कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५)
महाकवि सोमदेव भट्ट द्वारा
स्रोत: कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1960 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंद्वितीय लम्बक १५५
उस मुख्यमंत्री ने अपनी आज्ञा से वधिकों को रोककर और राजा को सूचित करके उस धीरदत्त को दंड से छुड़ाकर अपने घर बुला लिया॥१७३॥ ये मेरे चाचा विगतभय किसी समय घर से विदेश चले गये थे व ही आज दैवयोग से मथुरा-नरेश के मन्त्री हो गये हैं ऐसा समझकर और उनसे पूछकर धीरदत्त उनके चरणों पर गिर पड़ा॥१७४॥ वह मन्त्री भी अपने भतीजे को पहचानकर आश्चर्यचकित रह गया और उसे गले से लगा लिया। इसके पश्चात् उसने सारा समाचार पूछा॥१७५॥ चाचा के पूछने पर धीरदत्त ने पिता के वध से उस समय तक का सारा वृत्तान्त अपने चाचा को सुना दिया॥१७६॥ चाचा ने अपने भाई की मृत्यु के समाचार पर आंसू बहाकर एकान्त में धीरदत्त से कहा—'बेटा! अधीर न हो। मुझे धनदा यक्षिणी सिद्ध है। उसने मुझे पाँच सहस्र घोड़े और सात करोड़ सोने की मोहरें दी हैं। मैं पुत्रहीन हूँ अतः यह सब धन तुम्हारा ही है'॥१७७-१७९॥ ऐसा कहकर चाचा ने भतीज धीरदत्त को वह सारा धन दे दिया। धीरदत्त ने भी धन पाकर उसी मृगांकवती के साथ विवाह कर लिया॥१८०॥ धीरदत्त उस मृगाङ्कवती पत्नी के साथ वहीं ठहर गया और रात्रि में कुमुदाकर के समान आनन्दित तथा प्रफुल्लित होने लगा॥१८१॥ पूर्ण सम्पत्तिशाली धीरदत्त के हृदय को बाहुशाली आदि मित्रों की चिन्ता चन्द्रमा में कलङ्करोग के समान मलिन करती थी॥१८२॥ एक बार चाचा ने एकान्त में धीरदत्त से कहा—'बेटा! राजा शूरसेन की एक कन्या है। वह राजा की आज्ञा से मेरे द्वारा दान करने के लिए अवन्तिदेश (उज्जयिनी) में ले जायी जायगी। सो मैं उसी बहाने से उसका हरण करके तुझे दे दूँगा'॥१८३-१८४॥ ऐसा निश्चय करके चाचा विगतभय और भतीजे धीरदत्त ने सेना और दहेज का सामान साथ लेकर उज्जयिनी को प्रस्थान किया॥१८५॥ चाचा ने धीरदत्त से कहा—'इस प्रकार उस राजा की सेना और मेरी सेना के अन्त होने पर गुप्त राज्य को प्राप्त करोगे जैसा कि लक्ष्मी के स्वरूपने तिल आदेश दिया है'॥१८६॥ जब ये दोनों विन्ध्य पर्वत के प्रान्तों में पहुँचे तब वहाँ म्लेच्छों की एक बड़ी सेना ने डाकाजनी करके उन्हें मार्ग में ही रास्ता रोक लिया॥१८७॥