भारतकोश
कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५)

कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५)

महाकवि सोमदेव भट्ट द्वारा

स्रोत: कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1960 (उद्गम)

DevanagariHindipublished876 पृष्ठ

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द्वितीय लम्बक १८९ आश्चर्यचकित राक्षस ने जाकर लोहजंघ को अपने स्वामी विभीषण का सन्देश सुनाया ॥१२२॥ लोहजंघ ने शांतचित्त से विभीषण का सन्देश सुना और उसी राक्षस के साथ लंका को गया ॥१२३॥ लंका में जाकर नगरी के सुवर्णमय अनेक विशाल भवनों को देखकर चकित होते हुए लोह- जंघ ने राजमहल में जाकर राजा विभीषण के दर्शन किये ॥१२४॥ लंका के राजा विभीषण ने उसका आतिथ्य-सत्कार किया। उसके द्वारा आशीर्वाद प्राप्त करने पर राजा ने पूछा—हे ब्राह्मण देवता ! आप यहाँ कैसे पधारे? ॥१२५॥ यह सुनकर वह धूर्त ब्राह्मण लोहजंघ विभीषण से बोला—'राजन्, मैं मथुरा का रहने- वाला ब्राह्मण हूँ ॥१२६॥ दरिद्रता से दुःखी होकर मैंने भगवान् नारायण के मन्दिर में निराहार रहकर तपस्या की ॥१२७॥ तपस्या करते हुए मुझे नारायण ने स्वप्न में आज्ञा दी कि तू लंकाधिपति विभीषण के पास जा। वह मेरा भक्त है और तुझे धन देगा ॥१२८॥ जब मैंने उनसे कहा कि 'महाराज कहाँ राजा विभीषण और कहाँ मैं ! मैं उन्हें कैसे प्राप्त कर सकूँगा'? इस पर भगवान् नारायण ने कहा कि तू अभी जा विभीषण को देखेगा ॥१२९॥ भगवान् की इस प्रकार स्वप्न में आज्ञा प्राप्त कर मैं ज्यों ही जगा त्यों ही मैंने अपने को समुद्र के पार तट पर पड़ा हुआ पाया ॥१३०॥ इससे अधिक मैं कुछ नहीं जानता। यह सुनकर और साधारण व्यक्ति का लंका में पहुँचना अति कठिन समझकर विभीषण ने उसे सचमुच दिव्य प्रभाववाला व्यक्ति समझा ॥१३१॥ 'ठहरो मैं तुम्हें धन दूँगा'—ऐसा कहकर विभीषण ने उसे नरघातियों के लिए अवध्य समझकर राक्षसों को सौंप दिया और वह वहाँ ठहरा रहा ॥१३२॥ तब विभीषण ने राक्षसों को सुमेरु पर्वत पर भेजकर गरुड़-वंश के पक्षी को वाहन के रूप में मँगाया ॥१३३॥ उस वाहन को लोहजंघ को देकर कहा कि—'तुम इसे वश में करो। इसी के द्वारा तुम फिर मथुरा जा सकोगे' ॥१३४॥ लोहजंघ कुछ दिनों तक लंका में ही उस पक्षी पर उड़ने का अभ्यास करता रहा और विभीषण के स्वागत-सत्कार का आनन्द लेता रहा ॥१३५॥ एक बार उसने विभीषण से कौतुक के साथ पूछा कि 'महाराज लंका में यह सारी भूमि काष्ठमयी क्यों मालूम होती है' ॥१३६॥