कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५)
महाकवि सोमदेव भट्ट द्वारा
स्रोत: कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1960 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंद्वितीय लम्बक १४९ वहाँ उतरने पर उसकी प्यारी मृगांकवती भय और थकावट के कारण प्यास से व्याकुल हो गई ॥१२८॥ धीरदत्त मृगांकवती को वहीं ठहराकर इधर-उधर पानी ढूंढने लगा। पानी ढूंढते-ढूंढ़ते सन्ध्या हो गई, सूर्य अस्त हो गया ॥१२९॥ जल मिल जाने पर भी राह भूल जाने के कारण धीरदत्त ने चकवे के समान बिलखते- बिलखते रात व्यतीत की ॥१३०॥ प्रातःकाल मरे हुए लीढ़ेवाले उस स्थान को तो उसने पाया किन्तु उस प्यारी राजकुमारी को कहीं न देखा ॥१३१॥ तब धीरदत्त व्याकुलता के कारण मृगांक खड्ग को वृक्ष की जड़ में रखकर उसे देखने के लिए पेड़ पर चढ़ गया ॥१३२॥ उसी समय उस मार्ग से कोई जंगली भिल्लराज उधर आ निकला। उसने आते ही पहले पेड़ की जड़ में रखी हुई तलवार उठा ली ॥१३३॥ उसे देखकर धीरदत्त पेड़ से नीचे उतरा और उसने उतरते ही भिल्लराज से दीनतापूर्वक राजपुत्री का समाचार पूछा ॥१३४॥ 'यहाँ से तुम मेरे गाँव पर जाओ सम्भवतः वह वहीं गई होगी मैं वहीं आ रहा हूँ और तुम्हारी तलवार भी साथ ला रहा हूँ' ॥१३५॥ ऐसा कहकर भिल्लराज द्वारा अपने गाँव को भेजा हुआ धीरदत्त उसके आदमियों के साथ उसके गाँव आ गया ॥१३६॥ वहाँ जाकर उसने आदमियों के 'थकावट मिटा लो'—कहने पर धीरदत्त वहाँ सो गया ॥१३७॥ जागने पर उसने अपने पैरों को बेड़ियों से बँधा पाया। मानों वे पैर मृगांकवती का पता न लगा सकने के कारण दण्डित किये गये हों ॥१३८॥ क्षण भर में सुख देनेवाली और क्षण भर में दारुण दुःख देनेवाली प्यारी मृगांकवती को दैवगति१ के समान सोचता हुआ धीरदत्त बँधे पैरों से पड़ा रहा ॥१३९॥ इस प्रकार सोच में पड़े हुए धीरदत्त के समीप आकर मोषणिका नामक एक दासी ने कहा—'हे महाभाग ! मृत्यु के लिए तुम यहाँ कहाँ आ गये हो ? ॥१४०॥ यह भिल्लराज अपनी किसी कार्य-सिद्धि के लिए कहीं गया है आकर चंडिका देवी के आगे तुम्हारा बलिदान करेगा ॥१४१॥ इसीलिए तुम्हें विन्ध्य के जंगल से युक्तिपूर्वक यहाँ भेजकर कैद कर दिया गया है ॥ १४२॥ १ दैवगति भी क्षण भर में दुःख और दूसरे ही क्षण सुख देती है। उसी प्रकार मृगांक- वती भी धीरदत्त को क्षण-क्षण में सुख और दुःख का अनुभव करा रही थी। —अनु