भारतकोश
कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५)

कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५)

महाकवि सोमदेव भट्ट द्वारा

स्रोत: कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1960 (उद्गम)

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तृतीय लम्बक २५७ यह सुनकर एकमात्र क्रीड़ा का लोभी राजा वासवदत्ता के साथ लावणक जाने के लिए उद्यत हो गया ॥१२६॥ किसी दिन जाने का निश्चय होने और यात्रा का शुभ मुहूर्त निकलने पर अपनी कान्ति से दिशाओं को प्रकाशित करते हुए नारद मुनि आकाश से उतरकर दर्शकों की आँखों को आनन्दित करने लगे। मानों चन्द्रमा अपने वंश (चन्द्रवंश) से प्रेम के कारण आकाश से उतर आया हो ॥१२७-१२८॥ राजा के द्वारा आतिथ्य-सत्कार ग्रहण किए हुए नारद मुनि ने नम्रता से झुके हुए राजा उदयन को प्रसन्नता से पारिजात के फूलों की माला प्रदान की ॥१२९॥ ऋषि ने नमस्कार करती हुई वासवदत्ता से कहा—'तुम कामदेव के अंश से उत्पन्न एक पुत्र को प्राप्त करोगी जो विद्याधरों का राजा होगा'॥१३०॥ तब यौगन्धरायण के सामने नारद ने वत्सराज से कहा—हे राजन्! तुम्हारी पत्नी वासवदत्ता को देखकर मुझे स्मरण हो गया कि प्राचीन समय में तुम्हारे पर दादा युधिष्ठिर भीम आदि पाँच भाई थे । उन पाँचों की एक ही पत्नी द्रौपदी थी। वह वासवदत्ता के समान ही अनुपम सुन्दरी थी। इस दोष को देखकर मैंने इन लोगों से कहा कि तुम पाँचों को स्त्री के सम्बन्ध से परस्पर बैर न करना चाहिए । इस प्रसंग में एक कथा कहता हूँ सुनो ॥१३१-१३४॥ सुन्द और उपसुन्द की कथा प्राचीन काल में सुन्द और उपसुन्द नाम के दो असुर थे जो अपने अतुल बल के कारण तीनों लोकों को जीतने के कारण अजेय थे ॥१३५॥ उन दोनों भाइयों के विनाश की इच्छा से ब्रह्मा ने विश्वकर्मा से तिलोत्तमा नामक दिव्य नारी का निर्माण कराया ॥१३६॥ चारों ओर से उसके रूप को देखने के लिए ब्रह्मा चतुर्मुख हो गये। जब वह प्रदक्षिणा कर रही थी तब शिव भी उसे चारों ओर से देखने के लिए ही चतुर्मुख हो गये ॥१३७॥ वह तिलोत्तमा ब्रह्मा की आज्ञा से विन्ध्याचल के तटवर्ती प्रदेश में स्थित उन असुरों के प्रलोभन के लिए गई ॥१३८॥ ३३