कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५)
महाकवि सोमदेव भट्ट द्वारा
स्रोत: कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1960 (उद्गम)
पंचम लम्बक ४८१
पंचम लम्बक ४८१ प्रणाम करके आतिथ्य सत्कार किये गये उस पुरुष को वत्सराज उदयन ने उत्सुकता से पूछा कि 'तुम कौन हो ? और 'तुम्हारा यहाँ क्या कार्य है। अर्थात् किसलिए आय हो' ॥११ ॥ उसने कहा मैं मनुष्य होकर भी शक्तिवेग नाम से विद्याधरों का राजा बन गया। अतः मेरे बहुत शत्रु हैं ॥१२॥ इसलिए हे राजन् ! मैं अपनी विद्या के प्रभाव से यह जानकर कि तुम्हारा पुत्र भविष्य में हम विद्याधरों का चक्रवर्ती होगा इसलिए उसे देखने के लिए आया हूँ ॥१२॥ ऐसा कहकर भावी विद्याधर चक्रवर्ती का दर्शन कर प्रसन्न शक्तिवेग ने राजा से आश्चर्य के साथ पूछा—॥१३॥ 'मित्र ! विद्याधरत्व कैसे प्राप्त होता है। वह कैसा होता है और तुमने विद्याधरत्व को कैसे प्राप्त किया'। यह सब मुझसे कहो ॥१४॥ राजा की बातें सुनकर विनय से नम्र शक्तिवेग नामक विद्याधर बोला ॥१५॥ 'राजन् ! इस जन्म में या अगले जन्म में शिवजी की आराधना करने पर धैर्यशाली व्यक्ति उनकी कृपा से विद्याधर-पद को प्राप्त होता है ॥१६॥ वह विद्याधर-पद, अनेक प्रकार का होता है जो विद्या खड्ग या माला आदि की सिद्धि द्वारा प्राप्त होता है। मैंने उसे जिस प्रकार पाया कहता हूँ सुनो ॥१७॥ ऐसा कहकर शक्तिवेग ने महारानी वासवदत्ता के समक्ष राजा से अपनी कथा कहनी प्रारम्भ की ॥१८॥ कनकपुरी और शक्तिवेग की कथा प्राचीन काल में वर्धमान¹ नाम का नगर था जो भूतल का भूषण था। उस नगर में परोपकारी नामक वीर राजा हुआ ॥१९॥ उस उन्नतिशील राजा की महारानी मेघ की रानी विद्युत् के समान 'कनकप्रभा' नाम की थी। वह चंचलता से रहित अर्थात् अति गंभीर थी ॥२० ॥ कुछ समय के पश्चात् उस राजा को रानी कनकप्रभा के गर्भ से एक कन्या उत्पन्न हुई, जो विधाता ने मानों लक्ष्मी के रूप का अभिमान नष्ट करने के लिए निर्मित की थी ॥२१॥ लोकों की आँखों के लिए चाँदनी के समान वह राजकुमारी धीरे-धीरे बढ़ने लगी। पिता ने माता के ही नाम पर उसका नाम कनकरेखा रख दिया ॥२२॥ कन्या के युवती होने पर एक बार राजा ने एकान्त में आई हुई महारानी कनकप्रभा से कहा—॥२३॥ १ बंगाल का प्रसिद्ध वर्द्धमान (वर्धमान) नगर।
४८४ कथासरित्सागर
४८४ कथासरित्सागर वर्धमाना सहैवैतत्समानोद्वाहचिन्तया। एषा कनकरेखा मे हृदयं देवि बाधते ॥२४॥ स्थानप्राप्तिविहीना हि गीतिवत् कुलकन्यका। उद्वेजिनी परस्यापि श्रूयमाणव कणयो ॥२५॥ विद्येव कन्यका मोहादपात्रे प्रतिपादिता। यशसे न न धर्माय जातानुशयाय तु ॥२६॥ सत्कस्मै दीयतां ह्येषा मया नृपतये सुता। कोऽस्याः समः स्यादिति मे चिन्ता देवि १ गरीयसी ॥२७॥ तच्छ्रुत्वा सा विहस्यैव बभाषे कनकप्रभा। स्वमेवमात्थ कन्या तु नेच्छत्युद्वाहमेव सा ॥२८॥ अद्यैव मर्मणा सा हि कृतकृत्रिमपुत्रका। वत्स कदा विवाहं ते द्रक्ष्यामीत्युदिता मया ॥२९॥ सा तच्छ्रुत्वैव साक्षेपमथ मां प्रत्यभाषत। मा मवमम्ब दातव्या नैव कस्मैचिदप्यहम् ॥३०॥ मद्वियोगो न भविता कन्यावास्मि सुशोभना। अन्यथा मां मृतां विद्धि किञ्चिदस्त्यत्र कारणम् ॥३१॥ एवं तयोक्ता त्वत्पार्श्वं राजन् विग्नाहमागता । तन्निषिद्धविवाहायाः का वरस्य विचारणा ॥३२॥ इति राज्ञीमुखाच्छ्रुत्वा समुद्विग्नोऽथ स नृपतिः। कन्याकान्तःपुरं गत्वा तामभाषीत्तदा सुताम् ॥३३॥ प्रार्थयन्तेऽपि तपसा यं सुरासुरकन्यकाः। प्रसूंस्तथा कथं वत्से स निषिद्धः किल त्वया ॥३४॥ एतत्पितुर्वचः श्रुत्वा भूतलन्यस्तलोचना। तदा कनकरेखा सा निजगाद नृपात्मजा ॥३५॥ तात नैवेप्सितस्तावद् विवाहो मम साम्प्रतम्। ततातस्यापि किं तन कार्यं यश्चात्र वो ग्रहः ॥३६॥ इत्युक्तः स तया राजा पृष्ट्वा धीमतां वरः। परोपकारी च पुनरेवमेतामभाषत ॥३७॥ १ व्याकुला।
पंचम लम्बक ४८९
पंचम लम्बक ४८९ 'यह कन्या कनकरेखा विवाह की चिन्ता के साथ समान रूप से बढ़ती हुई मेरे हृदय को व्यथित कर रही है॥२४॥ समुचित स्थान से भ्रष्ट गीति (गान) के समान कन्या पराये व्यक्ति के भी कानों में उद्वेग उत्पन्न करती है॥२५॥ अज्ञान से कुपात्र में दी हुई विद्या के समान कुपात्र को दी हुई कन्या न यश के लिए होती है, न धर्म के लिए ही प्रत्युत पश्चात्ताप के लिए होती है॥२६॥ अतः मैं इस कन्या को किस राजा के लिए दूँ। इसके योग्य वर कौन होगा यह मेरे हृदय में भारी चिन्ता हो रही है' ॥२७॥ यह सुनकर महारानी कनकप्रभा हँसकर राजा से बोली कि 'आप तो इस प्रकार चिन्तित हैं किन्तु वह कनकरेखा तो विवाह ही नहीं करना चाहती' ॥२८॥ 'आज ही खेल में गुड़िया बनाती हुई उससे मैंने कहा कि 'मैं तुम्हारा विवाह कब देखूँगी' ॥२९॥ मेरे ऐसा प्रश्न करते ही उसने रोष के साथ मुझसे कहा 'माँ ऐसा मत कहो ऐसा मत कहो मुझे किसी के लिए भी न दो॥३०॥ तुम्हारे साथ मेरा वियोग न होगा। मैं अविवाहित ही ठीक हूँ। यदि तुमने मेरा विवाह किया तो मुझे मरी ही समझो। इसमें कुछ कारण है'॥३१॥ यह सुनकर व्याकुल मैं तुम्हारे पास आई हूँ। विवाह न करनेवाली कन्या के लिए वर का शोधना ही व्यर्थ है॥३२॥ रानी के मुख से ऐसा सुनकर घबराया हुआ राजा कन्या के भवन में जाकर उससे बोला—'बेटी जिस पति की प्राप्ति के लिए देवताओं और दैत्यों की कन्याएँ तपस्या करके भगवान् से प्रार्थना करती हैं उसे तू ने मना कर दिया ॥३३ ३४॥ पिता की बातें सुनकर भूमि पर दृष्टि गड़ाए हुई राजकुमारी कनकरेखा बोली—॥३५॥ 'पिताजी मुझे विवाह की चाह नहीं है तो इसमें आपको इतना आग्रह क्यों है ? ॥३६॥ पुत्री के इस प्रकार कहने पर बुद्धिमान् और परोपकारी राजा इस तरह कहने लगा—बेटी कन्यादान के बिना गृहस्थ की फलप्राप्ति के लिए दूसरा कौनसा उपाय है ? ॥३७॥
४८४ कथासरित्सागर
४८४ कथासरित्सागर वर्धमाना सहैवैतत् समानोद्वाहचिन्तया। एषा कनकरेखा मे हृदयं देवि बाधते ॥२४॥ स्थानप्राप्तिविहीना हि गीतिवत् कुलकन्यका। उद्वेगिनी परस्यापि श्रूयमाणैव कर्णयोः ॥२५॥ विद्येव कन्यका मोहादपात्रे प्रतिपादिता। यशसे न न धर्माय जातानुशयाय तु ॥२६॥ तत्कस्मै दीयते ह्येषा मया नृपतम सुता। योऽस्याः सम स्यादिति मे चिन्ता देवि ! गरीयसी ॥२७॥ तच्छ्रुत्वा सा विहस्यैव बभाषे कनकप्रभा। त्वमेवमात्थ कन्या तु नेच्छत्युद्वाहमेव सा ॥२८॥ अद्यैव नर्मणा सा हि कृतकृत्रिमपुत्रका। वत्से कदा विवाहं ते द्रक्ष्यामीत्युदिता मया ॥२९॥ सा तच्छ्रुत्वैव साक्षेपमेव मां प्रत्यबोधत। मा मैवमम्ब दातव्या नैव कस्मैचिदप्यहम् ॥३०॥ मद्वियोगो न चादिष्टः कस्यचास्मि सुशोभना। अन्यथा मां मृतां विद्धि किञ्चिदस्त्यत्र कारणम् ॥३१॥ एव तयोक्ता त्वत्पार्श्वं राजन् विग्नाहमागता । सन्निषिद्धविवाहायाः का वरस्य विचारणा ॥३२॥ इति राज्ञीमुखाच्छ्रुत्वा समुद्भ्रान्तः स नृपतिः। कन्यकान्तः पुरं गत्वा तामवादीत्तदा सुताम् ॥३३॥ प्रार्थ्यन्तेऽपि तपसा यं सुरासुरकन्यकाः। भर्तृकामः कथं वत्से स निषिद्धः किल त्वया ॥३४॥ एतत्पितुर्वचः श्रुत्वा भूतलन्यस्तलोचना। तदा कनकरेखा सा निजगाद नृपात्मजा ॥३५॥ तात नैवेप्सितस्तावद् विवाहो मम साम्प्रतम्। तत्तादृश्यापि किं तेन कार्यं कश्चात्र वो ग्रहः ॥३६॥ इत्युक्तः स तया राजा दुहित्रा धीमतां वरः। परोपकारी स पुनरेवमेतामभाषत ॥३७॥
१ प्याश्रुत्वा।
पंचम लम्बक ४८९
पंचम लम्बक ४८९ "यह कन्या कनकरेखा विवाह की चिन्ता के साथ समान रूप से बढ़ती हुई मेरे हृदय को व्यथित कर रही है॥२४॥ समुचित स्थान से भ्रष्ट मोति(मान) के समान कन्या पराये व्यक्ति के भी कानों में उद्वेग उत्पन्न करती है॥२५॥ अज्ञान से कुपात्र में दी हुई विद्या के समान कुपात्र को दी हुई कन्या न यश के लिए होती है, न धर्म के लिए ही, प्रत्युत पश्चात्ताप के लिए होती है॥२६॥ अतः मैं इस कन्या को किस राजा के लिए दूँ। इसके योग्य वर कौन होगा यह मेरे हृदय में भारी चिन्ता हो रही है" ॥२७॥ यह सुनकर महारानी कनकप्रभा हँसकर राजा से बोली कि 'आप तो इस प्रकार चिन्तित हैं किन्तु वह कनकरेखा तो विवाह ही नहीं करना चाहती' ॥२८॥ आज ही खेल में गुड़िया बनाती हुई उससे मैंने कहा कि 'मैं तुम्हारा विवाह कर दूँगी' ॥२९॥ मेरे ऐसा प्रश्न करते ही उसने भय के साथ मुझसे कहा 'माँ ऐसा मत कहो ऐसा मत कहो, मुझे किसी के लिए भी न दो॥३०॥ तुम्हारे साथ मेरा वियोग न होगा। मैं अविवाहित ही ठीक हूँ। यदि तुमने मेरा विवाह किया तो मुझे मरी ही समझो। इसमें कुछ कारण है' ॥३१॥ यह सुनकर व्याकुल मैं तुम्हारे पास आई हूँ। विवाह न करनेवाली कन्या के लिए वर का सोचना ही व्यर्थ है॥३२॥ रानी के मुख से ऐसा सुनकर घबराया हुआ राजा कन्या के भवन में जाकर उससे बोला—'बेटी जिस पति की प्राप्ति के लिए देवमाता और दैत्यों की कन्याएँ तपस्या करके भगवान् से प्रार्थना करती हैं, उसे तू ने मना कर दिया' ॥३३-३४॥ पिता की बातें सुनकर भूमि पर दृष्टि गड़ाए हुई राजकुमारी कनकरेखा बोली—॥३५॥ 'पिताजी जब विवाह की चाह नहीं है तो इसके कारण इतना आग्रह क्यों है? ॥३६॥ पुत्री के इस प्रकार कहने पर बुद्धिमान् और परोपकारी राजा इस तरह कहने लगा—'बेटी कन्यादान के बिना पुरुष की पारशान्ति के लिए दूसरा कौनसा उपाय है?' ॥३७॥
४८६ कथासरित्सागर
४८६ कथासरित्सागर
० यादानादृते पुत्रि ! किं स्यात् किल्बषशान्तये । न च बन्धुपराधीना कन्या स्वातन्त्र्यमर्हति ॥३८॥ जातैव हि परस्यार्थे कन्यका नाम रक्ष्यते । बाल्यावृते विना भर्त्तृ कीदृक्तम्या पितुर्गृहम् ॥३९॥ ऋतुमत्य हि कन्यायां बान्धवा मान्त्यधोगतिम् । वृषली' सा वरश्यास्या वृषलीपति रुच्यते ॥४०॥ इति तेनोदिता पित्रा राजपुत्री मनोगताम् । वाचं कनकरेखा सा तत्क्षण ममुवरयत् ॥४१॥ यद्येव तात तद्येन विप्रेण क्षत्रियेण वा । दृष्टा कनकपुर्याख्या नगरी कृतिना किर ॥४२॥ तस्म त्वयाहं दातव्या स मे भर्त्ता भविष्यति । नान्यथा तात मिथ्यैव कर्त्तव्या मे कवर्षना ॥४३॥ एव तयोक्ते सुतया स राजा समचिन्तयत् । विष्टमोद्वाहस्य तसावत् प्रसङ्गोऽङ्गीकृतोऽनया ॥४४॥ नूनं च कारणोत्पन्ना देवीय कापि मवगृहे । इतरकथं विजानाति बाला भूत्वान्यथा दृसौ ॥४५॥ इति सञ्चिन्त्य तत्कालं तमत्युक्त्वा च तां सुताम् । उत्थाय विनवस्तंभ्य स चकार महीपति ॥४६॥ अन्यद्युरास्थानगतो जगाद स च पार्श्वगान् । दृष्टा कनकपुर्याख्या पुरी युष्मासु केनचित् ॥४७॥ येन दृष्टा च सा तस्मै विप्राय क्षत्रियाय वा । मया कनकरेखा च यौवराज्यं च दीयते ॥४८॥ श्रुतापि नैव सास्माभिर्दर्शने वेव का कथा । इति ते चावदन् सर्वे अन्योन्याननदर्शिन ॥४९॥ ततो राजा प्रतीहारमानीयाविशति स्म सः । गच्छ भ्रमय कुरम्मेऽथ पुरं पटहघोपणाम् ॥५०॥ जानीहि यदि केनापि दृष्टा सा नगरी न वा । इत्यादिष्ट प्रतीहार स तद्यति विनिर्ययौ ॥५१॥
१ शूद्री।
पंचम लम्बक ४८७
पंचम लम्बक ४८७ माता पिता और बन्धु (भाई) से पराधीन कन्या स्वतन्त्र नहीं रह सकती ॥४१॥ कन्या उत्पन्न होते ही दूसरे के लिए पालित पोषित और रक्षित की जाती है। बाल्या- वस्था के अनन्तर पति के बिना पिता के घर पर कन्या का जीवन क्या है? अर्थात् कुछ नहीं ॥४२॥ पितृगृह में कन्या के ऋतुमती होने पर उसके बन्धु-बान्धव अधोगति को प्राप्त होते हैं। वह कन्या वृषली' हो जाती है और उसके पति को वृषलीपति कहा जाता है ॥४३॥ राजा के इस प्रकार कहने पर वह कनकरेखा अपने मन की बात राजा से कही—॥४३॥ 'पिता यदि ऐसी बात है तो जिस वीर ब्राह्मण या क्षत्रिय ने कनकपुरी नाम की नगरी देखी हो, उसे आप मुझे दे दीजिए और वही मेरा पति होगा। अन्यथा व्यर्थ में आप मेरी दुश्चिन्ता न करें' ॥४३४॥ कन्या के ऐसा कहने पर राजा ने सोचा भला भाग्य से इस कन्या ने विवाह करना तो स्वीकार किया ॥४४॥ अवश्य ही किसी कारण से मेरे घर में यह कोई देवी उत्पन्न हुई है। अन्यथा यह छोटी कन्या होकर भी यह सब कैसे जानती है ॥४५॥ उस समय ऐसा सोचकर और उसकी बात स्वीकार करके राजा उठकर चला गया और अपने दैनिक कार्य में व्यस्त हो गया ॥४६॥ दूसरे ही दिन दरबार में बैठकर राजा ने दरबारियों से कहा—'क्या आप लोगों में से किसी ने कनकपुरी नाम की नगरी देखी है ? ॥४७॥ जिसने देखी हो वह ब्राह्मण हो या क्षत्रिय उसे अपनी कन्या कनकरेखा और उसके साथ युवराज-पद प्रदान करूँगा ॥४८॥ परस्पर एक दूसरे का मुख देखते हुए सभासदों ने कहा— महाराज उसे देखने की बात कौन कहे, हमलोगों ने यह नाम तक सुना नहीं ॥४९॥ तब राजा ने प्रतिहार को यह आज्ञा दी कि— जाओ इस नगर में ढिंढोरा पीटकर घोषणा कर दो कि किसी ने कनकपुरी देखी है या नहीं? और तुम इस बात का पता लगाओ ॥५०॥ राजा से आज्ञा पाकर प्रतिहार 'जो आज्ञा' कहकर चला गया ॥५१॥ १ वृषली—शूद्र जाति की स्त्री—शङ्ख।
प्रस्तुत चित्र पूर्णतः रिक्त (खाली/श्वेत) है, इसमें कोई पाठ (टेक्स्ट) या श्लोक उपलब्ध नहीं है। कृपया सही पृष्ठ या चित्र पुनः साझा करें।
पंचम लम्बकः ४८९
पंचम लम्बकः ४८९ और लौटकर उसने राजकर्मचारियों को आदेश दिया कि वे नगर में सुनाने के लिए आश्चर्यजनक इस घोषणा का डिंडिम-घोष के साथ कर दें ॥५२॥ 'कोई भी ब्राह्मण या क्षत्रिययुवक जिसने कनकपुरी नाम की नगरी देखी हो, वह राज- दरबार में उपस्थित हो जाय राजा उसे अपनी कन्या और युवराज-पद देना ही देंगे' ॥५३॥ सारे नगर में व्यापक रूप से आश्चर्यजनक यह घोषणा होने लगी ॥५४॥ आज कनकपुरी की यह क्या घोषणा की जा रही है, जो हम वृद्धों ने भी कभी न देखी और सुनी ॥५५॥ नगर-निवासी वृद्धजन इस घोषणा को सुनकर परस्पर इस प्रकार वार्तालाप करने लगे। नगर में एक भी व्यक्ति यह नहीं कह सका कि मैंने वह कनकपुरी देखी है ॥५६॥ इतने में ही उस नगर-निवासी बलदेव के पुत्र शक्तिदेव ने भी यह घोषणा सुनी ॥५७॥ वह व्यसनी युवक उस समय जूए में दरिद्र हो चुका था। वह राजकुमारी की प्राप्ति के समाचार से उत्साहित होकर सोचने लगा ॥५८॥ मैं जूए में सब कुछ हार चुका हूँ अतः अब मैं पिता के घर में प्रवेश नहीं पा सकता और न वेश्या के घर में ही जाकर रह सकता हूँ ॥५९॥ इसलिए अब मैं कहीं का भी न रहा अतः अब अवसर है कि मैं झूठ बोलूँ कि मैंने वह नगरी देखी है ॥६०॥ मुझे झूठा कौन समझेगा। वह नगरी किसने देखी है। अतः सम्भव है, राजकुमारी से मेरा समागम होजाय ॥६१॥ ऐसा सोचकर उसने राजपुरुषों के समीप जाकर झूठ कह दिया कि मैंने कनकपुरी नगरी देखी है ॥६२॥ तब उन्होंने कहा—आओ द्वारपाल उसके पास चलें। उनके ऐसा कहने पर उनके साथ वह द्वारपाल के पास गया ॥६३॥ घोषणा करनेवालों ने कहा कि 'इसने कनकपुरी देखी है'। यह सुनकर द्वारपाल उस स्वागत-सत्कार के साथ राजा के पास ले गया ॥६४॥ राजा के सम्मुख उपस्थित होकर भी उस धूर्त जुआरी ने ऐसे ही मिथ्या भाषण किया। सच है, द्यूत में हारे हुए धूर्त जुआरी के लिए कौनसा कार्य दुष्कर है ॥६५॥ १२
४८८ कथासरित्सागर
४८८ कथासरित्सागर
निर्गत्य च समादिश्य तत्क्षणं राजपूरुषान् । भ्रामयामास पटहं कृतश्रवणकौतुकम् ॥५२॥ विप्रः क्षत्रयुवा वा कनकपुरी योऽत्र दृष्टवाश्नगरीम् । वदतु स तस्मै राजा ददाति तनयां च यौवराज्यं च ॥५३॥ इति श्रुतस्ततस्तन्नगरं दत्तविस्मयम् । उदघोष्यत सर्वत्र पटहानन्तरं बुधैः ॥५४॥ केयं पुरेऽस्मिन्कनकपुरीनामाद्य घोष्यत । या वृद्धैरपि नास्माभिदृष्टा जातु न च श्रुता ॥५५॥ इत्येव धावन्पौराः श्रुत्वा सो तंन घोषणाम् । न पुन कश्चिदेकोऽपि मया दृष्टेत्यभाषत ॥५६॥ तावच्च तन्निवास्त्येकः शक्तिदेव इति द्विजः। बसुदेवतनुजस्तामश्रृणोत्तत्र घोषणाम् ॥५७॥ स युवा व्यसनी सद्यो द्यूतेन विवनीकृतः । अचिन्तयद्राजसुताप्राथनाकर्णनोन्मनाः ॥५८॥ द्यूतहारितनिश्शेषवित्तस्य मम नाधुना । प्रवेशोऽस्ति पितुर्गेहे नापि पण्याङ्गनागृहे ॥५९॥ तस्मादगतिकस्तावद् वरं मिथ्या ब्रवीम्यहम् । मया सा नगरी दृष्टेत्येव पटहघोषकान् ॥६०॥ को मां प्रत्येष्यभिज्ञानं केन दृष्टा कदा हि सा । स्यादेव च कदाचिन्मे राजपुत्र्या समागमः ॥ ६१॥ इति सञ्चिन्त्य गत्वा तान् स राजपुरुषांस्तदा । शक्तिदेवो मया दृष्टा सा पुरीत्यबवन्मृषा ॥६२॥ विष्टया तर्हि प्रतीहारपार्श्वमेहीहि सत्वरम् । उक्तस्तद्भूभिश्च तैः साकं स प्रतीहारमभ्यगात् ॥६३॥ तस्मै तथैव प्राशंसत्त्तुरीदर्शनं मृषा । तेनापि सस्कृत्य ततो राजात्तिकमनीयत ॥६४॥ राजाग्रेऽप्यविकत्थ्य सन्तथैव च तदब्रवीत् । द्यूतदान्तस्य किं नाम कितबस्य हि दुष्करम् ॥६५॥
पञ्चम लम्बक ४८९
पञ्चम लम्बक ४८९ और लौटकर उसने राजकर्मचारियों को आदेश दिया कि वे नगर में सुनने के लिए आश्चर्यजनक इस घोषणा को डिंडिम-घोष के साथ कर दें ॥५२॥ 'कोई भी ब्राह्मण या क्षत्रिययुवक जिसने कनकपुरी नाम की नगरी देखी हो, वह राज- दरबार में उपस्थित हो जाय, राजा उसे अपनी कन्या और युवराज-पद दोनों ही देंगे' ॥५३॥ सारे नगर में व्यापक रूप से आश्चर्यजनक यह घोषणा होने लगी ॥५४॥ 'आज कनकपुरी की यह क्या घोषणा की जा रही है, जो हम बूढ़ों ने भी कभी न देखी और सुनी' ॥५५॥ नगर-निवासी वृद्धजन इस घोषणा को सुनकर परस्पर इस प्रकार वार्तालाप करने लगे। नगर में एक भी व्यक्ति यह नहीं कह सका कि मैंने वह कनकपुरी देखी है ॥५६॥ इतने में ही उस नगर-निवासी वसुदेव के पुत्र शक्तिदेव ने भी यह घोषणा सुनी ॥५७॥ वह व्यसनी युवक उस समय जुए म दरिद्र हो चुका था। वह राजकुमारी की प्राप्ति के समाचार से उत्साहित होकर सोचने लगा ॥५८॥ 'मैं जुए में सब कुछ हार चुका हूँ, अतः अब मैं पिता के घर में प्रवेश नहीं पा सकता और न वेश्या के घर में ही जाकर रह सकता हूँ ॥५९॥ इसलिए जब मैं कहीं का भी न रहा, अतः अब अवसर है कि मैं झूठ बोलूँ कि मैंने यह नगरी देखी है ॥६०॥ मुझे झूठा कौन समझेगा। वह नगरी किसने देखी है। अतः सम्भव है राजकुमारी से मेरा समागम हो जाय ॥६१॥ ऐसा सोचकर उसने राजपुरुषों के समीप जाकर झूठ कह दिया कि मैंने कनकपुरी नगरी देखी है ॥६२॥ तब उन्होंने कहा—'आओ द्वारपाल उसके पास चलें'। उनके ऐसा कहने पर उनके साथ वह द्वारपाल के पास गया ॥६३॥ घोषणा करनेवालों ने कहा कि 'इसने कनकपुरी देखी है'। यह सुनकर द्वारपाल उसे स्वागत-सत्कार के साथ राजा के पास ले गया ॥६४॥ राजा के सम्मुख उपस्थित होकर भी उस धूर्त जुआरी ने ऐसे ही मिथ्या भाषण किया। सच है, जुए में हारे हुए धूर्त जुआरी के लिए कौन-सा कार्य दुष्कर है ॥६५॥ १२
४९ कथासरित्सागर
४९ कथासरित्सागर
राजापि निश्चय ज्ञात्वा ब्राह्मणं स विसृष्टवान्। तस्याः कनकरेखाया दुहितुर्निकटं तदा॥६६॥ तया च स प्रतीहारमुखाज्ज्ञात्वाऽन्तिकागतः। कञ्चित्त्वया सा कनकपुरी दृष्टेत्यपृच्छ्यत॥६७॥ बाढं मया सा नगरी दृष्टा विद्याथिना सता। भ्रमता भुवमित्येवं सोऽपि तां प्रत्यभाषत॥६८॥ केन मार्गेण तत्र त्वं गतवान् कीदृशी च सा। इति भूयस्तया पृष्टः स विप्रोऽप्येवमब्रवीत्॥६९॥ इतो हस्तिपुरं नाम नगरं गतवानहम्। ततोऽपि प्राप्तवानस्मि पुरीं वाराणसीं क्रमात्॥७०॥ वाराणस्याश्च विवर्द्धनगरं पौण्ड्रवर्धनम्। तस्मात् कनकपुर्याख्यां नगरीं तां गतोऽभवम्॥७१॥ दृष्टा मया च साभोगभूमिः सुकृतकर्मणाम्। अनिमेषैक्षणस्वाद्यशोभा शक्रपुरी यथा॥७२॥ तत्राधिगतविद्यश्च कालनाहमिहागमम्। इति तनास्मि गतवान् यथा सापि पुरीदृशी॥७३॥ एवं विरचितोक्तौ च धूर्ते तस्मिन्द्द्विजन्मनि। शक्तिदेवे महासं सा व्याजहार नृपात्मजा॥७४॥ अहो सत्यं महाब्राह्मण् दृष्टा सा नगरी त्वया। ब्रूहि ब्रूहि पुनस्तावत्केनासि गतवान् पथा॥७५॥ तच्छ्रुत्वा स यथा चाद्यं शक्तिदेवोऽकरोत् पुनः। तदा तं राजपुत्री सा चटीभिर्निरवासयत्॥७६॥ निर्वासिते ययौ चास्मिन्पितुः पार्श्वं तदब सा। किं सत्यमाह विप्रोऽसाविति पित्राप्यपृच्छ्यत॥७७॥ ततश्च सा राजसुता जगाद निजगाद तम्। तात राजापि भूत्वा त्वमविचार्येव चेष्टसे॥७८॥ किं न जानासि धूर्ता यद् वञ्चयन्त जनान्बहून्। स हि मिथ्यैव विप्रो मां प्रतारयितुमीहते॥७९॥ न पुनर्नगरी तेन दृष्टा सालोकवादिना। धूर्तेरनाकाशादद्य म्रियन्ते भुवि वञ्चनाः॥८०॥
पंचम लम्बक ४९१
पंचम लम्बक ४९१ राजा ने भी उसकी सत्यता जाँचने के लिए उसे राजकुमारी के पास भेज दिया ॥६६॥ राजकन्या ने द्वारपाल से समाचार सुनकर पास आये हुए उस ब्राह्मण से पूछा 'क्या तुमने कनकपुरी देखी है ? ॥६७॥ उसने स्वीकार करते हुए कहा कि विद्यार्थी-अवस्था में घूमते हुए उस नगरी को मैंने देखा था॥६८॥ 'किस प्रकार तुम वहाँ गये थे और वह कैसी नगरी है? राजकुमारी के पुनः इस प्रकार पूछने पर उस ब्राह्मण ने इस प्रकार कहा॥६९॥ यहाँ से मैं हरपुर नामक नगर में गया और वहाँ से चलकर क्रमशः वाराणसी पहुँचा ॥७०॥ वाराणसी से चलकर मैं पौण्ड्रवर्धन नामक नगर में पहुँचा और उसके पश्चात् मैं उस कनकपुरी नगरी में पहुँचा ॥७१॥ पुण्यात्माओं के लिए इन्द्रपुरी के समान वह भोगभूमि है। उसकी शोभा अपलक नेत्रों से देखने योग्य है॥७२॥ वहाँ विद्या प्राप्त कर कुछ समय पश्चात् मैं यहाँ आ गया ! इस प्रकार इस मार्ग से मैं गया और वह ऐसी नगरी है' ॥७३॥ उस धूर्त ब्राह्मण शक्तिदेव की इस प्रकार की बनावटी बातों को सुनकर राजकन्या मुस्कराती हुई बोली—'हे ब्राह्मण ! यह सत्य है कि तुमने वह नगरी देखी। किन्तु यह तो बताओ कि तुम उस नगरी में किस मार्ग से गये थे फिर से एक बार बताओ' ॥७४-७५॥ राजकुमारी के इस प्रकार पूछने पर जब शक्तिदेव पुनः धृष्टता करने पर उतारू हुआ तब राजकुमारी ने दासियों से कहकर उसे बाहर निकलवा दिया ॥७६॥ उसके निकल जाने पर राजपुत्री पिता के पास गई। पिता ने उससे पूछा कि 'वह ब्राह्मण सत्य कहता था अथवा नहीं ॥७७॥ तब वह राजपुत्री कहने लगी—'पिताजी आप राजा होकर भी ऐसी अविवेकपूर्ण बातें क्यों करते हैं? क्या आप नहीं जानते कि धूर्त जन सरल व्यक्तियों को ठग लेते हैं। यह ब्राह्मण झूठ बोलकर मुझे ठग लिया चाहता था। इस धूर्त ने कनकपुरी नहीं देखी है। धूर्त लोग अनेक प्रकार की ठगियाँ किया करते हैं॥७८-८०॥
४९२ कथासरित्सागर
४९२ कथासरित्सागर शिवमाधवधूर्तयो कथा शिवमाधववृत्तान्तं तथापि शृणु वच्मि ते। इत्युक्त्वा राजकन्या सा व्याजहार कथामिमाम् ॥८१॥ अस्ति रत्नपुरं नाम यथार्थं नगरोत्तमम्। शिवमाधवसंज्ञौ च धूर्तौ तत्र बभूवतुः ॥८२॥ परिवारीकृतानेकधूर्तौ तौ चक्रतुश्चिरम्। माया'प्रयोगनिःशेषमुषिताढ्यजनं पुरम् ॥८३॥ एकदा द्वौ च तावेव मन्त्रं विवक्षतुर्मिथः। इह नगरमावाभ्यां कृत्स्नं तावद् विलुञ्चितम् ॥८४॥ अत सम्प्रति गच्छावो वस्तुमुज्जयिनीं पुरीम्। तत्र सु श्रूयते राज्ञः पुरोधाः सुमहाधनः ॥८५॥ शङ्कुरस्वामिनामा च तस्माद्युक्त्या हृतैर्धनैः। मालवस्त्रीविलासानां यास्यामोऽत्र रसज्ञताम् ॥८६॥ आस्कन्दी दक्षिणार्थस्य स राज्ञः भृकुटीमुखः। सप्तकुम्भीनिधानो हि कीदृशो गीयते द्विजैः ॥८७॥ कन्यारत्नं च तस्यास्ति विप्रस्यैकमिति श्रुतम्। तदप्यतत्नसङ्गेन ध्रुवं तस्मादवाप्स्यते ॥८८॥ इति निश्चित्य कृत्वा च मिथः कर्तव्यसंविदम्। शिवमाधवधूर्तौ तु पुरात् प्रथमतुस्ततः ॥८९॥ शनद्दबोज्जयिनीं प्राप्य माधवः सपरिच्छदः। राजपुत्रस्य वषेण तस्थौ ग्रामे क्वचिद् बहिः ॥९०॥ शिवस्त्वनिकलं कृत्वा वणिक्वेषां विवेश ताम्। नगरीमेक एवाद्य बहुमायाविचक्षणः ॥९१॥ तत्राध्युवास क्षिप्राया मटिकां तीरसीमनि। दृश्यस्थापितमृद्गम्भिदाभाण्डमृगाजिनाम् ॥९२॥ १ मायाप्रयोगेण पूर्णतया, निःशेषं सम्पूर्णतया मुषितः बञ्चितः, आडूव्यः धनिजनः यस्य पुरस्य ईदृशं पुरमशेषयेत्यर्थः। २ बहुव्यचारिवस्त्रम्
पंचम लम्बक ४१६
पंचम लम्बक ४१६ 'सुनो मैं इस प्रसंग में तुम्हें शिव और माधव दो धूर्तों की कथा सुनाती हूँ। ऐसा कहकर उसने यह कथा सुनानी प्रारम्भ की ॥८१॥ शिव और माधव नामक धूर्तों की कथा सब नगरों में श्रेष्ठ रत्नपुर नाम का यथार्थ नामवाला एक नगर है। उसमें शिव और माधव नाम के दो धूर्त रहते थे ॥८२॥ उन्होंने अनेक ठगों का एक दल बनाकर अपनी ठगी के हथकंडों से नगर के सभी धनी व्यक्तियों को ठग लिया था ॥८३॥ एक बार उन दोनों ने आपस में यह विचार किया कि 'हमलोगों द्वारा यह सारा नगर ठग लिया गया है। अब इसे छोड़ कर चलें और उज्जैन में डेरा डालें। सुनते हैं कि वहाँ के राजा का पुरोहित बहुत बड़ा धनी है। उसका नाम शंकरस्वामी है। उससे धन लेकर मालवा देश की रमणियों के विलास का आनन्द लेंगे। वह आधी दक्षिणा का हिस्सेदार अर्थात् आधी फूस पर काम करनेवाला बढ़ी हुई भौंहोंवाला है। उसके पास सात घड़े स्वर्ण का खजाना है। किन्तु वह स्वयं बड़ा ही कृपण या अर्थपिशाच है—ऐसा ब्राह्मण लोग कहा करते हैं। उस ब्राह्मण की एक रूपलावण्या कन्या भी है। इसी प्रसंग में हमलोग उसे भी अवश्य प्राप्त कर सकेंगे' ॥८४-८८॥ ऐसा सोचकर और उसे ठगने की योजना बनाकर शिव और माधव दोनों धूर्त उस रत्नपुर नगर से उज्जैन को चले ॥८९॥ धीरे-धीरे उज्जैन पहुँचकर माधव तो नगर के बाहर किसी ग्राम में अपने को राजकुमार घोषित कर अपने साथियों के साथ ठहर गया ॥९० ॥ और अत्यन्त मायावी शिव भली-भाँति ब्रह्मचारी का वेष बनाकर उस उज्जयिनी नगरी में जा पहुँचा ॥ ९१॥ वह वहाँ जाकर क्षिप्रा नदी के तट के समीप किसी मठ में ठहर गया और अपने आसपास पूर्ण आडम्बर के लिए मिट्टी कुश भिक्षापात्र मृगचर्म आदि रख लिये ॥९२॥
४२४ कथासरित्सागर
४२४ कथासरित्सागर सा च प्रभातकार्याद्युनयन् मुखालिपत्। अवीचि¹कर्ममालपसूत्रपातमिवाचरन् ॥९३॥ सरित्तोये च स चिरं निमज्ज्यासीदवाङ्मुखः। कुकर्मजामिवाभ्यस्यन् भविष्यन्तीमधोगतिम् ॥९४॥ स्नानोत्थितोऽर्काभिमुखस्तस्थावूर्ध्वं चिरं च सः। शूलाधिरोपणौचित्यमात्मनो दर्शयन्निव ॥९५॥ ततो देवाग्रतो गत्वा बद्धकूर्चकरो जपन्। आस्त पद्मासनासीनः सदम्भश्चतुराननः² ॥९६॥ अन्तरा हृदयानीव साधूनां कतवेन सः। स्वच्छान्याहृत्य पुष्पाणि पुरारिं पर्यपूजयत् ॥९७॥ कृतपूजश्च भूयोऽपि मिथ्याजपपरोऽभवत्। दत्तावधानः कुसृतिष्विव³ ध्यानं सतान सः ॥९८॥ अपराह्णे च भिक्षार्थी कृष्णसाराजिनाम्बरः। पुरि तद्वञ्चनामायाकटाक्ष इव सोऽभ्रमत् ॥९९॥ आदाय द्विजगेहेभ्यो मौनी भिक्षात्रयं ततः। सदण्डाजिनकञ्चक्रे त्रिसत्यमिव सञ्चरन् ॥१००॥ भागं ददौ च काकेभ्यो भागमभ्यागताय च। भागेन दम्भबीजेन कुक्षिमस्रामपूरयत् ॥१०१॥ पुमः स सर्वपापानि निजानि गणयन्निव। जपन्नावर्त्तयामास चिरं मिथ्याक्षमालिकाम् ॥१०२॥ रजयामद्वितीयेन च स तस्यो मठान्तरे। अपि मूढ्मानि शेक्य तस्वस्थानानि पित्तयन् ॥१०३॥ एवं प्रतिदिनं कुर्वन् पट्टं व्याजमयं शत। स तत्रावर्जयामास नगरीस्वामिनां मनः ॥१०४॥ अहो तपस्वी शान्तोऽयमिति ख्यातिञ्च सर्वतः। उत्पादत तत्राम्य भक्तिगम्भीरिए जनः ॥१०५॥ १ अवीचिर्नाम नरकः, तद्भेदोस्तरमवीचिमहारौरवरौरवाः—इत्यमरः। २ धूर्तरूपम् चतुरं आननं यस्य सः। यस्य मुखं एव चातुर्यं प्रतिभामने रक्तः। ३ कुसृतिः—शाठ्यम्।
पंचम लम्बक ४१५
पंचम लम्बक ४१५ वह प्रातःकाल ही घनी और चिकनी मिट्टी से शरीर पर लेप करता था मानों बिना तरंगों के कीचड़ के लेप का मुखपाठ कर रहा हो ॥१९३॥ वह नदी के तट पर स्नान करके बहुत देर तक नीचे की ओर मुंह किये खड़ा रहता था मानों अपने कुकर्मों से होनेवाली अधोगति का अभ्यास कर रहा हो ॥१९४॥ स्नान करके उठा हुआ वह चिरकाल तक सूर्य की ओर मुंह करके खड़ा रहता था मानों अपने को शूली पर चढ़ाने के योग्य बना रहा हो ॥१९५॥ स्नान करके हाथ में कुशा की मुट्ठी लेकर जप करता हुआ वह पद्मासन लगाकर बैठा हुआ दम्भी ब्राह्मण के समान मालूम होता था ॥१९६॥ बीच-बीच में वह साधु पुरुषों के हृदयों के समान सुन्दर पुष्पों का हरण करके शिवजी की पूजा किया करता था ॥१९७॥ पूजन करने के पश्चात् भी वह जप करने की बनावटी मुद्रा बनाये रहता था मानों अपने कुकर्मों के फलस्वरूप प्राप्त होनेवाले नरकों का ध्यान करता हो ॥१९८॥ अपराह्न के समय वह मौन धारण करके द्विजो (ब्राह्मणो) के घरों से भिक्षा प्राप्त करने के लिए दण्ड लेकर और कृष्णाजिन¹ पहनकर जाता था और तीन भिक्षायें लेता था ॥१९९॥ और तीन गल्प के समान वह भिक्षा के तीन भाग करता था ॥२००॥ एक भाग कौवा का एक भाग अतिथि का और दम्भ के बीज के समान एक भाग से वह अपना पेट भरता था ॥२०१॥ भोजन के बाद मानों अपने पापों को गिनता हुआ वह फिर जप-माला लेकर जप करने का झूठा ढोंग रचा करता था ॥२०२॥ वह रात में उस मठ के अन्दर नगरनिवासियो के गूढ़म हरंख्याना को सोचता हुआ अकेला ही रहता था ॥२०३॥ इस प्रकार प्रतिदिन वंचनापूर्ण कपट रूप करते हुए उसने नागरिका के मन को अपनी ओर आकृष्ट कर लिया ॥२०४॥ ओह यह तो बड़ा ही शान्त तपस्वी है—इस प्रकार चारों ओर उसकी प्रसिद्धि हो गई और सभी नागरिक उनके सामन भक्ति से प्रणाम करने लगे ॥२०५॥ १ कृष्णाजिन = काले मृग का चर्म ।
४९६ कथासरित्सागर
४९६ कथासरित्सागर तावच्च स द्वितीयोऽस्य १ सक्ता चारमुखम् तम् । विज्ञाय माधवोऽप्येतन्नगरीं प्रविवेश ताम् ॥१०६॥ गृहीत्वा वसतिं चात्र दूरे देवकुलात्सरे । स राजपुत्रच्छन्ना सन् स्नातुं क्षिप्रातटं ययौ ॥१०७॥ स्नात्वा सानुचरो दृष्ट्वा ददर्श तपस्तत्परम् । तं शिवं परमश्रद्धो निपपातास्य पादयोः ॥१०८॥ जगाद च जनस्याग्रे नास्तीदृक्तपसोऽपरः । असकृद्धि मया दृष्टस्तीर्थान्येष भ्रमन्निति ॥१०९॥ शिवस्तु तं विलोक्यापि दृप्तस्तम्भितकन्धरः । तूष्णीमासीत्ततः सोऽपि माधवो वसतिं ययौ ॥११०॥ रात्रौ मिलित्वा चक्रतुर्भुक्त्वा पीत्वा च तावुभौ । मन्त्रयामासतुः शेषं कर्तव्यं यवतः परम् ॥१११॥ यामे च पश्चिमे स्वरमागात् स्वमठिकां शिवः । माधवोऽपि प्रभाते स्वं धूर्तमेकं समादिशत् ॥११२॥ एतद् गृहीत्वा गच्छ त्वं वस्त्रयुग्म मुपायनम् । शङ्करस्वामिनः पार्श्वमिह राजपुरोधसः ॥११३॥ राजपुत्रः परामूतो माधवो नाम गोत्रजः । पित्र्यं बहुगृहीत्वार्थमागतो दक्षिणापथात् ॥११४॥ समं कतिपयैरस्य राजपुत्रैरनुव्रतः । स चह युष्मदीयस्य राज्ञः सर्वां करिष्यति ॥११५॥ येन त्वद्दर्शनायाहं प्रेषितो यशसां निधे । इति त्वया सविनयं स च वाच्यः पुरोहितः ॥११६॥ एव स माधवेनोक्तो धूर्तः सम्प्रेषितस्तथा । जगामोपायनकरो गृहं तस्य पुरोधसः ॥११७॥ उपेत्यावसरे दत्त्वा प्राभृतं बिजने च तत् । तस्मै माधवसन्देशं शशंसि स्म यथोचितम् ॥११८॥ सो ऽप्युपायनलोभात्तन्मूढचे कल्पितायतिः । उपप्रदान लििप्सूनामङ्क ३ ग्याश्चर्यजोपभम् ॥११९॥ १ वणिग्वेशमभिनिर्मितं चीतं प्राचारकं चेति बुद्धम् । २ प्राभृतम् = उपायनम् । 'भेंट' इति भाषायाम् । ३ 'भेंट' 'घूस' इति प्रसिद्धम् ।
पंचम लम्बक ४९७
पंचम लम्बक ४९७ शिव के इस प्रकार अपना प्रभाव जमा लेने पर उसके दूसरे साथी माधव ने अपने गुप्तचरों से जानकर नगरी में प्रवेश किया ॥१०६॥ और शिव के स्थान से दूर एक मन्दिर में अपना निवास स्थिर किया। एक बार माधव राजपुत्र के नकली वेष में स्नान करने के लिए क्षिप्रा नदी के तट पर गया ॥१०७॥ स्नान करने के पश्चात् वह देव-मन्दिर में जप करते हुए शिव को देखकर अत्यन्त भक्ति- भाव से नम्र होकर उसके चरणों में गिर पड़ा ॥१०८॥ और जनता के सामने कहने लगा कि ऐसा दूसरा तपस्वी इस समय नहीं है। मैंने तीर्थों में भ्रमण करते हुए इस बात का बार-बार अनुभव किया है ॥१०९॥ शिव भी दम्भ से गर्दन टेढ़ी करके उसे देखता हुआ मौन ही रहा और माधव प्रणाम करके घर चला गया ॥११०॥ फिर रात में मिलकर और खा-पीकर उन दोनों ने अपने आगे के कर्त्तव्य की योजना बनाई। कुछ रात्रि शेष रहते ही शिव अपने मठ में लौट आया और माधव ने भी प्रातःकाल अपने साथियों में से एक धूर्त को आदेश दिया ॥१११-११२॥ कि ये दो वस्त्र (पागी और दुपट्टा) लेकर राजपुरोहित शंकरस्वामी के घर जाओ और उससे कहो कि अपने बन्धु-बान्धवों के द्वारा सताया गया माधव नामक राजकुमार दक्षिण देश से कुछ राजपुत्रों के साथ बहुत-सा धन लेकर यहाँ आया है। वह आपके राजा की सेवा करेगा ॥११३-११५॥ 'उसने आपके दर्शन के लिए (समय माँगने के लिए) मुझे आपके पास भेजा है' इस प्रकार नम्रता के साथ राजपुरोहितजी से कहना ॥११६॥ माधव द्वारा इस प्रकार कहा गया वह धूर्त हाथ में भेंट लिये उसने माधव का सन्देश उसे सुनाया ॥११७-११८॥ राजपुरोहित ने भी भविष्य में लाभ की कल्पना और वर्तमान में भेंट के लोभ में फँसकर उसकी बात मान ली। सच है लोभियों के लिए भेंट, उपहार आदि एकमात्र आकर्षणकारी औषधि हैं ॥११९॥ ६३
४१८ कथासरित्सागर
४१८ कथासरित्सागर तत प्रयागते तस्मिन्धूर्तेऽन्येषु स माधव । लब्धावकाशस्तमगात्स्वय द्रष्टु पुरोहितम् ॥१२०॥ धृतकार्पटिकाकारे राजपुत्रापदेशिभि । वृत पार्श्वचरैरातत्काव्यसण्डकलाञ्छन ॥१२१॥ पुरोगावेदितदनन्यभ्यगात्स पुरोहितम् । तेनाप्यभ्युद्गमानन्दस्वागतैरभ्यनन्दत ॥१२२॥ सततस्तेन सह स्थित्वा कथालापै क्षण च स । आययौ तदनुज्ञातो माधवो वसति निजाम् ॥१२३॥ द्वितीयेऽह्नि पुन प्रद्य प्रभूत वस्त्रयोर्युगम् । भूयोऽपि तमुपागच्छ पुरोहितमुवाच च ॥१२४॥ परिवारानुरोधेन किल सवाशिनो वयम् । तेन त्वमाधितोऽस्माभिरर्थमात्रास्ति न पुन ॥१२५॥ तच्छ्रुत्वा प्राप्तिमाशङ्क्य तस्मात्सोऽथ पुरोहित । प्रतिशुश्राव¹ तत्सस्मै माधवाय समीहितम् ॥१२६॥ क्षणाच्च गत्वा राजानमेतदर्थ व्यजिज्ञपत् । तद्गौरवेण राजापि तत्तथा प्रत्यपद्यत ॥१२७॥ अपरेऽह्नि च नीत्वा त माधव सपरिच्छदम् । नृपायादर्शयत्तस्मै स पुरोधा सगौरवम् ॥१२८॥ नृपोऽपि माधव दृष्ट्वा राजपुत्रोपमाकृतिम् । आदरेणानुजग्राह वृत्ति चास्य प्रदिष्टवान् ॥१२९॥ ततोऽत्र सवमानस्त नृप तस्मै स माधव । रात्रौ रात्रौ च मन्त्राय शिवेम समगच्छत ॥१३०॥ इहैव वस मद्गेह इति तेन पुरोधसा । सोऽभितश्चामवत्स्तोमादुपचारोपजीविना ॥१३१॥ तत सहचरी साक तस्यवाशिश्रियद् गृहम् । विनाशहेतुर्वासाय मद्गु स्कन्ध तरोरिव ॥१३२॥ कृत्वा कृत्रिममाणिक्यमयाभरणभृंतम् । भाण्ड च स्थापयामास तदीये कोषवेश्मनि ॥१३३॥ १ स्वीकार । २ 'विनाशहेतुर्वासोऽयमासीत् स्कन्धे तरोरिव' इति पुस्तकान्तरे पाठः। 'मद्गुः पानीयकाकिका' जलकुक्कुट इति प्रसिद्धः। मद्गुर्यस्मिन्व्रक्षे निवसति तमेवाश्वत्थं विनाशयति तथैव माधवोऽपि पुरोहितविनाशाय तद्गृहेऽवस्थितः।