कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५)
महाकवि सोमदेव भट्ट द्वारा
स्रोत: कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1960 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंषष्ठ लम्बक ७८९ कुछ समय के अनन्तर उस यक्ष पति के मरने पर यह स्त्री भी सती हो गई और उसी के तप के प्रभाव से वह यक्ष पुनः निष्पाप होकर अपने पूर्व पद को प्राप्त कर सका ॥८९॥ इस प्रकार, निरपराध देवता अयोनिज होकर कारणवश दैवमाया से भूतल में अवतार लेते हैं ॥९०॥ नरवाहनदत्त और मदनमंचुका का बाल्य-विलास हे राजन् ! तेरा और इसका कुल क्या। कलिङ्गसेना की यह देवताओं द्वारा निर्मित पुत्री तेरे पुत्र की पत्नी है। यौगन्धरायण ने ऐसा कहने पर राजा उदयन तथा वासवदत्ता ने इस बात को हृदय में स्थान दिया ॥९१-९२॥ तदनन्तर मुख्यमन्त्री के चले जाने पर राजा उदयन तथा वासवदत्ता ने पान (मद्यपान) आदि मनोविनोदों से उस दिन को सुखपूर्वक व्यतीत किया ॥९३॥ कुछ दिनों के व्यतीत होने पर मोह से अपने पूर्वजन्म की स्मृति को भूली हुई कलिङ्गसेन की कन्या अपनी रूप-सम्पत्ति के साथ बड़ी होने लगी ॥९४॥ मदनवेग नामक विद्याधर की कन्या होने के कारण माता तथा अन्य लोगों ने उसका नाम मदनमंचुका रख दिया ॥९५॥ उस कन्या ने संसार की सभी सुन्दरी कन्याओं के रूप को ले लिया था अन्यथा उसके सामने वे सब विरूप कैसे हो जातीं ? ॥९६॥ उसे अत्यन्त रूपवती सुनकर कौतुक के कारण रानी वासवदत्ता ने एक बार अपने पास बुलवाया। वहाँ पर धात्री (धाई) के मुँह से चिपकी हुई उसे राजा और यौगन्धरायण आदि ने भी कमलदीपक की बत्ती की शिखा (लौ) के समान देखा ॥ ९७-९८॥ उसके अपूर्व रूप और आँखों में अमृत-वर्षा करनेवाले शरीर को देखकर, यह रति ही अवतीर्ण हुई है, ऐसा सभी ने माना ॥९९॥ तब रानी ने संसार के नेत्रों के उत्सव देनेवाले अपने पुत्र नरवाहनदत्त को बुलवाया ॥१००॥ खिले हुए मुख-कमलवाले बालक नरवाहनदत्त ने उस कन्या को इस प्रकार देखा जैसे सरोवर, प्रातःकालीन नवीन सूर्य-रश्मियों को निहारता है ॥१०१॥ वह कन्या मदनमंचुका भी आँखों को आनन्द देनेवाले नरवाहनदत्त को देखती हुई उसी प्रकार अतृप्त रह गई जैसे चकोरी चन्द्रमा को देखते रहने पर भी तृप्त नहीं होती ॥१०२॥