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कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५)

महाकवि सोमदेव भट्ट द्वारा

स्रोत: कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1960 (उद्गम)

DevanagariHindipublished876 पृष्ठ

षष्ठ लम्बक ७८७

षष्ठ लम्बक ७८७ उस यक्ष ने जाकर अपनी युक्ति से उन निधानवादी असफल मनोरथ ब्राह्मणों को मार डाला ॥७४॥ यह सब जानकर, कुबेर विरूपाक्ष पर क्रोध करके बोले—'अरे पापी तूने सहसा यह ब्रह्महत्या क्यों करा दी। खजाना खोजनेवाले दरिद्र क्या नहीं करते? उन्हें विघ्न करके और भय आदि दिखाकर दूर किया जाता है, जान से नहीं मारा जाता' ॥७५-७६॥ ऐसा कहकर कुबेर ने उस यक्ष को शाप दिया कि तू इस पाप को करने से मनुष्य-योनि में उत्पन्न होगा ॥७७॥ तदनन्तर वह शापित विरूपाक्ष मनुष्य-योनि में किसी ब्राह्मण के यहाँ उत्पन्न हुआ। तब उस यक्ष विरूपाक्ष की पतिव्रता पत्नी ने कुबेर से प्रार्थना की—'हे स्वामी ! मुझे भी वहीं फेंक दो जहाँ तुमने मेरे पति को फेंका है। मैं उससे वियुक्त होकर जीवित नहीं रह सकती'। उस पतिव्रता की प्रार्थना पर कुबेर ने कहा—॥७८-८०॥ 'तेरा पति जिस ब्राह्मण के घर में उत्पन्न हुआ है, तू उसी ब्राह्मण की दासी के घर में गिरेगी और योनि से उत्पन्न नहीं होगी। वहाँ पर पति के साथ तेरा समागम होगा और तेरी कृपा से वह शाप से मुक्त होकर पुनः मेरे पास आ जायगा' ॥८१-८२॥ इस प्रकार कुबेर के आदेश से वह सती पद्मिनी मानुषी कन्या बनकर उसी ब्राह्मण की दासी के द्वार पर जा गिरी ॥८३॥ दासी ने उस अद्भुत कन्या को अकस्मात् देखा और उसे अपने स्वामी उस ब्राह्मण के पास ले गई ॥८४॥ 'यह कन्या कोई दिव्या स्त्री है और इसीलिए अवश्य अयोनिजा है। मेरी धारणा ऐसा कहती है। तू इसे बिना किसी शंका के ले आ ॥८५॥ यह मेरे पुत्र की पत्नी होने योग्य है। ब्राह्मण अपनी दासी को ऐसा कहकर प्रसन्न हुआ ॥८६॥ क्रमशः वह कन्या और ब्राह्मणकुमार दोनों बड़े हो गये और परस्पर देखने से ही घनिष्ठ प्रेमी बन गये ॥८७॥ तदनन्तर ब्राह्मण ने उन दोनों का विवाह करके उन्हें दम्पती बना दिया। वे दोनों पूर्व जन्म का स्मरण न करते हुए भी ऐसा अनुभव करते थे माना वे परस्पर चिरकालीन वियोग के पश्चात् मिले हों ॥८८॥

७८८ कथासरित्सागर

७८८ कथासरित्सागर अथ कालेन देहान्ते तया सोऽनुगतः पतिः। ससपः क्षतपापः सन्स्वं स्वं प्राप्तवान्पदम् ॥८९॥ इतीहावतरत्येव निरागस्त्वादयोनिजा। भूतले शारदयक्षाख्या दैवनिर्मिता ॥९०॥ मदनमञ्चुकानरवाहनदत्तयोर्बाल्यविलासः कुलं किं नृपते तेऽस्यास्तस्माद् भार्या सुतस्य से। कलिङ्गसेनापुत्रीयं यथोक्तं दैवनिर्मिता ॥९१॥ यौगन्धरायणैनेवमुक्त वत्सेश्वरश्च तत्। देवी वासवदत्ता च तथेति हृदि चक्रतुः ॥९२॥ ततस्तस्मिन्गृहं यात मन्त्रिमुख्ये स भूपतिः। पानादिक्रीडया नित्यं सभार्यस्तद्दिनं सुखी ॥९३॥ ततो दिनेषु गच्छत्सु मोहभ्रष्टस्वस्मृतिः। कलिङ्गसेनातनया सा समं रूपसम्पदा ॥९४॥ क्रमेण ववृधे नाम्ना कृता मदनमञ्चुका। सुता मदनवगम्यत्यतो मात्राऽनेन च ॥९५॥ नूनं सा विधिने रूपं सर्वाम्बरयोषिताम्। अन्यथा ताः पुरस्तस्या विरूपा जज्ञिरे कथम् ॥९६॥ दृष्ट्वा रूपवतीं तां च कौतुकात् स्वयमेव सा। देवी वासवदत्ता तामानायायात्मनोऽन्तिकम् ॥९७॥ तत्र धात्र्या भृशामस्तां वत्सराजो ददर्श ताम्। यौगन्धरायणावाप्तं वत्सेर्दीपशिखामिव ॥९८॥ दृष्ट्वा चादृष्टपूर्वं सतस्या नेत्रामृतं वपुः। रतिरैवायमथैवेदमिति मेने न तत्र कः ॥९९॥ ततश्चानाययामास दत्त्वा वागम्बराद्यथ। मन्दारपुष्पसान्द्रं जगच्चत्राशयः सुतं ॥१००॥ गोत्रं बाल्येऽमृगाम्भानां नीत्वा मन्मथमन्मथम्। तामाप्यप्रभा गौरीमिव दृष्ट्वा रराध प्रभाम् ॥१०१॥ सापि तं बालनयनं पश्यन्ती विस्मयानना। न तृप्तिमापयो बालो वियोगे चामृतविग्रम् ॥१०२॥

षष्ठ लम्बक ७८९

षष्ठ लम्बक ७८९ कुछ समय के अनन्तर उस यक्ष पति के मरने पर यह स्त्री भी सती हो गई और उसी के तप के प्रभाव से वह यक्ष पुनः निष्पाप होकर अपने पूर्व पद को प्राप्त कर सका ॥८९॥ इस प्रकार, निरपराध देवता अयोनिज होकर कारणवश दैवमाया से भूतल में अवतार लेते हैं ॥९०॥ नरवाहनदत्त और मदनमंचुका का बाल्य-विलास हे राजन् ! तेरा और इसका कुल क्या। कलिङ्गसेना की यह देवताओं द्वारा निर्मित पुत्री तेरे पुत्र की पत्नी है। यौगन्धरायण ने ऐसा कहने पर राजा उदयन तथा वासवदत्ता ने इस बात को हृदय में स्थान दिया ॥९१-९२॥ तदनन्तर मुख्यमन्त्री के चले जाने पर राजा उदयन तथा वासवदत्ता ने पान (मद्यपान) आदि मनोविनोदों से उस दिन को सुखपूर्वक व्यतीत किया ॥९३॥ कुछ दिनों के व्यतीत होने पर मोह से अपने पूर्वजन्म की स्मृति को भूली हुई कलिङ्गसेन की कन्या अपनी रूप-सम्पत्ति के साथ बड़ी होने लगी ॥९४॥ मदनवेग नामक विद्याधर की कन्या होने के कारण माता तथा अन्य लोगों ने उसका नाम मदनमंचुका रख दिया ॥९५॥ उस कन्या ने संसार की सभी सुन्दरी कन्याओं के रूप को ले लिया था अन्यथा उसके सामने वे सब विरूप कैसे हो जातीं ? ॥९६॥ उसे अत्यन्त रूपवती सुनकर कौतुक के कारण रानी वासवदत्ता ने एक बार अपने पास बुलवाया। वहाँ पर धात्री (धाई) के मुँह से चिपकी हुई उसे राजा और यौगन्धरायण आदि ने भी कमलदीपक की बत्ती की शिखा (लौ) के समान देखा ॥ ९७-९८॥ उसके अपूर्व रूप और आँखों में अमृत-वर्षा करनेवाले शरीर को देखकर, यह रति ही अवतीर्ण हुई है, ऐसा सभी ने माना ॥९९॥ तब रानी ने संसार के नेत्रों के उत्सव देनेवाले अपने पुत्र नरवाहनदत्त को बुलवाया ॥१००॥ खिले हुए मुख-कमलवाले बालक नरवाहनदत्त ने उस कन्या को इस प्रकार देखा जैसे सरोवर, प्रातःकालीन नवीन सूर्य-रश्मियों को निहारता है ॥१०१॥ वह कन्या मदनमंचुका भी आँखों को आनन्द देनेवाले नरवाहनदत्त को देखती हुई उसी प्रकार अतृप्त रह गई जैसे चकोरी चन्द्रमा को देखते रहने पर भी तृप्त नहीं होती ॥१०२॥

७९ कथासरित्सागर

७९ कथासरित्सागर ततः प्रभृति तौ बालाविप स्मातुं न शेकतुः। दृष्टिपाशैरिवानद्धौ पुष्पभूतावपि क्षणम्॥१०३॥ दिनैर्निश्चित्य सम्बन्धं देवनिर्मितमेव सुः। विवाहविषये बुद्धिं व्यधाद्वत्सेश्वरस्तयोः॥१०४॥ कलिङ्गसेना तच्छ्रुत्वा ननन्द च ददौ च सा। नरवाहनदत्तस्मिञ्जामातृप्रीतितो धृतिम्॥१०५॥ सम्मन्त्र्य मन्त्रिभिः सार्धं तत्तद्दक्षाकारवत् पृथक्। वत्सराजः स्वपुत्रस्य तस्य स्वमिव मन्दिरम्॥१०६॥ नरवाहनदत्तस्य यौवराज्याभिषेकः ततः सम्मृत्य सम्भारानथ राजा स कालवित्। यौवराज्येऽभ्यषिञ्चत्तं दृष्टदृष्टान्यगुणग्रहम्॥१०७॥ पूर्वं तस्यापतन्मूर्ध्नि पित्रोरानन्दबाष्पजम्। ततः श्रौतमहान्त्रपूतं सतीर्थजं पयः॥१०८॥ अभिषेकाम्बुभिस्तस्य धौते वदनपङ्कजे। चित्रं निर्मलतां प्रापुर्मुखानि ककुभामपि॥१०९॥ मङ्गल्यमाल्यपुष्पेषु तस्य क्षिप्तेषु मातृभिः। मुमोष दिव्यमाल्याद्यद्रूपं चौरपि तत्क्षणम्॥११०॥ देवदुन्दुभिनिह्रादिसर्घमेव जजृम्भिरे। आनन्दतूर्येमिथोपप्रतिशब्दा नभस्तले॥१११॥ प्रणनामाभिषिक्तं तं युवराजं न तत्र कः। स्वप्रभावादृते शैनेवोभनाम सदा हि सः॥११२॥ ततो वत्सेश्वरस्तस्य सूनोर्भक्तिसखीन् सतः। स्वमन्त्रिपुत्रानाहूय सचिवत्वे समादिशत्॥११३॥ यौगन्धरायणसुतं मन्त्रित्वे मरुभूतिकम्। सेनापत्ये हरिशिखं न्यव्यसनयं ततः॥११४॥ रुमन्वत्सुतं क्रीडासखीत्वे तु तपन्तकम्। गोमुखं च प्रतीहारपुरायामित्यकारयत्॥११५॥ पीठाङ्गिरये च पूर्वेक्तावुभौ पिङ्गलिकापुत्रौ। सैन्धानरः शान्तिनामः भ्रातृपुत्रो पुरोधसः॥११६॥

षष्ठ लम्बक ७९१

षष्ठ लम्बक ७९१ परस्पर दर्शन के अनन्तर वे दोनों बालक होने पर भी स्थिर न रह सके। यद्यपि वे दोनों अलग-अलग थे किन्तु दृष्टिपाश से बँधे हुए, अतएव एक थे ॥१ ३॥ यह देखकर वत्सराज ने उन दोनों के सम्बन्ध को देवताओं द्वारा निश्चित किया हुआ समझकर विवाह करने की इच्छा की ॥१ ४॥ कलिङ्गसेना यह जानकर प्रसन्न हुई और नरवाहनदत्त को जामाता के प्रेम से देखने लगी ॥१ ५॥ तब वत्सराज ने मन्त्रियों से सम्मति करके अपने पुत्र के लिए अपने ही राजभवन के समान भवन का निर्माण कराया ॥१ ६॥ नरवाहनदत्त का यौवराज्याभिषेक समयज्ञ राजा ने सब सामान एकत्र करके प्रशंसनीय गुणोंवाले कुमार नरवाहनदत्त का यौवराज्य (युवराज) पद पर अभिषेक कर दिया ॥१ ७॥ अभिषेक के समय उस युवराज के शिर पर पहले माता-पिता के आनन्दाश्रु गिरे तदनन्तर वेद-मन्त्रों से पवित्र तीर्थों का जल गिरा ॥१ ८॥ अभिषेक के जल से उसके मुख-कमल के घुल जाने पर, दिशाओं के मुंह भी घुल गये यह आश्चर्य है ! ॥१ ९॥ माताओं द्वारा उसके गले में मङ्गल-मालाएँ पहनाने पर, आकाश ने भी उसी क्षण दिव्य पुष्पों और मालाओं की वर्षा की ॥११ ॥ हर्ष से बजनेवाले देवताओं के वाद्यों की स्पर्धा में मानों आनन्द-वाद्यों के शब्द आकाश में गूँजने लगे ॥१११॥ अभिषेक किए हुए उस युवराज को किसने प्रणाम नहीं किया ? केवल अपने प्रभाव के अतिरिक्त इसी कारण वह ऊँचा उठा ॥११२॥ तब वत्सराज उदयन ने युवराज के बालमित्र अपने मन्त्रियों के पुत्रों को बुलाकर उन्हें युवराज के मन्त्रियों का पद दे दिया ॥११३॥ यौगन्धरायण के पुत्र मरुभूति को मुख्य मंत्री रुमण्वान् के पुत्र हरिशिख को प्रधान सेनापति वसन्तक के पुत्र तपन्तक को विनोद-मन्त्री और इत्यक के पुत्र गोमुख को प्रधान द्वारपाल बना दिया ॥११४ ११५॥ वीर-पिङ्गलिका के पुत्र तथा पुरोहित के भतीजे वैश्वानर तथा शान्तिसोम को युवराज पुरोहित नियुक्त किया ॥११६॥

इत्याज्ञाप्तेषु पुत्रस्य साचिव्ये तेषु भूभृता। गगनादुदभूद् वाणी पुष्पवृष्टिपुरःसरा ॥११७॥ सर्वार्थसाधका एते भविष्यन्त्यस्य मन्त्रिणः। शरीरावयवनिर्भिन्नोऽस्य गोमुखस्तु भविष्यति ॥११८॥ इत्युक्तो दिव्यया वाचा हृष्टो वत्सेश्वरश्च सः। सर्वान्सम्मानयामास वस्त्रैराभरणैश्च तान् ॥११९॥ अनुजीविषु यत्किञ्चन वसु वर्षति राजनि। दरिद्रशब्दस्यैकस्य नासीत्तत्रार्थसङ्गतिः ॥१२०॥ पवनोल्लासिताक्षिप्तपताकापटपङ्क्तिभिः । आहूतेरिव सापूरि नर्तकीचारणैः पुरी ॥१२१॥ आगाद् वैद्याधरी साक्षाल्लक्ष्मीस्तस्यैव भाविनी। कलिङ्गसेना जामातुरुत्सवेऽत्र भविष्यति ॥१२२॥ ततो वासवदत्ता च सा च पद्मावती तथा। हर्षेण ननृतुस्तिस्रो मिलिता इव शक्तयः ॥१२३॥ मारुतान्दोलितलताः प्रनृत्यन्निव सर्वतः। उद्यानतरवोऽप्यत्र चेतनेषु कथैव का ॥१२४॥ ततः कृताभिषेकः सन्नारुह्य जयकुञ्जरम्। नरवाहनदत्तः स युवराजो विनिर्ययौ ॥१२५॥ अवाकीर्यत धोत्क्षिप्तैर्नेत्रैर्ह्रसितारुणैः। पौरस्त्रीभिः स नीलाम्बुजाजपद्माब्जसिप्रमैः ॥१२६॥ दृष्ट्वा च तत्पुरीपूज्यदेवता बन्दिमागधैः। स्तूयमानः ससचिवः स विवेश स्वमन्दिरम् ॥१२७॥ तत्र दिव्यानि भोग्यानि तथा पानान्युपाहरत्। कलिङ्गसेना तस्यादौ स्वविभूत्यधिकानि सा ॥१२८॥ ददौ तस्मै सुवस्त्राणि दिव्यान्‍याभरणानि च। समन्त्रिसचिभृत्याय जामातृस्नेहकातरा ॥१२९॥ एवं महोत्सवेनासावमृतास्वादसुन्दरः। एषां वत्सेश्वरादीनां सर्वेषां वासरो ययौ ॥१३०॥ ततो निशायां प्राप्तायां सुतोद्वाहविधायिनी। कलिङ्गसेना सम्मन्त्र्य तां सा सोमप्रभां सखीम् ॥१३१॥

षष्ठ लम्बक ७९३

षष्ठ लम्बक ७९३ राजा द्वारा इस प्रकार युवराज के मन्त्रियों के नियुक्त किये जाने पर आकाश से पुष्पवृष्टि के साथ दिव्यवाणी हुई कि 'ये सभी मन्त्री इसके अभिन्नहृदय मित्र होंगे किन्तु गोमुख इसके शरीर से भी भिन्न न होगा' ॥११७-११८॥ इस प्रकार दिव्यवाणी से कहा गया वत्सराज अत्यन्त प्रसन्न हुआ और वस्त्र-आभूषण आदि से उसने सबका सम्मान किया ॥११९॥ उस राजा उदयन के सेवकों पर धन की वर्षा करने पर दरिद्र शब्द के केवल अर्थ की ही संगति नहीं रही¹ ॥१२० ॥ वायु द्वारा आन्दोलित अतएव फड़फड़ाती हुई पताकाओं के वस्त्रों की पंक्ति से मानो यह नगरी निमन्त्रित नर्तकियों और चारणों से भर गई थी ॥१२१॥ होनेवाले कलिङ्गसेना के जामाता के इस महोत्सव में मानो विद्याधरों की राजलक्ष्मी स्वयं आ गई ॥१२२॥ तदनन्तर रानी वासवदत्ता पद्मावती तथा कलिङ्गसेना ये तीनों मिलकर सम्मिलित धत्तियों के समान नाचने लगी ॥१२३॥ वायु द्वारा आन्दोलित लताएं चारों ओर नृत्य कर रही थीं और उद्यानों के वृक्ष इस नृत्य में भाग ले रहे थे। चेतन प्राणियों की तो बात ही क्या है ? ॥१२४॥ अभिषिक्त युवराज नरवाहनदत्त जयकुंजर पर चढ़कर बाहर निकला और नागरिक स्त्रियों के नीलकमल रूपी-लावे (धान के खीलों) की अंजुलियों के समान नील श्वेत और लाल नेत्रों से ढक दिया गया ॥१२५ १२६॥ युवराज सवारी से मयर-देवता का दर्शन करता हुआ एवं बन्दियों और सूतों से स्तुति किया जाता हुआ अपने मन्त्रियों के साथ युवराज-भवन में गया ॥१२७॥ वहां पर सबसे पहले कलिङ्गसेना ने अपने वैभव से भी बढ़कर भोजन-पान की दिव्य वस्तुओं से उनका स्वागत किया और जामाता के स्नेह से गद्गद होकर विविध प्रकार के वस्त्र और आभूषण मन्त्रियों-सहित युवराज को दिये ॥१२८ १२९॥ इस प्रकार, अमृतास्वाद के समान सुन्दर महोत्सव का यह दिवस वत्सराज आदि सबने सुख के साथ व्यतीत किया ॥१३० ॥ रात होने पर कन्या के विवाह के लिए विचार-विमर्श करने के लिए कलिङ्गसेना ने अपनी प्राणप्यारी सखी सोमप्रभा का स्मरण किया ॥१३१॥ १ अर्थात् राज्य में कोई दरिद्र न रह गया।—अनु १

७९४ कथासरित्सागर

७९४ कथासरित्सागर एतया स्मृतमात्रा सा मयासुरसुता तदा । भव्यां भर्त्ता महामानी जगाद नलकूबरः ॥१३२॥ कलिङ्गसेना त्वामद्य सोत्सुका स्मरति प्रिये । तद्गच्छ दिव्यमुद्यानं कुरु चैतत्सुताकृते ॥१३३॥ इत्युक्त्वा भावि भूतं च कथयित्वा च तद्गतम् । तत्रैव प्रेषयामास पत्नीं सोमप्रभां पतिः ॥१३४॥ सा चागत्य चिरोत्कण्ठाकृतकण्ठग्रहां सखीम् । कलिङ्गसेनां कुशलं पृष्ट्वा सोमप्रभाब्रवीत् ॥१३५॥ विद्याधरेण तावत्त्वं परिणीता महद्धिना । अवतीर्णा रतिस्ते च सुता शार्वानुग्रहात् ॥१३६॥ कामावतारस्यैषा च वत्सेशात्मसम्भवन् । नरवाहनदत्तस्य पूर्वभार्या विनिर्मिता ॥१३७॥ विद्याधराधिराज्यं स दिव्यं कल्पं करिष्यति । तस्यैषान्यावरोधानां मूर्ध्नि माया भविष्यति ॥१३८॥ त्वं चावतीर्णा भूलोके शक्रशापच्युताप्सराः । निष्पन्नकार्यशेषा च शापमुक्तिमवाप्स्यसि ॥१३९॥ एतन्मे सर्वमाख्यातं भर्त्रा ज्ञानवता सखि । तस्माच्चिन्ता न ते कार्या भावि सर्वं शुभं तव ॥१४०॥ अहं चेह करोम्येषा दिव्यं स्वतनयाकृते । उद्यानं नास्ति पाताले न भूमौ यन्न वा दिवि ॥१४१॥ इत्युक्त्वा दिव्यमुद्यानं सा निर्माय स्वमायया । कलिङ्गसेनामामन्त्र्य सोत्कां सोमप्रभा ययौ ॥१४२॥ ततो निशि प्रभातायामकस्मात्सम्पूर्णं दिवः । भूमाविव च्युतं लोको ददर्शोद्यानमत्र सत् ॥१४३॥ शुश्राव राजा वत्सैशः सभार्यः सचिवैः सह । नरवाहनदत्तश्च सानुगोऽत्र समाययौ ॥१४४॥ ददृशुस्ते तमुद्यानं सदा पुष्पफलद्रुमम् । नानामणिमयस्तम्भभित्तिभूभागवापिकम् ॥१४५॥ सुवर्णवर्णविहगं दिव्यसौरभमारुतम् । देवादेशावतीर्णं वत्स्वर्गास्तरमिव क्षितौ ॥१४६॥

षष्ठ लम्बक ७१५

षष्ठ लम्बक ७१५ कलिङ्गसेना द्वारा स्मरण की गई मयासुर की कन्या सोमप्रभा को उसके महाज्ञानी पति नलकुबर ने कहा—॥१३२॥ 'प्यारी आज कलिङ्गसेना अत्यन्त उत्कण्ठा से तेरा स्मरण कर रही है इसलिए जाओ और उसके लिए दिव्य उद्यान बनाओ' ॥१३३॥ ऐसा कहकर और कलिङ्गसेना के सम्बन्ध में भूत और भविष्य का वर्णन करके सोमप्रभा को उसके पति ने तुरन्त भेज दिया ॥१३४॥ वह सोमप्रभा भी आकर चिर-उत्कंठा से गल मिलती हुई कलिङ्गसेना से कुशल-समाचार पूछने के उपरान्त कहने लगी—॥१३५॥ 'तू अत्यन्त धनी विद्याधर के साथ विवाहित हुई है और शिवजी की कृपा से तेरे यहाँ रति ने अवतार लिया है ॥१३६॥ तेरी यह कन्या वत्सराज के यहाँ उत्पन्न हुए कामदेव के अवतार नरवाहनदत्त की पूर्व जन्म की पत्नी है ॥१३७॥ वह नरवाहनदत्त दिव्य कल्प वर्षों तक विद्याधरों पर राज्य करेगा और तुम्हारी कन्या उसके यहाँ के स्त्री-समाज में सर्वमान्य और सम्राज्ञी बनी रहेगी ॥१३८॥ तू भी इन्द्र के शाप से भूलोक में पतित पूर्व जन्म की अप्सरा है और कुछ शेष कार्यों को समाप्त करके मुक्ति प्राप्त करेगी ॥१३९॥ हे सखि यह सब मेरे ज्ञानी पति ने मुझे बताया है। और मैं तुम्हारी कन्या के लिए एक उद्यान बना देती हूँ। ऐसा उद्यान पाताल पृथ्वी और स्वर्ग में कहीं भी नहीं होगा' ॥१४०-१४१॥ ऐसा कहकर और अपनी माया से दिव्य उद्यान का निर्माण करके उत्कण्ठित कलिङ्गसेना से पूछकर सोमप्रभा चली गई ॥१४२॥ तदनन्तर प्रातःकाल होते ही लोगों ने उस उद्यान को इस प्रकार देखा मानो स्वर्ग का नन्दन-वन अकस्मात् यहाँ उतर पड़ा हो ॥१४३॥ इस समाचार को सुनकर वत्सराज अपनी पत्नियों और मन्त्रियों-सहित वहाँ आया। युवराज नरवाहनदत्त भी अपने साथियों के साथ वहाँ गया ॥१४४॥ राजा ने वहाँ उस उद्यान को देखा जिसमें सदा फल और फूल देनेवाले वृक्ष लगे हुए थे। विविध प्रकार के मणिरत्न-समूहों द्वारा चबूतरा और बावलियों से वह शोभित था। उसमें स्वर्णिम पक्षी विहार कर रहे थे। दिव्य सुगन्धवाली वायु बह रही थी। यह सब देखकर ऐसा प्रतीत होता था कि मानो देवताओं की आज्ञा से पृथ्वी पर दूसरे स्वर्ग का निर्माण किया गया हो ॥१४५-१४६॥

७९६ कथासरित्सागर

७९६ कथासरित्सागर दृष्ट्वा तदद्भुतं राजा किमेतदिति पृष्टवान्। कलिङ्गसेनामातिथ्यमग्र्यं वत्सेश्वरस्तदा ॥१४७॥ सा प्रत्युवाच सर्वेषु शृण्वत्सु नृपतिं च तम्। विश्वकर्मावतारोऽस्ति मयो नाम महासुरः ॥१४८॥ युधिष्ठिरस्य यश्चक्रे पुरं रम्यं च दक्षिण। तस्य सोमप्रभा नाम तनयास्ति सखी मम ॥१४९॥ तया रात्राविहागत्य मत्समीपं स्वमायया। प्रीत्या कृतमिदं दिव्यमुद्यानं मत्सुताकृते ॥१५०॥ इत्युक्त्वा यच्च सख्यास्या मूर्त्तं माभ्युदितं तया। तत्तथैवोक्तमित्युक्त्वा तदा सर्वं शशंस सा ॥१५१॥ ततः कलिङ्गसेनोक्तिं ससंवादामवेक्ष्य_ताम्। निरस्तसंशयाः सर्वे तोषं तत्रातुलं ययुः ॥१५२॥ कलिङ्गसेनातिथ्येन निनाय दिवसं च तत्। उद्यानेनैव वत्सेशो भार्या पुत्रादिभि सह ॥१५३॥ अन्येद्युर्निर्गतो द्रष्टुं देवं देवकुले च सः। ददर्श नृपतिर्बह्वी सुवस्त्राभरणाः स्त्रियः ॥१५४॥ का यूयमिति पृष्टाश्च तेन तास्तं वभाषिरे। वयं विद्याः कलाश्चैतास्त्वत्पुत्रार्थमिहागताः ॥१५५॥ गत्वा विशाम स्तस्तान्तरित्युक्त्वा तास्तिरोऽभवन्। सविस्मयः स राजापि वत्सेशोऽभ्यन्तरं ययौ ॥१५६॥ तत्र वासवदत्तायै देव्यै मन्त्रिगणाय च। तच्छशंसाम्यनन्दंस्ते देवानुग्रह च तम् ॥१५७॥ ततो राजनिवेशनं वीणा वासवदत्तया। नरवाहनदत्तेऽत्र प्रविष्टे जगृहे क्षणात् ॥१५८॥ वादयन्तीं ततस्तां च मातरं विनयेन सः। राजपुत्रोऽब्रवीद् वीणा च्युता स्थानादसाविति ॥१५९॥ त्वं वाद्य गृहाणैतामिति पित्रोदितेऽथ सः। वीणामवादयत् कुर्वन् गन्धर्वानपि विस्मितान् ॥१६०॥ एवं सर्वासु विद्यासु कलासु च परीक्षितः। पित्रा यावद् वृतस्ताभिः स्वयं सर्वं विवेद सः ॥१६१॥

षष्ठ लम्बक ७९७

षष्ठ लम्बक ७९७ उस अद्भुत उद्यान को देखकर वत्सराज ने स्वागतातिथ्य में व्यग्र कलिङ्गसेना से पूछा कि 'यह सब क्या है ? ॥१४७॥ तब कलिङ्गसेना सबके सामने राजा से बोली—'महाराज ! विश्वकर्मा का अवतार मयासुर नाम का एक महान् असुर है, जिसने इन्द्र की आज्ञा से युधिष्ठिर का सुन्दर नगर बनाया था। सोमप्रभा नाम की उसी की कन्या मेरी सखी है। उसने रात में मेरे पास आकर अपनी माया के और अपने ही प्रेम से मेरी कन्या के लिए यह उद्यान बनाया है' ॥१४८-१५०॥ ऐसा कहकर, और भी सहेली ने भूत एवं भविष्य की जो बातें बताई थीं राजा को उसी प्रकार सुना दीं ॥१५१॥ तब सभी ने कलिङ्गसेना की बात को प्रामाणिक मानकर, संशय-रहित होकर परम हर्ष और विश्वास प्रकट किया ॥१५२॥ वत्सराज ने वह समस्त दिन अपनी स्त्री और पुत्र आदि के साथ कलिङ्गसेना के स्वागत में ही व्यतीत किया ॥१५३॥ दूसरे दिन देव-मन्दिर में दर्शन के लिए गये राजा ने सुन्दर और बहुमूल्य वस्त्राभरणों से अलंकृत स्त्रियों को देखा ॥१५४॥ 'तुम सब कौन हो'—राजा के इस प्रकार पूछने पर वे स्त्रियाँ कहने लगीं—'हम सब विद्याएँ और कलाएँ हैं और तुम्हारे पुत्र के लिए यहाँ आई हैं ॥१५५॥ अब जाकर उसी में प्रवेश करती हैं, इतना कहने के उपरान्त वे सब अन्तर्धान हो गईं और आश्चर्यचकित राजा भी मन्दिर के भीतर गया ॥१५६॥ उसने वहाँ जाकर यह वृत्तान्त अपनी रानियों और मन्त्रियों को सुनाया। सब उसे देवता का अनुग्रह समझकर उसका अभिनन्दन करने लगे ॥१५७॥ तदनन्तर राजा की आज्ञा से वासवदत्ता ने भी वीणा उठाई और राजकुमार नरवाहनदत्त ने मन्दिर में प्रवेश किया ॥१५८॥ वीणा बजाती हुई माता से राजकुमार ने नम्रतापूर्वक कहा—'तुम्हारी वीणा स्थान (स्वर-स्थापन की मात्रा) से भ्रष्ट हो रही है ॥१५९॥ तदनन्तर तू इसे ले और बजा' पिता की आज्ञा पाकर वीणा बजाते हुए राजकुमार ने गन्धर्वो को भी विस्मित कर दिया ॥१६०॥ इस प्रकार, सभी विद्याओं और कलाओं में पिता द्वारा परीक्षित राजकुमार ने उत्तीर्णता प्राप्त की। वह स्वयं सब कुछ जान गया था ॥१६१॥

७१८ कथासरित्सागर

७१८ कथासरित्सागर वीक्ष्य तं सगुणं पुत्रं वत्सेशास्तामशिक्षयत् । कलिङ्गसेनातनयां नृत्तं मदनमञ्चुशाम् ॥१६२॥ यथा यथा पूर्णकला साभूत्सुमुरिखन्दवी । नरवाहनदत्ताब्धिवृद्धये स तथा तथा ॥१६३॥ अरस्त तां च गायन्तीं नृत्यन्तीं च विलोकयन् । पठन्तीमिव कामाज्ञामङ्गाभिनयमूर्ताम् ॥१६४॥ सापि क्षणमपश्यन्ती तन्मुखेन्दुं सुधामयम् । क्लान्तासीदुप काले जलाद्रेव कुमुद्वती ॥१६५॥ सवत धासहः स्थातुं तन्मुखालोकनं विना । नरवाहनदत्तोऽसौ तत्तदुद्यानमाययौ ॥१६६॥ तत्र पार्श्वं तयानीय सुतां मदनमञ्चुकाम् । कलिङ्गसेनया प्रीत्या रज्यमानः स तस्थिवान् ॥१६७॥ गोमुखश्चास्य चित्तज्ञः स्वामिनोऽत्र चिरस्थितिम् । इच्छन्कलिङ्गसेनार्थं तां तामकथयत्कथाम् ॥१६८॥ चित्रग्रहेण तेनास्या राजपुत्रस्तुतोष सः । हृदयानुप्रवेशो हि प्रेम्णो सवतनं परम् ॥१६९॥ गुप्तादियोग्यां कृप्ते तस्मिन्मदनमञ्चुकाम् । तत्र स्वयं च संगीतवेश्मन्युद्यानवर्त्तिनि ॥१७०॥ नरवाहनदत्तं स ह्रेपयन्वरचारुमान् । तस्यां प्रियायां नृत्यन्त्यां सर्वास्तोद्यान्यवादयत् ॥१७१॥ जिगाय चागतान् दिग्भ्यो विविधां पण्डितांस्तथा । गजाश्वरथशास्त्रास्त्रचित्रपुस्तादिकोविदः ॥१७२॥ एवं विहरतो विद्यास्वयंवरवृतस्य ते । नरवाहनदत्तस्य शैशवे बासरा ययुः ॥१७३॥ एकदा चान्न यात्रायामुद्यानं स प्रियसखः । ययौ नागवनं नाम राजपुत्रः समंत्रिकः ॥१७४॥ तत्राभिलाषिणी काचिद् वणिग्भार्या निराकृता । इयेष गोमुखं हन्तुं सविषाहृतपानका ॥१७५॥ तद्विवेद च तरसस्या मुखादत्त च गोमुखः । नाददे पानकं तच्च स्त्रियं एवं निनिन्द च ॥१७६॥

षष्ठ लम्बक ७९९

षष्ठ लम्बक ७९९ राजकुमार को सभी विद्याओं और कलाओं में प्रवीण जानकर वत्सराज ने कलिंगसेना की कन्या मदनमंचुका को नृत्त-विद्या (वह नाच जिसमें केवल अंगों का विक्षेप किया जाता है) सिखा दी॥१६२॥ जैसे-जैसे चन्द्रमा के समान शरीरवाली वह मदनमंचुका कलापूर्ण होने लगी वैसे ही वैसे नरवाहनदत्त-रूपी समुद्र क्षुब्ध और उद्वेलित होने लगा॥१६३॥ वह (नरवाहनदत्त) उस (मदनमंचुका) को नाचती और गाती देखकर प्रसन्न होता था क्योंकि वह मदनमंचुका अपने अंग आदि के अभिनय से मानों कामदेव की आज्ञा का पाठ करती थी॥१६४॥ वह मदनमंचुका भी अमृतमय उस सुन्दर पति को न देखकर रोने लगती तो ऐसा प्रतीत होता था जैसे प्रभातकालीन तुषार-बिन्दुओं से परिपूर्ण कुमुद्वती हो ॥१६५॥ उसे देखे बिना बेचैन नरवाहनदत्त निरन्तर और बार-बार उसके उद्यान में घूमता रहता था॥१६६॥ वहाँ पर कलिंगसेना अपनी कन्या मदनमंचुका द्वारा सन्तुष्ट किये जाते हुए नरवाहनदत्त को देखकर अत्यन्त प्रसन्न होती थी॥१६७॥ नरवाहनदत्त के हृदय को जाननेवाला उसका नम्र सचिव गोमुख उस स्थान पर दीर्घकालीन स्थिति की कामना से कलिंगसेना को विविध प्रकार की कथाएं सुनाया करता था॥१६८॥ इस प्रकार उसके हृदय को आकृष्ट करने से वह राजकुमार सन्तुष्ट होता था। सच है स्वामी के हृदय में प्रवेश करना अर्थात् उसके हृदय को समझकर कार्य करना ही स्वामी की सबसे बड़ी सेवा है॥१६९॥ उस उद्यान की रंगशाला में नरवाहनदत्त मदनमंचुका को स्वयं ही समुचित शिक्षा दिया करता था॥१७०॥ नरवाहनदत्त मदनमंचुका के गाने पर सभी प्रकार के वाद्य को स्वयं बजाया करता था जिसको वादक भरत भी देखकर लज्जित होते थे॥१७१॥ उस नरवाहनदत्त ने बाहर के देशों से आनेवाले विविध शास्त्रों और कलाओं के मर्मज्ञ विद्वानों और कलाकारों को प्रतियोगिता में जीत लिया था॥१७२॥ स्वयं ही विधाता द्वारा वरण किये गये नरवाहनदत्त के बाल्यकाल के दिन इसी प्रकार के विनोद में व्यतीत हुए॥१७३॥ एक बार नरवाहनदत्त ने अपनी पत्नी मदनमंचुका के साथ विहार (भ्रमण) करने की इच्छा से मित्रों और मन्त्रियों को साथ लेकर नागवन की यात्रा की॥१७४॥ वहाँ पर किसी बनिये की कामुकी स्त्री को गोमुख ने तिरस्कृत कर दिया था फलतः उस स्त्री ने क्रोध में आकर विष मिला हुआ शर्बत पिलाकर गोमुख को मार डालना चाहा॥१७५॥ गोमुख ने उस स्त्री की सहेली से यह सब जान लिया और उसने डगरा दिया हुआ शर्बत नहीं पिया प्रत्युत स्त्रियों की निन्दा की॥१७६॥

८० कथारित्सागर

८० कथारित्सागर अहो धात्रा पुरः सृष्टं साहसं तदनु स्त्रियः । नैतासां दुष्करं किञ्चिन्निसर्गादिह विद्यते ॥१७७॥ नूनं स्त्री नाम सृष्टेयममृतेन विषेण च । अनुरक्तामृतं सा हि विरक्ता विषमेव च ॥१७८॥ ज्ञायते कान्तवदना केन प्रच्छन्नपातका । कुस्त्री प्रफुल्लकमला गूढनक्रा पद्मिनी ॥१७९॥ दिवः पतति काचित्तु गुणचक्रप्रमोदिनी । भर्तृश्लाघासहा सुस्त्री प्रभा भानोरिवामला ॥१८०॥ हन्त्येवाशु गृहीतान्या पररक्ता गतस्पृहा । पापा विरागविषमूढं भर्तरि भुजगीव सा ॥१८१॥ शत्रुघ्नस्य दुष्टभार्यास्तत्फलप्राप्तश्च कथा यथा हि कुत्रचिद् ग्रामे शत्रुघ्न इति कोऽप्यभूत् । पुरुषस्तस्य भार्या च बभूव व्यभिचारिणी ॥१८२॥ स ददर्श कदा सायं भार्या तां जारसङ्गताम् । जघान तं च तज्जारं खड्गेनान्तर्गृहस्थितम् ॥१८३॥ रात्र्यपेक्षो च तस्थौ स द्वारि भार्या निरुध्य ताम् । तत्कालं च निवासार्थी तमत्र पथिकोऽभ्यगात् ॥१८४॥ दत्त्वा तस्याश्रयं युक्त्या तेनैव सह तं मृतम् । पारदारिकमादाय रात्री तत्राटवीं ययौ ॥१८५॥ तत्रान्धकूपे यावत्स शवं क्षिपति तं तया । तावदागत्य पश्चात्क्षिप्तः सोऽप्यत्र भार्यया ॥१८६॥ एवं कुयोषित्कुरुते किं किं नाम न साहसम् । इति स्त्रीचरितं वाणोप्यनिन्दत्सोऽत्र गोमुखः ॥१८७॥ ततो नागावने तत्र नागानभ्यर्च्य स स्वयम् । नरवाहनदत्तोऽगात् स्वावासं सपरिच्छदः ॥१८८॥ राजनीतिवादः तत्र जिज्ञासुरम्येषु मन्त्रिणान् गोमुखादिकान् । जानन्नपि स पप्रच्छ राजनीति समुच्चयम् ॥१८९॥ १ अत्र समुपवर्णिता राजनीतिः कामन्दकशुक्रमनुचाणक्यवादिमतानुसारिणी प्रतीयते ।

षष्ठ लम्बक ८१

षष्ठ लम्बक ८१ आश्चर्य है कि ब्रह्मा ने पहले साहस को उत्पन्न किया और उसके पश्चात् ही स्त्रियों को। इन स्त्रियों के लिए स्वभावतः कुछ भी कर डालना कठिन नहीं है। स्त्री की सृष्टि अवश्य ही अमृत और विष दोनों से की गई है, यद्यपि वही स्त्री अनुरक्त होने पर अमृत के समान और विरक्त होने पर विष के समान हो जाती है॥१७७-१७८॥ बाहर से देखने में सुन्दर और गुप्त रूप से पाप करनेवाली स्त्री उस बावली के समान है जिसमे जल के ऊपर तो कमल खिले हों और भीतर भीषण मगर तथा हिंसक जन्तुओं से पूर्ण हो॥१७९॥ कोई ही गुणवती और सुभगी सूर्य की निर्मल प्रभा के समान स्वर्ग से आती है, जो पति का गुणगान करनेवाली होती है॥१८०॥ पति के प्रति विरक्त और पर-पुरुषों पर वासक्त एवं वैराग्य-रूपी विष से भरी हुई स्त्री नागिन के समान अपने पति का विनाश कर देती है॥१८१॥ शत्रुघ्न और उसकी दुष्टा स्त्री की कथा इसी प्रकार, किसी गाँव में शत्रुघ्न नाम का एक पुरुष रहता था और उसकी स्त्री व्यभिचारिणी थी॥१८२॥ उसने एक बार सन्ध्या के समय अपनी स्त्री को उसके प्रेमी से मिलते देखा और देखकर उसने घर के भीतर बैठे हुए उस स्त्री के यार को तलवार से मार दिया और रात की प्रतीक्षा में वह अपनी पत्नी को रोककर बैठा रहा। इतने ही में निवास-स्थान का इच्छुक कोई बटोही वहाँ उसके पास आया॥१८३-१८४॥ शत्रुघ्न उस पथिक को स्थान देकर और युक्तिपूर्वक उसे भी मारकर, उस व्यभिचारिणी को लेकर जंगल में चला गया॥१८५॥ जंगल में जाकर जब वह उस शव को एक अँधेरे कुँए में फेंकने लगा इतने ही में पीछे से आती हुई उसकी स्त्री ने उसे भी उसी कुँए में ढकेल दिया॥१८६॥ इस प्रकार दुष्टा स्त्री कौन-सा साहसिक कार्य नहीं कर सकती। गोमुख ने बालक होते हुए भी इस प्रकार स्त्री चरित्र की निन्दा की॥१८७॥ तदनन्तर वह नरवाहनदत्त वहाँ पर नागों की पूजा करके अपने परिवार और साथियों सहित अपने निवास-स्थान पर लौट आया ॥१८८॥ राजनीति का सार एक दिन जिज्ञासु नरवाहनदत्त ने जानते हुए भी अपने मन्त्रियों से राजनीति का सार पूछा॥१८९॥ १. यह नीति-वर्णन कामन्दकनीति शुक्रनीति, मनु और याज्ञवल्क्य आदि ग्रन्थों के अनुसार है। विशेष विवरण संस्कृत-टिप्पणी में देखिए।-अनु. ११

८२ कथासरित्सागर

८२ कथासरित्सागर सर्वस्तत्वं सभाप्येतद् ब्रूमः पृष्टा वयं त्वया। इत्युक्त्वा सारमन्योन्यं ते निश्चित्यैवमब्रुवन् ॥१९०॥ आरुह्य नृपति पूर्वमिन्द्रियाश्वान् वशीकृतान्। कामक्रोधादिकां जित्वा रिपूनाभ्यन्तरांश्च तान् ॥१९१॥ ज्रयेदात्मानमेवादी विजयायान्यविद्विषाम्। अजितात्मा हि विवशो वशी कुर्यात्कथं परम् ॥१९२॥ ततो जानपदत्वादिगुणयुक्तांश्च मन्त्रिणः। पुरोहितं चाध्वंशं कुर्याच्च तपोनन्वितम् ॥१९३॥ उपाधिभिर्भये लोभे धर्मे कामे परीक्षितान्। योग्येष्वमात्यान् कार्येषु युञ्जीतान्तरवित्तमः ॥१९४॥ सत्यं द्वेषप्रयुक्तं वा स्नेहोक्तं स्वार्थसंहतम्। वचस्तेषां परीक्षेत मिथः कार्येषु जल्पताम् ॥१९५॥ सत्ये तुष्येदसत्ये तु यथार्हं दण्डमाचरेत्। जिज्ञासेत पृथक् चैषां चारैराचरितं तथा ॥१९६॥ इत्यनावृतवृक्षस्यन् कार्याण्युत्थाय कण्टकान्। उपार्य्य कोषडण्डादि साधयेद् दृढमूलताम् ॥१९७॥ उत्साहप्रभुतामन्त्रशक्तिन्त्रययुतस्तत १ परदेशजिगीषुः स्याद् विचार्य स्वपरान्तरम् ॥१९८॥ आदौ धूतान्वितं प्राज्ञेमन्त्रं कुर्यादनायतम्। तैनिश्चितं स्वबुद्ध्या यत्सर्वाङ्गं परिशोधयेत् ॥१९९॥ सामदानाद्युपायज्ञो योगक्षेमं प्रसाधयेत्। प्रयुञ्जीत ततः सन्धिविग्रहादीन् गुणांश्च' षट् ॥२ ०० ॥ एवं वितन्द्रो विदधत्स्ववेशपरवेदाभोः। धिन्तां राजा जयत्येव न पुनर्जतु जीयते ॥२०१॥


१ अयं परीक्षाप्रकारः कामन्दके चतुर्थे सर्गे पञ्चत्रिंशत्तमे श्लोके समुल्लिखितः। २ याज्ञवल्क्यस्मृतौ प्रथमाध्याये ३३८ संख्याकः श्लोको द्रष्टव्यः। ३ कामन्दके नवमे सर्गे षोडशधा सन्धिः प्रतिपादितः।

षष्ठ लम्बक ८ ३

षष्ठ लम्बक ८ ३ 'आप तो सब कुछ जानते हैं फिर भी आपके पूछने पर हमलोग कहते हैं'—इस प्रकार रहकर मन्त्रियों ने परस्पर निश्चय करके कहा—॥१९०॥ "युवराज राजा को चाहिए कि वह सबसे पहिले इन्द्रिय-रूपी घोडों पर चढ़कर काम क्रोध लोभ आदि भीतरी शत्रुओं को जीतकर, अन्य बाहरी शत्रुओं को जीतने के पहले इस प्रकार अपनी आत्मा पर ही विजय प्राप्त करे ॥१९१॥ जो आत्मविजय ही नहीं कर पाया वह स्वयं विवश या पराधीन दूसरों पर क्या विजय प्राप्त कर सकेगा ? ॥१९२॥ आन्तरिक शत्रुओं पर विजय प्राप्त करके जनपद रस आदि की उन्नति करनेवाले मन्त्रियों तथा अथर्ववेद को जाननेवाले चतुर एवं तपस्वी पुरोहित की नियुक्ति करे। तदनन्तर राजा को भय में क्रोध में लोभ में और धर्म में उन लोगों की कपट-परीक्षा करके उनके हृदयों को भली भाँति जानकर उन्हें योग्य कार्यों पर नियुक्त करे ॥१९३ १९४॥ इस प्रकार, उनकी बातों की भी परीक्षा करनी चाहिए कि वे आन्तरिक स्नेह से बातें करते हैं या स्वार्थ अथवा कपटपूर्ण होकर। पारस्परिक वार्तालाप से उनकी यह परीक्षा करनी चाहिए। सत्य बात पर प्रसन्न होना और असत्य बात पर दंड देना चाहिए। उनके चरित्रों का पता भी अलग-अलग गुप्तचरों द्वारा लगाना चाहिए। इस प्रकार, आँखें खोले रहकर चौतर्फे राज्य के कार्यों को देखते हुए, विरोधियों को उखाड़कर, कोष और सेना का बल संग्रह करके अपनी जड़ सुदृढ़ कर लेनी चाहिए ॥१९५ १९७॥ तदनन्तर प्रभाव उत्साह और मन्त्र —इन तीनो शक्तियों से युक्त होकर अपने और शत्रु के बलाबल को भली भाँति समझकर दूसरे देशों को जीतने की इच्छा करनी चाहिए ॥१९८॥ अत्यन्त विश्वासी नीति आदि शास्त्रा को जाननेवाले प्रतिभाशाली मन्त्रियों से मन्त्रणा करनी चाहिए। उनके निर्णयों को अपनी बुद्धि द्वारा कार्यान्वित करके राज्य के सभी अंगों को दृढ़ करना चाहिए ॥१९९॥ साम दाम आदि उपायों से योग और क्षेम की साधना करनी चाहिए और सन्धि विग्रह आदि छह् गुणों का प्रयोग करना चाहिए ॥२ ०० ॥ इस प्रकार आलस्य और प्रमाद-रहित होकर जो राजा अपने और पराये देश की चिन्ता करता है, वह सदा विजयी रहता है और किसी से जीता नहीं जा सकता ॥२०१॥

अज्ञस्तु कामलोभान्धो यथा मार्गप्रदर्शिभिः। नीत्वा श्वभ्रेषु निक्षिप्य मुष्यते धूर्तभेटकैः ॥२०२॥ नैवावकाशं लभते राज्ञस्तस्यान्तिके परः। धूर्तेर्निवद्धवाटस्य घालेरिव कृपीवरुः ॥२०३॥ अन्तर्भूय रहस्येषु तैर्वशीक्रियते हि सः। तत्र धीरविशेषज्ञात् बिभ्रा तस्मात् पलायते ॥२०४॥ तस्माज्जितात्मा राजा स्याद्युक्तदण्डो विशेषवित्। प्रजानुरागादेव हि स भवेद् भाजनं श्रियः ॥२०५॥

शूरसेननृपतेः तन्मन्त्रिणाम्च कथा पूर्वं च शूरसेनाख्यो मृत्तकप्रत्ययो नृपः। सचिवैः पेटकं कृत्वा भुज्यते स्म वशीकृतः ॥२०६॥ यस्तस्य सेवको राज्ञस्तस्मै तन्मन्त्रिणोऽत्र ते। दातुं नैच्छंस्तृणमपि दित्सत्यपि च भूपतौ ॥२०७॥ तेषां तु सेवको योऽत्र बभूवस्तस्मै स्वयं च ते। ते च विज्ञप्य राजानमनर्हायाप्यदापयन् ॥२०८॥ तद्दृष्ट्वा स नृपः बुद्ध्या शनैस्तद्धूर्तपेटकम्। अन्योन्यं प्रज्ञया युक्त्या सचिवास्तानभेदयत् ॥२०९॥ भिन्नेषु तेषु नष्टेषु मिथः पैशुन्यकारिषु। सम्यक्शशास राज्यं तत्स राजाऽथैरवञ्चितः ॥२१०॥ हरिसिंहश्च राजामूत्सामान्यो नीतितत्त्ववित्। कृतभक्त्युपसामात्यः सदुर्गः सार्थसञ्चयः ॥२११॥ अनुरक्ताः प्रजाः कृत्वा चेष्टते स्म यथा तथा। चक्रवर्त्यभियुक्तोऽपि न जगाम पराभवम् ॥२१२॥ एष विचार्यचिन्ता च सारं राज्येऽधिकं नु किम्। इत्याद्युक्त्वा यथास्वं ते विरेमुर्गोमुखादयः ॥२१३॥ नरवाहनदत्तश्च तेषां श्रद्धाय तद्वचः। चिन्त्ये पुरुषारम्भेऽप्यचिन्त्यं दैवमभ्यधात् ॥२१४॥


१ आसन्नवृक्षमुर्गुरारभ्य इत्यभिधीयते। —कामन्दके।

मूर्ख सामान्य और लोभी राजा झूठे और अनुचित माप प्रदर्शित करनेवाले धूर्ती और ठगों द्वारा गड्ढे में गिरा-गिराकर भ्रष्ट कर दिया जाता है। इस प्रकार के स्वार्थयों से घिरे हुए मूर्ख राजा के पास बुद्धिमान् और श्रेष्ठ व्यक्ति उसी प्रकार नहीं जा सकते जिस प्रकार निपुण किसान द्वारा लगाई गई बाड़ को पारकर धान के खेत तक नहीं पहुँचा जा सकता ॥२ २-३ ॥।

ऐसा राजा धूर्तों का अन्तरङ्ग बन जाता है और अपना रहस्य प्रकट कर बैठता है। फलतः, वह उनके वश में हो जाता है। और, ऐसे मूर्ख जनभिन्न राजा से खिन्न होकर राज्यलक्ष्मी भाग जाती है ॥२ ४॥

इसलिए राजा को आत्मविजयी, उचित दंड देनेवाला और राजनीति आदि में विशेषज्ञ होना चाहिए। ऐसा होने पर प्रजा के प्रेम से वह राजा लक्ष्मी का निवास-स्थान का पात्र बन पाता है ॥२ ५॥

राजा शूरसेन और उसके मन्त्रियों की कथा

प्राचीन समय में शूरसेन नाम का एक राजा था जो एकमात्र सेवको पर विश्वास किया करता था। वे सेवक एक दल बनाकर राजा को वश में करके उसे चूमा करते थे ॥२ ६॥

जिस योग्य सेवक को राजा कुछ देना भी चाहता था मन्त्रिगण उस एक तिनका भी नहीं देन देते और जो उनके निजी चापलूस नौकर थे उन्हें वे स्वयं भी देत और राजा द्वारा भी दिलाते थे ॥२ ७-८ ॥

यह सब देखकर और उन धूर्तों के दल को समझकर राजा ने अपनी बुद्धि से उनमे परस्पर फूट उत्पन्न करा दी ॥२ ९॥

फूट के कारण उन चुगलखोर सेवकों के पृथक हो जाने पर अन्य अच्छे और सुधी व्यक्तियों से युक्त वह राजा भली भाँति शासन करने लगा ॥२१० ॥

हरिदत्त नाम का एक नीतिज्ञ और साधारण राजा था उसने अपने महल मन्त्री रखे थे। सुदृढ वित्त और बल का संग्रह भी पर्याप्त किया था। वह प्रजा को अपने प्रति अनुरक्त करके जैसा चाहता था वैसा करता था। इसी कारण वह एक चक्रवर्ती राजा के आक्रमण करने पर भी पराजित न हो सका ॥२११ २१२॥

इसलिए विचार और चिन्तन के अतिरिक्त राज्य का सार और क्या हो सकता है? इतना कहकर अपनी-अपनी सम्मति देकर गोमुख आदि मन्त्री चुप हो गये ॥२१३॥

नरवाहनदत्त ने उनके विचारो पर श्रद्धा प्रकट करते हुए कहा— पुरुष का कर्तृव्य चिन्तनीय होने पर भी दैवगति अचिन्तनीय है ॥२१४॥

८६ कथासरित्सागर

८६ कथासरित्सागर ततश्चोत्थाय तत्रैव क्षात्रं तां प्रेक्षितुं ययौ। स विरम्बकृतोत्कण्ठां प्रियां मदनमञ्जुकाम् ॥२१५॥ प्राप्ते तन्मन्दिरे तस्मिन्नामनस्ये कृतादृशः। क्षण स्फुरितनेनाय गोमुख विस्मिताब्रवीत् ॥२१६॥ नरवाहनदत्तंश्च राजसूतामनागते। उत्सुका पदवीमस्य द्रष्टु मदनमञ्जुषा ॥२१७॥ हर्म्याग्रभूमिमारूढा गोमुखानुगता मया। यावत्तावत्पुमानेको नभसोऽत्रावतीर्णवान् ॥२१८॥ स किरीटी च खड्गी च मां दिव्याकृतिरब्रवीत्। अह मानसवेगाख्यो राजा विद्याधरेश्वरः ॥२१९॥ स्वस्त्री सुरभिदत्ताख्या स्व च शापच्युता भुवि। सुता च सव दिव्ययमेतन्न विन्त्रि किम ॥२२०॥ तदहि म सुतामेतां मच्चम्व गच्छतो ह्ययम्। इत्युक्त तन् रहमा विहस्याहं समग्रवम् ॥२२१॥ नरवाहनदत्तोऽस्या भर्त्ता दवनिर्मितः। सर्वेषां यत्र युष्माकं चक्रवर्ती भविष्यति ॥२२२॥ इत्युक्तः स मयात्याज्य ख्याम् विद्याधरो गतः। मन्दुर्नीनयनादेवकाराण्डवितुन्नतोषम ॥२२३॥ गच्छन्त्या गोमगा रात्रौप्रत्नान्नग्गिमस्वामिनोह न । शत्रपुत्रेन्नग्णिासन्नुदुष्यामु भाविनं प्रभुम् ॥२२४॥ पातं विधातुमप्येष्यन्तमद्य विद्याधरा रिताः। उक्त्वाऽतो निधनार्थं च वञ्चयत्विनं प्रभुम् ॥२२५॥ गत्वाच रक्षितं पालाद् गतानाञ्च शम्भना। मार्गावारयिष नातमाप्यमाना श्श मया ॥२२६॥ अद्य विद्याधराः सन्त्र्यवरप्रसाद विशाधिनः। श्श्या कश्चित्त्गनेनात् गधुष्यान्मभियाडवीर्र ॥२२७॥ भाजना सहि नो यावन् मद्धर्म्मसमन्चता। सच्दा गन्तुश श्कि स चास्तु विशाद्यते॥ २२८॥ ल्लान्तारूगवातं गत्वा तां शापशान्ये। उपत्यन्तेव शौण्डिभ्यन् गत्वा प्रदेशामिति ॥ २२९॥