कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५)
by महाकवि सोमदेव भट्ट
Source: कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1960 (origin)
१२४ कथासरित्सागर
१२४ कथासरित्सागर
तस्य च स्कन्धमारुह्य निर्यद्वक्त्रामलाधिपः । आनेतुं राजपुत्रीं तामुत्पत्य नभसा ययौ ॥ १६५ ॥ विदूषकोऽपि तत्सर्वं दृष्ट्वा तत्र व्यचिन्तयत् । कथं राजसुतानेन हन्यत मयि जीवति ॥ १६६ ॥ इहैव तावत्तिष्ठामि यावदायास्यसौ शठः । इत्यालोच्य स तत्रैव तस्थौ छन्नो विदूषकः ॥ १६७॥ प्रव्राजकश्च गत्वैव वातायनपथेन सः । प्रविश्यान्तःपुरं प्राप सुप्तां निशि नृपात्मजाम् ॥ १६८ ॥ आययौ च गृहीत्वा तां गगनेन तमोमयः । कान्तिप्रकाशितदिशं राहुः शशिकलामिव ॥ १६९ ॥ हा तात हाम्बति च तां क्रन्दन्तीं कन्यकां वहन् । तत्रैव देवीभवनं सोऽन्तरिक्षादवातरत् ॥ १७० ॥ प्रविवेश च तत्कालं वेतालं प्रविमुच्य सः । कन्यारत्नं तदादाय देवीगर्भगृहान्तरम् ॥ १७१ ॥ सत्र यावन्निहन्तुं तां राजपुत्रीमियेष सः । तावदाकृष्टखड्गोऽत्र प्रविवेश विदूषकः ॥ १७२ ॥ आः पाप ! मालतीपुष्पमश्मना हन्तुमीहसे । यदस्यामाकृतौ शस्त्रं व्यापारयितुमिच्छसि ॥ १७३॥ इत्युक्त्वाकृष्य केशेषु शिरस्तस्य विवस्वतः । प्रव्राजकस्य चिच्छेद खड्गेन स विदूषकः ॥ १७४॥ आश्वासयामास च तां राजपुत्रीं भयाकुलाम् । प्रविशन्तीमिवाङ्गानि किञ्चित्प्रत्यभिजानतीम् ॥ १७५॥ कथमन्तःपुरं राज्ञो राजपुत्रीमिमामिह । नययमिति तत्कालमसौ धीरो व्यचिन्तयत् ॥ १७६॥ भो विदूषक ! शृण्वेतद्योऽस्य प्रव्राट् त्वया हतः । महानेतस्य वेतालः सिद्धोऽभूत्सर्पपास्तथा ॥ १७७॥ ततोऽस्य पृथ्वाराज्ये च वाञ्छा राजात्मजासु च । उदपद्यत तेनायमेव मूढोऽद्यवञ्चितः ॥ १७८ ॥ तद्गृहाणसवीमांस्त्व सर्पपान्वीर येन ते । इमामेकां निशामद्य भविष्यत्यम्बरे गतिः ॥ १७९॥
तृतीय लम्बक १२५
तृतीय लम्बक १२५ मुँह से आग की ज्वाला उगलते हुए उसके कन्धे पर बैठकर साधक प्रव्राजक राजकुमारी को लाने के लिए आकाश-मार्ग से चला ॥१६५॥ विदूषक यह सारी घटना देखकर सोचने लगा कि मेरे जीते-जी यह राजकुमारी का वध कैसे करेगा ? ॥१६६॥ इसलिए मैं तबतक यहीं ठहरता हूँ जबतक वह नीच आता है। ऐसा सोचकर वह वहीं छिपा रहा ॥१६७॥ इस प्रकार आकाश में उड़ता हुआ प्रव्राजक खिड़की के रास्ते से राजकुमारी के भवन में जा पहुँचा ॥१६८॥ उसने उसे इस प्रकार पकड़ा जिस प्रकार अंधकारपूर्ण आकाश में कान्ति फैलानेवाली शशिकला को राहु पकड़ता है ॥१६९॥ इतने में ही अरे बाप ! अरी मां ! इस प्रकार चिल्लाती हुई राजकन्या को लिये हुए वह नीच आकाश से नीचे उतरा। उस बैताल (मुर्दे) को उसी प्रकार छोड़कर कन्या को लेकर देवी की मूर्ति के समीप पहुँचा ॥१७०-१७१॥ वह जब राजकुमारी का वध करने के लिए तैयार हुआ इतने में ही तलवार खींचे हुए विदूषक भी मन्दिर में घुसा और बोला—'ओ पापी ! मालती के फूल को पत्थर से पीसना चाहता है जो इस कोमल कन्या पर शस्त्र प्रहार करना चाहता है' ॥१७२-१७३॥ ऐसा कहकर और उसकी जटा पकड़कर विदूषक ने साधक संन्यासी का वध कर डाला और भय से काँपती हुई एवं अत्यन्त सिकुड़ती हुई राजकन्या को धीरज बँधाया ॥१७४ १७५॥ वह सोचने लगा कि अब इसे (राजकुमारी को) फिर रतिवास में कैसे पहुँचाऊँ ? ॥१७६॥ इतने में ही आकाशवाणी हुई—'हे विदूषक ! तुमने इस प्रव्राजक को मारा है इसे यह बैताल और सरसों सिद्ध थे ॥१७७॥ इसीलिए इसकी पृथ्वी का राज्य और राजकुमारी को प्राप्त करने की इच्छा उत्पन्न हो गई थी। किन्तु आज यह ठगा गया ॥१७८॥ इसलिए हे वीर ! तुम उसके सरसों के दाने ले लो इससे केवल एक आज की रात तुम्हारी आकाश में गति हो जायगी' ॥१७९॥
१२६ कथासरित्सागर
१२६ कथासरित्सागर इत्याकाशगता वाणी जातहर्षं जगाद तम्। अनुगृह्णन्ति हि प्रायो देवता अपि साधुवृत्तम् ॥१८०॥ ततो वस्त्राञ्चलात्तस्य स परिव्राजकस्य तान्। जग्राह सर्षपान्हस्ते तामङ्के च नृपात्मजाम् ॥१८१॥ यावच्च देवी भवनात्स तस्मान्निर्ययौ बहि। उच्चचार पुनस्तावदन्या नभसि भारती ॥१८२॥ इहैव देवीभवन मासस्यान्ते पुनस्त्वया। आगन्तव्य महावीर ! विस्मर्त्तव्यमिदं न ते ॥१८३॥ तच्छ्रुत्वा सप्रयुक्तत्वा सद्यो देवीप्रसादतः। उत्पात नभो बिभ्रद्राजपुत्रीं विदूषकः ॥१८४॥ गत्वा च गगनेनाशु स तामन्तःपुरान्तरम्। प्रावेशयद्राजसुतां समाश्वस्तामुवाच च ॥१८५॥ न मे भविष्यति प्रातर्गतिर्व्योम्नि ततश्च माम्। सर्वे द्रक्ष्यन्ति निन्द्यन्ति तत्सम्प्रत्येव याम्यहम् ॥१८६॥ इति तेनोदिता बाला बिभ्यती सा जगाद तम्। गते त्वयि मम प्राणास्त्रासाक्रान्ता प्रयान्त्यमी ॥१८७॥ तन्महाभाग मा गास्त्वं देहि मे जीवितं पुनः। प्रतिपन्नार्थनिर्वाहः सहज हि सतां व्रतम् ॥१८८॥ तच्छ्रुत्वा चिन्तयामास स सुसत्त्वो विदूषकः। यदस्तु मे न गच्छामि मुञ्चेत्प्राणान् भयादियम् ॥१८९॥ ततश्च नृपतेर्भक्तिः का मया विहिता भवेत्। इत्यालोच्य स तत्रैव तस्थावन्तःपुरे निशि ॥१९०॥ व्यायामजागराच्छ्रान्तो ययौ निद्रां क्षनेनच सः। राजपुत्री त्वनिद्रैव भीता तामनयन्निशाम् ॥१९१॥ विश्राम्यतु क्षण तावदिति प्रमादमानसा। सुप्तं प्रबोधयामास सा प्रभातेऽपि नव तम् ॥१९२॥ ततः प्रविष्टा ददृशुस्तमन्तःपुरचारिणः। ससम्भ्रमाश्च गत्वैव राजानं तं व्यजिज्ञपन् ॥१९३॥ राजाप्यवेक्षितुं तत्त्वं प्रतीहारं व्यसर्जयत्। प्रतीहारश्च गत्वात्तस्तत्रापश्यद् विदूषकम् ॥१९४॥
तृतीय लम्बक ३२७
तृतीय लम्बक ३२७ यह सुनकर वह प्रसन्न हुआ। सच है ऐसे वीर और सत्कार्यकर्ताओं को देवताओं की भी कृपा प्राप्त होती है॥१७८ ॥ तब विदूषक ने उस मृत साधु के आँचल से सरसों निकालकर एक हाथ में लिये और दूसरे हाथ से राजकन्या को गोद में लेकर बाहर निकला ॥१७९॥ जब वह देवी के मन्दिर से बाहर निकला तब उसे पुनः दूसरी आकाशवाणी सुन पड़ी—'हे महाबीर ! महीने के अन्त में तुम इस मन्दिर में फिर आना यह भूलना नहीं ॥१८०-१८१॥ यह सुनकर और उसे स्वीकार करके देवी की कृपा से राजकुमारी को लिये हुए विदूषक आकाश की ओर उड़ा॥१८४॥ आकाशमार्ग से जाकर राजकन्या को उसके भवन में पहुँचाकर और उसे धीरज बँधाकर बोला—'सबेरे आकाश में उड़ने की मेरी शक्ति न रहेगी। यह केवल इसी रात के लिए प्राप्त थी। तब इस घर से निकलते हुए मुझे सब लोग देखेंगे। इसलिए मैं अभी ही जा रहा हूँ' ॥१८५ १८६॥ विदूषक के भलीभाँति समझाने पर भी डरती हुई बालिका उससे बोली—'तुम्हारे जाने पर भय से काँपते हुए मेरे प्राण अब निकल रहे हैं। इसीलिए हे महापुरुष ! तुम न जाओ। स्वीकार किये हुए कार्य का निर्वाह करना सज्जनों का स्वाभाविक व्रत (नियम) है ॥१८७-१८८॥ यह सुनकर महा प्राणवान् विदूषक सोचने लगा—'जो भी हो मैं नहीं जाता। यह भय से प्राणों को छोड़ देगी। तब मेरी राज-सेवा ही क्या हुई ? । ऐसा सोचकर वह वहीं राजकन्या के भवन में ठहर गया। धीरे-धीरे श्रम और जागरण से थका हुआ वह रात में भी सो गया। किन्तु डरी हुई राजकुमारी ने जाग करके ही सारी रात व्यतीत की ॥१८९ १९१॥ 'यह कुछ देर विश्राम कर ले'—इस प्रकार स्नेहपूर्ण-हृदया राजकन्या ने उसे प्रातःकाल नहीं जगाया। तब रनिवास की सेविकाओं ने अन्दर आकर उसे देखा और घबराकर राजा से निवेदन किया ॥१९२-१९३॥ राजा ने भी तत्त्व जानने की इच्छा से अपने निजी सेवक को भेजा। उसने अन्दर आकर उस विदूषक को देखा॥१९४॥
३२८ कथासरित्सागर
३२८ कथासरित्सागर शुश्राव च यथावृत्तं स सद्योराजसुतामुखात्। तथैव गत्वा राज्ञे च स समग्रं न्यवेदयत् ॥१९५॥ विद्रूपकस्य सत्त्वज्ञस्तच्छ्रुत्वा स महीपतिः। किमवेत् स्यादिति क्षिप्रं समुद्भ्रान्त इवाभवत् ॥१९६॥ आनाययच्च दुहितुर्मन्दिरात् विद्रूपकम्। वशानुयाग मनसा तस्या स्नेहानुपातिना ॥१९७॥ पप्रच्छ च यथावृत्तं न राजा तमुपागतम्। मा भूरुत्रश्च सोऽप्यस्मै विप्रो वृत्तान्तमब्रवीत् ॥१९८॥ अदर्शयच्च वस्त्रान्ते निबद्धाश्चोरनासिकाः। प्रभाद्सम्भविनस्तांश्च सर्पंपाभूमिमेदिनः ॥१९९॥ ततः सम्भाव्य सत्यं तत्तांश्चानाय्य मठद्विजान्। सशिरश्छत्ररोपेतान् पृष्ट्वा तन्मूलकारणम् ॥२००॥ स्वयं श्मशाने गत्वा च दृष्ट्वा तांश्छिन्ननासिकान्। पुंश्चांस्त च निर्लूनकण्ठं प्रव्राजकाधमम् ॥२०१॥ उत्पन्नप्रत्ययो राजा स तुष्टोय महाशयः। विद्रूपकाय कृतिने सुताप्राणप्रदायिने ॥२०२॥ ददौ तस्मै च तामेव तत्रैव तनयां निजाम्। किमदेयमदाराणामुपकारिषु तुष्यताम् ॥२०३॥ क्षीरवासााम्बुजप्रीत्या भूमं राजसुताकरे। गृहीतपाणिर्येनास्यां लेभे लक्ष्मीं विद्रूपकः ॥२०४॥ ततो राजोपचारेण स तया कान्तया सह। आदित्यसेनभूपस्तेस्तस्थौ श्लाघ्ययशा गृहे ॥२०५॥ अथ यातेषु दिवसेष्वेकदा दैवचोदिता। समुवाच निशायां सा राजपुत्री विद्रूपकम् ॥२०६॥ नाथ स्मरसि यत्तत्र तत्र देवीगृहे निशि। मासान्ते त्वमिहागच्छेरित्युक्तं दिव्यया गिरा ॥२०७॥ तत्र चाद्य गतो मासो भवतस्तच्च विस्मृतम्। इत्युक्तः प्रियया स्मृत्वा स जहर्ष विद्रूपकः ॥२०८॥ साधु स्मृतं त्वया तन्वि ! विस्मृतं तन्मया पुनः। इत्युक्त्वाऽऽलिङ्गनं चास्यै स ददौ पारितोषिकम् ॥२०९॥
तृतीय लम्बक ३७१
तृतीय लम्बक ३७१ राज-सेवक ने राजकुमारी के मुंह से सुना हुआ सारा समाचार राजा से कह दिया ॥१९५॥
विदूषक के मन और बल को जाननेवाला राजा 'यह क्या बात है ? - ऐसा सोचता हुआ व्याकुल-सा हो गया। और कन्या के महल से विदूषक को बुला ठीक-ठीक समाचार पूछा। उसने भी प्रारम्भ से अन्त तक सारा समाचार कह डाला। और कपड़े के कोने में बँधे हुए उन चोरों की कटी हुई नाक भी दिखा दी साथ ही प्रव्राजक के उस भूमिश्रेणी सरभों के शवों को भी दिखाया ॥१९६-१९९॥
राजा ने सारी घटना का सत्य समझकर सभी मठवासी ब्राह्मणों को चक्कर के साथ बुलाया और उनसे मूल कारण जानकर श्मशान में जाकर उन तीनों नक-कटों को देखा और कटे हुए गलेवाले उस दुष्ट साधक को (देवी-मन्दिर में) देखा ॥२०-२१॥
इन प्रमाणों से विश्वस्त राजा ने कन्या को प्राणदान करनेवाले विदूषक को अपनी कन्या प्रदान कर दी। सच है उदार व्यक्तियों के उपकारों के लिए कौन-सी वस्तु अदेय है? ॥२०२॥
राजकुमारी के हाथ में लक्ष्मी का निवास था इसी कारण विदूषक ने उसका पाणि-ग्रहण करते ही लक्ष्मी को प्राप्त किया ॥२०४॥
वह यशस्वी विदूषक अपनी पत्नी के साथ आदरसम्पन्न के घर राजाओं के समान रहने लगा ॥२०५॥
कुछ दिनों के बाद दैव से प्रेरित राजकन्या ने रात्रि में विदूषक से कहा कि 'हे स्वामिन् ! क्या तुम्हें स्मरण नहीं है कि देवी-मन्दिर में आकाशवाणी ने कहा था कि 'एक मास बाद तुम यहाँ आना' । तदनुसार आज मास समाप्त हो गया आप उसे भूल गए। पत्नी ने यह सुनकर विदूषक प्रसन्न हुआ। और बोला- 'प्रिये ! तुमने अच्छा स्मरण दिला दिया मैं उसे भूल ही गया था। ऐसा कहकर उसने उसे पुरस्कार में आलिंगन दिया ॥१-२ ॥ ४२
११० कथासरित्सागर
११० कथासरित्सागर
सुप्तायां च ततस्तस्यां निभृत्यान्तःपुरान्निशि। आदाय खड्गं स्वस्यं सस्तद्देवीभवनं ययौ ॥२१॥ प्राप्तो विदूषकोऽह्र मौरिति तत्र जपन् बहिः। प्रविशेत्यशृणोद् वाचमन्तः केनाप्युदीरिताम् ॥२११॥ प्रविश्य चान्तरे सोऽथ दिव्यमावासमैक्षत। तदन्तर्दिव्यरूपों च कन्यां दिव्यपरिच्छदाम् ॥२१२॥ स्वप्रभाभिन्नतिमिरं रजनिज्वलिशिखामिव। हरकोपाग्निदग्धस्मरसञ्जीवनौषधिम् ॥२१३॥ किमेतदिति साश्चर्यं स तया दृष्टया स्वयम्। सस्नेहबहुमानेन स्वागतेनाभ्यनन्द्यत ॥२१४॥ उपविष्टं च सञ्जातविश्रम्भं प्रम-दर्शनात्। तत्स्वरूपपरिज्ञानसोत्सुक सा तमब्रवीत् ॥२१५॥ अह विद्याधरी कन्या भद्रा नाम महान्वया। इह कामचरस्वाप्नं त्वामपश्यमहं तदा ॥२१६॥ त्वद्गुणाकृष्टचित्ता च तत्कालमहमेव ताम्। अश्रुत्यवाणीमसृजं पुनरागमनय ते ॥२१७॥ अद्य विद्या प्रयोगाच्च सतोऽद्य प्रेरिता मया। सा से राजसुतेवाऽस्मिन् कार्ये स्मृतिमजीजनत् ॥२१८॥ त्वदर्थं च स्थितास्मीह तत्तुभ्यमिदमर्पितम्। शरीरं सुन्दर ! मया कुरु पाणिग्रहं मम ॥२१९॥ इत्युक्तो भद्रया भव्यो विद्याधर्या विदूषकः। तथेति परिणिन्ये तां गान्धर्वविधिना तदा ॥२२ ॥ अतिष्ठदथ तत्रैव दिव्यं भोगमवाप्य सः। स्वपौरुषफलब्ध्येव प्रियया सङ्गतस्समा ॥२२१॥ अत्रान्तरे प्रबुद्धा सा राजपुत्री निशाक्षये। भर्तारं तमपश्यन्ती विषादं सहसागमत् ॥२२२॥ उत्थाय चान्तिकं मातुः प्रस्खलद्भिः पदैर्ययौ। विह्वला सङ्गमवाष्पातरङ्गितविलोचना ॥२२३॥ स पतिर्मे गतः क्वापि राज्ञीविति च मातरम्। आत्मापराधसम्भ्रान्ता सानुतापा च साब्रवीत् ॥२२४॥
तृतीय लम्बक १३१
तृतीय लम्बक १३१ उसके सो जाने पर रात में वह विदूषक तलवार लेकर स्वस्थतापूर्वक देवी-मन्दिर को गया॥२१०॥ मन्दिर के बाहर पहुँचकर उसने आवाज दी—'हे ! मैं विदूषक आ गया। अन्दर से किसी की आवाज आई कि 'अन्दर आओ' ॥२११॥ उसने अन्दर जाकर दिव्य स्थान देखा। उसके अन्दर दिव्य रूप और दिव्य वस्त्रधारिणी सुन्दरी को देखा। वह अपनी कान्ति से अन्धकार को ऐसे दूर कर रही थी मानों शिव के कोप से जले हुए कामदेव को जिलाने के लिए जलती हुई सजीवनी औषधि हो॥२१२-२१३॥ 'यह क्या देख रहा हूँ'—इस प्रकार आश्चर्यचकित विदूषक का उस प्रसन्न सुन्दरी ने बड़े ही मान-सम्मान के साथ स्वागत किया॥२१४॥ कुछ समय के अनन्तर आश्वस्त होकर बैठे हुए और उस सुन्दरी का परिचय प्राप्त करने के लिए उत्सुक विदूषक को वह सुन्दरी स्वयं कहने लगी—'मैं महान् वंश में उत्पन्न भद्रा नाम की विद्याधरी हूँ अभी अविवाहिता कन्या हूँ। स्वेच्छाचारिणी होने के कारण उस दिन मैं यहाँ आई और तुम्हें देखा। तुम्हारे गुणों से आकृष्ट होकर मैंने ही अदृश्य रूप से तुम्हें पुनः आने के लिए आकाशवाणी की थी। मेरी विद्या से प्रेरित राजकुमारी ने आज तुम्हें मार दिखाई॥२१५-२१८॥ भद्रा से कहे गये विदूषक ने 'ठीक है'—ऐसा स्वीकार करके गन्धर्व-विधान से उसके साथ विवाह कर लिया। और, वही रात-भर ठहरकर, पौरुष-समृद्धि के फलस्वरूप उस प्रिया के साथ दिव्य आनन्द लेने लगा ॥२१९-२२१॥ इसी बीच रात के अन्त में उठी राजकुमारी पति को न देखकर सहसा दुःखी हो गई॥२२२॥ उठकर व्याकुल और आँसुओं से डबडबाते आँखोंवाली कुमारी लड़खड़ाती पैरों से माता के पास गई॥२२३॥ अपने द्वारा किये गये अपराध पर पश्चात्ताप करती हुई राजकुमारी ने माता से कहा कि 'मेरा पति रात में कहीं चला गया ॥२२४॥
११२ कथासरित्सागर
११२ कथासरित्सागर ततस्तन्मातरि स्नेहात् सम्भ्रान्तायां क्रमण तत्। बुद्ध्वा राजापि तन्प्रत्य परमाकुलतामगात् ॥२२५॥ जाने श्मशानबाह्यं तं गतोऽसौ देवतावृहम्। इत्युक्ते राजसुतया राजा तत्र स्वयं ययौ ॥२२६॥ तत्र विद्याधरीविद्याप्रभावेण तिरोहितम्। विचिन्त्यापि न लेभे स स क्षितीशो विदूषकम् ॥२२७॥ ततो राज्ञि परावृत्ते निराशां तां नृपात्मजाम्। देहत्यागोन्मुखीमेत्य ज्ञानी कोऽप्यब्रवीदिदम् ॥२२८॥ नारिष्टशङ्का कर्त्तव्या स हि ते वर्तते पतिः। युक्तो दिव्येन भोगेन त्वामुपैष्यति चाचिरात् ॥२२९॥ तच्छ्रुत्वा राजपुत्री सा धारयामास जीवितम्। हृदि प्रविष्टया बुद्ध्या सत्वत्यागमवाञ्छया ॥२३०॥ विदूषकस्यापि ततस्तिष्ठतस्तत्र तां प्रियाम्। भद्रां योगेश्वरी नाम सखी काचिदुपागमौ ॥२३१॥ उपेत्य सा रहस्यनामिव भद्रामथाब्रवीत्। सखि ! मानुषसंसर्गात् क्रुद्धा विद्याधरास्त्वयि ॥२३२॥ पापं च ते चिकीर्षन्ति तदितो गम्यतां त्वया। अस्ति पूर्वाम्बुधेः पारे पुरं कार्कोटकाभिधम् ॥२३३॥ तदतिक्रम्य च नदी शीतोदा नाम पावनी। तीर्त्वा तामुदयाख्यश्च सिद्धक्षेत्रं महागिरिः ॥२३४॥ विद्याधरैरनाक्रम्यस्तत्र त्वं गच्छ साम्प्रतम्। प्रियस्य मानुषस्यास्य कृते चिन्तां च मा कृथाः ॥२३५॥ एतद्धि सर्वमेतस्य रूपयित्वा गमिष्यसि। येनैष पश्चात्त्वमेव लब्ध्वानागमिष्यति ॥२३६॥ इत्युक्ता सा तया सख्या भद्रा भयवशीकृता। विदूषकानुरक्तापि प्रतिपेदे तथेति तत् ॥२३७॥ उक्त्वा च तस्य सबहुप्रथा दत्त्वा च स्वाङ्गुलीयकम्। विदूषकस्य रात्र्यन्तसमये सा तिरोबभूव ॥२३८॥ विदूषकश्च पूर्वस्मिन् शून्ये देवगृहे स्थितम्। क्षणादपश्यदात्मानं न भद्रां न च मन्दिरम् ॥२३९॥
तृतीय लम्बक ११३
तृतीय लम्बक ११३ पुत्री के स्नेह से माता के व्याकुल हो जाने पर क्रमशः राजा भी उठा और बहुत व्याकुल हो गया॥२२५॥ मालूम होता है कि 'वह (मेरा पति) श्मशान के बाहरवाले देवी-मन्दिर में गया होगा'—राजकुमारी के ऐसा कहने पर राजा आदित्यसेन स्वयं मन्दिर की ओर गया॥२२६॥ वहाँ पर विद्याधरी की विद्या के प्रभाव से तिरोहित विदूषक को राजा ने नहीं देखा॥२२७॥ तब राजा के लौट जाने पर निराश हुई उस राजकन्या से किसी ज्ञानी ने आकर कहा—'तुम किसी प्रकार के अनिष्ट की शंका न करो। वह तुम्हारा पति जीवित है और शीघ्र ही दिव्य भोगों से युक्त तुम्हें मिलेगा'॥२२८-२२९॥ यह सुनकर हृदय में बैठी हुई पति के लौटने की आशा से राजकन्या ने किसी तरह अपने जीवन की रक्षा की॥२३० ॥ इधर जब विदूषक भद्रा नाम की विद्याधरी के साथ दिव्य भोगों का आनन्द ले रहा था इसी बीच भद्रा की योगेश्वरी नामक सखी वहाँ आई॥२३१॥ वह आकर भद्रा से एकान्त में बोली कि हे सखि ! तुमने मनुष्य के साथ सम्पर्क कर लिया है। इसलिए विद्याधर तुमपर बहुत क्रुद्ध हैं और तुम्हारा अहित करना चाहते हैं इसलिए तुम यहाँ से भाग जाओ॥२३२-२३३॥ पूर्व समुद्र के पार कार्कोटक नामक नगर है। उसे पार करके सीतोदा नाम की पवित्र नदी है। उसे पार करके उषयनामक महान् पर्वत है जो सिद्धों का क्षेत्र है॥२३४॥ वह उदय पर्वत विद्याधरों से आक्रान्त नहीं किया जा सकता। वहाँ तुम जाओ और अपने प्यारे इस पुरुष के लिए चिन्ता न करो॥२३५॥ यह सब इस मनुष्य को बता देना तब यह प्राणवान् वीर पुरुष तुम्हारे जाने के अनन्तर वहाँ पहुँच जायगा॥२३६॥ उस सखी के द्वारा डराई गई उस भद्रा ने विदूषक के प्रति अत्यन्त अनुरक्त होने पर भी उसकी बात मान ली॥२३७॥ भद्रा विदूषक को सारी घटना समझाकर और अपनी अंगूठी उसे देकर रात्रि के अन्त में स्वयं अन्तर्धान हो गई॥२३८॥ विदूषक ने रात बीतने पर ने न अपने को, न भद्रा को और न मन्दिर को देखा॥२३९॥
३३४ कथासरित्सागर
३३४ कथासरित्सागर स्मरन्विद्याप्रपञ्चं स पश्यंश्चैवाङ्गुलीयकम्। विषादविस्मयावशवशाः सोऽभूद् विद्रूपकः ॥२४०॥ अचिन्तयच्च तस्याः स वचः स्वप्नमिव स्मरन् । गता ताम्रलिप्तेयैव सा ममोदयपर्वतम् ॥२४१॥ तन्मयाप्याशु तत्रैव गन्तव्यं तदवाप्तये । न चैव लोकदृष्टं मां मुक्त्वा राजा परित्यजेत् ॥२४२॥ तस्माद्युक्तिं करोमीह कार्यं सिद्ध्यति मे यथा। इति सञ्चिन्त्य मतिमान् रूपमन्यत्स शिश्रिये ॥२४३॥ जीर्णवासा रजोलिप्तो भूत्वा देवीगृहात्ततः । निरगाच्च 'हा भद्रे ! हा भद्रे इति स ब्रुवन् ॥२४४॥ सत्वरं च विलोक्यैनं जनास्तत्क्षणवर्तिनः । सोऽयं विद्रूपकः प्राप्त इति कोलाहलं व्यधुः ॥२४५॥ बुद्ध्वा च राजा निर्गत्य स्वयं दृष्ट्वा तथाविधम् । उन्मत्तचेष्टोऽवष्टभ्य स नीतोऽभूत् स्वमन्दिरम् ॥२४६॥ तत्र स्नेहाकुलैर्यद्यदुक्तोऽभूद् भृत्यबान्धवैः । तत्र तत्र स 'हा भद्रे' इति प्रत्युत्तरं ददौ ॥२४७॥ वस्त्रोपदिष्टैरभ्यङ्गैरभ्यक्तोऽपि स तत्क्षणम् । अङ्गमूद्धूलयामास भूरिणा भस्मरेणुना ॥२४८॥ स्नेहेन राजपुत्र्या च स्वहस्ताभ्यामुपाहृतः । माहारस्तेन सहसा पादेनाहत्य विक्षिपे ॥२४९॥ एवं स तस्थौ कतिभिर्द्दिवसैस्तत्र निःस्पृहः । पाटयन्निजबस्त्राणि कृतोन्मादो विद्रूपकः ॥२५०॥ अशक्यप्रतिकारोऽयं तत्किमर्थं कदर्य्यते । त्यजेत् कदाचन प्राणान् ब्रह्महत्या भवेत्ततः ॥२५१॥ स्वच्छन्दचारिणस्त्वस्य कारणं कुशलं भवेत् । इत्यालोच्य स चादित्यसेनो राजा मुमोच तम् ॥२५२॥ ततः स्वच्छन्दचारी सप्रन्यद्युः साङ्गुलीयकः । धीरो भद्रां प्रति स्वरं स प्रतस्थे विद्रूपकः ॥२५३॥ गच्छन्नहःरहः प्राच्यां दिशि प्राप स च क्रमात् । मध्ये मागधशायार्तं नगरं पोण्ड्रवर्धनम् ॥२५४॥
तृतीय लम्बक १३५
तृतीय लम्बक १३५ यह सब विद्याधरी की विद्या का प्रभाव समझकर और अंगूठी को देखता हुआ विदूषक खेद और आश्चर्य के वशीभूत हो गया। उसकी बात को स्वप्न के समान स्मरण करता हुआ विदूषक सोचने लगा कि वह उदय पर्वत का पता बताकर गई है। इसलिए उसे प्राप्त करने के निमित्त मुझे भी वहीं शीघ्र जाना चाहिए ॥२४०-२४१॥ यदि मैं न जाऊँगा और लोग मुझे देखेंगे तो राजा मेरी इस स्थिति को देखकर मुझे छोड़ देगा ॥२४२॥ इसलिए ऐसी युक्ति करता हूँ कि जिससे मेरा काम सिद्ध हो सके—ऐसा सोचकर बुद्धिमान् विदूषक ने अपना रूप बदल लिया। फटे-पुराने कपड़े पहिने शरीर में धूल लपेटे हुए वह देवीमन्दिर से बाहर निकलकर 'हा भद्रे ! हे भद्रे—इस प्रकार रटने लगा ॥२४३-२४४॥ उस समय उसे इस स्थिति में देखकर उस देश के निवासी 'यह तो वही विदूषक है'—ऐसा हुल्लड़ मचाने लगे। राजा आदित्यसेन ने यह समाचार जानकर उसे उस रूप में देख कर पकड़वाकर अपने घर बुलवाया ॥२४५-२४६॥ वहाँ स्नेह-भरे भृत्यों एवं बन्धुओं के विविध प्रश्नों पर केवल 'हा भद्रे' 'हा भद्रे' ही कहता रहा ॥२४७॥ वैद्यों द्वारा बताये गये उबटनों के लगाने पर भी वह पुनः बहुत-सी धूल उठाकर शरीर में लपेट लेता था ॥२४८॥ राजकुमारी द्वारा प्रेमपूर्वक लाई गई भोजन की थाली को वह पैरों से मारकर फेंक देता था ॥२४९॥ इस प्रकार पागलपन का प्रदर्शन करता हुआ अपने कपड़ों को फाड़ता हुआ वह विदूषक लापरवाही से कुछ दिनों तक वहाँ रहा ॥२५०॥ 'इसका रोग असाध्य है, इसे व्यर्थ कष्ट क्यों दिया जाय ? 'यदि कहीं इसने प्राण त्याग दिये तो व्यर्थ की ब्रह्महत्या लगेगी, यह स्वच्छन्दचारी अपने समय से ही आरोग्य होगा'—राजा आदित्यसेन ने ऐसा सोचकर उसे छोड़ दिया ॥२५१ २५२॥ वह स्वच्छन्दचारी पागल विदूषक उँगली में अंगूठी पहने हुए धीरे-धीरे भद्रा की ओर चला (उदय पर्वत) ॥२५३॥ पूर्व दिशा की ओर दिन-रात चलते-चलते उसे मार्ग में पौण्ड्रवर्धन नाम का नगर मिला ॥२५४॥
३३६ कथासरित्सागर
[Header] ३३६ कथासरित्सागर
मातरत्र वसाम्येकां रात्रिमित्यभिधाय सः। ब्राह्मण्यास्तत्र कस्याश्चिद् वृद्धायाः प्राविशद् गृहम् ॥२५५॥ प्रतिपन्नाश्रया सा च कृतातिथ्या क्षणान्तरे। ब्राह्मणी समुपेतैव सान्तर्बाष्पा जगाद तम् ॥२५६॥ तुभ्यमेव मया दत्तं पुत्र ! सर्वमिदं गृहम्। तद् गृहाण यतो नास्ति जीवितं मम साम्प्रतम् ॥२५७॥ कस्मादेवं ब्रवीषीति तेनोक्ता विस्मितेन सा। श्रूयतां कथयाम्येतदित्युक्त्वा पुनरब्रवीत् ॥२५८॥ अस्तीह देवासनाख्ये नगरे पुत्र ! भूपतिः। तस्यैका समुत्पन्ना कन्या भूतलभूषणम् ॥२५९॥ मया दुःखेन लब्धेयमिति तां दुःशलब्धिकाम्। नाम्ना चकार स नृपस्तनाममतिवत्सलः ॥२६०॥ कालेन यौवनारूढामानीताय स्ववेश्मनि। राज्ञे कच्छपनाथाय तां प्रादाच्चाथ भूपतिः ॥२६१॥ स कच्छपेश्वरः स्वस्या वध्वा वासगृहं निशि। प्रविष्ट एव प्रथमं तत्काल पञ्चतां ययौ ॥२६२॥ ततो विमनसा राज्ञा भूयोऽप्येतेन सा सुता। दत्तायस्मै नृपायाभूत्सोऽपि तद्वद् व्यपद्यत ॥२६३॥ तन्भयाच्च तदान्येऽपि नृपा वाञ्छन्ति नैव ताम्। तदा सेनापतिं राजा निजमेवं समादिशत् ॥२६४॥ इतो देशात्स्वयंकैकं क्रमादेकैकतो गृहात्। पुमान् प्रत्यहमानेयो ब्राह्मणः क्षत्रियोऽथवा ॥२६५॥ आनीय च प्रवेश्योऽत्र रात्रौ मत्पुत्रिकागृहे। पश्यामोऽत्र विपद्यन्ते कियन्तोऽत्र कियच्चिरम् ॥२६६॥ उत्तरिष्यति यश्चात्र सोऽस्या भर्त्ता भविष्यति। गतिः शक्या परिच्छेत्तुं महाद्भुतविधुर्विधेः ॥२६७॥ इति सेनापती राज्ञा समादिष्टो दिने दिने। वारक्रमेण गेहेभ्यो नयत्येव नरानिह ॥२६८॥ एवं च तत्र यातानि क्षयं नरशतान्यपि। मम भ्रातृवपुष्याया एकः पुत्रोऽत्र वर्तते ॥२६९॥
तृतीय लम्बक ३३७
तृतीय लम्बक ३३७ 'माता ! एक रात मैं यहाँ निवास करना चाहता हूँ'—ऐसा कहकर वह किसी बूढ़ी के मकान में घुसा ॥२५५॥ आश्रय देना स्वीकार करके तुरन्त ही उसका स्वागत करके दुःख-हृदया ब्राह्मणी उसके समीप आकर बोली—बेटा ! यह सारा घर मैंने तुम्हें ही दे दिया तुम इसे ले लो क्योंकि मेरा जीवन अब समाप्त हो रहा है' ॥२५६-२५७॥ 'तुम ऐसा क्यों कर रही हो?'—विदूषक से इस प्रकार पूछी गई वृद्धा फिर बोली—'सुनो मैं तुम्हें सब सुनाती हूँ' ॥२५८॥ बेटा इस नगर में देवसेन नामक राजा है। उसके एक परम सुन्दरी कन्या उत्पन्न हुई, जो भू-तल का भूषण थी ॥२५९॥ राजा ने 'मैंने इसे बड़े ही दुःख से पाया है'—ऐसा सोच अत्यन्त वात्सल्य-स्नेह-युक्त होकर उसका नाम 'दुःखलब्धिका' रखा ॥२६०॥ कुछ समय व्यतीत होने पर, यौवन को प्राप्त उस कन्या को अपने घर पर आये हुए कच्छप-देश के राजा के लिए दे दिया ॥२६१॥ वह कच्छपराज उसके साथ वास-घर में प्रवेश करते ही तत्क्षण मर गया ॥२६२॥ इस घटना से दुःखी होकर देवसेन ने वह कन्या दूसरे राजा को दी किन्तु वह भी इसी प्रकार मर गया ॥२६३॥ जब इस भय के कारण अन्य किसी राजा ने उस कन्या का वरण स्वीकार नहीं किया तब राजा ने अपने सेनापति को आज्ञा दी कि तुम इसी नगर से प्रतिदिन एक-एक ब्राह्मण या क्षत्रिय पुरुष को लाकर इस कन्या के शयनागार में भेजो। देखते हैं कि कबतक कितने मरते हैं। जो इसमें सफल हो जायगा नहीं मरेगा वही इसका पति होगा। आश्चर्यकारी दैव की गति-विधि जानी नहीं जा सकती ॥२६४-२६७॥ इस प्रकार राजा की आज्ञा से सेनापति प्रतिदिन पारी के क्रम से एक-एक सुन्दर पुरुष को लाता रहा ॥२६८॥ इस प्रकार क्रमशः एक सौ व्यक्ति मारे गये मुझ अभागिन का भी एक ही पुत्र है ॥२६९॥ ४३
३३८ कथासरित्सागरे
३३८ कथासरित्सागरे
तस्य वारोऽद्य सम्प्राप्तस्तत्र गन्तु विपत्तय। तदभावे मया कार्य प्रातरग्निप्रवेशनम् ॥२७०॥ तज्जीवन्ती स्वहस्तेन तुभ्यं गुणवते गृहम्। ददामि सर्वं यन स्यां न पुनर्दुःखभागिनी ॥२७१॥ एवमुक्तवतीं धीरस्तामवोचद् विदूषकः । यद्यवमम्व तर्हि त्व मास्म विह्वलतां कृथा ॥२७२॥ अह सत्राय गच्छामि जीवत्वेकसुतस्तव । किमेत घातमामीति कृपा ते मयि मा च भूत् ॥२७३॥ सिद्धियोगाद्धि नास्त्येव भय सत्र गतस्य मे। एव विदूषकेणोक्ता ब्राह्मणी सा जगाद तम् ॥२७४॥ तर्हि पुण्यंममायातः कोऽपि देवो भवानिह। तत्त्राणान्देहिन् पुत्र ! कुशलं च तथारमनि ॥२७५॥ एव तया सोऽनुमत साय राजसुतागृहम्। सेनापतिनियुक्तेन किङ्करेण सम ययौ ॥२७६॥ तत्रापश्यन्नृपसुतां तां यौवनमवोद्धताम् । मत्तामनुच्चितस्फीतपुण्यमारानतामिव ॥२७७॥ ततो निशार्था शयने राजपुत्र्या तयाधिते । ध्यातोपनतमाग्नय खड्ग बिभ्रत्करेण सः ॥२७८॥ वासवेदमनि तत्रामीज्जाग्रदेव विद्रूपकः । पश्यामि तावत्को हन्ति नरानत्रेति धिस्तमन् ॥२७९॥ प्रसुप्ते च जने क्षिप्रावपावृतकपाटकम्। स द्वारदशादायान्तं घोरं राक्षसमद्रात् ॥२८०॥ स च द्वारिस्थितस्तत्र राक्षसो वासवान्तर । भुजं नरनताकाण्डयमदण्ड म्यवदायन् ॥२८१॥ विदूषकश्च चिच्छेद् धावित्वा सस्य तं क्रुधा। एक खड्गप्रहारेण बाहु सपदि रक्षसः ॥२८२॥ छिन्नबाहु पलाय्याशु जगाम स निशाचरः । भूयोऽनागमनायैव तन्मत्त्वोत्कर्षभीतिनः ॥२८३॥ प्रबुद्ध्वा वीक्ष्य पतिनं रक्तोद्वाहं नृपात्मजा। भीता च जातहर्षा च विस्मिता च बभूव सा ॥२८४॥
तृतीय लम्बक १३९
तृतीय लम्बक १३९ उसकी पारी आज है। आज वह मरने के लिए जायगा। इसके मर जाने पर मैं प्रात काल आग में प्रवेश करके जल मरूँगी॥२७०॥ इसलिए जीवित अवस्था में तुम्हारे ऐसे गुणवान् को आज भर दान देती हूँ जिससे फिर इस प्रकार का कष्ट न भोगना पड़े। ऐसा कहती हुई वृद्धा से धीरे-धीरे विदूषक बोला—अम्मा ! तुम घबराना मत। आज पारी में मैं जाऊँगा तुम्हारा एकलौता बेटा जीवित रहे। इसे क्यों मरवाऊँ—इस प्रकार तुम मुझपर दया भी न करना मेरे पास ऐसे सिद्धियोग हैं जिससे मुझे वहाँ जाकर मरने का भय नहीं है। ब्राह्मण के ऐसा कहने पर बूढ़ी बोली—॥२७१-२७४॥ मालूम होता है कि मेरे पुण्य-प्रभाव से तुम किसी देवता के रूप में आये हो इसलिए मेरे पुत्र को प्राण-दान करो और अपना भी कल्याण करो ॥२७५॥ इस प्रकार वृद्धा की सम्मति प्राप्त करके वह विदूषक सायंकाल सेनापति से नियुक्त किये गये दूत के साथ राजकन्या के यहाँ गया॥२७६॥ वहाँ जाकर उसने यौवन के मद में मदमाती और फूलों के न तोड़ने के कारण भार से झुकी हुई लता के समान राजकन्या को देखा॥२७७॥ तब रात्रि में राजकन्या के सो जाने पर पलंग पर ध्यान से प्राप्त अपनी तलवार को लिये हुए विदूषक जाग रहा था और यह सोच रहा था कि देखता हूँ यहाँ कौन है, जो मनुष्यों को मार देता है॥२७८-२७९॥ सब लोगों के सो जाने पर उसने किवाड़ों को खोलकर दरवाजे से घुसते हुए भीषण राक्षस को देखा ॥२८०॥ उसने द्वार पर खड़े-खड़े ही सैकड़ों पुरुषों के लिए यम-दण्ड के समान भीषण भुजा को घर के अन्दर डाला ॥२८१॥ विदूषक ने दौड़कर क्रोध से उसकी भुजा को एक ही खड्ग-प्रहार से काट डाला॥२८२॥ कटे हुए हाथवाला वह राक्षस मानों उसके उत्कृष्ट बल से डरकर फिर न आने के लिए शीघ्रता से भाग गया ॥२८३॥ राजकन्या ने जागकर उस कटकर गिरे हुए राक्षस के हाथ को देखा और उसे देखकर बड़ी प्रसन्न हुई तथा अचरज से चकित-सी रह गई॥२८४॥
प्रातश्च ददृशे राज्ञा देवसेनेन तत्र सः। स्वसुतान्तःपुरद्वारि स्थितश्छिन्नच्युतो भुजः ॥२८५॥ इतः प्रभृति नेहायं प्रवेष्टव्यो नरैरिति। दत्तो विदूषकेणैव सुवीर्यं परिमार्गकः ॥२८६॥ ततो दिव्यप्रभावाय तस्मै प्रीतः स पार्थिवः। विदूषकाय तनयां तां ददौ विभवोत्तरम् ॥२८७॥ ततस्तया समं तत्र कान्तया स विदूषकः। तस्थौ दिनानि कतिचिद्रूपवत्येव सम्मदः ॥२८८॥ एकस्मिंश्च दिने सुप्तां राजपुत्रीं विहाय ताम्। स ततः प्रययौ रात्रौ तां भद्रां प्रति सत्वरः ॥२८९॥ राजपुत्री च सा प्रातस्तदवेक्षणदुःखिता। आसीदाश्वासिता पित्रा तत्प्रत्यावर्तनाशया ॥२९०॥ सोऽपि गच्छन्नहर्गच्छं क्रमात् प्राप विदूषकः। पूर्वाम्बुधेस्तटस्थां नगरीं ताम्रलिप्तिकाम् ॥२९१॥ तत्र चक्रे स केनापि वणिजा सह सङ्गतिम्। स्कन्ददासाभिधानेन पारमभ्ययियासता ॥२९२॥ तेनैव सह सोऽनल्पतदीयधनसम्भृतम्। यानपात्रं समारुह्य प्रतस्थेऽम्बुधिमर्थिना ॥२९३॥ ततः समुद्रमध्यं तद्यानपात्रमुपागतम्। अकस्मादभवद्रुद्धं व्यासक्तमिव केनचित् ॥२९४॥ उच्छ्रितेऽनिलवेगेन प्रयत्नैर्वा न विचचाल तत्। तदा स वणिगार्त्तः सन् स्कन्ददासोऽब्रवीदिदम् ॥२९५॥ यो मोक्षयति ससद्यमिव प्रवहणं मम। तस्मै निजधनार्धं च स्वसुतां च ददाम्यहम् ॥२९६॥ तच्छ्रुत्वैव जगादेदं धीरचेता विदूषकः। अहमत्रावतीर्यान्तर्विचिनोम्यम्बुधज्जलम् ॥२९७॥ क्षणाच्च मोक्षयाम्येतदद्य प्रवहणं तव। यूयं गाढमवलम्बध्वं बद्ध्वा मां पादरज्जुभिः ॥२९८॥ विमुक्ते च प्रवहणे तत्क्षणं वारिमध्यतः। उद्धर्त्तव्योऽस्मि युष्माभिरवलम्बन-रज्जुभिः ॥२९९॥
तृतीय लम्बक | १४१
तृतीय लम्बक | १४१
प्रातःकाल राजा ने कन्या के शयनागार के द्वार पर पड़े हुए और कटकर गिरे हुए हाथ को देखा ॥२८५॥ राजा ने समझा कि विदूषक ने भय से लेकर यहाँ दूसरों का प्रवेश न हो, ऐसा सोचकर द्वार पर परिघ (अर्गल) के समान भुजा की अर्गला लगा दी है ॥२८६॥ तब अत्यन्त प्रसन्न राजा ने दिव्य प्रभावशाली विदूषक को धन के साथ कन्या प्रदान की। वह विदूषक भी मूर्तिमती सम्पत्ति के समान उस सुन्दरी राजकन्या के साथ कुछ दिनों तक रहा ॥२८७-२८८॥ एक बार मङ्गा से मिलने की शीघ्रता के कारण विदूषक रात में उठकर चल पड़ा ॥२८९॥ दूसरे दिन प्रातःकाल राजकुमारी उसे न देखकर अत्यन्त दुःखी हुई, किन्तु राजा ने उसके पुनः लौटने की आशा दिखाकर उसे धीरज बँधाया ॥२९०॥ वह विदूषक भी दिनरात चलते-चलते पूर्व समुद्र के समीप ताम्रलिप्ति नामक नगरी में पहुँचा ॥२९१॥ उसने वहाँ पर समुद्र-पार जाने की इच्छा रखनेवाले स्कन्ददास नामक व्यापारी वैश्य से मित्रता की ॥२९२॥ और अत्यधिक धन से भरे हुए उसके जहाज पर चढ़कर विदूषक ने समुद्र-मार्ग से यात्रा की ॥२९३॥ क्रमशः जहाज समुद्र के बीच पहुँच गया और किसी वस्तु से फँसकर वहीं अड़ गया ॥२९४॥ नाना से समुद्र की पूजा करने पर भी जब जहाज हिला नहीं, तब अत्यन्त दीनता से बनिये ने कहा कि 'मेरे इस फँसे हुए जहाज का जो छुड़ा देगा, उसे मैं अपनी संपत्ति का आधा हिस्सा और अपनी कन्या दे दूंगा' ॥२९५॥ यह सुनकर धैर्यशाली विदूषक ने कहा कि 'मैं पानी में उतरकर ज्ञात करता हूँ और तुरन्त इस फँसे जहाज को छुड़ाता हूँ' ॥२९६॥ 'तुम लोग मुझे सन और रस्सियों से कसकर बाँधो और ऊपर से पकड़े रहो ॥२९७॥ जब जहाज छूटकर चलने लगे तब तुमलोग उन रस्सियों द्वारा मुझे ऊपर खींच लेना' ॥२९८॥
१४९ कथासरित्सागर
१४९ कथासरित्सागर तथेति तेन वणिजा तद्वचस्त्वभिनन्दित । बबन्धुः कर्णधारास्तं रज्जुबन्धेन कटयो ॥३०॥ तद्बढोऽवततारैव वारिधौ स विदूषकः । न जात्ववसरे प्राप्ते सत्त्ववानवसीदति ॥३१॥ ध्यातोपस्थितमार्गेण खड्गं कृत्वा च तं करे। वीरः प्रवहणस्याधो मध्यवारि विवेश सः ॥३२॥ तत्र चक्रे महाकायं सुप्तं पुरुषमैक्षत। जङ्घायां तस्य बद्धं च यानपात्रं व्यलोकयत् ॥३०३॥ बिच्छेद तां स जङ्घां च तस्य खड्गेन तत्क्षणम्। पचाल स प्रवहणं रोधमुक्तं तदैव तत् ॥३०४॥ तद्दृष्ट्वैव वणिक्पापश्छेदयामास तस्य तत्। विदूषकस्य रज्जूस्तां प्रक्षिप्तार्थस्तलोभतः ॥३०५॥ द्रुतमेव च मुक्तेन द्रुतं प्रवहणेन सः। स्वलोभस्येव महत्पारमम्बुनिधेर्ययौ ॥३६॥ विदूषकोऽपि स च्छिन्नरज्ज्वालम्बोऽम्बुमध्यगः। उन्मज्ज्य तत्तथा दृष्ट्वा धीरः क्षणमचिन्तयत् ॥३०७॥ किमिदं वणिजा तेन कृतं किमबबोध्यते। कृतघ्ना धनलोभान्धा मोपकारेष्वमक्षमाः ॥३८॥ तदेष कालः सुतरामधैकस्यास्य साम्प्रतम्। नहि सत्त्वावसादेन स्वाल्पाप्यापद् विलङ्घ्यते ॥३९॥ इति सञ्चिन्त्य तत्कालं जङ्घां तामारुरोह सः। या सान्तर्जलसुप्तस्य पुरुषस्य न्यकृन्तत ॥३१०॥ तया ततार नावव हस्तन्यस्ताम्बुरम्बुधिम्। दैवमेव हि साहाय्यं कुरुते सत्त्वशालिनाम् ॥३११॥ तं मारुतिमिवाम्भोधिपारं रामा१र्थमागतम्। ससत्त्वमुवाचवमन्तरिक्षात्सरस्वती ॥३१२॥ १ रामार्थ इत्यत्र क्लिष्टम्; मारुतिपक्षे रामस्यार्थः, विदूषक पक्षे च रामा = स्त्री, तस्यानिमित्ति ज्ञेयम् ।
तृतीय लम्बक १४१
यहाँ पृष्ठ का संपूर्ण पाठ (transcription) दिया गया है:
तृतीय लम्बक १४१ उस वैश्य के स्वीकार करने पर जहाज के स्वामियों ने इसे रस्सियों से दोनों ओर से कसकर बाँध दिया ॥१३१॥ इस प्रकार बँधा हुआ विदूषक समुद्र में उतर पड़ा। धीर पुरुष मौका आने पर कभी हिम्मत नहीं हारते ॥१३२॥ ध्यान करते ही उपस्थित होने वाले खड्ग को हाथ में लिये हुए विदूषक जहाज के नीचे पानी में गोता लगाकर गया ॥१३३॥ वहाँ उसने एक विशालकाय सोये हुए पुरुष को देखा जिसकी जाँघों में फँसकर जहाज रुक गया था ॥१३४॥ विदूषक ने तलवार से उसकी विशाल जंघा काट डाली और रुकावट हटने से जहाज चल पड़ा ॥१३५॥ यह देखकर उस दुष्ट (बेईमान) बनिये ने पोतित धन के लोभ से उसके शरीर से बँधी रस्सियों को काट डाला और वह वैश्य अपचरित्र के समान छूटे हुए जहाज से महान् लोभ के समान समुद्र के पार पहुँच गया ॥१३६॥ रस्सियों के कट जाने से समुद्र के बीच निराधार तैरता हुआ धीर विदूषक मन में निस्तब्ध सोचने लगा कि इस पापी बनिये ने यह क्या किया। अथवा क्या कहा जाय ? धन के लोभ में अन्धे मनुष्य उपकार को देखने या समझने में समर्थ नहीं होते ॥१३७॥ दुर्गा ! अब यह समय पछताने का नहीं है तैरने का ताँता देने पर छोटी-सी विपत्ति भी दूर नहीं की जा सकती यह तो भीषण विपत्ति है ॥१३८॥ ऐसा सोचकर वह उस जलेचर का बेड़ा जो उसने अन्दर सोए हुए पुरुष की काट दी थी ॥१३९॥ दोनों हाथों से कटे का भाग लेकर उसी जाँघ के सहारे विदूषक ने समुद्र को पार कर लिया। सच है साहसी का दैव भी सहायता देता है ॥१४०॥ रात के समय समुद्र के पार आए हुए हत्थाण्ड के समान उस धीर विदूषक का अन्धकार वाणी ने कहा—॥१४१॥