी को जला हुआ समझ लिया और प्रातःकाल धीदत्त को वहाँ उपस्थित देखा॥११३॥ दूसरी रात को धीदत्त 'मृगांक' नामक खड्ग को हाथ में लेकर पहले से भागी हुई प्रिया (राजकुमारी) से मिलने के लिए चल पड़ा॥११४॥ उत्सुक धीदत्त रात में ही लम्बा रास्ता तै करके प्रातःकाल एक प्रहर व्यतीत होने पर विन्ध्याचल के घोर जंगल में जा पहुँचा ॥११५॥ धीदत्त ने प्रस्थान करते हुए पहले अशुभसूचक शकुन देखे और पीछे भावनिका के साथ आक्रमण से व्याकुल अपने मित्रों को देखा ॥११६॥ वे लोग घबराकर भागे हुए धीदत्त से बोले—'हम लोग बहुत बड़ी घुड़सवार-सेना द्वारा घेर लिये गये हैं॥११७॥ हम लोगों के घायल होने पर एक घुड़सवार सैनिक राजकुमारी को घोड़े पर बैठा कर ले भागा॥११८॥ अतः जबतक वे लोग दूर नहीं चले जाते तबतक इसी मार्ग से उस ओर जाओ। हम लोगों के पास न रहो। उस (राजकुमारी) की रक्षा प्रधान कर्त्तव्य है' ॥११९॥ इस प्रकार उन मित्रों का भेजा हुआ धीदत्त लौटकर वेग से घोड़ा दौड़ाता हुआ गया। कुछ ही दूर आगे उसने घुड़सवार-सेना को देखा और उसके बीच एक युवा क्षत्रिय को भी उसने देखा॥१२०-१२१॥ उस युवा द्वारा घोड़े पर चढ़ाकर पकड़ी हुई राजकुमारी को भी उसने देखा और क्रमशः उन दोनों के समीप आ गया॥१२२॥ शान्तिपूर्वक राजकुमारी को न छोड़ते हुए उस युवक को धीदत्त ने पैरों से खींचकर पत्थर पर दे मारा और घोड़े से गिराकर चूर-चूर कर दिया ॥१२३॥ उसने उसे मारकर और उसी के घोड़े पर सवार होकर अन्यान्य क्रुद्ध एवं भागते हुए उसके सिपाहियों को भी मारा। बचे हुए सिपाही धीदत्त के अमानुष पराक्रम को देखकर डर से इधर-उधर भाग गये॥१२४-१२५॥ अकस्मात् धीदत्त भी राजकुमारी मृगांकवती को साथ लेकर अपने मित्रों की ओर लौटा ॥१२६॥ कुछ दूर जाने पर लड़ाई में घायल हुआ उसका घोड़ा गिर गया। धीदत्त जब अपनी पत्नी को लेकर उससे उतरा तब वह घोड़ा मर गया ॥१२७॥
१४८ कथासरित्सागर
१४८ कथासरित्सागर तत्कालं चास्य सत्रेण सा मृगाङ्कवती प्रिया । त्रासायासपरिश्रान्ता तृषार्त्ता समपद्यत ॥१२८॥ स्नापयित्वा च तां तत्र गत्वा दूरमितस्ततः । जलमन्विष्यतश्चास्य सवितास्तमुपाययौ ॥१२९॥ ततः स लब्धेऽपि जले मार्गनाशवशाद् भ्रमन् । चक्रवाकवधूकूजां निनाय निशां वने ॥१३०॥ प्रातः प्राप च तत्स्थानं पतिताश्वोपलक्षितम् । न च तत्र क्वचित् कान्तां राजपुत्रीं ददर्श ताम् ॥१३१॥ ततः स मोहाद् विन्यस्य भुवि खड्गं मृगाङ्ककम् । वृक्षाग्रमारुहोन्नामवेक्षितुमितस्ततः ॥१३२॥ तत्क्षणं तेन मार्गेण कोऽप्यागच्छच्छबराधिपः । स चागत्यैव जग्राह वृक्षमूलान् मृगाङ्ककम् ॥१३३॥ तं दृष्ट्वापि स वृक्षाग्रादवतीर्यैव पृष्टवान् । प्रियाप्रवृत्तिमार्त्तं धीदस्तं शबराधिपम् ॥१३४॥ इतस्त्वं गच्छ मत्पल्लीं जाने सा तत्र ते गता । अह्रं तत्रैव चैष्यामि दास्याम्यसिमिमं च ते ॥१३५॥ इत्युक्त्वा प्रेषितस्तेन शबरेण स चोत्सुकः । धीवरस्तां ययौ पल्लीं तदीये पुरुषैः सह ॥१३६॥ श्रमं तावद् विमुञ्चेति तत्रोक्तः पुरुषैश्च सः । प्राप्य पल्लीपतेर्गेहं श्रान्तो निद्रां क्षणाद्ययौ ॥१३७॥ प्रबुद्धश्च ददर्श स्वौ पादौ निगडसंयुतौ । असम्यर्थद्गतौ कान्ताप्राप्त्युपायोधमाविव ॥१३८॥ अथ क्षण दरासुखां क्षणान्तरविभाविनीम् । दैवस्य च गतिं शोचन् तस्थौ शोचन् स तां प्रियाम् ॥१३९॥ एकदा तमुवाचास्य चटी मोषणिकामिषा । आगतोऽसि महाभाग कुनेहं बत मृत्यवे ॥१४०॥ कार्यसिद्धय स हि क्वापि प्रयातः शबराधिपः । आगत्य चण्डिकायास्त्वामुपहारीकरिष्यति ॥१४१॥ एतदर्थं हि तेन त्वमितो विन्ध्याटवीतलात् । प्राप्य युक्त्या विसृज्येह नीतः सम्प्रति बन्धनम् ॥१४२॥
द्वितीय लम्बक १४९
द्वितीय लम्बक १४९ वहाँ उतरने पर उसकी प्यारी मृगांकवती भय और थकावट के कारण प्यास से व्याकुल हो गई ॥१२८॥ धीरदत्त मृगांकवती को वहीं ठहराकर इधर-उधर पानी ढूंढने लगा। पानी ढूंढते-ढूंढ़ते सन्ध्या हो गई, सूर्य अस्त हो गया ॥१२९॥ जल मिल जाने पर भी राह भूल जाने के कारण धीरदत्त ने चकवे के समान बिलखते- बिलखते रात व्यतीत की ॥१३०॥ प्रातःकाल मरे हुए लीढ़ेवाले उस स्थान को तो उसने पाया किन्तु उस प्यारी राजकुमारी को कहीं न देखा ॥१३१॥ तब धीरदत्त व्याकुलता के कारण मृगांक खड्ग को वृक्ष की जड़ में रखकर उसे देखने के लिए पेड़ पर चढ़ गया ॥१३२॥ उसी समय उस मार्ग से कोई जंगली भिल्लराज उधर आ निकला। उसने आते ही पहले पेड़ की जड़ में रखी हुई तलवार उठा ली ॥१३३॥ उसे देखकर धीरदत्त पेड़ से नीचे उतरा और उसने उतरते ही भिल्लराज से दीनतापूर्वक राजपुत्री का समाचार पूछा ॥१३४॥ 'यहाँ से तुम मेरे गाँव पर जाओ सम्भवतः वह वहीं गई होगी मैं वहीं आ रहा हूँ और तुम्हारी तलवार भी साथ ला रहा हूँ' ॥१३५॥ ऐसा कहकर भिल्लराज द्वारा अपने गाँव को भेजा हुआ धीरदत्त उसके आदमियों के साथ उसके गाँव आ गया ॥१३६॥ वहाँ जाकर उसने आदमियों के 'थकावट मिटा लो'—कहने पर धीरदत्त वहाँ सो गया ॥१३७॥ जागने पर उसने अपने पैरों को बेड़ियों से बँधा पाया। मानों वे पैर मृगांकवती का पता न लगा सकने के कारण दण्डित किये गये हों ॥१३८॥ क्षण भर में सुख देनेवाली और क्षण भर में दारुण दुःख देनेवाली प्यारी मृगांकवती को दैवगति१ के समान सोचता हुआ धीरदत्त बँधे पैरों से पड़ा रहा ॥१३९॥ इस प्रकार सोच में पड़े हुए धीरदत्त के समीप आकर मोषणिका नामक एक दासी ने कहा—'हे महाभाग ! मृत्यु के लिए तुम यहाँ कहाँ आ गये हो ? ॥१४०॥ यह भिल्लराज अपनी किसी कार्य-सिद्धि के लिए कहीं गया है आकर चंडिका देवी के आगे तुम्हारा बलिदान करेगा ॥१४१॥ इसीलिए तुम्हें विन्ध्य के जंगल से युक्तिपूर्वक यहाँ भेजकर कैद कर दिया गया है ॥ १४२॥ १ दैवगति भी क्षण भर में दुःख और दूसरे ही क्षण सुख देती है। उसी प्रकार मृगांक- वती भी धीरदत्त को क्षण-क्षण में सुख और दुःख का अनुभव करा रही थी। —अनु
१५० कथासरित्सागर
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भगवत्युपहारत्वं यत एवासि कल्पितः। अत एव सदा वस्त्रभोजनैश्चोपचर्यसे ॥१४३॥ एकस्तु मुक्त्युपायस्ते विद्यते यदि मन्यसे। अस्त्यस्य सुन्दरी नाम शबराधिपतेः सुता ॥१४४॥ अयमर्थे सा च दृष्ट्वा त्वां जायते मदनातुरा। तां भजस्व वयस्यां मे ततः क्षेममवाप्स्यसि ॥१४५॥ तमित्युक्तो विमुक्त्यर्थी स धीवस्तस्तदन्विति ताम्। गान्धर्वविधिना गुप्तां भार्यां व्यधित सुन्दरीम् ॥१४६॥ रात्रौ रात्रौ च सा तस्य बन्धनानि व्यवारयत्। अचिराच्च सगर्भा सा सुन्दरी समपद्यत ॥१४७॥ तत्सर्वमथ तन्माता बुद्ध्वा मोचनिकामुखात्। जामातुस्तद्रहो गत्वा स्वैरं श्रीदत्तमब्रवीत् ॥१४८॥ पुत्र! श्रीचण्डनामासौ कोपनः सुन्दरीपिता। न त्वां क्षमेत तद् गच्छ विस्मर्तव्या न सुन्दरी ॥१४९॥ इत्युक्त्वा मोचितः श्वश्र्वा खड्गं श्रीचण्डहस्तगम्। सुन्दर्यै निजमावेद्य श्रीदत्तः प्रययौ ततः ॥१५०॥ विवेश बाह्यां तामेव चिन्ताक्रान्तो निजाटवीम्। मृगाङ्कवत्याः पदवीं तस्या जिज्ञासितुं पुनः ॥१५१॥ निमित्तं च शुभं दृष्ट्वा तमेवोद्देशमाययौ। यत्रास्याश्वो मृतः सोऽथ यत्र सा हारिता वधूः ॥१५२॥ तत्र चैकं ददर्शार्त्तस्तुलुब्धकं सम्मुखागतम्। दृष्ट्वा च पृष्टवांस्तस्याः प्रवृत्तिं हरिणीदृशः ॥१५३॥ किं श्रीदत्तस्त्वमित्युक्तो लुब्धकेन च तत्र सः। स एव मन्दभाग्योऽहमित्युवाच विनिश्वसन् ॥१५४॥ ततः स लुब्धकोऽवादीत्सखि वच्मि सखे! शृणु। दृष्टा सा ते मया भार्या क्रन्दन्ती त्वामितस्ततः ॥१५५॥ पृष्ट्वा ततश्च वृत्तान्तमाश्वास्य च कृपाकुरुः। निजां पल्लीमितोऽरण्याद्दीनां तां नीतवानहम् ॥१५६॥ तत्र चालोक्य तरुणान्पुलिन्दांत्सभयेन सा। मथुरानिकटं ग्रामं नीता नागम्बरुं मया ॥१५७॥
द्वितीय लम्बक १५१
द्वितीय लम्बक १५१ चूंकि तुम्हें देवी के सम्मुख बलिदान के लिए निश्चित किया गया है इसीलिए अच्छे भोजन और वस्त्रों से तुम्हारा सत्कार किया जा रहा है ॥१४३॥ यदि तुम मानो तो तुम्हारी मुक्ति का एक उपाय है। वह यह कि इस भिल्लराज की सुन्दरी नाम की एक कन्या है॥१४४॥ वह तुम्हें देख अत्यन्त कामातुर हो रही है। मेरी उस सहेली को यदि तुम पत्नी बना लो तो तुम्हारा कल्याण होगा ॥१४५॥ धीवर ने भी उसके इस प्रस्ताव को स्वीकार कर गान्धर्व विधि से उस भिल्लराज की कन्या के साथ गुप्त विवाह कर उसे पत्नी बना लिया॥१४६॥ वह सुन्दरी प्रतिदिन रात में धीवर के बन्धन खोल देती थी इस प्रकार कुछ दिनों में वह गर्भवती हो गई॥१४७॥ कुछ समय के अनन्तर सुन्दरी की माता ने मोचनिका से सब समाचार ज्ञात किया और वह जामाता के स्नेह से बोली—बेटा ! धीचण्डनामक सुन्दरी का पिता अति क्रोधी है, वह तुम्हें छोड़ेगा नहीं अतः तुम जाओ किन्तु सुन्दरी को मत भूलना ॥१४८-१४९॥ ऐसा कहकर सास के द्वारा कैद से छुड़ाया गया धीवर भिल्लराज के हाथ लगे अपने कङ्कण के लिए सुन्दरी को समझाकर, चिन्ता से आक्रान्तहृदय होकर, मृगांकवती का पता लगाने के लिए फिर उसी विन्ध्यारण्य में गया ॥१५०-१५१॥ चलने के समय शुभ शकुनों को देखकर वह फिर उसी स्थान पर आ गया जहाँ घोड़ा मरा था और जहाँ से मृगांकवती खो गई थी॥१५२॥ वहाँ पर एक व्याध (बहेलिया) को सामने आते हुए देखकर धीवर ने उससे मृगभवनी का समाचार पूछा ॥१५३॥ 'क्या तुम्हीं धीवर हो ?' बहेलिये के इस प्रकार पूछने पर धीवर ने लम्बी सांस लेते हुए कहा 'हाँ मैं ही वह अभागा हूँ' ॥१५४॥ तब बहेलिये ने कहा 'मित्र बताता हूँ सुनो। तुम्हारा नाम लेकर विलाप करती हुई तुम्हारी भार्या को इधर-उधर भटकते हुए देखा तो मैंने उससे सारे समाचार जानकर और धीरज बँधाकर (समझा-बुझाकर) यथावत् उसे मैं अपने गाँव ले गया॥१५५-१५६॥ वहाँ गाँव में जबान भीलों को देखकर उनके भय से मैं उसे मथुरा के समीप नागस्थल नामक स्थान को ले गया ॥१५७॥
१५२ कथासरित्सागरे
१५२ कथासरित्सागरे तत्र च स्थापिता गेहे स्थविरस्य द्विजन्मनः । विश्वदत्ताभिधानस्य न्यासीकृत्य सगौरवम् ॥१५८॥ ततश्चाहमिहायातो वुबुद्ध्वा त्वन्नाम तन्मुखात् । तामन्वेष्टुं ततो गच्छ शीघ्रं नागस्थलं प्रति ॥१५९॥ इत्युक्तो लुब्धकेनाथ स श्रीदत्तस्ततो ययौ । तं च नागस्थलं प्रापवपरेद्युर्विनात्यये ॥१६० ॥ भवनं विश्वदत्तस्य प्रविश्याथ विलोक्य तम् । ययाचे देहि मे भार्या लुब्धकस्थापितामिति ॥१६१॥ तच्छ्रुत्वा विश्वदत्तस्तं श्रीदत्तं निजगाद सः । मथुरायां सुहृन्मेऽस्ति ब्राह्मणो गुणिनां प्रियः ॥१६२॥ उपाध्यायश्च मन्त्री च शूरसेनस्य भूपतेः । तस्य हस्ते त्वदीया सा गृहिणी स्थापिता मया १६३॥ अयं हि विजनो ग्रामो न तत्रक्षाक्षमा भवेत् । तत्प्रातस्तत्र गच्छ त्वमद्य क्षम्यतामिह ॥१६४॥ इत्युक्तो विश्वदत्तेन स नीत्वाथ तां निशाम् । प्रातः प्रतस्थे प्रापञ्च मथुरामपरे दिने ॥१६५॥ दीर्घाध्वम्लानस्तस्मिन्नगरे बहिरेव सः । स्नानं चक्रे परिश्रान्तो निर्मले दीर्घिकाजले ॥१६६॥ सत एषाम्बुमध्याच्च वस्त्रं चौरनिवेष्टितम् । प्राप्तवानञ्चलप्रन्थिबद्धहारमसञ्जितम् ॥१६७॥ अथ तद्वस्त्रमादाय स तं हारमलक्षयन् । प्रियां दिवृक्षुः श्रीदत्तो विवेश मथुरां पुरीम् ॥१६८॥ तत्र तत्प्रत्यभिज्ञाय वस्त्रं हारमवाप्य च । स चौर इत्यवष्टभ्य निग्ये नगररक्षिभिः ॥१६९॥ दर्शितश्च तथाभूतो नगराधिपतेश्च तैः । तेनाप्यावदिता राजे राजाप्यस्याविदधाद् वधम् ॥१७०॥ ततो वध्यभुवं हन्तुं नीयमानं ददर्श तम् । सा मृगाङ्कवती दूरात् पश्चादाहतडिण्डिमम् ॥१७१॥ योऽयं मे नीयते भर्ता वधायेति ससम्भ्रमम् । सा गत्वा मन्त्रिमुख्यं तमब्रवीद्गृह स्थिता ॥१७२॥
द्वितीय लम्बक १५३
द्वितीय लम्बक १५३ वहाँ (नागस्थल में) मैंने उसे विश्वदत्त नामक वृद्ध ब्राह्मण के घर में गौरव के साथ धरोहर के रूप में रख दिया है। उसी से तुम्हारा नाम जानकर मैं तुम्हें ढूँढ़ने के लिए यहाँ आया हूँ ॥१५८-१५९॥ बहेलिये से इस प्रकार कहा गया धीरदत्त शीघ्र ही वहाँ से चल पड़ा और दूसरे दिन सायंकाल नागस्थल पहुँच गया ॥१६०॥ वहाँ विश्वदत्त के घर आकर और उससे मिलकर धीरदत्त ने कहा कि 'बहेलिये द्वारा रखी गई मेरी भार्या मुझे दे दो' ॥१६१॥ यह सुनकर विश्वदत्त ने धीरदत्त से कहा— मथुरा में मेरा एक मित्र गुणग्राही ब्राह्मण है। वह उपाध्याय है और राजा शूरसेन का मन्त्री भी है। मैंने उसी के पास तुम्हारी पत्नी को रख दिया है ॥१६२-१६३॥ यह ग्राम निर्जन है अतः यहाँ उसकी रक्षा सम्भव न थी। अब तुम प्रातःकाल वहाँ जाओ। आज यहीं विश्राम करो ॥१६४॥ विश्वदत्त से इस प्रकार कथित धीरदत्त उस रात को वहीं बिताकर दूसरे दिन प्रातःकाल मथुरा पहुँचा ॥१६५॥ लम्बे रास्ते के कारण मैला-कुचैला तथा थका हुआ धीरदत्त नगर के बाहर ही ठहर गया और निर्मल बावली के जल में स्नान करने लगा ॥१६६॥ स्नान करते हुए उसे चोरों द्वारा बावली में छिपाये हुए कुछ वस्त्र मिले जिनकी गाँठ में एक बहुमूल्य हार बँधा हुआ था। उसे धीरदत्त ने वहीं देखा ॥१६७॥ उन कपड़ों को लेकर मृगांकवती से मिलने की इच्छा से धीरदत्त ने मथुरा में प्रवेश किया ॥१६८॥ नगर में जाने पर सिपाहियों ने उन कपड़ों और उसकी गाँठ में बँधे हुए चोरी के हार को पाकर धीरदत्त को पकड़ लिया और उसे सामान के सहित नगराधिपति के सामने उपस्थित किया ॥१६९॥ इसने (नगराधिपति ने) राजा से निवेदन किया और राजा ने उसे (धीरदत्त को) फाँसी के लिए सिपाहियों को आदेश दे दिया ॥१७०॥ पीछे-पीछे बज रही ढग-ढगी के साथ फाँसी के स्थान पर ले जाये जाते हुए धीरदत्त को देखकर मृगांकवती ने राज्य के उस दूसरे मुख्यमन्त्री से जिसके घर में वह ठहरी थी, जाकर कहा कि 'मेरा पति फाँसी पर लटकाने के लिए ले जाया जा रहा है' ॥१७१-१७२॥ २
निवार्य वधकान्सोऽथ मन्त्री विज्ञाप्य भूपतिम्। श्रीदत्तं मोचयित्वा तं वधादानाययद् गृहम्॥१७३॥ कथं सोऽयं पितृव्यो मे गत्वा देशान्तरं पुरा। इहैव दवाद्द्विगसमयं प्राप्तोऽथ मन्त्रिताम्॥१७४॥ इति तं मन्त्रिणं सोऽथ श्रीदत्तस्तद्गृहागतः। प्रत्यभिज्ञातवान्पृष्ट्वा पपातास्य च पादयोः॥१७५॥ सोऽपि तं प्रत्यभिज्ञाय भ्रातुः पुत्रं सविस्मयः। कण्ठे जग्राह सर्वं च वृत्तान्तं परिपृष्टवान्॥१७६॥ ततस्तस्मै स निखिलं श्रीदत्तः स्वपितुर्वधात्। आरभ्य निजवृत्तान्तं पितृव्याय न्यवेदयत्॥१७७॥ सोऽपि मुक्त्वाश्रु विजनं भ्रातुः पुत्रं तमभ्यधात्। अधृतिं मा कृथाः पुत्र! मम सिद्धा हि यक्षिणी॥१७८॥ पञ्च वाजिसहस्राणि हेमकोटीश्च सप्त सा। प्रादाम्मह्यमपुत्राय तत्तवेशाखिलं धनम्॥१७९॥ इत्युक्त्वा स पितृव्यस्तां श्रीदत्तायार्पयत् प्रियाम्। श्रीदत्तोऽप्यात्तविभवस्तत्र तां परिणीतवान्॥१८०॥ ततश्च तस्मो तत्रैव सङ्गतः कान्तया तया। मृगाङ्कवत्या सानन्दो राज्येव कुमुदाकरः॥१८१॥ बाहुशाल्यादिरचिन्ता तु तस्याभूत्पूर्णसम्पदः। इन्द्बोः कलङ्कलेखेव हृदि मात्सर्यदायिनी॥१८२॥ एकदा स पितृव्यस्तं रहः श्रीदत्तमभ्यधात्। पुत्र! राज्ञः सुताराख्यस्य शूरसेनस्य कन्यका॥१८३॥ मया चावन्तिवेशं सा नेया दातुं सदाज्ञया। तत्तैनैवापदेशेन कृत्वा तुभ्यं ददामि ताम्॥१८४॥ ततस्तदनुगे प्राप्ते बले सति च मामके। यद् राज्यं ते धियाविष्टं तत्प्राप्स्यस्यचिरादिति॥१८५॥ निश्चित्यैतच्च तां कन्यां गृहीत्वा मयतुस्ततः। श्रीदत्तस्तत्पितृव्यश्च ससैन्याः सपरिग्रहो॥१८६॥ ततो विन्ध्याटवीमेतौ प्राप्तमात्राववस्थितौ। चौरसेनातिमहती रुरोध सरसत्त्विणी॥१८७॥
द्वितीय लम्बक १५५
द्वितीय लम्बक १५५
उस मुख्यमंत्री ने अपनी आज्ञा से वधिकों को रोककर और राजा को सूचित करके उस धीरदत्त को दंड से छुड़ाकर अपने घर बुला लिया॥१७३॥ ये मेरे चाचा विगतभय किसी समय घर से विदेश चले गये थे व ही आज दैवयोग से मथुरा-नरेश के मन्त्री हो गये हैं ऐसा समझकर और उनसे पूछकर धीरदत्त उनके चरणों पर गिर पड़ा॥१७४॥ वह मन्त्री भी अपने भतीजे को पहचानकर आश्चर्यचकित रह गया और उसे गले से लगा लिया। इसके पश्चात् उसने सारा समाचार पूछा॥१७५॥ चाचा के पूछने पर धीरदत्त ने पिता के वध से उस समय तक का सारा वृत्तान्त अपने चाचा को सुना दिया॥१७६॥ चाचा ने अपने भाई की मृत्यु के समाचार पर आंसू बहाकर एकान्त में धीरदत्त से कहा—'बेटा! अधीर न हो। मुझे धनदा यक्षिणी सिद्ध है। उसने मुझे पाँच सहस्र घोड़े और सात करोड़ सोने की मोहरें दी हैं। मैं पुत्रहीन हूँ अतः यह सब धन तुम्हारा ही है'॥१७७-१७९॥ ऐसा कहकर चाचा ने भतीज धीरदत्त को वह सारा धन दे दिया। धीरदत्त ने भी धन पाकर उसी मृगांकवती के साथ विवाह कर लिया॥१८०॥ धीरदत्त उस मृगाङ्कवती पत्नी के साथ वहीं ठहर गया और रात्रि में कुमुदाकर के समान आनन्दित तथा प्रफुल्लित होने लगा॥१८१॥ पूर्ण सम्पत्तिशाली धीरदत्त के हृदय को बाहुशाली आदि मित्रों की चिन्ता चन्द्रमा में कलङ्करोग के समान मलिन करती थी॥१८२॥ एक बार चाचा ने एकान्त में धीरदत्त से कहा—'बेटा! राजा शूरसेन की एक कन्या है। वह राजा की आज्ञा से मेरे द्वारा दान करने के लिए अवन्तिदेश (उज्जयिनी) में ले जायी जायगी। सो मैं उसी बहाने से उसका हरण करके तुझे दे दूँगा'॥१८३-१८४॥ ऐसा निश्चय करके चाचा विगतभय और भतीजे धीरदत्त ने सेना और दहेज का सामान साथ लेकर उज्जयिनी को प्रस्थान किया॥१८५॥ चाचा ने धीरदत्त से कहा—'इस प्रकार उस राजा की सेना और मेरी सेना के अन्त होने पर गुप्त राज्य को प्राप्त करोगे जैसा कि लक्ष्मी के स्वरूपने तिल आदेश दिया है'॥१८६॥ जब ये दोनों विन्ध्य पर्वत के प्रान्तों में पहुँचे तब वहाँ म्लेच्छों की एक बड़ी सेना ने डाकाजनी करके उन्हें मार्ग में ही रास्ता रोक लिया॥१८७॥
१५६ कथासरित्सागर
१५६ कथासरित्सागर प्रहारमूर्च्छितं बद्ध्वा श्रीदत्तं भग्नसैनिकम्। निन्युश्चोरा स्वपल्लीं ते स्वीकृत्य सकलं धनम् ॥१८८॥ ते च तं प्रापयामासुश्चण्डिकासद्म भीषणम्। उपहाराय घण्टानां नाधमृत्युरिहाह्वयत् ॥१८९॥ तत्रापश्यच्च तं पत्नी सा पल्लीपतिपुत्रिका। सुन्दरी द्रष्टुमायाता देवीं बालसुतान्विता ॥१९०॥ निषिद्धहत्या मध्यस्थान्दस्यूनानन्दपूर्णया। स श्रीदत्तस्तया साकं सन्मन्दिरमथाविशत् ॥१९१॥ सद्यश्च पल्लीराज्यं तत्प्राप पित्रा यदर्पितम्। प्रागेवानन्यपुत्रेण सुन्दर्या गच्छता दिवम् ॥१९२॥ स च घोरसमाक्रान्तं सपितृव्यपरिच्छदम्। सकलत्रं च लब्धैतौ तं सङ्गं च मृगाङ्ककम् ॥१९३॥ तत्रैव शूरसेनस्य सुतां तां परिणीय च। श्रीदत्तोऽपि महान् राजा नगरे समपद्यत ॥१९४॥ प्रजिघाय स दूतांश्च ततः श्वशुरयोस्तयोः। विम्बकस्तस्य तस्यापि शूरसेनस्य भूपतेः ॥१९५॥ समुपाजग्मतुस्तौ च सेनासमुदयान्वितौ। तं विज्ञाय च सम्बन्धं मुदा दुहितृवत्सलौ ॥१९६॥ तेऽपि स्वव्रणाः स्वस्थास्तद्वियुक्ता वयस्यकाः। बाहुशालिप्रभृतयस्तद्बुद्ध्यैव तमुपाययुः ॥१९७॥ अथ श्वशुरसंयुक्तो गत्वा तं पितृघातिनम्। चक्रे विक्रमशक्तिं स वीरः क्षेमानलाहुतिम् ॥१९८॥ ततश्च साब्धिवसयां धीमत्तः प्राप्य मेदिनीम्। ननन्द विरहोत्तीर्णः स मृगाङ्कवतीसखः ॥१९९॥ इत्थं नरपत दीर्घवियोगव्यसनार्णवम्। तरन्ति च लभन्ते च कल्याणं धीरचेतसः ॥२००॥ इति संश्रुतवाञ्छ्रुत्वा कथां स दयितोत्सुकः। तां निनाय निशां मार्गे सहस्रानीकभूपतिः ॥२०१॥ ततो मनोरथारूढ पुरः प्रहितमानसः। प्रात सहस्रानीकोऽसौ प्रतस्थे स्वां प्रियां प्रति ॥२०२॥
द्वितीय लम्बक १९७
द्वितीय लम्बक १९७ घोरतम आघात से बेहोश और भागे हुए सैनिकोंवाले अकेले श्रीदत्त को हाथ-पाँव बाँध कर सारे दल के साथ अपने गाँव ले गये ॥१८४॥ उस गाँव में ले जाकर उसे चंडी के एक भीषण मन्दिर में पहुँचा दिया गया जहाँ घंटे अपने शब्दों से मानों उसकी मृत्यु का आह्वान कर रहे थे ॥१८९॥ वहाँ पर भिल्लराज की पुत्री सुन्दरी भी छोटे बच्चों को गोद में लेकर उस बलिदान का दृश्य देखने आई थी। जो पिता की मृत्यु के बाद वहाँ का शासन करती थी ॥१९०॥ मानन्द-भरी सुन्दरी ने उन डाकुओं को बलिदान करने से रोक दिया और श्रीदत्त भी आनन्दपूर्वक उस सुन्दरी के घर चला गया ॥१९१॥ वहाँ जाकर उसने उस भिल्लपल्ली का राज्य प्राप्त किया जिसे सुन्दरी के पिता ने अपनी मृत्यु के समय अन्य संतान न होने के कारण एकमात्र उत्तराधिकारिणी अपनी कन्या सुन्दरी को दिया था ॥१९२॥ चोरों से आक्रान्त चण्डाल और सेना-सामग्री सं युक्त सपत्नीक श्रीदत्त ने वहाँ पर अपने मृगांक नामक खड्ग को भी प्राप्त कर लिया ॥१९३॥ श्रीदत्त वहीं (भिल्लपल्ली में) शूरसेन की उस कन्या से विवाह करके उस नगर में महान् राजा बन गया ॥१९४॥ श्रीदत्त ने राजा बिम्बकि और राजा शूरसेन दोनों ने अपने श्वसुरों के पास दूत भेज दिये। फलतः अपनी-अपनी कन्याओं के स्नेह के कारण वे दोनों राजा अपनी-अपनी सेना-सामग्री के साथ विवाह-संबंध के लिए वहीं आये ॥१९५ १९६॥ उधर युद्ध के कारण बिछुड़े हुए बाहुशाली आदि उसके मित्र भी घावों के भर जाने पर स्वस्थ होकर उसके समीप आ गये थे ॥१९७॥ तदनन्तर श्वसुरों और उनकी सेनाओं के सहित श्रीदत्त ने अपने पिता के हत्यारे एवं विरोधी पाटलिपुत्र के राजा विक्रमशक्ति को अपनी कोपाग्नि की आहुति बना डाला। अर्थात् उसे मारकर अपना बदला चुका लिया ॥१९८॥ इसके पश्चात् मृगांकवती के साथ आसमुद्र पृथ्वी का राज्य प्राप्त कर श्रीदत्त सम्राट् बन गया और आनन्द-भोग करने लगा ॥१९९॥ राजा सहस्रानीक को कहानी सुनानेवाले संगठक ने इस कथा को सुनाकर कहा— 'राजन् ! धैर्यशाली व्यक्ति इस प्रकार वियोगजन्य कष्ट के समुद्र को पार करते हुए अभीष्ट को प्राप्त करते हैं ॥२० ॥ प्रिया-समागम के लिए उत्सुक राजा सहस्रानीक ने उस रात को अत्यन्त उत्सुकता के साथ बिताया ॥२०१॥ प्रातःकाल ही मनोरथ पर चढ़े हुए और मन को आगे से ही भेजे हुए राजा सहस्रानीक ने अपनी प्रिया के प्रति प्रस्थान किया ॥२०२॥
१५६ कथासरित्सागर
१५६ कथासरित्सागर प्रहारमूर्च्छितं बद्ध्वा श्रीदत्तं भग्नसैनिकम्। निन्युश्चोरा स्वपल्लीं ते स्वीकृत्य सकलं धनम्॥१९८॥ ते च तं प्रापयामासुश्चण्डिकासद्म भीषणम्। उपहाराय चण्डानां नादेयस्थुरिवाद्रयम्॥१९९॥ समापश्यच्च तं पल्ली सा पल्लीपतिपुत्रिका। सुन्दरी द्रष्टुमायाता देवीं बालसुतान्विता॥१९ ॥ निषिद्धवत्या मध्यस्थान्दस्यूनामन्दपूर्णया। स श्रीदत्तस्तया साकं तन्मन्दिरमबाविशत्॥१९१॥ तदन्न पल्लीराज्यं तत्राप पित्रा यदर्पितम्। प्रायेणानन्यपुत्रेण सुन्दर्यै गच्छता दिवम्॥१९२॥ तं च घोरसमाक्रान्तं सपितृभ्यपरिच्छदम्। सकलं च रेमेऽसौ स खड्गं च मृगाङ्ककम्॥१९३॥ समेव शूरसेनस्य सुतां तां परिणीय च। धीवतोऽपि महान् राजा नगरे समपद्यत॥१९४॥ प्रजिघाय स दूतांश्च ततः श्वशुरयोस्तयोः। दिव्यकेतस्य तस्यापि शूरसेनस्य भूपते॥१९५॥ तमुपाजग्मतुस्तौ च समासमुवयान्वितौ। तं विज्ञायैक सम्बन्धं मुदा दुहितृवत्सलौ॥१९६॥ तेऽपि स्वव्रणा स्वस्थखास्तद्वियुक्ता वयस्यकाः। बाहुशालिप्रभृतयस्सवुबुद्ध्या तमुपाययुः॥१९७॥ अथ स्वसुतसंयुक्तो गत्वा तं पितृमातिनम्। चक्रे विश्रमशक्तिं स धीर प्रधानराष्ट्रतिम्॥१९८॥ ततश्च साम्बिबल्यां श्रीदत्त प्राप्य मेदिनीम्। मनन्द विरहोत्तीर्णः स मृगाङ्कवतीसमः॥१९९॥ इत्थं नरपते दीर्घवियोगव्यसनार्णवम्। तरन्ति च लभन्ते च कल्याणं धीरचेतसः॥२००॥ इति सङ्केतकाच्छ्रुत्वा कथां स दयितोत्सुकः। तां निनाय निशां मार्गे सहस्रानीकभूपतिः॥२०१॥ ततो मनोरथारूढः पुरं प्रहितमानसं। प्रात सहस्रानीकोऽसौ प्रतस्थे स्वां प्रियां प्रति॥२०२॥
द्वितीय लम्बक १५९
द्वितीय लम्बक १५९ कुछ दिनों बाद वह शान्त मृगोंवाले प्रशान्त पावन जमदग्नि ऋषि के आश्रम में पहुँचा ॥२३॥ वहाँ उसने सस्नेह अतिथि-सत्कार करते हुए, तपस्या के मूर्तिमान् आकार, एवं पवित्र दर्शन जमदग्नि ऋषि के प्रणामपूर्वक दर्शन किये ॥२४॥ आश्रम में मुनि जमदग्नि ने पुत्री-सहित आनन्दित एवं सुख की मूर्ति रानी मृगावती को राजा के लिए अर्पण कर दिया ॥२५॥ शाप का अन्त होने पर (चौदह वर्षों के पश्चात्) उन दोनों राजा और रानी का परस्पर दर्शन आनन्द के आँसुओं से छलछलाती आँखों में मानों अमृत-वर्षा कर रहा था ॥२६॥ प्रथम दर्शन के कारण उदयन को हृदय से लगाये हुए राजा रोमांच के कारण शरीर से बड़े हुए के समान उसे कठिनता से दूर कर सका ॥२७॥ तपोवन के अन्त तक आँसू बहाते हुए मृगों से अनुसरण किया गया राजा उदयन और मृगावती को साथ लेकर जमदग्नि ऋषि से आज्ञा प्राप्त कर अपनी नगरी की ओर चला। आश्रम से चलकर प्रिया को अपनी विरह-व्यथा सुनाता हुआ राजा मानों नागरिक लोगों के विकसित नेत्रों से पान किया जाता हुआ क्रमशः कौशाम्बी नगरी में पहुँचा ॥२८-२९॥ राजधानी में पहुँचते ही सर्वप्रथम उसने उदयन को युवराज-पद पर अभिषिक्त किया। अपने मन्त्रियों के पुत्रों को उसने सम्मतिकार के रूप में नियुक्त कर दिया। उस समय उदयन के अभिषेक के समय आकाश से पुष्पवृष्टि के साथ यह वाणी हुई कि 'वसन्तक, रुरुम्मान् और यौगन्धरायण—इन मुख्य मंत्रियों की सहायता से सम्पूर्ण पृथ्वी का राज्य करेंगे' ॥२११-२१४॥ तदनन्तर युवराज उदयन पर राज्य का भार देकर राजा चिरकाल से अभिलषित सांसारिक सुखों का मृगावती के साथ उपभोग करने लगा ॥२१५॥ कुछ समय आनन्द का उपभोग कर लेने पर शान्ति की दूती वृद्धावस्था के कान के समीप आ जाने पर, उसे देखकर राजा की विषय-वासना मानों शोषित¹ होकर उससे दूर हो गई ॥२१६॥ १. पत्नी स्त्री अपने पति को अन्य स्त्री में अनुरक्त देखकर जो ईर्ष्या करती है, उसे मान, प्रणयरुष या सौतियाडाह कहते हैं।—अनु.
१६० कथासरित्सागर
१६० कथासरित्सागर ततस्तं बह्याश्च तनयमनुरक्तप्रकृतिष्विव निवेश्य स्वे राज्ये जगदुदयहेतोरुदयनम् । सहस्रानीकोऽसौ सचिवसहितः सप्रियतमो महाप्रस्थानाय क्षितिपतिरगच्छद्धिमगिरिम् ॥२१७॥ इति महाकविश्रीसोमदेवभट्टविरचिते कथासरित्सागरे कथामुखलम्बके द्वितीयस्तरङ्गः तृतीयस्तरङ्गः ततः स वत्सराज्यं च प्राप्य पित्रा समर्पितम् । कौशाम्ब्यवस्थितः सम्यक्छशासोदयनः प्रजाः ॥१॥ यौगन्धरायणाद्येषु भरं विन्यस्य मन्त्रिषु । बभूव स शनै राजा सुखैकान्ततत्परः ॥२॥ सदा सिषेवे मृगयां वीणां घोषवतीं च ताम् । दत्तां वासुकिना पूर्वं भक्तस्दिनमवादयत् ॥३॥ तत्तन्त्रीक्वणनिर्ह्लादमोहमन्यवशीकृतान् । आनिनाय च संयम्य सदा मत्तान् वनद्विपान् ॥४॥ स वारनारीवक्त्रेन्दुप्रतिमालङ्कृतां सुराम् । मन्त्रिणां च मुखच्छायां वत्सराजः समं पपौ ॥५॥ कुरूपस्यानुरूपा मे भार्या क्वापि न विद्यते । एका वासवदत्ताख्या कन्यका श्रूयते परम् ॥६॥ कथं प्राप्येत सा चेति चिन्तामेकामुवाह सः । सोऽपि चण्डमहासेन उज्जयिन्यामचिन्तयत् ॥७॥ तुल्यो मदुहितुर्भर्त्ता जगत्यस्मिन्न विद्यते । अस्ति चोदयनो नाम विपक्षः स च मे सदा ॥८॥ तत्कथं माम जामाता वश्यश्च स भवेन्मम । उपायस्त्वक एवास्ति यदटव्यां भ्रमत्यसौ ॥९॥ एकाकी द्विरदान्वेषी मृगयाव्यसनी नृपः । तेन च्छिद्रेण तं युक्त्यावष्टभ्यानाययाम्यहम् ॥१०॥ गान्धर्वशास्त्रं तस्यैतां सुतां शिक्षीकरोमि च । ततश्चास्यां स्वयं तस्य चक्षुः स्निह्यत्यसंशयम् ॥११॥ एवं स मम जामाता वश्यश्च नियतं भवेत् । मान्योऽस्त्युपायः कोऽप्यत्र येन वश्यो भवेन्न सः ॥१२॥
द्वितीय लम्बक १६१
द्वितीय लम्बक १६१ तदनन्तर कल्याणकारी एवं अनुरक्त प्रजावाले संसार के उदय के लिए उत्पन्न अपने पुत्र उदयन को राज्य पर बैठाकर राजा सहस्रानीक सचिवों और महारानी के साथ महाप्रस्थान के लिए हिमाचल की ओर चला गया ॥२१७॥ द्वितीय तरंग समाप्त तृतीय तरंग राजा उदयन की कथा सहस्रानीक के महाप्रस्थान के लिए हिमाचल की ओर चले जाने पर, राजा उदयन वत्स प्रदेश का शासन प्राप्त करके राजधानी कौशाम्बी में रहकर सुखपूर्वक प्रजा का शासन करने लगा ॥१॥ राजा उदयन यौगन्धरायण रुमण्वान् आदि मन्त्रियों पर शासन भार छोड़कर एकमात्र आनन्द लेने में तल्लीन हो गया ॥२॥ राजा के सुख-साधनों में वासुकि द्वारा बाल्यकाल में दी हुई घोषवती वीणा ही प्रमुख साधन के रूप में थी जिसे वह दिनरात बजाया करता था ॥३॥ राजा उदयन वीणा के तारों के मधुर स्वर-रूपी मोहन-मन्त्र से मदोन्मत्त जंगली हाथियों को वश में कर और बाँधकर ले आता था यही उसका एक विनोद था ॥४॥ वह वत्सराज उदयन वेश्याओं की मुखचन्द्र की प्रतिमाओं से सुशोभित मदिरा और मन्त्रियों की मुखकान्ति को साथ-साथ पान करता था ॥५॥ राजा उदयन को केवल एकमात्र यही चिन्ता थी कि मेरे वंश के अनुसार उच्च वंश की कन्या कहीं नहीं दीखती केवल वासवदत्ता नाम की एक प्रसिद्ध कन्या सुनी जाती है ॥६॥ 'वह कैसे मिले'—बस यही एक मात्र चिन्ता उसके मन में थी। उधर वासवदत्ता के पिता उज्जैन के राजा चण्डमहासेन को भी यह चिन्ता सता रही थी ॥७॥ कि मेरी अनुपम सुन्दरी और गुणवती कन्या के योग्य वर संसार में मिलेगा नहीं। केवल एक योग्य वर उदयन है किन्तु वह मेरा सदा का विरोधी है ॥८॥ उसके लिये एक उपाय हो कि जिससे वह मेरे वश में आ जाय और मेरा जामाता भी बन जाय। उदयन प्रायः अकेला ही जंगलों में वीणा बजाकर हाथियों को पकड़ता फिरता है ॥९॥ वह शिकार का व्यसनी है, अतः अवसर ढूँढ़कर किसी युक्ति से उसे जंगल से पकड़वाकर वश में किया जाय और यहाँ लाया जाय ॥१० ॥ वह संगीत-शास्त्र का विशेषज्ञ है। अतः अपनी कन्या वासवदत्ता को उसकी संगीत शिष्या बना दूँगा। इस प्रकार, वासवदत्ता को देखकर वह निस्सन्देह उसका अनुरागी बन जायगा। फलतः वह मेरा वशीभूत और जामाता बन जायगा ॥११ १२॥ २१
इति सञ्चिन्त्य तत्सिद्धयै स गत्वा चण्डिकागृहम्। चण्डीमभ्यर्च्य तुष्टाव चक्रेऽप्या उपयाचितम् ॥१३॥ एतत्समत्स्यते राजन्नचिराद् वाञ्छितं तव। इति शुश्राव सत्रासावशरीरां सरस्वतीम् ॥१४॥ ततस्तुष्टः समागत्य बुद्धवत्तेन मन्त्रिणा। सह चण्डमहासेनस्तमेवार्थमचिन्तयत् ॥१५॥ मानोद्धतो वीतलोभो रक्तभृत्यो महाबलः। असाध्योऽपि स सामाद्यैः साम्ना तावन्निरूप्यताम् ॥१६॥ इति सम्मन्त्र्य स नृपो दूतमेकं समादिशत्। गच्छ मद्द्वचनाद् ब्रूहि वत्सराजमिदं वचः ॥१७॥ मत्पुत्री तव गान्धर्वे शिष्या भवितुमिच्छति। स्नेहस्त्वस्मासु धत्तस्व तामिहैवैत्य शिक्षय ॥१८॥ इत्युक्त्वा प्रेषितस्तेन दूतो गत्वा न्यवेदयत्। कौशाम्ब्यां वत्सराजाय सन्देशं तं तथैव सः ॥१९॥ वत्सराजोऽपि तच्छ्रुत्वा दूतानूचित वचः। यौगन्धरायणस्यैवमेकान्ते मन्त्रिणोऽब्रवीत् ॥२०॥ किमतत्तेन सन्दिष्टं सदर्पं मम भूपुजा। एवं सन्दिष्टतस्तस्य कोऽभिप्रायो दुरात्मनः ॥२१॥ इत्युक्तो वत्सराजेन तदा यौगन्धरायणः। उवाचेनं महामन्त्री स स्वामीहितनिष्ठुरः १ ॥२२॥ भुवि व्यसनिताख्यातिः प्ररूढा त रुतेव या। इह तस्या महाराज! कषायकटुकं फलम् ॥२३॥ स हि त्वां रागिणं मत्वा कन्यारत्नेन लोभयन्। नीत्वा चण्डमहासेनो बद्ध्वा स्वीकर्तुमिच्छति ॥२४॥ तमुञ्छ व्यसनानि त्वं सूक्ष्नं हि परैर्नृपाः। सीदन्तस्तेषु गृह्यन्ते खातेष्विव वनद्विपाः ॥२५॥ इत्युक्तो मन्त्रिणा धीरः प्रतिदूतं व्यसर्जयेत्। स वत्सराजस्तं चण्डमहासननृपं प्रति ॥२६॥ सन्दिदेश च यद्यस्ति वाञ्छा मच्छिष्यतां प्रति। स्वत्पुत्र्यास्तदिहैवेषा भवता प्रेष्यतामिति ॥२७॥
१ स्वामिनः हिते कथ्याने निष्ठुरः कठिनः, सुदृढ इति भावः, यौगन्धरायणविशेष- णिदम्।