कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५)
महाकवि सोमदेव भट्ट द्वारा
स्रोत: कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1960 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंइस अनहोनी बात को सुनकर मैंने क्रोध से शर्ववर्मा से कहा कि 'यदि तुम छह महीने में राजा को व्याकरण पढ़ा दोगे तो मैं संस्कृत प्राकृत और देशभाषा इन तीनों को सदा के लिए छोड़ दूंगा जो मनुष्यों की बोलचाल में आती हैं॥१४७-१४८॥ तब शर्ववर्मा ने कहा कि यदि मैं ऐसा न कर सकूँगा तो तुम्हारी पादुका को बारह वर्षों तक सिर पर उठाऊँगा ॥१४९॥ ऐसा कहकर शर्ववर्मा के चले जाने पर मैं भी अपने घर चला गया। राजा ने दोनों ओर से कार्य-सिद्धि समझकर धैर्य धारण किया॥१५०॥ प्रतिज्ञा से व्याकुल शर्ववर्मा ने अत्यन्त कठिन प्रतिज्ञा कर ली और उसने यह सारी बात अपनी स्त्री से कही॥१५१॥ शर्ववर्मा की स्त्री अत्यन्त दुःखित होकर बोली—'हे स्वामिन्! इस कठिन संकट के समय स्वामिकुमार के बिना दूसरी गति नहीं दीखती'॥१५२॥ शर्ववर्मा ने भी ऐसा ही निश्चय किया और रात के चौथे पहर में उठकर बिना भोजन किये कुमार कार्तिकेय के मन्दिर को चला॥१५३॥ मैंने भी गुप्तचर के द्वारा शर्ववर्मा का जाना जानकर प्रातःकाल राजा से कहा। राजा भी 'जाने क्या होगा' ऐसा सोचने लगा ॥१५४॥ तब सिंहगुप्त नामक राजपुत्र राजा से बोला कि 'हे महाराज! आपका अस्वास्थ्य देखकर उस समय मुझे महान् खेद हुआ॥१५५॥ और तब मैं नगर के बाहर चंडिका के मन्दिर में अपना सिर काटने के लिए उद्यत हुआ ॥१५६॥ इतने में ही आकाशवाणी ने कहा-ऐसा मत करो। राजा की इच्छा अवश्य ही पूरी होगी। इस प्रकार उसने मुझे रोक दिया। सो मेरी समझ से आपको सिद्धि प्राप्त होगी' ॥१५७॥ ऐसा कहकर और राजा से विचार करके सिंहगुप्त ने शर्ववर्मा के पीछे दो गुप्तचर छोड़ दिये ॥१५८॥ शर्ववर्मा भी केवल वायु-भक्षण करता हुआ मौनी और दृढ़निश्चयी होकर क्रमशः स्वामिकुमार के स्थान पर पहुँचा ॥१५९॥ शरीर की परवाह न करके किये गये कठोर तप से प्रसन्न होकर स्वामिकार्तिक ने शर्ववर्मा पर कृपा की और उसे अभीष्ट वर प्रदान किया ॥१६०॥ तब सिंहगुप्त के भेजे हुए अनुचरों ने राजा के सामने आकर शर्ववर्मा की सफलता बताई ॥१६१॥