भारतकोश
कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५)

कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५)

महाकवि सोमदेव भट्ट द्वारा

स्रोत: कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1960 (उद्गम)

DevanagariHindipublished876 पृष्ठ

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द्वितीय लम्बक १६१ तदनन्तर कल्याणकारी एवं अनुरक्त प्रजावाले संसार के उदय के लिए उत्पन्न अपने पुत्र उदयन को राज्य पर बैठाकर राजा सहस्रानीक सचिवों और महारानी के साथ महाप्रस्थान के लिए हिमाचल की ओर चला गया ॥२१७॥ द्वितीय तरंग समाप्त तृतीय तरंग राजा उदयन की कथा सहस्रानीक के महाप्रस्थान के लिए हिमाचल की ओर चले जाने पर, राजा उदयन वत्स प्रदेश का शासन प्राप्त करके राजधानी कौशाम्बी में रहकर सुखपूर्वक प्रजा का शासन करने लगा ॥१॥ राजा उदयन यौगन्धरायण रुमण्वान् आदि मन्त्रियों पर शासन भार छोड़कर एकमात्र आनन्द लेने में तल्लीन हो गया ॥२॥ राजा के सुख-साधनों में वासुकि द्वारा बाल्यकाल में दी हुई घोषवती वीणा ही प्रमुख साधन के रूप में थी जिसे वह दिनरात बजाया करता था ॥३॥ राजा उदयन वीणा के तारों के मधुर स्वर-रूपी मोहन-मन्त्र से मदोन्मत्त जंगली हाथियों को वश में कर और बाँधकर ले आता था यही उसका एक विनोद था ॥४॥ वह वत्सराज उदयन वेश्याओं की मुखचन्द्र की प्रतिमाओं से सुशोभित मदिरा और मन्त्रियों की मुखकान्ति को साथ-साथ पान करता था ॥५॥ राजा उदयन को केवल एकमात्र यही चिन्ता थी कि मेरे वंश के अनुसार उच्च वंश की कन्या कहीं नहीं दीखती केवल वासवदत्ता नाम की एक प्रसिद्ध कन्या सुनी जाती है ॥६॥ 'वह कैसे मिले'—बस यही एक मात्र चिन्ता उसके मन में थी। उधर वासवदत्ता के पिता उज्जैन के राजा चण्डमहासेन को भी यह चिन्ता सता रही थी ॥७॥ कि मेरी अनुपम सुन्दरी और गुणवती कन्या के योग्य वर संसार में मिलेगा नहीं। केवल एक योग्य वर उदयन है किन्तु वह मेरा सदा का विरोधी है ॥८॥ उसके लिये एक उपाय हो कि जिससे वह मेरे वश में आ जाय और मेरा जामाता भी बन जाय। उदयन प्रायः अकेला ही जंगलों में वीणा बजाकर हाथियों को पकड़ता फिरता है ॥९॥ वह शिकार का व्यसनी है, अतः अवसर ढूँढ़कर किसी युक्ति से उसे जंगल से पकड़वाकर वश में किया जाय और यहाँ लाया जाय ॥१० ॥ वह संगीत-शास्त्र का विशेषज्ञ है। अतः अपनी कन्या वासवदत्ता को उसकी संगीत शिष्या बना दूँगा। इस प्रकार, वासवदत्ता को देखकर वह निस्सन्देह उसका अनुरागी बन जायगा। फलतः वह मेरा वशीभूत और जामाता बन जायगा ॥११ १२॥ २१