कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५)
महाकवि सोमदेव भट्ट द्वारा
स्रोत: कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1960 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंप्रथम लम्बक ५१ राजभवन में आकर राजा को आशीर्वाद देकर मैंने उस योगनन्द से गुरुदक्षिणा के लिए एक करोड़ स्वर्ण-मुद्रा की याचना की ॥१ ३॥ तब योगनन्द ने शकटाल नामक पूर्वनन्द के मन्त्री को आज्ञा दी कि 'तुम इसे एक करोड़ की स्वर्ण-मुद्रा दिला दो' ॥१ ४॥ मृत राजा का तुरन्त जीवित हो उठना और उसी समय याचक का उपस्थित हो जाना देखकर वह मंत्री सच्ची बात को ताड़ गया। सच है बुद्धिमानों के लिए कौन-सी बात अज्ञेय है ॥१ ५॥ 'राजन् ! देता हूँ'—ऐसा कहकर उस मन्त्री ने यह सोचा कि नन्द का लड़का अभी बालक है और राज्य के शत्रु भी बहुत हैं। अतः इस (नकली) राजा के शरीर की अभी रक्षा करनी चाहिए। (कहीं कार्य होने पर यह भाग न जाय) यह निश्चय करके उसने तत्काल राज्य के सभी मर्चों को जलवा दिया ॥१ ६ १ ७॥ राज्य के गुप्तचरों ने ढूँढ़-ढूँढ़कर मुर्दों को जलाना शुरू किया। इसी प्रसंग में देवायतन में पड़े हुए इन्द्रदत्त के शव को भी व्याडि से छीनकर हठात् जला दिया गया ॥१ ८॥ इस बीच राजा को स्वर्ण देने में शीघ्रता करते हुए देख कर चतुर शकटाल बोला ॥१ ९॥ महाराज ! सारे राज-कर्मचारी उत्सव के कार्यों में व्यस्त हैं। इसलिए यह ब्राह्मण क्षण- भर प्रतीक्षा करे। तबतक मैं अभी देता हूँ ॥११ ॥ इसी अवसर पर व्याडि ने आकर राजा के सामने रोना प्रारम्भ किया कि आपके इस शुभ उदयकाल में अत्यन्त पाप हो गया। प्राणों के शेष रहने पर भी योग-समाधि में स्थित ब्राह्मण के शव को—अनाथ शव कहकर—तुम्हारे नौकरों ने जला डाला। यह सुनकर शोक के कारण योगनन्द' की कुछ बदहवास एवं विचित्र-सी दशा हो गई ॥१११ १२॥ शरीर के दग्ध हो जाने पर नन्द के शरीर में इन्द्रदत्त की आत्मा को स्थिर समझकर महाबुद्धिमान् शकटाल ने उठकर मुझे एक करोड़ स्वर्ण-मुद्राएँ प्रदान कीं ॥११३॥ इसके अनन्तर वह योगनन्द, एकान्त में खेद के साथ व्याडि से बोला—अब मैं ब्राह्मण होकर भी शूद्र हो गया। इसलिए मुझे इस स्थिर राजलक्ष्मी से भी क्या लाभ ॥११४॥ यह सुनकर व्याडि ने राजा को कामोचित आश्वासन देते हुए कहा—'तुम्हारा रहस्य शकटाल को मालूम हो गया है। इसलिए अब पहले उसकी चिन्ता करो ॥११५॥ यह महामन्त्री है। अपनी इच्छा से शीघ्र ही यह तुम्हारा नाश करके पूर्वनन्द के पुत्र चन्द्रगुप्त को राजा बनायेगा ॥११६॥ इसलिए तुम वररुचि को अपना प्रधान मन्त्री बनाओ उसकी दिव्य और प्रतिभाशाली बुद्धि से तुम्हारा राज्य स्थिर रहेगा ॥ ११७॥ १ योग के द्वारा पुनः जीवित होने के कारण इसका नाम योगनन्द पड़ा था। असली नन्द का नाम तरुनन्द या पूर्वनन्द था। इस विषय में विस्तृत विवेचन परिशिष्ट में किया गया है।