भारतकोश
कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५)

कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५)

महाकवि सोमदेव भट्ट द्वारा

स्रोत: कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1960 (उद्गम)

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षष्ठ लम्बक ७९९ राजकुमार को सभी विद्याओं और कलाओं में प्रवीण जानकर वत्सराज ने कलिंगसेना की कन्या मदनमंचुका को नृत्त-विद्या (वह नाच जिसमें केवल अंगों का विक्षेप किया जाता है) सिखा दी॥१६२॥ जैसे-जैसे चन्द्रमा के समान शरीरवाली वह मदनमंचुका कलापूर्ण होने लगी वैसे ही वैसे नरवाहनदत्त-रूपी समुद्र क्षुब्ध और उद्वेलित होने लगा॥१६३॥ वह (नरवाहनदत्त) उस (मदनमंचुका) को नाचती और गाती देखकर प्रसन्न होता था क्योंकि वह मदनमंचुका अपने अंग आदि के अभिनय से मानों कामदेव की आज्ञा का पाठ करती थी॥१६४॥ वह मदनमंचुका भी अमृतमय उस सुन्दर पति को न देखकर रोने लगती तो ऐसा प्रतीत होता था जैसे प्रभातकालीन तुषार-बिन्दुओं से परिपूर्ण कुमुद्वती हो ॥१६५॥ उसे देखे बिना बेचैन नरवाहनदत्त निरन्तर और बार-बार उसके उद्यान में घूमता रहता था॥१६६॥ वहाँ पर कलिंगसेना अपनी कन्या मदनमंचुका द्वारा सन्तुष्ट किये जाते हुए नरवाहनदत्त को देखकर अत्यन्त प्रसन्न होती थी॥१६७॥ नरवाहनदत्त के हृदय को जाननेवाला उसका नम्र सचिव गोमुख उस स्थान पर दीर्घकालीन स्थिति की कामना से कलिंगसेना को विविध प्रकार की कथाएं सुनाया करता था॥१६८॥ इस प्रकार उसके हृदय को आकृष्ट करने से वह राजकुमार सन्तुष्ट होता था। सच है स्वामी के हृदय में प्रवेश करना अर्थात् उसके हृदय को समझकर कार्य करना ही स्वामी की सबसे बड़ी सेवा है॥१६९॥ उस उद्यान की रंगशाला में नरवाहनदत्त मदनमंचुका को स्वयं ही समुचित शिक्षा दिया करता था॥१७०॥ नरवाहनदत्त मदनमंचुका के गाने पर सभी प्रकार के वाद्य को स्वयं बजाया करता था जिसको वादक भरत भी देखकर लज्जित होते थे॥१७१॥ उस नरवाहनदत्त ने बाहर के देशों से आनेवाले विविध शास्त्रों और कलाओं के मर्मज्ञ विद्वानों और कलाकारों को प्रतियोगिता में जीत लिया था॥१७२॥ स्वयं ही विधाता द्वारा वरण किये गये नरवाहनदत्त के बाल्यकाल के दिन इसी प्रकार के विनोद में व्यतीत हुए॥१७३॥ एक बार नरवाहनदत्त ने अपनी पत्नी मदनमंचुका के साथ विहार (भ्रमण) करने की इच्छा से मित्रों और मन्त्रियों को साथ लेकर नागवन की यात्रा की॥१७४॥ वहाँ पर किसी बनिये की कामुकी स्त्री को गोमुख ने तिरस्कृत कर दिया था फलतः उस स्त्री ने क्रोध में आकर विष मिला हुआ शर्बत पिलाकर गोमुख को मार डालना चाहा॥१७५॥ गोमुख ने उस स्त्री की सहेली से यह सब जान लिया और उसने डगरा दिया हुआ शर्बत नहीं पिया प्रत्युत स्त्रियों की निन्दा की॥१७६॥