कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५)
महाकवि सोमदेव भट्ट द्वारा
स्रोत: कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1960 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंद्वितीय लम्बक १४५ श्रीदत्त ने जाकर राजकुमारी की अँगुली में अंगूठी पहना दी और मंत्र भी पढ़ा। इससे वह पुनर्जीवित हो उठी ॥९७॥ राजकुमारी के स्वस्थ होते ही वहाँ एकत्र सभी व्यक्ति श्रीदत्त की प्रशंसा करने लगे। यह समाचार सुनकर राजा बिम्बकि भी वहाँ आ पहुँचा ॥९८॥ राजा के आने पर श्रीदत्त अपनी अंगूठी बिना लिये ही अपने मित्र बाहुशाली के साथ उसके घर लौट आया ॥९९॥ राजा बिम्बकि ने प्रसन्न होकर श्रीदत्त के लिए जो सोना आदि उपहार के रूप में भेजे थे उन्हें श्रीदत्त ने बाहुशाली के पिता को दे दिया ॥१००॥ तदनन्तर श्रीदत्त उस राजकुमारी के विरह में इतना व्याकुल रहने लगा कि उसके मित्र भी घबराकर किंकर्तव्यविमूढ़-से हो गये ॥१०१॥ कुछ समय के पश्चात् राजकुमारी की प्रिय सहेली भावनिका अंगूठी लौटाने के बहाने श्रीदत्त के समीप आई ॥१०२॥ और बोली- हे सौभाग्यशालिन् ! मेरी सहेली को प्राणदान करनेवाले तुम उसके स्वामी बनो अन्यथा उसकी मृत्यु हो जायगी इसमें सन्देह नहीं ॥१०३॥ भावनिका के इस प्रकार कहने पर श्रीदत्त भावनिका बाहुशाली तथा अन्य मित्र मिलकर गुप्त मंत्रणा करने लगे ॥१०४॥ हम लोग किसी भी उपाय से राजकुमारी का हरण कर लें और रहने के लिए गुप्त रूप से यहाँ से मथुरा चलें ॥१०५॥ कार्य सिद्धि के लिए इन लोगों की सम्मति में परस्पर ऐसा निश्चय करके भावनिका अपने घर लौट गई ॥१०६॥ दूसरे दिन अपने तीन मित्रों के साथ बाहुशाली व्यापार के बहाने मथुरा चला गया ॥१०७॥ उसने मथुरा जाते हुए मार्ग में स्थान-स्थान पर सवारी का प्रबन्ध करके राजकुमारी के आने के लिए चारों ओर से गुप्त प्रबन्ध किया ॥१०८॥ श्रीदत्त ने भी कन्या के साथ किसी परदेशी स्त्री को सायंकाल राजकुमारी के निवास-स्थान में ठहरा दिया ॥१०९॥ उधर भावनिका ने दीपक जलाने के बहाने से उस घर में आग लगा दी और गुप्त रूप से राजकुमारी को लेकर बाहर आ गई ॥११०॥ बाहर प्रतीक्षा करते हुए श्रीदत्त ने उसी समय अपने दो मित्रों के साथ राजकुमारी को आगे गये हुए बाहुशाली के समीप भेज दिया ॥१११॥ और, उसके पीछे (या साथ) भावनिका भी गई। १९