कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५)
महाकवि सोमदेव भट्ट द्वारा
स्रोत: कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1960 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंद्वितीय लम्बक १९७ घोरतम आघात से बेहोश और भागे हुए सैनिकोंवाले अकेले श्रीदत्त को हाथ-पाँव बाँध कर सारे दल के साथ अपने गाँव ले गये ॥१८४॥ उस गाँव में ले जाकर उसे चंडी के एक भीषण मन्दिर में पहुँचा दिया गया जहाँ घंटे अपने शब्दों से मानों उसकी मृत्यु का आह्वान कर रहे थे ॥१८९॥ वहाँ पर भिल्लराज की पुत्री सुन्दरी भी छोटे बच्चों को गोद में लेकर उस बलिदान का दृश्य देखने आई थी। जो पिता की मृत्यु के बाद वहाँ का शासन करती थी ॥१९०॥ मानन्द-भरी सुन्दरी ने उन डाकुओं को बलिदान करने से रोक दिया और श्रीदत्त भी आनन्दपूर्वक उस सुन्दरी के घर चला गया ॥१९१॥ वहाँ जाकर उसने उस भिल्लपल्ली का राज्य प्राप्त किया जिसे सुन्दरी के पिता ने अपनी मृत्यु के समय अन्य संतान न होने के कारण एकमात्र उत्तराधिकारिणी अपनी कन्या सुन्दरी को दिया था ॥१९२॥ चोरों से आक्रान्त चण्डाल और सेना-सामग्री सं युक्त सपत्नीक श्रीदत्त ने वहाँ पर अपने मृगांक नामक खड्ग को भी प्राप्त कर लिया ॥१९३॥ श्रीदत्त वहीं (भिल्लपल्ली में) शूरसेन की उस कन्या से विवाह करके उस नगर में महान् राजा बन गया ॥१९४॥ श्रीदत्त ने राजा बिम्बकि और राजा शूरसेन दोनों ने अपने श्वसुरों के पास दूत भेज दिये। फलतः अपनी-अपनी कन्याओं के स्नेह के कारण वे दोनों राजा अपनी-अपनी सेना-सामग्री के साथ विवाह-संबंध के लिए वहीं आये ॥१९५ १९६॥ उधर युद्ध के कारण बिछुड़े हुए बाहुशाली आदि उसके मित्र भी घावों के भर जाने पर स्वस्थ होकर उसके समीप आ गये थे ॥१९७॥ तदनन्तर श्वसुरों और उनकी सेनाओं के सहित श्रीदत्त ने अपने पिता के हत्यारे एवं विरोधी पाटलिपुत्र के राजा विक्रमशक्ति को अपनी कोपाग्नि की आहुति बना डाला। अर्थात् उसे मारकर अपना बदला चुका लिया ॥१९८॥ इसके पश्चात् मृगांकवती के साथ आसमुद्र पृथ्वी का राज्य प्राप्त कर श्रीदत्त सम्राट् बन गया और आनन्द-भोग करने लगा ॥१९९॥ राजा सहस्रानीक को कहानी सुनानेवाले संगठक ने इस कथा को सुनाकर कहा— 'राजन् ! धैर्यशाली व्यक्ति इस प्रकार वियोगजन्य कष्ट के समुद्र को पार करते हुए अभीष्ट को प्राप्त करते हैं ॥२० ॥ प्रिया-समागम के लिए उत्सुक राजा सहस्रानीक ने उस रात को अत्यन्त उत्सुकता के साथ बिताया ॥२०१॥ प्रातःकाल ही मनोरथ पर चढ़े हुए और मन को आगे से ही भेजे हुए राजा सहस्रानीक ने अपनी प्रिया के प्रति प्रस्थान किया ॥२०२॥