कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५)
महाकवि सोमदेव भट्ट द्वारा
स्रोत: कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1960 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंप्रथम लम्बक ४१ उपकोशा की कथा¹ (चालू) मेरे तपस्या के लिए चले जाने पर मेरी कल्याण-कामना करती हुई उपकोशा भी नियमित व्रत रखकर प्रतिदिन गंगा-स्नान करती थी ॥२८॥ एक बार मेरे विरह में दुर्बल पीली अतएव मनोहर और प्रतिपदा के चन्द्र के समान जन- लोचनों के लिए आकर्षक उपकोशा वसन्त-समय में गंगा-स्नान के लिए जा रही थी। मार्ग में उस नयन-मधुर आकृति को राजपुरोहित मद्यरपास तथा युवराज क मंत्री ने देखा ॥२९ ३०॥ उसे देखकर वे तीनों काम-बाण से हृदय बन गये। उनकी अवस्था को समझकर उपकोशा ने भी स्नान करने में जान-बूझकर विलम्ब किया ॥३१॥ सायंकाल गंगा-स्नान से लौटकर आती हुई उपकोशा को कुमारसचिव ने बलपूर्वक रोका किन्तु प्रतिभावती उपकोशा ने उससे कहा ॥३२॥ भले आदमी ! यह ठीक है। जो तुम चाहते हो वही मैं भी चाहती हूँ। किन्तु मैं उच्च कुल में उत्पन्न हुई हूँ और प्रोषितभर्तृका हूँ ॥३३॥ अतः इस प्रकार का कार्य ही क्यों किया जाय। यदि कदाचित् कोई देख ले तो तुम्हारे साथ मेरा भी कल्याण नहीं होगा ॥३४॥ इसलिए वसन्तोत्सव की धूमधाम में नागरिकों के व्यस्त रहने पर तुम रात के पहले पहर मेरे घर पर आओ' ॥३५॥ ऐसा कहकर उससे प्रतिज्ञा करके उपकोशा उससे छूटकर जब कुछ आगे बढ़ी तब दैवयोग से उसे पुरोहित ने आ घेरा ॥३६॥ उपकोशा ने उससे भी उसी दिन उसी प्रकार रात के तीसरे पहर आने का निश्चय किया ॥३७॥ पुरोहित से किसी प्रकार छूटकर वह विह्वल उपकोशा एस ही कुछ दूर गई थी कि नगर पालक (शहर-कोतवाल) ने भी उसी प्रकार उसे रोका ॥३८॥ इसके बाद उपकोशा ने उस भी उसी प्रकार, उसी दिन उसी रात के दूसरे पहर में घर पर आने का संकेत किया ॥३९॥ विधिवशात् उससे भी छूटी हुई उपकोशा काँपती हुई अपने घर पहुँची और अपनी दासियों को बुलाकर स्वतन्त्रतापूर्वक कर्त्तव्य-निर्धारण करते हुए बोली ॥४०॥ पति के प्रवास में रहने पर कुलस्त्री का मर जाना अच्छा है, किन्तु रूप पर मरनेवालों की आँखों पर चढ़ना अच्छा नहीं ॥४१॥ इस प्रकार सोचती हुई तथा मुझे स्मरण करती हुई उस पतिव्रता उपकोशा ने निराहार रहकर उस रात्रि को व्यतीत किया ॥४२॥ १ इस कथा से मिलती-जुलती कहानी बर्टन के अरेबियन नाइट्स में एक मिस्री स्त्री और उसके चार यारों की कहानी में है। अँगरेजी के उपन्यासों में भी परियों की कहानी में ऐसा प्रसंग मिलता है। ६