भारतकोश
कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५)

कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५)

महाकवि सोमदेव भट्ट द्वारा

स्रोत: कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1960 (उद्गम)

DevanagariHindipublished876 पृष्ठ

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प्रथम लम्बक ९१ आज उसी मूर्खता के कारण रानी से अपमानित हुआ है, यह मैंने सुना है॥१३२॥ इस प्रकार परस्पर विचार करते हुए उस रात को व्यतीत कर हमलोग प्रातःकाल राजा के निवास-स्थान पर गये ॥१३३॥ प्रवेश-निषेध रहते पर भी मैं अन्दर गया मेरे जाने पर धीरे-धीरे शर्ववर्मा भी आया ॥१३४॥ उसके पास बैठकर मैंने राजा से निवेदन किया कि 'हे महाराज आप अकारण ही स्वस्थ क्यों हैं? ॥१३५॥ मेरी बात सुनकर भी राजा उसी प्रकार मौन रहा। तब शर्ववर्मा ने यह अद्भुत वाक्य कहा ॥१३६॥ 'राजन् आपने मुझसे कभी सुना होगा। मैंने पहले भी आपसे कहा है। अतः आज मैंने स्वप्न-माणवक मंगाया ॥१३७॥ आज मैंने स्वप्न में देखा कि एक कमल आकाश से गिरा है। उसे किसी दिव्य कुमार ने विकसित किया और उसमें से श्वेतवस्त्रधारिणी एक स्त्री निकली जो महाराज ! आपके मुंह में चली गई॥१३८॥ इतना देखकर मैं जग गया। मैं समझता हूँ कि वह स्त्री सरस्वती देवी ही थी जो आपके मुख में प्रविष्ट हुई। इसमें तनिक भी सन्देह नहीं ॥१३९॥ इस प्रकार शर्ववर्मा के स्वप्न-वृत्तान्त बतलाने पर राजा मौन त्याग कर, स्मित भाव के साथ मुझसे बोला ॥१४०॥ 'मुझे विद्या के बिना यह लक्ष्मी अच्छी नहीं लगती। लकड़ी के गहनों के समान मूर्ख को इस वैभव से क्या लाभ ? ॥१४१॥ यत्नपूर्वक शिक्षा ग्रहण करता हुआ मनुष्य कितने समय में पांडित्य प्राप्त कर सकता है, यह मुझे बताओ' ॥१४२-१४३॥ तब मैंने राजा से कहा—'राजन्, सब विद्याओं का मूल नवीन व्याकरण बारह वर्षों में आता है॥१४४॥ लेकिन प्रभो मैं तुम्हें छह वर्षों में व्याकरण सिखा दूंगा। यह सुनकर शर्ववर्मा ईर्ष्या के साथ बोला ॥१४५॥ सुख में रहनेवाला राजा-जैसा व्यक्ति इतने समय तक पढ़ने का कष्ट कैसे उठा सकता है ? सो महाराज ! मैं तुम्हें छह महीनों में व्याकरण पढ़ा दूंगा ॥१४६॥