कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५)
महाकवि सोमदेव भट्ट द्वारा
स्रोत: कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1960 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंद्वितीय लम्बक १९१ और उससे कहने लगे—'हे देवि यदि तुम हमारा कार्य सिद्ध कर दोगी तो तुम्हें हम बहुत-सा धन देंगे' ॥८९॥ वह स्त्री बोली—'यदि तुम लोग किसी स्त्री को चाहते हो तो बताओ। मैं तुम्हारा कार्य करा दूँगी। मुझे धन का लालच नहीं है'॥९० ॥ सिद्धिकरी नाम की मेरी एक बुद्धिमती शिष्या है। उसकी कृपा से मैंने अगण्य धन प्राप्त किया है ॥९१॥ सिद्धि की कथा 'तुमने शिष्या की कृपा से अगण्य धन कैसे प्राप्त किया ?' वीरपुत्रों द्वारा इस प्रकार पूछने पर संन्यासिनी बोली—॥९२॥ बेटो ! यदि तुम्हें सुनने की इच्छा है तो सुना करती हूँ। एक बार उत्तामरण से कोई बनिया यहाँ आया था ॥९३॥ मेरी शिष्या किसी उपाय से उसके घर जाकर टिक गई। उसने अपना रूप बिगाड़कर सेविका (मजदूरनी) का रूप धारण किया ॥९४॥ धीरे-धीरे वह उस बनिए पर विश्वास जमाकर उसके घर में रखे हुए समस्त स्वर्ण भांडार को लेकर अत्यन्त प्रातःकाल में छिपकर निकल गई ॥९५॥ नगर से बाहर पकड़े जाने के भय से शीघ्रतापूर्वक भागती हुई उसे देखकर मार्ग में एक डोम उसका धन छीनने के लिए उसका पीछा करने लगा ॥ ९६॥ चतुरा सिद्धिकरी ने समझ लिया और एक पीपल के वृक्ष के नीचे पहुँचकर उसने बड़ी ही दीनता के साथ उस डोम से कहा— आज मैं अपने पति के साथ कलह करके मरने के लिए घर से भाग आई हूँ। इसलिए हे भले आदमी ! तुम मेरे लिए फाँसी का फन्दा बाँध दो। 'यह फाँसी के फन्दे से स्वयं ही मर जाय तो स्त्री-हत्या क्यों करूँ'—यह सोचकर उसने वृक्ष में फाँसी का फन्दा लटका दिया ॥९७—९८॥ तब वह सिद्धिकरी अनजान और भोली-भाली सी बनकर कहने लगी— इस फन्दे को गले में कैसे बाँधा जाता है जरा मुझे बाँधकर दिखलाओ ॥९९॥ तब उस मूर्ख डोम ने पीपल के नीचे हाथ रखकर फन्दे को गले में डालकर फाँसी का फन्दा बाँध दिया ॥१००॥ इतने ही में सिद्धिकरी ने उस हाथ को तुरन्त अलग कर दिया और उसके लटकते ही उस स्थान से नीचे के कपड़े को सम्भालकर भाग गई ॥१०१॥ [L30: कुछ समय पश्चात् सिद्धिकरी को ढूँढ़ते-ढूँढ़ते परिजन वहाँ आए और पेड़ से लटके हुए डोम के नीचे सिद्धिकरी को नहीं देखा ॥१०२॥ १. चाण्डाल का कार्य करनेवाली नीच जाति का पुरुष जिसे डोम कहते हैं।—सं०