कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५)
महाकवि सोमदेव भट्ट द्वारा
स्रोत: कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1960 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंतृतीय लम्बक २६३ उधर यौगन्धरायण उन दोनों को साथ लिए हुए मगध-नरेश की राजधानी में प्रविष्ट हुआ॥१६॥ वहाँ राजकुमारी को उद्यान में घूमते देखकर सिपाहियों के रोकने पर भी यौगन्धरायण उन दोनों के साथ अन्दर घुस गया॥१७-१८॥ पद्मावती ने उधर देखा और वासवदत्ता की ओर उसकी आँखें बरबस उलझ गईं तथा उसके प्रति प्रेम उत्पन्न हो गया। उसने सिपाहियों को मना करके उस ब्राह्मणी के रूप में स्थित राजकन्या को अपने समीप बुलाया। और बूढ़े ब्राह्मण से पूछा कि हे ब्रह्मदेव ! यह बालिका कौन है ? तथा यहाँ मेरे पास किस लिए आये हो ? यौगन्धरायण ने उत्तर दिया। हे राजकुमारी ! यह अवन्तिका नाम की मेरी बेटी है। इसका व्यसनी पति इसे छोड़ कर कहीं चला गया। इसलिए इसे मैं तुम्हारे हाथ सौंपता हूँ। तब तक उस जामाता को शीघ्र ही ढूँढ़ कर लाता हूँ ॥१९-२२॥ इसका भाई यह कानबटु भी जब तक इसके पास ही रहेगा जिससे इसे अकेलेपन का कष्ट-अनुभव न हो ॥२३॥ ऐसा सुनकर पद्मावती ने बूढ़े ब्राह्मण की प्रार्थना स्वीकार कर ली और वह बूढ़ा यौगन्धरायण पद्मावती से आज्ञा लेकर लावणक लौट आया ॥२४॥ उसके जाने पर स्नेहशीला पद्मावती अवन्तिका का उदार हृदय से स्वागत करके काने के साथ कानबटु और वासवदत्ता को अपने आश्चर्यमय भवन में ले गई॥२५-२६॥ राज-भवन में जाकर दीवारों पर लिखे हुए रामचरित के चित्रों को देखकर विरह-वेदना को सीता के समान सहन करने लगी ॥२७॥ स्वरूप से सुकुमारता से उठने-बैठने सोने आदि के सुन्दर ढंग से नील कमल के समान शरीर की सुगन्धि से उसे उच्च श्रेणी की महिला समझकर पद्मावती उसके साथ अपने ऐसे राजोचित व्यवहार करने लगी और मन में सोचती थी कि यह कोई (छिपाई हुई) रमणी है जैसे विराट् के राजभवन में द्रौपदी छिपी थी ॥२८-३०॥