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कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५)

महाकवि सोमदेव भट्ट द्वारा

स्रोत: कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1960 (उद्गम)

DevanagariHindipublished876 पृष्ठ

१८ कथासरित्सागर

१८ कथासरित्सागर तच्छ्रुत्वा तं च दृष्ट्वाग्रे मत्वा योगबलं तत् । युक्त्या वासवदत्तां तां वत्सराजोऽब्रवीदिदम् ॥६१॥ गत्वा सरस्वतीपूजामादायागच्छ दारिके । तच्छ्रुत्वा सा तथेत्युक्त्वा सवयस्या विनिर्ययौ ॥६२॥ यथोचितमुपेत्याथ ददौ वत्सेश्वराय सः । यौगन्धरायणस्तस्मै योगाक्षियङ्मभ्यञ्जनान् ॥६३॥ अस्याम् वासवदत्ताया वीणातन्त्रीनियोजितान् । वशीकरणयोगांश्च राज्ञस्तं स समर्पयत् ॥६४॥ व्यजिज्ञपच्च तं राजन्निहायातो वसन्तकः । द्वारि स्थितोऽप्यरूपेण तं कुरुष्वान्तिके द्विजम् ॥६५॥ यदा वासवदत्तेयं तव विश्रम्भमेष्यति । तदा वक्ष्यामि यदहं तत्कुर्यास्तिष्ठ साम्प्रतम् ॥६६॥ इत्युक्त्वा निर्ययौ शीघ्रं ततो यौगन्धरायणः । अगाद् वासवदत्ता च पूजामादाय तत्क्षणात् ॥६७॥ सोऽथ तामवदद्राजा बहिर्द्वारि द्विजः स्थितः । सरस्वत्यर्चने सोऽस्मिन् दक्षिणार्थे प्रवेश्यताम् ॥६८॥ सथेति द्वारवेद्यास्तं सत्र वासवदत्तया । विरूपामाकृतिं बिभ्रदानाय्यत वसन्तकः ॥६९॥ स चानीतस्तमालोक्य वत्सेशमरुवन्मुचा । ततश्चाप्रतिभेदाय स राजा निजगाद तम् ॥७० ॥ हे ब्रह्मन् ! रोगधैरूप्य सर्वमेतदहं तव । निवारयामि मा रोदीस्तिष्ठहेह ममान्तिके ॥७१॥ महाम्प्रसावो वेवति स धोवाच वसन्तकः । सोऽथ तं विकृतं दृष्ट्वा राजा स्मितमुखोऽभवत् ॥७२॥ तच्चालोक्याशयं बुद्ध्या तस्य सोऽपि वसन्तकः । हसति स्माधिकोद्भूतविरूपाननवैकृतः ॥७३॥ तं हसन्तं तथा दृष्ट्वा क्रीडनीयकसन्निभम् । तत्र वासवदत्तापि जहासा च तुतोष च ॥७४॥ यत सा नर्मणा बाला तं पप्रच्छ वसन्तकम् । किं विप्रान विजानासि भो ब्रह्मन् ! कथ्यतामिति ॥७५॥

द्वितीय लम्बक १८१

द्वितीय लम्बक १८१ सेविकाओं की ऐसी बातें सुनकर और यौगन्धरायण को सामने देखकर राजा ने वासव- दत्ता से कहा—कन्ये तुम जाकर सरस्वती-पूजा का सामान लाओ। फलतः गुरु की आज्ञा से सहेलियों के साथ वासवदत्ता वहाँ से चली गई॥६१-६२॥ अब एकान्त देखकर छद्मवेषी यौगन्धरायण ने युक्तिपूर्वक राजा की बेड़ियाँ काट डालीं और वासवदत्ता तथा उसकी सहेलियों को वश में करने के लिए राजा को वशीकरण की औषधियां भी दे दीं॥६३-६४॥ और राजा से बोला—'हे महाराज ! वसन्तक भी छद्म-वेश धारण करके द्वार पर खड़ा है। उसे अपने पास बुलवाओ॥६५॥ जब वासवदत्ता का तुम पर पूरा विश्वास हो जायगा तब मैं तुम्हे जो कहूँगा वह करना अभी तुम मौन रहो' ॥६६॥ यौगन्धरायण राजा से इस प्रकार कहकर बाहर चला गया और उसी समय वासवदत्ता सरस्वती-पूजन की सामग्री लेकर आई। उसके आने पर राजा ने वासवदत्ता से कहा कि एक ब्राह्मण द्वार पर खड़ा है। उसे पूजा की दक्षिणा देने के लिए बुलवा लो। वासवदत्ता ने राजा की आज्ञा से विकृत रूप धारण किये हुए उस ब्राह्मण को भीतर बुलवा लिया॥६७-६९॥ वसन्तक राजा उदयन के सामने आते ही रोने लगा उदयन भी भेद खुल जाने के भय से उससे कहने लगा ॥७०॥ हे ब्राह्मण रोग के कारण तुममें जो यह कुरूपता आ गई है उसे मैं अभी दूर कर देता हूँ। रोओ मत। मेरे पास रहो ॥७१॥ तब वसन्तक बोला—'देव ! यह आपकी महती कृपा है। राजा भी वसन्तक की विकृत आकृति को देखकर मुस्कराने लगा ॥७२॥ वसन्तक राजा को प्रसन्नता से मुस्कराते हुए अपने रूप को और भी बिगाड़कर हँसने लगा॥७३॥ पिशाच के समान उस वसन्तक को इस प्रकार विकृत रूप में हँसते हुए देखकर वासव- दत्ता भी हँसने लगी और प्रसन्न हुई ॥७४॥ तब वासवदत्ता ने अपने हास्य-विकार के भय से उससे पूछा कि 'हे ब्राह्मण! तुम कौन-सा विशेष ज्ञान रखते हो। बताओ तो सही ॥७५॥

१८२ कथासरित्सागर

१८२ कथासरित्सागर कथां कथयितुं देवि जानामीति स चावदत्। कथां कथय तर्ह्येकामिति सापि ततोऽब्रवीत् ॥७६॥ ततस्तां राजतनयां रञ्जयन् स वसन्तकः। हास्यवचित्रसरसामिमामकथयत्कथाम् ॥७७॥ लोहजङ्घकथा अस्तीह मथुरा नाम पुरी कंसारिजन्मभूः। तस्यां रूपनिकेतासीत् ख्याता वारविलासिनी ॥७८॥ तस्या मकरदंष्ट्राख्या माताभूद् वृद्धकुट्टनी। तद्गुणावृष्यमाणानां यूनां दृष्टि विपच्छटा ॥७९॥ पूजाकाले सुरकुलं स्वनियोगाय जातु सा। गता रूपणिका दूरादेकं पुंष्यमक्षत ॥८०॥ स दृष्टः सुभगस्तस्या विवेश हृदयं तथा। यथा मात्रा कृतास्तेऽस्मादुपदेशा विनिर्ययुः ॥८१॥ चेटिकामथ सावादीद् गच्छ मद्वचनादमुम्। पुंष्यं ब्रूहि मद्गेहं त्वयाद्यागम्यतामिति ॥८२॥ तथेति चेटिका सा च गत्वा तस्मै तदब्रवीत्। ततः स किञ्चिद् विमृशन् पुंष्यस्तामभाषत ॥८३॥ लोहजङ्घाभिधानोऽस्मि ब्राह्मणो नास्ति मे धनम्। तवाढ्यजनगम्यं हि कोऽहं रूपणिकागृहे ॥८४॥ न धनं वाञ्छ्यते त्वत्त स्वामिन्येत्युदिते तया। स लोहजङ्घस्तद्वाक्यं तथेति प्रत्यपद्यत ॥८५॥ ततश्चेटीमुगाद् मुक्त्वा तच्च सा गृहमूत्सुका। गत्वा रूपणिका हस्थौ तन्मार्ग न्यस्तलोचना ॥८६॥ क्षणाच्च लोहजङ्घोऽथ तस्या मन्दिरमाययौ। कुतोऽप्यमिति कुट्टन्या दृष्टो मकरदंष्ट्रया ॥८७॥ प्रापि रूपणिका दृष्ट्वा स्वयमुत्थाय सादरम्। कामवन्मन्तरं हृष्टा कण्ठे लग्ना निनाय तम् ॥८८॥ तत्र सा लोहजङ्घस्य नव्यं सौभाग्यसम्पदा। वणीरता गतौ भाग्यम्यक्त जगद्मयमयत् ॥८९॥

द्वितीय लम्बक १८५

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तब विदूषक वसन्तक बोला- 'मैं अच्छी-अच्छी कहानियाँ कहना जानता हूँ। तब वासवदत्ता ने कहा- 'अच्छा एक अच्छी-सी कहानी सुनाओ तो' ॥७६॥ तब वह वसन्तक राजपुत्री वासवदत्ता का मनोरंजन करता हुआ हास्य के पुट से सरस एवं एक विचित्र कहानी सुनाते हुए कहने लगा ॥७७॥

लोहजंघ की कथा

इस देश में भगवान् कृष्ण की जन्मभूमि मथुरा नाम की एक नगरी है। उसमें रूपनिका नाम की एक वेश्या रहती थी ॥७८॥ उसकी माता मकरदंष्ट्रा नाम की बूढ़ी कुट्टनी थी। वह मानो रूपनिका के रूप और गुणों पर आकृष्ट कामुकों की आँखों के लिए विष के समान थी ॥७९॥ एक बार किसी देवता के पूजन के लिए रूपनिका किसी मन्दिर में गई और उसने दूर से ही किसी एक युवा पुरुष को देखा ॥८०॥ रूपनिका को देखते ही वह युवक उसके हृदय में गड़-सा गया और कुट्टनी माता के सभी उपदेश उसके हृदय से दूर हो गये। उनका स्थान मानो उस पुरुष ने ले लिया। रूपनिका ने अपनी सेविका से कहा- 'तुम उस पुरुष के पास जाकर कहो कि आज वह मेरे घर पर आवे' ॥८१-८२॥ सेविका ने इस प्रकार स्वामिनी का सन्देश उस पुरुष से कह दिया। वेश्या का सन्देश सुनने पर और कुछ सोचकर वह युवक बोला- ॥८३॥ 'मैं लोहजंघ नामक ब्राह्मण हूँ। मेरे पास धन नहीं है। इसलिए धनिकों के जाने योग्य रूपनिका के घर में मेरी क्या योग्यता है' ॥८४॥ सेविका ने कहा- मेरी मालकिन तुमसे धन नहीं चाहती। सेविका का यह उत्तर सुनकर लोहजंघ ने उसके घर जाना स्वीकार कर लिया ॥८५॥ सेविका से यह समाचार सुनकर, उत्सुकतापूर्वक घर आकर उसके आने की राह देखती हुई रूपनिका खिड़की में बैठ गई ॥८६॥ कुछ समय के अनन्तर पूर्वनिश्चयानुसार लोहजंघ उसके घर आ गया और वेश्या की माता मकरदंष्ट्रा कुट्टनी को आश्चर्य हुआ कि यह कहाँ से आया ॥८७॥ रूपनिका भी उसका आगमन देखकर प्रसन्न हुई और उठकर उसका स्वागत करती हुई शयनगृह में ले जाकर आनन्दमग्न हो गई। लोहजंघ के सहवास से उसे ऐसा आनन्द प्राप्त हुआ जिसे पाकर उसने अपना जन्म सफल समझा ॥८८-८९॥

१८४ कथासरित्सागर

१८४ कथासरित्सागर सतस्तया निभृतान्यपुरुषासङ्गया सह। यथासुखं स रात्रैव तस्यौ तन्मन्दिरे युवा ॥९०॥ तद्दृष्ट्वा शिक्षिताशेषवेपयोपिर्जगाद ताम्। माता मकरदंष्ट्रा सा क्षिप्ता रूपणिकां रहः ॥९१॥ किमयं निर्धनं पुत्रि! सभ्यत पुरुषस्त्वया। धनं स्पृहयन्ति सुजना गणिका न तु निर्धनम् ॥९२॥ क्वानुरागः क्व वेश्यात्वमिति तं विस्मृतं कथम्। सन्ध्येव रागिणी वेश्या न स्थिरं पुत्रि! दीप्यते ॥९३॥ मटीव कृत्रिमं प्रेम गणिकार्थाय दर्शयेत्। तदेनं निर्धनं मुञ्च मा कृथा नाशमात्मनः ॥९४॥ इति मातुर्वचः श्रुत्वा रुषा रूपणिकाब्रवीत्। मैवं वादीर्मम ह्येष प्राणेभ्योऽप्यधिकः प्रियः ॥९५॥ धनमस्ति च मे भूरि किमन्येन करोम्यहम्। तदम्ब! मन्न वन्तव्या भूयोऽप्येवमहं त्वया ॥९६॥ सङ्क्रुद्धा मोहजङ्घस्य निर्वासनविधौ कृथा। तस्यौ मकरदंष्ट्रा सा तस्योपायं विचिन्वती ॥९७॥ अथ मार्गगतं कञ्चित्तीक्ष्णकोशं ददर्श सा। राजपुत्रं परिवृतं पुरुष्यैः शस्त्रपाणिभिः ॥९८॥ उपगम्य द्रुतं तं च नीत्वैकान्ते जगाद सा। निर्धनेन ममैकेन कामुकनावृतं गृहम् ॥९९॥ तन्ममागच्छ तन्नाशं तथा च कुरु यन सः। गृहान्मम निवर्तेत मदीयां च सुतां भज ॥१००॥ तथेति राजपुत्रोऽथ प्रविवेश स तद्गृहम्। तस्मिन्क्षणे रूपणिका तस्यौ देवकुले च सा ॥१०१॥ सोऽहञ्कश्च तत्कालं बहिः क्वापि स्थितोऽभवत्। क्षणान्तरे स निशङ्कस्तमेव समुपाययौ ॥१०२॥ तत्क्षणं राजपुत्रस्य तस्य भृत्यः प्रधाव्य सः। पृष्ठं पादप्रहाराद्यैः सर्वेष्वङ्गेष्वताडयत् ॥१०३॥ ततस्तैरेव चामेष्यपूर्वं क्षिप्तः स सातके। मोहजङ्घः कथमपि प्रपलायितवांस्ततः ॥१०४॥

द्वितीय लम्बक १८५

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द्वितीय लम्बक १८५ तदनन्तर अन्य पुरुषों के साथ समागम को छोड़कर एकमात्र उसी के साथ प्रेम करनेवाली रूपणिका के साथ वह भी उसी घर में आनन्दपूर्वक रहने लगा। कन्या की यह रीति देखकर नगर की समस्त वेश्याओं की शिक्षिका मकरदंष्ट्रा न अत्यन्त दुःखी होकर एकबार एकान्त में अपनी कन्या रूपणिका से कहा—'बेटी तुम इस दरिद्र से क्या प्रेम कर रही हो। अच्छे व्यक्ति मुर्दे को भी छू लेते हैं, पर वेश्या निर्धन को भी नहीं छू सकती। कहाँ सच्चा प्रेम और कहाँ वेश्या-वृत्ति क्या तुम वेश्याओं के इस सिद्धान्त को भी भूल गई। बेटी ! स्नेह करनेवाली वेश्या सन्ध्या के समान अधिक देर तक नहीं चमक सकती। वेश्या को तो केवल धन के लिए अभिनेत्री के समान प्रेम दिखलाना चाहिए। इसलिए तुम इस दरिद्र ब्राह्मण को छोड़ो अपना विनाश न करो। माता के उपदेश को सुनकर रूपणिका क्रोध से बोली—'माता ! तुम ऐसा न कहो। यह मुझे प्राणों से भी अधिक प्यारा है धन तो मेरे पास बहुत है अधिक धन लेकर मैं क्या करूँगी। इसलिए हे माता ! तुम फिर मुझे ऐसा कभी न कहना ॥१९०-१९६॥ यह सुनकर रूपणिका की माता मकरदंष्ट्रा मन-ही-मन जल गई और लोहजंघ को घर से निकालने का षड्यन्त्र सोचने लगी ॥१९७॥ कुछ समय के अनन्तर कुट्टनी ने राह म जाते हुए किसी धनहीन राजपुत्र को देखा जो शस्त्र धारी सिपाहियों से घिरा हुआ जा रहा था ॥१९८॥ उसे देखकर कुट्टनी दौड़कर उसके पास आ गई और एकान्त म ले जाकर कहने लगी— 'मेरे घर पर एक दरिद्र कामी व्यक्ति ने अधिकार जमा रखा है इसलिए तुम मेरे घर पर आओ और ऐसा उपाय करो कि वह मेरे घर से निकल जाय। इस काय के पुरस्कार-स्वरूप तुम मेरी पुत्री का उपभोग करो ॥१९९-१ ॥ राजपुत्र ने कुट्टनी की बात स्वीकार कर ली और उसने रूपणिका के गृह में प्रवेश किया उसी समय रूपणिका किसी देवमन्दिर म दर्शन के लिए चली गई थी ॥१ १॥ लोहजंघ भी दैवयोग से उस समय कहीं बाहर गया हुआ था। फलतः लोहजंघ आकर निःशंक भाव से सदा के अनुसार वेश्या के घर म घुसा ॥१ २॥ उसके घर म घुसते ही राजपुत्र के सिपाहियों ने उसे दौड़ाकर लात-घूसों से खूब मारा ॥१ ३॥ मार खाकर मरे हुए लोहजंघ को पकड़कर सिपाहियों ने किसी गंदे गड्ढे (संडास) में फेंक दिया। लोहजंघ फिर उससे किसी प्रकार निकल भागा ॥१ ४॥ २४

१८४ कथासरित्सागर

१८४ कथासरित्सागर अथागता रूपशिखा सबुद्धवा शोकविह्वला। सामूशोदयाय स ययौ राजपुत्रो यथागतम्॥१०५॥ लोहजङ्घोऽपि कुट्टन्या प्रसह्य स खलीकृतः। गन्तु प्रवृत्त तीर्थे प्राणांस्त्यक्तु वियोगवान्॥१०६॥ गच्छन्नटव्यां सन्तप्त कुट्टनीमयुना हृदि। रवेश्च ग्रीष्मतापेन च्छायामभिललाप स॥१०७॥ तरुमप्राप्नुवन्सोऽथ रुभ हस्तिकलेबरम्। अथानेन प्रविश्यान्तर्निर्मास जम्बुक कृतम्॥१०८॥ घर्मविक्षेपे तद्रान्तः परिश्रान्त प्रविश्य सः। लोहजङ्घो ययौ निद्रो प्रविद्यद् वातशीतले॥१०९॥ अथाकस्मात्समुत्थाय क्षणेनैव समन्ततः। मेघः प्रवृवृते तत्र धारासारेण वर्षितुम्॥११०॥ तन निर्विवर प्राप सङ्कोच हस्तिचर्म तत्। क्षणाच्च तेन मार्गेण जलोघो भृशमामयौ॥१११॥ तनापहृत्य गङ्गायामक्षेपि गजचर्म तत्। सज्जलोभेन नीत्वा च समुद्रान्तन्यषीयत॥११२॥ तत्र दृष्ट्वा च तत्तन्म निपत्यामिषशङ्कया। हृत्वार्णवे पारमनयत्पक्षी गरुडवंशजः॥११३॥ तत्र चञ्च्वा विदार्यैतत् गजचम विलोक्य च। अन्तस्थं मानुषं पक्षी पलाय्य स छतो ययौ॥११४॥ ततश्च घर्मेणस्तस्मात्पक्षिसरम्भबोधितः। तच्चञ्चुरचितद्वाराल्लोहजङ्घो विनिर्ययौ॥११५॥ दृष्ट्वा समुद्रपारस्थमात्मानं च सविस्मयः। अनिद्रस्वप्नमिव तत्स समग्रममन्यत॥११६॥ अथ द्वौ राक्षसौ तत्र घोरौ भीतौ ददर्श सः। तौ चापि राक्षसौ दूराच्छङ्कितौ तमपश्यताम्॥११७॥ रामात्परामवं श्रुत्वा त तथैव च मानुषम्। दृष्ट्वा तीर्णाम्बुधि भूयस्तो भय हृदि घत्रतुः॥११८॥ समन्त्र्य च तयोर्मध्यावेको गत्वा तथैव तम्। बिभीषणाय प्रभवे यथावृष्ट न्यवेदयत्॥११९॥ दुष्टरामप्रभावः सख्लोऽपि राजा विभीषणः। मानुषागमनाद् भीतो राक्षसं समभाषत॥१२०॥ गच्छ मद्वचनात् भद्र प्रीत्या च ब्रूहि मानुषम्। मागग्यतां गृहेऽस्माकं प्रसा क्रियतामिति॥१२१॥

द्वितीय लम्बक १८७

द्वितीय लम्बक १८७ इस बीच देव-दर्शन करने आई हुई रूपनिका सारा वृत्तान्त देख-सुन अत्यन्त शोक- सन्तप्त हुई और वह राजपुत्र भी यह सब कांड करके जिधर जा रहा था उधर ही चला गया॥११५॥ कुट्टनी पर बढ़े हुए क्रोध से जलता हुआ लोहजंघ भी किसी तीर्थ में प्राण-त्याग करने की इच्छा से किसी ओर चला गया ॥११६॥ लोहजंघ का हृदय कुट्टनी के इस कुकृत्य से जल रहा था ऊपर से पड़ती हुई गर्मी की कड़ी धूप से उसका शरीर भी जल रहा था। वह कहीं ठंडी छाया की खोज में था उस निर्जन भूमि में कहीं वृक्ष तो नहीं दिखाई पड़ा किन्तु एक हाथी की खाली लाश कहीं पड़ी हुई उसे दिखाई दी जिसे शृगालों ने भीतर से खाकर खोखला कर दिया था और दोनों ओर खुली रहने से हवा के आवागमन से वह ठंडी भी थी। लोहजंघ पैरों की ओर से उसमें घुस गया और शीतल वायु के झोंकों से उसी में पड़े हुए लोहजंघ को नींद आ गई॥११७-११९॥ इसी बीच सहसा आकाश में बादल उमड़ आये और चारों ओर मूसलाधार वर्षा के कारण नदी-सी बह चली और हाथी की लाश सिकुड़ गई ॥१२०॥ कुछ समय में ही पानी के प्रवाह में वह लाश बह चली और सडकते-खिसकते गंगाजी में जा गिरी। वह वहाँ से भी बहकर समुद्र में गिर गई॥१२१॥ समुद्र में डूबती-उतराती हुई उस लाश को मांसपूर्ण समझकर गरुड़वंश का एक पक्षी¹ चोंच से पकड़कर उसे समुद्र के उस पार किसी टापू पर ले गया ॥१२२॥ टापू के किनारे उस पक्षी ने चोंच से उसे फाड़कर देखा तो वह खोखला हाथी का चमड़ा था और उसके भीतर जीवित मनुष्य को देखकर वह पक्षी उसे वहीं छोड़कर उड़ गया॥१२४॥ लोहजंघ भी पक्षी की चोंच से किये हुए छेद के द्वारा बाहर निकलकर चारों ओर देखा और उस घटना को बिना नींद का स्वप्न उसने समझा। इतने में ही उसने समुद्र-तट पर घूमते हुए तथा विस्मय से डरे हुए दो भयानक राक्षसों को देखा ॥१२५-१२६॥ रामचन्द्र द्वारा भरी हुई लंका की दुर्दशा का स्मरण करके फिर से आये हुए एक मनुष्य को देखकर उन्हें भय हुआ। डरे हुए राक्षसों ने लंका में किसी मनुष्य के आने का समाचार वहाँ के राजा विभीषण से जा कहा। विभीषण रामचन्द्र के प्रभाव को देख चुका था। अतः वह भी मनुष्य के आगमन से भयभीत होकर गुप्तचर राक्षस से बोला—'तुम समुद्र के तटपर जाकर मेरी ओर से उस मनुष्य से कहो कि आओ हमारे घर पर पधारने की कृपा करो' ॥१२७-१२९॥ १ अरेबियन नाइट्स में सिदबाद जहाजी की कहानी में तीन फकीर और बगदाद की तवचियों की कथा के प्रसंग में तीसरे फकीर की कहानी, इससे मिलती-जुलती है उसमे इस पक्षी की चर्चा है। —अनु

तथेत्यागत्य तत्स्मै स्वप्रभुप्रार्थनावचः। कथितो लोहजङ्घाय घस्रसं स च राक्षसः ॥१२२॥ सोऽप्यङ्गीकृत्य तद्विप्रो लोहजङ्घः प्रशान्तधीः। तेनैव सद्वितीयेन सह लङ्कां ततोऽगमत् ॥१२३॥ तस्यां च दृष्टसौवर्णतत्तत्प्रासादविस्मितः। प्रविश्य राजभवनं रा ददर्श विभीषणम् ॥१२४॥ सोऽपि पप्रच्छ राजा तं कृतातिथ्यः कृताशिषम्। ब्रह्मन्! कथमिमां भूमिमनुप्राप्तो भवानिति ॥१२५॥ ततः स धूर्तोऽवादीत्तं लोहजङ्घो विभीषणम्। विप्रोऽहं लोहजङ्घाख्यो मथुरायां कृतस्थितिः ॥१२६॥ सोऽहं दारिद्र्यसन्तप्तस्तत्र नारायणायत। निराहारः स्थितोऽकार्षं गत्वा द्वकुलं तपः ॥१२७॥ विभीषणान्तिकं गच्छ मद्‌भक्तः स हि ते धनम्। दास्यतीत्यादिशत् स्वप्ने ततो मां भगवान्हरिः ॥१२८॥ क्वाहं विभीषणः क्वेति मयोक्ते स पुनः प्रभुः। समादिक्षद्ध्रुवाद्यैव तं द्रक्ष्यसि विभीषणम् ॥१२९॥ इत्युक्तः प्रभुना सद्यः प्रबुद्धोऽहमिक्षाम्बुधः। पारेऽञ्चस्थितमारभाममपश्यं तद्विं नापरम् ॥१३०॥ इत्युक्तो लोहजङ्घेन लङ्कामालोक्य दुर्गमाम्। सत्यं दिव्यप्रभावोऽयमिति मेने विभीषणः ॥१३१॥ तिष्ठ दास्यामि ते वित्तमित्युक्त्वा ब्राह्मणं च तम्। मत्वा च रक्षसां हस्ते तमप्रच्छ्य नृघातिनाम् ॥१३२॥ तमस्यारत्नर्भमुत्साख्याद् गिरेः सम्प्रेष्य राक्षसान्। मानाययत्पक्षिपोतं गरुडान्वयसम्भवम् ॥१३३॥ स चास्मै लोहजङ्घाय मथुरायां गमिष्यते। तत्कालमेव प्रददौ वशीकाराय वाहनम् ॥१३४॥ लोहजङ्घोऽपि लङ्कायां वाह्यप्रशिष्टहस्तम्। कञ्चित्काल विशश्राम स विभीषणसत्कृतः ॥१३५॥ एकदा तं च पप्रच्छ राक्षसेन्द्रं सकौतुकः। लङ्कायां काष्ठमप्येषा कथं सर्वैव भूरिति ॥१३६॥

द्वितीय लम्बक १८९

द्वितीय लम्बक १८९ आश्चर्यचकित राक्षस ने जाकर लोहजंघ को अपने स्वामी विभीषण का सन्देश सुनाया ॥१२२॥ लोहजंघ ने शांतचित्त से विभीषण का सन्देश सुना और उसी राक्षस के साथ लंका को गया ॥१२३॥ लंका में जाकर नगरी के सुवर्णमय अनेक विशाल भवनों को देखकर चकित होते हुए लोह- जंघ ने राजमहल में जाकर राजा विभीषण के दर्शन किये ॥१२४॥ लंका के राजा विभीषण ने उसका आतिथ्य-सत्कार किया। उसके द्वारा आशीर्वाद प्राप्त करने पर राजा ने पूछा—हे ब्राह्मण देवता ! आप यहाँ कैसे पधारे? ॥१२५॥ यह सुनकर वह धूर्त ब्राह्मण लोहजंघ विभीषण से बोला—'राजन्, मैं मथुरा का रहने- वाला ब्राह्मण हूँ ॥१२६॥ दरिद्रता से दुःखी होकर मैंने भगवान् नारायण के मन्दिर में निराहार रहकर तपस्या की ॥१२७॥ तपस्या करते हुए मुझे नारायण ने स्वप्न में आज्ञा दी कि तू लंकाधिपति विभीषण के पास जा। वह मेरा भक्त है और तुझे धन देगा ॥१२८॥ जब मैंने उनसे कहा कि 'महाराज कहाँ राजा विभीषण और कहाँ मैं ! मैं उन्हें कैसे प्राप्त कर सकूँगा'? इस पर भगवान् नारायण ने कहा कि तू अभी जा विभीषण को देखेगा ॥१२९॥ भगवान् की इस प्रकार स्वप्न में आज्ञा प्राप्त कर मैं ज्यों ही जगा त्यों ही मैंने अपने को समुद्र के पार तट पर पड़ा हुआ पाया ॥१३०॥ इससे अधिक मैं कुछ नहीं जानता। यह सुनकर और साधारण व्यक्ति का लंका में पहुँचना अति कठिन समझकर विभीषण ने उसे सचमुच दिव्य प्रभाववाला व्यक्ति समझा ॥१३१॥ 'ठहरो मैं तुम्हें धन दूँगा'—ऐसा कहकर विभीषण ने उसे नरघातियों के लिए अवध्य समझकर राक्षसों को सौंप दिया और वह वहाँ ठहरा रहा ॥१३२॥ तब विभीषण ने राक्षसों को सुमेरु पर्वत पर भेजकर गरुड़-वंश के पक्षी को वाहन के रूप में मँगाया ॥१३३॥ उस वाहन को लोहजंघ को देकर कहा कि—'तुम इसे वश में करो। इसी के द्वारा तुम फिर मथुरा जा सकोगे' ॥१३४॥ लोहजंघ कुछ दिनों तक लंका में ही उस पक्षी पर उड़ने का अभ्यास करता रहा और विभीषण के स्वागत-सत्कार का आनन्द लेता रहा ॥१३५॥ एक बार उसने विभीषण से कौतुक के साथ पूछा कि 'महाराज लंका में यह सारी भूमि काष्ठमयी क्यों मालूम होती है' ॥१३६॥

९९ कथासरित्सागर

९९ कथासरित्सागर संस्मृत्य स च तद्वृत्तं समुवाच विभीषणः । यदि ते कौतुकं दृष्टांस्तदिदं शृणु वच्मि ते ॥१३७॥ पुरा प्रतिश्रुतोपार्ता नागानां दासभावतः । निष्क्रष्टुकामो जननीं गरुडः कश्यपात्मजः ॥१३८॥ तन्मूल्यभूतां देवेभ्यः सुधामहर्तुमुद्यतः । बलस्य हेतोर्भक्ष्यार्थी स्वपितुर्निकटं ययौ ॥१३९॥ स चन याचितोऽवादीन्महान्तौ गजकच्छपौ । अब्धौ स्तः पुत्र ! तौ भुङ्क्ष्व गच्छ शापच्युताविति ॥१४०॥ ततः स गरुडो गत्वा नख्यादादाय तावुभौ । महतः कल्पवृक्षस्य शाखायां समुपाविशत् ॥१४१॥ तां च शाखां भरात्सद्यो भग्नां धृष्ट्वा बभार सः । अधःस्थिततपोनिष्ठबालखिल्यानुरोधतः ॥१४२॥ लोकोपमर्दभीतेन ततश्च पितुराज्ञया । आनीय विजने त्यक्ता सा शाखेह गरुत्मता ॥१४३॥ रम्या पृष्ठे कृता सङ्गा तेन काष्ठमयीह भूः । एतद्विभीषणाच्छ्रुत्वा लोहजङ्घस्तुतोष सः ॥१४४॥ ततस्तस्मै महार्घाणि रत्नानि सुबहूनि च । विभीषणो ददाति स्म मथुरां गन्तुमिच्छते ॥१४५॥ भक्त्या च देवस्य हरस्येहपुरारिणः कृते । हस्तेऽस्याम्भोजदामाक्षचक्रान्हेममयान्ददौ ॥१४६॥ तद्गृहीत्वाखिलं तस्मिन्विभीषणसमर्पिते । आरुह्य विहगे लक्षं योजनानां प्रयातति । उत्पत्य व्योममार्गेण लङ्कायास्तीर्णवारिधिः । स लोहजङ्घो मथुरामेकक्षणेनाजगाम ताम् ॥१४८॥ तस्यां शून्ये विहारे च बाह्ये व्योम्नोऽवतीर्य सः । स्थापयामास रत्नौघं स बबन्ध च पक्षिणम् ॥१४९॥ आपणे रत्नमेकं च गत्वा विक्रेतुमांस्ततः । अथ वस्त्राङ्गरागादि क्रीत्वा भोजनं तथा ॥१५०॥ तद्विहारे च तन्नैव भुक्त्वा दत्त्वा च पक्षिणे । वस्त्राङ्गरागपुष्पाद्यैरात्मानं तं समभूषयत् ॥१५१॥

द्वितीय लम्बक १९१

द्वितीय लम्बक १९१ उसका प्रश्न सुनकर विभीषण ने कहा— 'यदि तुम्हें यह जानने की जिज्ञासा है, तो सुनो। मैं तुम्हें इसका रहस्य बताता हूँ' ॥१३७॥ प्राचीन समय में कश्यप के पुत्र गरुड़ ने प्रतिज्ञाबद्ध नागों की दासता में पड़ी हुई अपनी माता विनता को दासता से मुक्त करने की इच्छा से उसका मूल्यस्वरूप अमृत का कलश लाने की इच्छा की और उसके लिए शक्ति प्राप्त करने को वह पिता के पास गया ॥१३८-१३९॥ पिता से प्रार्थना करने पर कश्यप ने उससे कहा कि समुद्र में बड़े-बड़े दो हाथी और कच्छप हैं, उन्हें तुम जाकर खाओ तो शापमुक्त हो जाओगे ॥१४० ॥ गरुड़ समुद्र में जाकर उन दोनों को पकड़ खाने के लिए कल्पवृक्ष की शाखा पर जा बैठा। उसके भार से वह शाखा टूट गई, किन्तु उसके नीचे बालखिल्य मुनि तपस्या कर रहे थे। अतः उनकी रक्षा के लिए गरुड़ ने उस शाखा को अपनी चोंच से रोक रखा। और जनापवाद के भय से गरुड़ ने उस शाखा को यहाँ समुद्र-तट पर लाकर रख दिया ॥१४१-१४३॥ उसी शाखा की पीठ पर यह लंका नगरी निर्मित हुई। इसी कारण यहाँ की भूमि काष्ठ- मयी है। विभीषण से यह कथा सुनकर लोहजंघ सन्तुष्ट हुआ ॥१४४॥ तब विभीषण ने मथुरा जाना चाहते हुए लोहजंघ को बहुत-से बहुमूल्य रत्न मँगाकर दिये और मथुराधिपति भगवान को भेंट देने के लिए सोने के शंख, चक्र, गदा और पद्म बनवाकर भक्ति- पूर्वक उसके द्वारा भेज दिये। विभीषण से प्राप्त समस्त धन को लेकर लोहजंघ एक बार में सौ योजन उड़नेवाले उस गरुड़जातीय पक्षी पर बैठ गया और आकाश में उड़कर समुद्र पार करता हुआ बड़े आराम से मथुरा पहुँच गया ॥१४५-१४८॥ मथुरा पहुँचकर वह नगरी के बाहरी भाग में स्थित किसी बौद्ध विहार में आकाश-मार्ग से उतरा। प्राप्त धन को वही भूमि में गाड़कर उसने वहीं उस पक्षी को भी बाँध दिया ॥१४९॥ विभीषण से प्राप्त रत्नों में से एक को बाज़ार में बेचकर उसने भोजन, कपड़े, इत्र, तैल आदि सजावट के अनेक सामान खरीद लिये। उसने विहार में आकर स्वयं भोजन किया और उस पक्षी को भी भोजन कराया तथा नवीन वस्त्र आदि पहनकर सुन्दर वेश बनाया ॥१५०-१५१॥

१६२ कथासरित्सागर

१६२ कथासरित्सागर प्रदोषे चाययौ तस्यास्तत्प्रवाह्य पक्षिणि। गृहं रूपणिकायास्ताः शङ्खचक्रगदा वहन् ॥१५२॥ तत्रोपरि ततः स्थित्वा स्थानविस्तरशारदः सः। शब्दं चकार गम्भीरं रहस्यां श्रावयन्प्रियाम् ॥१५३॥ तं च श्रुत्वैव निर्याता साऽपश्यद्गरुडराजितम्। एतं नारायणरूपं व्योम्नि रूपणिका निशि ॥१५४॥ अद्य हरिरिहायातस्त्वदर्थमिति तेन सा। उक्ता प्रणम्य वव्रे स्म दयां तव करोत्विति ॥१५५॥ अथावतीर्य सद्यम्य सोऽङ्गसङ्गो विहङ्गमम्। विवेश वासभवनं स तया कान्तया सह ॥१५६॥ तत्र सम्प्राप्तसम्भोगः स निष्क्रम्य क्षणान्तरं। तयैव विहगारूढो जगाम नभसा ततः ॥१५७॥ देवता विष्णुभार्याऽहं मर्त्यैः सह न मन्मय। इति रूपणिका प्रातस्तस्थौ मौनं विधाय सा ॥१५८॥ कस्मादेवंविधा पुत्रि ! वर्तसे कथ्यतां त्वया। इत्यपृच्छत सा मात्रा ततो मकरदंष्ट्रया ॥१५९॥ निर्बन्धपृष्टा तस्य च सा मात्रे मौनकारणम्। शशंस रात्रिबृत्तान्तं वाषमित्कान्तरे स्फुटम् ॥१६०॥ सा तच्छ्रुत्वा ससन्देहा स्वप्नं च कुट्टनी निशि। ददर्श विहगारूढं सोऽनङ्गे ततः क्षणम् ॥१६१॥ प्रभाते च पटान्तःस्थामेत्य रूपणिकां रहः। प्रज्ञा मकरदंष्ट्रा सा कुट्टनीति व्यजिज्ञपत् ॥१६२॥ देवस्यानुग्रहात् पुत्रि ! त्वं देवीत्वमिहागता। महं च तेऽद्य जननी तन्मे देहि सुताफलम् ॥१६३॥ मुदानेनैव देहेन यथा स्वर्गं व्रजाम्यहम्। तथा देवस्य विज्ञप्तिं कुर्व्वप्यनुगृहाण माम् ॥१६४॥ तथेति सा रूपणिका तमेवार्थं व्यजिज्ञपत्। व्याजविष्णुं पुनर्नक्तं सोऽङ्गजङ्गोमुपागतम् ॥१६५॥

द्वितीय लम्बक १९३

द्वितीय लम्बक १९३ सायंकाल होने पर हाथों में शंख-चक्र धारण करके उसी गरुड़ पक्षी पर बैठकर रूपणिका वेश्या के घर की छत पर आकाश से उतरा ॥१५२॥ उसने वेश्या को गुप्त रूप से सुनाते हुए ऊपर से कुछ शब्द किया ॥१५३॥ उसकी वाणी सुनकर बाहर आई रूपणिका ने रत्नों से अलंकृत एवं भगवान् के स्वरूप में लोहजंघ को उस रात्रि में देखा ॥१५४॥ 'मैं भगवान् हरि स्वयं तुम्हारे लिए आया हूँ' लोहजंघ के ऐसा कहने पर वेश्या उसे प्रणाम करके बोली—'महाराज आपकी कृपा है। आप दया करें और यहाँ ठहरें'। लोहजंघ ने पक्षी से उतरकर उसे बाँध दिया और वेश्या के साथ उसके शयनकक्ष में प्रवेश किया ॥१५५ १५६॥ कुछ समय के अनन्तर वेश्या-भवन से निकलकर लोहजंघ पक्षी पर बैठकर पुनः अपने निवास पर आ गया ॥१५७॥ प्रातःकाल होते ही रूपणिका वेश्या ने सोचा कि मैं भगवान् विष्णु की प्रेयसी होने के कारण देवता हो गई। अब तो मनुष्यों के साथ बात करना भी अपमान है। ऐसा सोचकर उसने मौन धारण कर लिया और पर्दे में रहने लगी ॥१५८॥ उसकी माता मकरदंष्ट्रा ने उसकी यह स्थिति देखकर पूछा कि 'आज तुम इस प्रकार मौन क्यों हो रही हो ? मुझे बताओ'। उसके आग्रहपूर्वक और बारम्बार पूछने पर रूपणिका ने पर्दे की ओट से मौन का सारा भेद बता दिया ॥१५९-१६०॥ कुट्टनी को बेटी की बातों पर सन्देह हुआ और उसी रात को उसने स्वयं अपनी आँखों से गरुड़ पर बैठे हुए विष्णुरूपी लोहजंघ को देखा ॥१६१॥ प्रातःकाल ही कुट्टनी ने पर्दे में बैठी हुई रूपणिका को बड़े ही सभ्रमभाव से कहा ॥१६२॥ 'हे बेटी ! भगवान् की कृपा से तू तो देवता बन गई। मैं तेरी माता हूँ। मुझे भी तो लड़की होने का फल दे' ॥१६३॥ 'मैं बूढ़ी इस शरीर से जिस प्रकार स्वर्ग चली जाऊँ, ऐसी कृपा के लिए तुम भगवान् से निवेदन करो'। रात को उसी छद्मरूप में आये हुए लोहजंघ को वेश्या की माता ने प्रार्थना सुना दी ॥१६४-१६५॥ २५

१९४ कथासरित्सागर

१९४ कथासरित्सागर ततः स देववेषस्तां लोहजङ्घोऽब्रवीत्प्रियाम्। पापा ते जननी स्वर्गं व्यक्तं नेतुं न युज्यते ॥१६६॥ एकादश्यां पुनःप्रातर्द्वारमुद्घाट्यते दिवि। तत्र च प्रविशन्त्यग्रे बहवः शाम्भवा गणाः ॥१६७॥ तन्मध्ये कृततद्वेषा स्वमातासौ प्रवेश्यते। तदस्याः पञ्चचूडं त्वं खुरक्लृप्तं शिरः कुरु ॥१६८॥ कण्ठ करङ्कमालाद्यं पार्श्वं चैकं सकज्जलम्। अन्यत्सिन्दूरलिप्तं च कुर्वस्या वीत-वाससः ॥१६९॥ एवं ह्येनां गणाकारां सुखं स्वर्गं नयाम्यहम्। इत्युक्त्वा स क्षण स्मित्वा लोहजङ्घस्ततोऽगमत् ॥१७०॥ प्रातश्च सा रूपणिका यथोक्तं तमकारयत्। वेषं मातुर्ग्यथापि तस्थौ स्वर्गैकसम्मुखी ॥१७१॥ आययौ च पुनस्तत्र लोहजङ्घो निशामुखे। सा च रूपणिका तस्मै मातरं तां समर्पयत् ॥१७२॥ ततः स विहगारूढस्तामादाय कुट्टनीम्। नग्नां विकृतवेषां च जवादुदपतन्नभः ॥१७३॥ गगनस्थश्च तत्रैव प्रांशु देवकुलाग्रतः। स ददर्श शिलास्तम्भचक्रेणोपरि लाञ्छितम् ॥१७४॥ तस्य पृष्ठे स चक्रैकसालम्बे तां न्यवेशयत्। शक्तिकाप्रतीकारपताकामिव कुट्टनीम् ॥१७५॥ इह तिष्ठ क्षण यावत्सांनिध्यानुग्रहं भुवि। गत्वा करोमीत्युक्त्वा च तस्या वृष्टिपथाच्च्युतः ॥१७६॥ ततस्तत्रैव देवाग्रे दृष्ट्वा जागरणागतान्। रात्रौ यात्रोत्सवे लोकान्गगनादेवमब्रवीत् ॥१७७॥ हे लोकाः ! इह युष्माकमुपर्यद्य पतिष्यति। सर्वसंहारिणी मारी तद्वेत शरणं हरिम् ॥१७८॥ श्रुत्वैतां गगनाद् वाणीं भीता सर्वेऽपि तत्र ते। माधुरां दवमाश्रित्य तस्थुः स्वस्त्ययनादृताः ॥१७९॥ सोऽपि व्योम्नोऽवतीर्यैव लोहजङ्घोऽवलोकयन्। तस्याबदृष्टस्तमध्यं देववेषं निधाय तम् ॥१८०॥

द्वितीय लम्बक १९५

द्वितीय लम्बक १९५ तब वह नकली देवता लोहजंघ रूपणिका से बोला—'तुम्हारी माता पापिनी है, उसे स्पष्ट रूप से स्वर्ग नहीं ले जाया जा सकता। हाँ एकादशी के दिन स्वर्ग का द्वार खुलता है। उस द्वार से सबसे पहले शिवजी के भक्तगण उसमें प्रवेश करते हैं। यदि इन शिवगणों में उनका-सा वेष बनाकर तुम्हारी माता की भरती करा दी जाय तो वह स्वर्ग में जा सकती है। इसलिए इसके सिर को छुरे से मुँड़ाकर सिर पर पाँच शिखाएँ या चोटियाँ रखवाओ। और गल में हड्डियों की माला और शरीर का एक भाग काजल से काला तथा दूसरा सिन्दूर से लाल करके और नंगी करके उसे शिवगणों में भरती किया जा सकेगा। यदि वह इस प्रकार शिवगण के रूप में मेरे साथ जावे तो मैं उसे स्वर्ग ले जा सकता हूँ॥१६६—१६९॥ ऐसा कहकर और कुछ ठहरकर लोहजंघ चला गया। पूर्वनिर्णयानुसार एकादशी को प्रातःकाल रूपणिका ने स्वर्ग जाने के लिए उत्सुक माता को गणों का वेश बनाकर तैयार कर दिया। सायंकाल लोहजंघ उसी प्रकार वेश्या के घर आया और रूपणिका ने माता को उसे सौंप दिया॥१७०—१७२॥ लोहजंघ भी अपने नित्यकृत्य से निवृत्त होकर उस विद्रूपवेशा कुट्टनी को अपने साथ गरुड़ पर बैठाकर आकाश में उड़ गया। आकाश में उड़ते हुए उसने एक देव-मन्दिर के सामने गड़े हुए चक्र-चिह्नित पत्थर के स्तम्भ को देखा। उसी स्तम्भ में लगे हुए चक्र के सहारे अपना अपमान करनेवाली ध्वजा के समान उस कुट्टनी को उसने खड़ा कर दिया॥१७३—१७५॥ तब कुट्टनी से उसने कहा कि 'तुम कुछ देर के लिए यहाँ ठहरो। मैं तुम्हें गणों में भरती कराने का प्रबन्ध करता हूँ। ऐसा कहकर लोहजंघ उसकी आँखों से ओझल हो गया॥१७६॥ कुछ आगे जाकर उसने एक मन्दिर के समीप रात्रि-जागरण के लिए एकत्र हुए नागरिकों का मेला देखा। उसे देखकर वह आकाश से ही चिल्लाकर बोला—'हे नागरिक लोगो आज तुम्हारे ऊपर सर्वसंहारकारिणी महामारी गिरेगी। इसलिए भगवान् का भजन करो उन्ही की शरण में जाओ'॥१७७-१७८॥ इस प्रकार आकाशवाणी सुनकर डरे हुए सभी मथुरावासी स्वस्ति पाठ करते हुए भगवान् के समीप जा बैठे॥१७९॥ वह लोहजंघ भी विहार से उतरकर पक्षी को बाँधकर और देवता का नकली वेश उतारकर साधारण नागरिक के वेश में उसी जन-समाज में चुपचाप आकर मिल गया॥१८०॥

१९६ कथासरित्सागर

१९६ कथासरित्सागर अद्यापि नागतो देवो न च स्वर्गमहं गता। इति च स्तम्भपृष्ठस्था कुट्टन्येवमचिन्तयत् ॥१८१॥ अक्षमेषोपरि स्थातुं श्रावयन्ती जनांश्च । हा हाऽहं पतिष्यामीति सा चक्रन्द च बिभ्यती ॥१८२॥ तच्छ्रुत्वा पतिता सेयं मारीत्याशङ्क्य व्याकुला। देवि मा मा पतत्यूचुस्ते देवाग्रगता जनाः ॥१८३॥ ततश्छबालवृद्धास्ते माथुरास्तां विभावरीम्। मारीपातभयोद्भ्रान्ताः कथमप्यत्यवाहयन् ॥१८४॥ प्रातश्च दृष्ट्वा स्तम्भस्थां कुट्टनीं तां तथाविधाम्। प्रत्यभिज्ञातवान्सर्वं पौरलोकः सराजकः ॥१८५॥ अतिक्रान्तभये तत्र जातहासोऽखिले जने। आययौ श्रुतवृत्तान्ता तत्र रूपणिकाथ सा ॥१८६॥ सा च दृष्ट्वा सवैरक्ष्या स्तम्भाग्राज्जननीं निजाम्। तामवातारयत् सद्यस्तत्रस्थैश्च जनैः सह ॥१८७॥ सद्यः सा कुट्टनी तत्र सर्वैस्तैः सकुतूहलैः। अपृच्छ्यत यथावृत्तं सापि तेभ्यः शशंस तत् ॥१८८॥ ततः सिद्धाद्विचरितं तन्मत्वादद्भुतकारकम्। सराजविप्रवणिजो जनास्ते वाक्यमब्रुवन् ॥१८९॥ यनेयं विप्रलब्धा हि वञ्चितानेककामुका। प्रकटः सोऽस्तु तस्येह पट्टबन्धो विधीयते ॥१९०॥ मन्त्रित्वा सोहजङ्घः स समात्मानमदर्शयत्। पृष्टश्चामुक्तं सर्वं वृत्तान्तं तमवर्णयत् ॥१९१॥ ददौ च तस्मै नृपाय शङ्खछत्राद्युपायनम्। विभीषणेन प्रहितं जनविस्मयकारकम् ॥१९२॥ अथ तस्य सपदि पट्टं बद्ध्वा सम्पूज्य माथुराः सर्वे। ख्यापितां रूपणिकां राजादेशेन तां वधूम् ॥१९३॥ ततश्च तत्र प्रियया मम तदा समृद्धरोषो बहुरम्यसङ्कथम् । स लोहजङ्घः प्रतिशूरय कुट्टनीनिवारमभ्युं न्यवगद्यथासुखम् ॥१९४॥

द्वितीय लम्बक १९७

द्वितीय लम्बक १९७ उधर चक्र के सहारे खम्भे पर चढ़ी कुट्टनी खड़े-खड़े थककर सोचने लगी कि अभी तक न तो भगवान् ही आये और न मैं ही स्वर्ग गई। ऐसा सोचकर त्रस्त कुट्टनी चिल्लाने लगी और गिरने के भय से कहने लगी—'मैं गिरती हूँ। उसका रोना-पीटना सुनकर देव-मन्दिर में एकत्र मथुरा के निवासी उस ही साक्षात् महामारी समझकर व्याकुल हो गये और कहने लगे कि 'मत गिरो मत गिरो। ॥१८६१—१८६४॥ इस प्रकार महामारी के पतन से घबराये हुए मथुरावासियों ने बाल-बच्चों के साथ वह रात किसी प्रकार व्यतीत की ॥१८६५॥ प्रातः काल के प्रकाश में सभी मथुरावासी प्रजा और राजा ने भी उस रूप में खम्भे पर खड़ी कुट्टनी को देखा और पहचाना ॥१८६५॥ महामारी का भय दूर होने पर तथा एक बार खूब हँसी हो जाने पर रूपणिका वेश्या माता का समाचार सुनकर वहाँ आई ॥१८६६॥ माता को इस प्रकार खम्भे पर खड़ी देखकर उसे अत्यन्त आश्चर्य हुआ और किसी प्रकार उसने उसे ऊपर से उतरवाया ॥१८६७॥ वहाँ एकत्र जनसमूह के पूछने पर उस कुट्टनी ने अपनी दुर्दशा का सारा वृत्तान्त लोगों से कह सुनाया ॥१८६८॥ इस विस्मयकारी घटना को किसी सिद्ध आदि का विनोद समझकर ब्राह्मण वैश्य और राजा आदि एकत्र लोगों ने कहा—'अनेक कामियों को ठगनेवाली इस कुट्टनी को भी जिसने इस प्रकार ठग लिया वह धन्य है। यदि वह इस जनसमाज में है, तो प्रकट हो जाय उसे पुरस्कार-स्वरूप पट्ट-बन्ध¹ किया जायगा' ॥१८६९-९०॥ इस घोषणा को सुनकर जनसमाज में छिपा हुआ लोहजंघ प्रकट हो गया और उसने जनता के पूछने पर समस्त वृत्तान्त सुना दिया ॥१९१॥ साथ ही उसने वहीं उपस्थित मथुरा-नरेश को शंख चक्र आदि उपहार भेंट कर दिये जिसे देखकर जनता ने अत्यन्त आश्चर्य प्रकट किया ॥१९२॥ तदनन्तर मथुरा के नागरिकों ने लोहजंघ के इस साहसिक कार्य पर सन्तोष प्रकट करते हुए उसे पट्ट बाँधकर पुरस्कृत किया और राजा की आज्ञा से वेश्या रूपणिका को स्वाधीन करा दिया अर्थात् उसे वेश्यावृत्ति से मुक्त कर दिया ॥१९३॥ इस प्रकार राजा तथा प्रजा से सम्मानित लोहजंघ लंका से प्राप्त धनराशि द्वारा अत्यन्त समृद्ध बनकर और कुट्टनी मकरदंष्ट्रा से बदला चुकाकर सुखपूर्वक मथुरा में निवास करने लगा ॥१९४॥

१ प्राचीन समय में जिस व्यक्ति का राजा या जनता से नागरिक सम्मान किया जाता था उसे विशेष प्रकार के मुकुट आदि पहनाकर और रथ में बैठाकर शोभायात्रा (जुलूस) के साथ नगर में घुमाकर सम्मानित किया जाता था।—अनु

इत्यन्यरूपस्य वसन्तकस्य मुखात्समाकर्ण्य कथामवापि।

इत्यन्यरूपस्य वसन्तकस्य मुखात्समाकर्ण्य कथामवापि। बद्धस्य वत्साधिपते समीपे तोषं परो वासवदत्तामान् ॥११९॥ इति महाकविश्रीसोमदेवभट्टविरचिते कथासरित्सागरे कथामुखलम्बके चतुर्थस्तरङ्गः।

पञ्चमस्तरङ्गः वसन्तककथा : वासवदत्ताहरणम्

अथ वासवदत्ता सा शनैर्वत्सेश्वरं प्रति। गाढं बबन्ध सद्भावं पितृपक्षपराङ्मुखी ॥१॥ ततो वत्सेशानिकटं पुनर्यौगन्धरायणः। विषेणादर्शनं कृत्वा सर्वानन्याञ्जनान्प्रति ॥२॥ वसन्तकसमक्षं च विजनं तं व्यजिज्ञपत्। राजन्बद्धो भवांश्चण्डमहासेनेन मायया ॥३॥ सुतां च दत्त्वा सम्भाव्य त्वामय मोक्तुमिच्छति। तदस्यैनां स्वयं हृत्वा गच्छामस्तनयां वयम् ॥४॥ एवं ह्यस्य प्रतीकारो दृप्तस्य विहितो भवेत्। अपौरुषकृतं लोके नैव स्याल्लाघवं च नः ॥५॥ अस्ति चैतन दत्तास्यास्तनयायाः करेणुका। राज्ञा वासवदत्ताया नाम्ना भद्रवती नृप ॥६॥ सा चानुगन्तुं शक्या नान्येन दन्तिना। मुक्त्वा नडागिरिं सोऽपि तां दृष्ट्वैव न मुच्यते ॥७॥ तस्यादषाषाढको नाम हस्त्यारोहोऽत्र विद्यते। स च दत्त्वा धनं भूरि स्वीकृत्य स्थापितो मया ॥८॥ तदारुह्य करेणुं तां सह वासवदत्तया। सायुधमापयातव्यं नक्तं गुप्तमितस्त्वया ॥९॥ रुमण्वन् महामात्रो द्विग्देन्द्रितबलस्तदा। मथनं शोभतां नगो नतश्चन्तयत यथा ॥१०॥ पुलिन्दकस्य सख्युस्ते पार्श्वमद्य च याम्यहम्। मार्गरक्षामित्युक्त्वा ययौ यौगन्धरायणः ॥११॥ यत्गरात्रोर्त्तदं तागब वत्सस्य हृन्थे व्यधात्। अथ वासवदत्ता सा तस्यांनिशिमृगायतौ ॥१२॥

द्वितीय लम्बक १९९

द्वितीय लम्बक १९९ इस प्रकार विकृत वेषधारी वसन्तक के मुंह से कथा सुनकर बन्दी उदयन को अत्यन्त सन्तोष हुआ और वासवदत्ता भी हृदय से प्रसन्न हुई ॥१९५॥ महाकवि श्रीसोमदेवभट्ट-विरचित कथासरित्सागर के कथामुखलम्बक का चतुर्थ तरंग समाप्त पञ्चम तरंग उदयन की कथा वासवदत्ता-हरण कुछ समय के अनन्तर पिता के पक्षपात से रहित होकर वासवदत्ता को वत्सराज उदयन के प्रति प्रगाढ़ प्रेम हो गया ॥१॥ यह जानकर मन्त्री यौगन्धरायण अदृश्य रूप से पुन राजा उदयन के समीप आया। उसकी अदृश्यकारिणी विद्या के प्रभाव से उसे दूसरे व्यक्ति न देख सके ॥२॥ उसने वसन्तक के सामने ही राजा से कहा—'महाराज तुम्हें चंडमहासेन ने छल-कपट करके कैद कर लिया है और अपनी कन्या देकर तुम्हारा सम्मान करके तुम्हें छोड़ देगा ॥३॥ इसलिए हम लोग स्वयं उसकी कन्या का अपहरण करके ले चलते हैं। इस प्रकार इस अभिमानी का मान भंग होगा और संसार में तुम्हारी दुर्बलता का अपवाद भी न होगा ॥४-५॥ राजा चंडसेन ने कन्या वासवदत्ता को भद्रवती नाम की हस्तिनी दी है। वह इतनी शीघ्रता से चलती है कि दूसरे हाथी केवल एक नलगिरि को छोड़कर, उसका पीछा नहीं कर सकते। नलगिरि भी उसे देखकर युद्ध नहीं करता। उस भद्रवती हस्तिनी के पीलवान (महावत) का नाम आषाढ़क है। उसे मैंने पर्याप्त धन देकर अपने पक्ष में कर लिया है॥६-८॥ इसलिए उसी हस्तिनी की सवारी से वासवदत्ता को साथ लेकर तुम्हें रात के समय यहाँ से छिपकर भागना चाहिए॥९॥ यहाँ के बड़े हाथीवान को मद्य पिलाकर ऐसा बेसुध कर देना चाहिए कि जिससे उसे होश ही न रहे। अन्यथा वह हाथियों के संकेत समझने में अति निपुण है॥१० ॥ मार्ग रक्षा के लिए मैं तुम्हारे मित्र पुलिन्दक के पास अभी जाता हूँ। ऐसा कहकर यौगन्धरायण चला गया ॥११॥ वत्सराज ने भी अपना सारा कर्त्तव्य सोच-समझ लिया। कुछ समय के पश्चात् वासवदत्ता उसके समीप आई॥१२॥