भारतकोश
कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५)

कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५)

महाकवि सोमदेव भट्ट द्वारा

स्रोत: कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1960 (उद्गम)

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द्वितीय लम्बक १९१ उसका प्रश्न सुनकर विभीषण ने कहा— 'यदि तुम्हें यह जानने की जिज्ञासा है, तो सुनो। मैं तुम्हें इसका रहस्य बताता हूँ' ॥१३७॥ प्राचीन समय में कश्यप के पुत्र गरुड़ ने प्रतिज्ञाबद्ध नागों की दासता में पड़ी हुई अपनी माता विनता को दासता से मुक्त करने की इच्छा से उसका मूल्यस्वरूप अमृत का कलश लाने की इच्छा की और उसके लिए शक्ति प्राप्त करने को वह पिता के पास गया ॥१३८-१३९॥ पिता से प्रार्थना करने पर कश्यप ने उससे कहा कि समुद्र में बड़े-बड़े दो हाथी और कच्छप हैं, उन्हें तुम जाकर खाओ तो शापमुक्त हो जाओगे ॥१४० ॥ गरुड़ समुद्र में जाकर उन दोनों को पकड़ खाने के लिए कल्पवृक्ष की शाखा पर जा बैठा। उसके भार से वह शाखा टूट गई, किन्तु उसके नीचे बालखिल्य मुनि तपस्या कर रहे थे। अतः उनकी रक्षा के लिए गरुड़ ने उस शाखा को अपनी चोंच से रोक रखा। और जनापवाद के भय से गरुड़ ने उस शाखा को यहाँ समुद्र-तट पर लाकर रख दिया ॥१४१-१४३॥ उसी शाखा की पीठ पर यह लंका नगरी निर्मित हुई। इसी कारण यहाँ की भूमि काष्ठ- मयी है। विभीषण से यह कथा सुनकर लोहजंघ सन्तुष्ट हुआ ॥१४४॥ तब विभीषण ने मथुरा जाना चाहते हुए लोहजंघ को बहुत-से बहुमूल्य रत्न मँगाकर दिये और मथुराधिपति भगवान को भेंट देने के लिए सोने के शंख, चक्र, गदा और पद्म बनवाकर भक्ति- पूर्वक उसके द्वारा भेज दिये। विभीषण से प्राप्त समस्त धन को लेकर लोहजंघ एक बार में सौ योजन उड़नेवाले उस गरुड़जातीय पक्षी पर बैठ गया और आकाश में उड़कर समुद्र पार करता हुआ बड़े आराम से मथुरा पहुँच गया ॥१४५-१४८॥ मथुरा पहुँचकर वह नगरी के बाहरी भाग में स्थित किसी बौद्ध विहार में आकाश-मार्ग से उतरा। प्राप्त धन को वही भूमि में गाड़कर उसने वहीं उस पक्षी को भी बाँध दिया ॥१४९॥ विभीषण से प्राप्त रत्नों में से एक को बाज़ार में बेचकर उसने भोजन, कपड़े, इत्र, तैल आदि सजावट के अनेक सामान खरीद लिये। उसने विहार में आकर स्वयं भोजन किया और उस पक्षी को भी भोजन कराया तथा नवीन वस्त्र आदि पहनकर सुन्दर वेश बनाया ॥१५०-१५१॥

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