कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५)
महाकवि सोमदेव भट्ट द्वारा
स्रोत: कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1960 (उद्गम)
४७८ कथासरित्सागर
४७८ कथासरित्सागर
स्वच्छकान्तिसुधासिक्तां चित्ररूपविभूषणां । जङ्गमामिव कन्दर्पराजधानीं मनोरमाम् ॥१४॥ त्वयाहं विजये विश्वमिति प्रीत्येव पादयो। आश्लिष्टां पञ्चबाणस्य तूणीद्वयशोभया ॥१५॥ सा दृष्ट्वैव मनस्तस्य जहार नृपतेस्तथा। यथान्विष्य गृहं तस्या स ययौ विवशो निशि ॥१६॥ तां च प्रार्थयमान सन् जगदे स तया नृपः। रक्षिता त्वं न युक्तं ते परदाराभिमर्षणम् ॥१७॥ हठात्स्पृशसि वा मां चेदधर्मस्ते महान्भवेत्। मरिष्यामि च सद्योऽहं न सहिष्ये च दूषणम् ॥१८॥ इत्युक्तोऽपि तथा तस्मिन् बलं राज्ञि चिकीर्षति। शीलभ्रंशभयात्तस्याः सद्यो हृदयमस्फुटत् ॥१९॥ तद्दृष्ट्वा सपदि भीतः स गत्वैव यथागतम्। दिनैस्तेनानुतापेन राजा पञ्चत्वमाययौ ॥२०॥ इत्याख्याय कथामेतां समयभ्रष्टयानता। भूयः कलिङ्गसेना सा वत्सेश्वरमभाषत ॥२१॥ तस्मादधर्मे मत्प्राणहरणे मा मतिं कृथा। इहास्थिताया वस्तुं मे देहि याम्यन्यतोऽन्यथा ॥२२॥ एतत्कलिङ्गसेनायाः श्रुत्वा वत्सेश्वरोऽथ सः। विचार्य विरतो भूत्वा धर्मत्रासामवापत ॥२३॥ राजपुत्रि ! वस स्वेच्छं भर्त्रा सममिहामुना। नाहं वक्ष्यामि ते किञ्चिदिदानीं मा भयं कृथाः॥२४॥ इत्युक्त्वैव गते तस्मिन् स्वैरं राज्ञि स्वमन्दिरम्। श्रुत्वा मदनवेगस्तन्नभसोऽवततार सः ॥२५॥ प्रिये साधु कृतं नैवमकरिष्यः शुभे यदि। नाभविष्यद्धर्मं यस्मान्नासहिष्यत तन्मया ॥२६॥ इत्युक्त्वा सान्त्वयित्वा तां निशां नीत्वा तया सह। तत्रैव गच्छन्नागच्छन्नासीद् विद्याधरोऽथ सः ॥२७॥ कलिङ्गसेनापि च सा पत्यौ विद्याधरेश्वरे। तत्रास्त मर्त्यभावेऽपि दिव्यभोगसुखान्विता ॥२८॥
षष्ठ लम्बक ७७९
षष्ठ लम्बक ७७९ स्वच्छ लावण्यमय सुधा से सींची हुई आश्चर्यमय रूपराशि आभूषणों से अलंकृत और मन को आकृष्ट करनेवाली कामदेव की राजधानी के समान वह स्त्री थी। और, वह स्त्री 'तेरे द्वारा मैं विश्व-विजय करूँगा'—मानों इस प्रकार कामदेव के तरकश-रूपी दोनों पैरों (पिंडलियों) से युक्त थी ॥१४-१५॥ देखते ही उस स्त्री ने राजा के मन को ऐसा हर लिया कि विवश होकर वह राजा उसके घर का पता लगाकर रात में वहाँ गया ॥१६॥ प्रार्थना करते हुए राजा से उसने कहा—'तुम तो प्रजा के रक्षक हो। तुम्हें परस्त्री का धर्म नहीं बिगाड़ना चाहिए' ॥१७॥ यदि बलपूर्वक मुझे छुओगे तो तुम्हे पाप लगेगा। मैं भी तुरन्त मर जाऊँगी। इस कलंक को कदापि सहन न करूँगी ॥१८॥ ऐसा कहने पर भी राजा के बलात्कार करने की चेष्टा करने पर शील नाश होने के भय से उस वैश्य-वधू का हृदय तुरन्त फट गया। यह देखकर लज्जित राजा लौट गया और उसी पश्चाताप में वह भी मर गया ॥१९-२०॥ इस प्रकार इस कथा को कहकर भय और नम्रता से भरी हुई कलिङ्गसेना ने वत्गराज से कहा—'इसलिए मेरे प्राण हरण करनेवाले अधर्म में मन को न लगाओ। मैं तुम्हारी आश्रित हूँ। तुम मुझे यहाँ रहने दो अथवा मैं यहाँ से चली जाऊँ' ॥२१-२२॥ कलिङ्गसेना की ऐसी बातें सुनकर धर्मात्मा वत्गराज पापकर्म से विरत होकर उससे कहने लगा—'हे राजकुमारी तुम अपने पति के साथ अपनी इच्छा से यहाँ रहो। मैं तुम्हें कुछ न कहूँगा। अब भय न करो' ॥२३-२४॥ ऐसा कहकर राजा के अपने भवन में चले जाने पर, यह सब समाचार सुनकर मदनवेग आकाश से उतरा ॥२५॥ आकर अपनी पत्नी कलिङ्गसेना से बोला—'तूने बहुत अच्छा किया। यदि इससे अन्यथा करती तो मैं कदापि सहन न करता' ॥२६॥ ऐसा कहकर कलिङ्गसेना को धीरज बँधाकर और उसके साथ रात बिताकर मदनवेग उसी भवन में आना-जाना करने लगा ॥२७॥ वह कलिङ्गसेना भी अपने पति विद्याधरराज के साथ कनकप्रभनगर के भी दिव्य भोगों का उपभोग करती हुई वहाँ रहने लगी ॥२८॥
४८ कथासरित्सागर
४८ कथासरित्सागर
वत्सराजोऽपि सञ्चिन्तां मुक्त्वा मन्त्रिवचः स्मरन्। ननन्द लब्धं मन्वानो देवीं राज्यं सुतं तथा ॥२९॥ देवी वासवदत्ता च मन्त्री यौगन्धरायणः। अभूतां निर्वृतौ सिद्धे नीतिकल्पलताफले ॥३०॥
मदनमञ्चुका जन्म कथा
अथ गच्छत्सु दिवसेष्वापाण्डुमुखपङ्कजा। दध्रे कलिङ्गसेना सा गर्भमुत्पन्नदोहदा ॥३१॥ तुङ्गौ विरेजतुस्तस्या स्तनौवाश्यामचूचुकौ। निधानकुम्भौ कामस्य मदमुद्राङ्किताविव ॥३२॥ ततो मदनवेगस्तामुपेत्य परिसम्यधात्। कलिङ्गसेने दिव्यानामस्माकं समयोऽस्त्ययम् ॥३३॥ जातं मानुषगर्भं यन्मुक्त्वा यामो विदूरतः। कण्वाश्रमे न तत्याज मेनका किं शकुन्तलाम् ॥३४॥ त्वं यद्यप्यप्सराः पूर्वं तदप्यविनयान्निजात्। क्षत्रशापेन सम्प्राप्ता मानुष्यं देवि साम्प्रतम् ॥३५॥ तेनैव बन्धकीशब्दो जातो साध्व्या अपीह ते। तस्मादपत्यं रक्षेस्त्वं स्थानं यास्याम्यहं निजम् ॥३६॥ स्मरिष्यसि यदा मां च सन्निधास्ये सदा तव। एवं कलिङ्गसेनां तामुक्त्वा साश्रुविलोचनाम् ॥३७॥ समाश्वास्य च दत्त्वा च तस्यै सद्रत्नसञ्चयम्। तच्चित्तः समयाकृष्टो ययौ विद्याधरेश्वरः ॥३८॥ कलिङ्गसेनाप्यत्रासीदपत्यार्था शचीमिव। आलम्ब्य वत्सराजस्य भुजच्छायामुपाश्रिता ॥३९॥ अत्रान्तरे कृतवतीं साङ्गमप्राप्तये तपः। आदिदेश रतिं मार्त्तामनङ्गस्याम्बिकापतिः ॥४०॥ वत्सराजगृहे जातो दग्धपूर्वः स ते पतिः। नरवाहनदत्ताख्यो योनिजो मद्विसर्जनात् ॥४१॥ मदाराधनतस्त्वं तु मर्त्यलोकेऽप्ययोनिजा। जनिष्यसे ततस्तेन भर्त्रा साङ्गेन मोक्ष्यसे ॥४२॥ एवमुक्त्वा रतिं शम्भुः प्रजापतिमथाविशत्। कलिङ्गसेना तनयां सोष्यते दिव्यसम्भवम् ॥४३॥
षष्ठ लम्बक ७८१
षष्ठ लम्बक ७८१ वत्सराज भी कलिङ्गसेना की चिन्ता छोड़कर मन्त्री यौगन्धरायण की बात सोचता हुआ यशरूपी राज्य और पुत्र को मानों पुनः प्राप्त कर प्रसन्न रहने लगा ॥२९॥ नीति-रूपी कल्पलता के फलने-पकने पर रानी वासवदत्ता और मन्त्री यौगन्धरायण भी निश्चिन्त हो गये ॥३०॥ मदनमञ्चुका के जन्म की कथा कुछ दिनों के व्यतीत होने पर कुछ पीले और पतले मुँहवाली तथा विविध प्रकार की इच्छाएँ रखनेवाली कलिङ्गसेना ने गर्भ धारण किया ॥३१॥ कालिमा लिये हुए उसके उत्तुंग स्तनों के अग्रभाग कामदेव की मद-मुद्रा से अंकित उसके कोष (खजाने) के घड़ों के समान सुशोभित हो रहे थे ॥३२॥ तब उसके पति मदनवेग ने एक बार उससे कहा—'हे कलिङ्गसेना दिव्य व्यक्तियों का यह नियम है कि मनुष्य-योनि में उत्पन्न अपने गर्भ को छोड़कर दूर चले जाते हैं। क्या मेनका ने कण्व के आश्रम में शकुन्तला को नहीं छोड़ दिया था ? ॥३३-३४॥ यद्यपि तू भी पूर्वजन्म की अप्सरा है किन्तु अपने ही अविनय (उद्दण्डता) के कारण इन्द्र के शाप से मानव-योनि को प्राप्त हुई है ॥३५॥ इसी कारण पतिव्रता होने पर भी तूने बन्धकी (व्यभिचारिणी) यह विशेषण प्राप्त किया। इसलिए तू अपनी सन्तान की रक्षा करना और मैं अपने स्थान को चला जाऊँगा ॥३६॥ जब तू मुझे स्मरण करेगी तभी तेरे समीप आ जाऊँगा। विद्याधर ने आँसू बहाती हुई कलिङ्गसेना से इस प्रकार कहा ॥३७॥ और, उसे धीरज बँधाकर तथा अच्छे-अच्छे रत्न उसे देकर, उसी में मन लगाया हुआ और समय हो जाने के कारण खिंचा हुआ विद्याधर-राज चला गया ॥३८॥ कलिङ्गसेना भी सखी के समान सन्तान की आशा को लिये हुए वत्सराज की छत्रछाया के सहारे वहीं रहने लगी ॥३९॥ इसी बीच कामदेव की पत्नी रति ने सम्पूर्ण शरीरयुक्त पति (कामदेव) की प्राप्ति के लिए शिवजी की तपस्या की और शिवजी ने उसे आज्ञा दी कि 'मेरे द्वारा पहले भस्म किया गया वह तेरा पति (कामदेव) वत्सराज के घर में उत्पन्न हुआ है। उसका नाम नरवाहनदत्त है। मेरे साथ उद्दण्डता करने के कारण वह देवता होकर भी योनिज है। उसी शापप्रथा के फलस्वरूप तू भी मर्त्यलोक में अयोनिज होकर सम्पूर्ण शरीरवाले पति से मिलेगी ॥४०-४२॥ रति से ऐसा कहकर शिवजी ने प्रजापति से कहा—'कलिङ्गसेना दिव्य वीर्य से उत्पन्न पुत्र का प्रसव करेगी ॥४३॥
७८२ कथासरित्सागर
७८२ कथासरित्सागर
तं हृत्वा मायया तस्यास्तत्स्थाने त्वमिमां रतिम्। निर्माय मानुषीं कन्यां त्यक्तदिव्यतनुं क्षिपेः॥४४॥ इतीश्वराज्ञामादाय मूर्ध्नि वेधस्यथो गते। कलिङ्गसेना प्रसवं प्राप्ते काले चकार सा॥४५॥ जातमात्रं सुतं तस्या हृत्वाऽथात्र स्वमायया। रतिं तां कन्यकां कृत्वा न्यधाद् विधिरलक्षितम्॥४६॥ सर्वैश्च तत्र तामेव कन्यां जातामलक्षत। दिवाप्यकाण्डप्रतिपच्चन्द्रलेखामिवोदिताम् ॥४७॥ कान्तिद्योतिततद्वासगृहां निर्जित्य कुर्वतीम्। रत्नदीपशिखाश्रेणिर्लज्जिता इव निष्प्रभाः॥४८॥ कलिङ्गसेना तां दृष्ट्वा जातामसदृशीं सुताम्। पुत्रजन्माधिकं सोत्पादुत्सवं विततान सा॥४९॥ अथ वत्सेश्वरो राजा सदेवीकः समन्त्रिकः। कन्यां कलिङ्गसेनाया जातां शुश्राव तादृशीम्॥५०॥ श्रुत्वा च स नृपोऽकस्माद्वाचेश्वरचोदितः। देवीं वासवदत्तां तां स्थिते यौगन्धरायणे॥५१॥ जाने कलिङ्गसेनेषा दिव्या स्त्री शापतश्च्युता। अस्यां जाता च कन्येयं दिव्याश्चर्यरूपधृक्॥५२॥ तदसौ कन्यका तुल्या रूपेण तनयस्य मे। नरवाहनदत्तस्य महादेवीत्वमर्हति॥५३॥ तच्छ्रुत्वा जगदे राजा देव्या वासवदत्तया। महाराज किमेवं त्वमकस्मादद्य भाषसे॥५४॥ कुलद्वयविशुद्धोऽयं क्व पुत्रस्ते वत क्व सा। कलिङ्गसेनातनया बन्धकीगर्भसम्भवा॥५५॥ श्रुत्वैद् विमृशन् राजा सोऽब्रवीद्भद्राहं स्वतः। वदाम्यतत्प्रविश्यान्तः कोऽपि जल्पयतीव माम्॥५६॥ नरवाहनदत्तस्य कन्ययं पूर्वनिर्मिता। भार्येत्येवं वदन्तीं च शृणोमीव गिरं दिवः॥५७॥ कलिङ्गसेना हि वासावेवपरमा शुक्लोदयता। पूर्वकर्मवशादेवस्या बन्धकीगर्भसम्भवः॥५८॥
षष्ठ लम्बक ४८१
षष्ठ लम्बक ४८१ तुम उसका अपहरण करके उसके स्थान पर इस रति को मनुष्य बनाकर रख देना' ॥४४॥ इस प्रकार ईश्वर (शिव) की आज्ञा को शिर स स्वीकार करके ब्रह्मा के चले जाने के पश्चात् समय आने पर कलिगसेना ने प्रसव किया ॥४५॥ इतने में ही प्रजापति ने अपनी माया के प्रभाव से उसके पुत्र का अपहरण करके रति को मानुषी कन्या बनाकर अलक्षित रूप से उसके समीप रख दिया ॥४६॥ दिन में भी अकालज प्रतिपदा की चन्द्रलेखा के समान उदित उस कन्या की उत्पत्ति का वहाँ रहनेवाले सभी लोगों ने सत्य समझा ॥४७॥ वह कन्या अपने शरीर की कान्ति से रत्नों की प्रभा को निस्तेज करती हुई प्रसूति-गृह को आलोकित कर रही थी ॥४८॥ कलिगसेना ने अनन्यसदृशी (अद्भुत) कन्या को देखकर पुत्रजन्म से भी अधिक हर्ष और प्रसन्नता के साथ व्यापक उत्सव मनाया ॥४९॥ तदनन्तर वत्सराज उदयन ने अपनी रानियों और मन्त्रियों के साथ कलिङ्गसेना द्वारा उत्पन्न हुई अनुपम कन्या का वृत्तान्त सुना ॥५०॥ सुनते ही भगवत्प्रेरित राजा ने शची और यौगन्धरायण के सामने ही इस प्रकार कहा—'मैं समझता हूँ कि यह कलिङ्गसेना शाप से पतित कोई स्वर्गीय स्त्री है। इससे उत्पन्न हुई यह कन्या भी दिव्य ही है, क्योंकि इसका रूप आश्चर्यमय है ॥५१-५२॥ इसलिए यह कन्या रूप में मेरे कामदेव के समान है। यह नरवाहनदत्त की महारानी होने के लायक है ॥५३॥ राजा के ऐसा कहने पर वासवदत्ता ने राजा से कहा-'महाराज, आज तुम यह क्या कह रहे हो? कहाँ मातृकुल और पितृकुल दोनों से शुद्ध यह तुम्हारा कुल और कहाँ व्यभिचारिणी से उत्पन्न कलिङ्गसेना की कन्या ?' ॥५४-५५॥ यह सुनकर सोचते हुए राजा ने कहा-'यह मैं स्वयं नहीं कह रहा हूँ, कोई मेरे अन्तर में बैठा हुआ कोई मुझसे कहला रहा है ॥५६॥ और ऐसी आकाशवाणी भी सुन रहा हूँ कि यह कन्या नरवाहनदत्त की पूर्वजन्म की पत्नी है। साथ ही उसमदिरानुगा कलिङ्गसेना की यह पतिव्रता पत्नी है। पूर्व जन्मानुरूप कर्म के कारण उसके लिए सुरपत्नी शब्द का प्रयोग हुआ है ॥५७-५८॥
०८४ कथासरित्सागर
०८४ कथासरित्सागर इति राज्ञोदिते प्राह मन्त्री यौगन्धरायणः । श्रूयते देव यत्त्वत्रे रतिर्दग्धे स्मरे पुरा ॥५९॥ मर्त्यलोकावतीर्णेन सशरीरेण सङ्गमः । मर्त्यभावगतायास्ते स्वेन भर्त्रा भविष्यति ॥६०॥ इति शापाद् वरं शर्वो रत्यै स्वपतिमीप्सवे । कामावतारश्चोक्तः प्राग्विद्युन्माचा सुतस्तव ॥६१॥ रत्यावतरणीयं च मर्त्यभावे सुराङ्गना । गर्भग्राहिकया चाद्य ममैव वर्णितं रहः ॥६२॥ मया कलिङ्गसेनाया गर्भे प्राग्गर्भसम्पदा । युक्तो दृष्टस्तदैवाम्यन्तरूयं तद्विवर्जितम् ॥६३॥ तदाश्चर्यं विलोक्याहं तवाख्यातुमिहागता । इति स्त्रिया यथोक्तं मे जातैषा प्रतिभाति ते ॥६४॥ तज्जाने मायया देव्याः सैषा रतिरयोनिजा । कलिङ्गसेनातनया गर्भवीर्येण निर्मिता ॥६५॥ भार्या कामावतारस्य पुत्रस्य तव भूपते । तथा चात्र कथामेतां यदासम्बन्धिनीं शृणु ॥६६॥ भृत्यो वैश्रवणस्याभूद्विरूपाक्ष इति श्रुतः । यक्षो निधानरक्षाणां प्रधानाध्यक्षतां गतः ॥६७॥ मथुरायां बहिसंस्थं निधानं स च रक्षितुम् । यक्षं नियुक्तवानेकं शिलास्तम्भमिवापरम् ॥६८॥ तत्र छत्रग्रहीवासी कश्चित्पाशुपतो द्विजः । निधानान्वेषणोपायात् गन्त्यवादी कणाशनः ॥६९॥ स मानुषवसादीपहस्तो यावत्परभ्रमात् । स्थानं तावत्तस्यात्र कराद्दीपः पपात सः ॥७०॥ रुदाशेन च तेनात्र स्थितं निधिमवेत्य सः । उद्घाटयितुमारेभे महाम्यैः गणिभिर्द्विजैः ॥७१॥ अथ योऽसौ नियुक्तोऽभूद्यक्षो रक्षाविधौ स तत् । दृष्ट्वा गत्वा यथावस्तु विरूपाक्षं व्यजिज्ञपत् ॥७२॥ गच्छ व्यापाद्य क्षिप्रं धूर्तान्तान्मययाविदः । इत्यादिदेश तं यक्षं विरूपाक्षः स शासनः ॥७३॥
षष्ठ लम्बक ७८५
षष्ठ लम्बक ७८५ राजा के इस प्रकार कहने पर मन्त्री यौगन्धरायण ने कहा—'महाराज सुना जाता है कि कामदेव के दग्ध हो जाने पर उसकी पत्नी रति ने तपस्या की कि मर्त्यलोक में अनङ्ग सशरीर कामदेव से मेरा समागम हो। तपस्या से प्रसन्न होकर अपने पति को चाहती हुई रति को वर दिया कि तू भी मनुष्य-योनि में जन्म लेकर अपने पति से मिलेगी ॥ ९६ ॥ पहले ही दिव्यवाणी ने तुम्हारे पुत्र को कामदेव का अवतार घोषित किया है। यह कन्या भी शिवजी की आज्ञा से रति के अवतार-रूप में उत्पन्न हुई है। यह बात प्रत्यक्ष करानेवाली धात्री ने एकान्त में मुझसे कही है ॥९१-९२॥ उसने बताया कि मैंने कलिङ्गसेना के गर्भ को पहले शय्या पर देखा था उसी समय उस अनिर्वचनीय रूप में देखा ॥९३॥ उस आश्चर्य को देखकर ही मैं तुम्हें कहने आई हूँ। इस प्रकार उस स्त्री ने मुझसे कहा और मेरी बुद्धि भी यही कहती है। अतः मैं समझता हूँ कि देवमाया ने अपनी माया के प्रभाव से उस रूपशालिनी रति को कन्या बनाकर यहाँ रख दिया और वास्तविक गर्भ को तिरोहित कर दिया है ॥९४-९५॥ यही कन्या कामदेव के अवतार तुम्हारे पुत्र नरवाहनदत्त की पत्नी है। इस सम्बन्ध में मैं एक यक्ष की कथा कहता हूँ सुनो ॥९६॥ विकतानन्द नामक एक यक्ष कुबेर का भृत्य था। वह अगणित खजानों का प्रधानाध्यक्ष बन गया ॥९७॥ उसने मथुरा नगरी के बाहरी भाग में स्थित एक खजाने की रक्षा के लिए यमदूत के सादृश्य के समान एक यक्ष को नियुक्त किया ॥९८॥ किसी समय उस नगरी का निवासी खजाने को जाननेवाला एवं दूसरा खजाना खोजने के लिए बार-बार भूमि की परीक्षा करने लगा। परीक्षा करते हुए उसके हाथ का कञ्चन की चाँदी से बनी हुई बत्ती एक स्थान पर गिर पड़ी ॥९९-१००॥ उस लक्षण से कपतान ने उसी स्थान पर खजाने का होना निश्चित करके अपने अन्य धनदत्त मित्रों के साथ खजाना खोदना आरम्भ किया ॥१०१॥ यह यक्ष रात में उस गुप्त निधि की रक्षा के लिए नियुक्त था उसने अविलम्ब विकतानन्द से यह समाचार कहा ॥१०२॥ मंत्री विकतानन्द के गुप्त बात के सम्बन्धी विचार करने पर जब तक यमदूत-सदृश दूतों को खजाना दिलाने के कहने ही वाला था ॥१०३॥
७८६ कथासरित्सागर
यहाँ पृष्ठ का लिप्यन्तरण प्रस्तुत है:
७८६ कथासरित्सागर ततः स यक्षो गत्वैव स्वयुक्त्या निजघान तान्। निधानवादिनो विप्रान्सम्प्राप्तमनार्यान् ॥७४॥ तद्बुद्ध्वा धनदः क्रुद्धो विरूपाक्षमुवाच तम्। ब्रह्महत्या कथं पाप कारिता सहसा त्वया ॥७५॥ दुर्गतो वार्त्तिकजनो लोभात्किं नाम नाचरेत्। निवार्यन्ते स विप्राय विघ्नेस्तैस्त्वेनं हन्यते ॥७६॥ इत्युक्त्वाथ शशापैनं विरूपाक्षं धनाधिपः। मर्त्ययोनौ प्रजायस्व दुष्कृताचरणादिति ॥७७॥ प्राप्तशापोऽथ कस्यापि भूतले ब्राह्मणस्य सः। विरूपाक्षः सुतो जातो ब्राह्मणस्याग्रहारिणः ॥७८॥ ततोऽस्य यक्षिणी पत्नी धनाध्यक्षं व्यजिज्ञपत्। देव यत्र स भर्त्ता मे क्षिप्तस्तत्रैव मां क्षिप ॥७९॥ प्रसीद नहि शक्नोमि वियुक्ता तेन जीवितुम्। एव तया स विज्ञप्तः साध्व्या वैश्रवणोऽभ्यधात् ॥८०॥ तस्य विप्रस्य सदने जातो भर्त्ता स तेऽनघे। तस्यैव दास्या गेहे त्वं निपतिष्यस्ययोनिजा ॥८१॥ तत्र तेन समं भर्त्रा सङ्गमस्ते भविष्यति। स्वप्रसादात्स शापं च तीर्त्वा मत्पार्श्वमेष्यसि ॥८२॥ इति वैश्रवणादेशात्सा साध्वी पतिता ततः। दास्यास्तस्या गृहद्वारि कन्या भूत्वैव मानुषी ॥८३॥ अकस्माच्च तया दास्या कन्या दृष्टाद्भुताकृतिः। गृहीत्वा दर्शिता चास्य स्वामिनोऽथ द्विजन्मनः ॥८४॥ न्वियेयं कन्यका क्वापि निःसन्देहमयोनिजा। त्याग्या मम चक्रीहानय तां श्यमदाद्द्रुतम् ॥८५॥ इयं हि मम पुत्रस्य मन्ये भार्यात्वमर्हति। इति सोऽपि द्विजो दासीं तामुवाच मनन्तरम् ॥८६॥ प्रमादत्र विवृद्धा सा कन्या विप्रात्मजश्च सः। अन्योन्यदर्शनापहृतात्मनो बभूवतुः ॥८७॥ ततः कृतविवाही तौ तेन पित्रेण दम्पती। प्रजातिस्मरणव्याप्तावुत्तीर्णविरहाविव ॥८८॥
षष्ठ लम्बक ७८७
षष्ठ लम्बक ७८७ उस यक्ष ने जाकर अपनी युक्ति से उन निधानवादी असफल मनोरथ ब्राह्मणों को मार डाला ॥७४॥ यह सब जानकर, कुबेर विरूपाक्ष पर क्रोध करके बोले—'अरे पापी तूने सहसा यह ब्रह्महत्या क्यों करा दी। खजाना खोजनेवाले दरिद्र क्या नहीं करते? उन्हें विघ्न करके और भय आदि दिखाकर दूर किया जाता है, जान से नहीं मारा जाता' ॥७५-७६॥ ऐसा कहकर कुबेर ने उस यक्ष को शाप दिया कि तू इस पाप को करने से मनुष्य-योनि में उत्पन्न होगा ॥७७॥ तदनन्तर वह शापित विरूपाक्ष मनुष्य-योनि में किसी ब्राह्मण के यहाँ उत्पन्न हुआ। तब उस यक्ष विरूपाक्ष की पतिव्रता पत्नी ने कुबेर से प्रार्थना की—'हे स्वामी ! मुझे भी वहीं फेंक दो जहाँ तुमने मेरे पति को फेंका है। मैं उससे वियुक्त होकर जीवित नहीं रह सकती'। उस पतिव्रता की प्रार्थना पर कुबेर ने कहा—॥७८-८०॥ 'तेरा पति जिस ब्राह्मण के घर में उत्पन्न हुआ है, तू उसी ब्राह्मण की दासी के घर में गिरेगी और योनि से उत्पन्न नहीं होगी। वहाँ पर पति के साथ तेरा समागम होगा और तेरी कृपा से वह शाप से मुक्त होकर पुनः मेरे पास आ जायगा' ॥८१-८२॥ इस प्रकार कुबेर के आदेश से वह सती पद्मिनी मानुषी कन्या बनकर उसी ब्राह्मण की दासी के द्वार पर जा गिरी ॥८३॥ दासी ने उस अद्भुत कन्या को अकस्मात् देखा और उसे अपने स्वामी उस ब्राह्मण के पास ले गई ॥८४॥ 'यह कन्या कोई दिव्या स्त्री है और इसीलिए अवश्य अयोनिजा है। मेरी धारणा ऐसा कहती है। तू इसे बिना किसी शंका के ले आ ॥८५॥ यह मेरे पुत्र की पत्नी होने योग्य है। ब्राह्मण अपनी दासी को ऐसा कहकर प्रसन्न हुआ ॥८६॥ क्रमशः वह कन्या और ब्राह्मणकुमार दोनों बड़े हो गये और परस्पर देखने से ही घनिष्ठ प्रेमी बन गये ॥८७॥ तदनन्तर ब्राह्मण ने उन दोनों का विवाह करके उन्हें दम्पती बना दिया। वे दोनों पूर्व जन्म का स्मरण न करते हुए भी ऐसा अनुभव करते थे माना वे परस्पर चिरकालीन वियोग के पश्चात् मिले हों ॥८८॥
७८८ कथासरित्सागर
७८८ कथासरित्सागर अथ कालेन देहान्ते तया सोऽनुगतः पतिः। ससपः क्षतपापः सन्स्वं स्वं प्राप्तवान्पदम् ॥८९॥ इतीहावतरत्येव निरागस्त्वादयोनिजा। भूतले शारदयक्षाख्या दैवनिर्मिता ॥९०॥ मदनमञ्चुकानरवाहनदत्तयोर्बाल्यविलासः कुलं किं नृपते तेऽस्यास्तस्माद् भार्या सुतस्य से। कलिङ्गसेनापुत्रीयं यथोक्तं दैवनिर्मिता ॥९१॥ यौगन्धरायणैनेवमुक्त वत्सेश्वरश्च तत्। देवी वासवदत्ता च तथेति हृदि चक्रतुः ॥९२॥ ततस्तस्मिन्गृहं यात मन्त्रिमुख्ये स भूपतिः। पानादिक्रीडया नित्यं सभार्यस्तद्दिनं सुखी ॥९३॥ ततो दिनेषु गच्छत्सु मोहभ्रष्टस्वस्मृतिः। कलिङ्गसेनातनया सा समं रूपसम्पदा ॥९४॥ क्रमेण ववृधे नाम्ना कृता मदनमञ्चुका। सुता मदनवगम्यत्यतो मात्राऽनेन च ॥९५॥ नूनं सा विधिने रूपं सर्वाम्बरयोषिताम्। अन्यथा ताः पुरस्तस्या विरूपा जज्ञिरे कथम् ॥९६॥ दृष्ट्वा रूपवतीं तां च कौतुकात् स्वयमेव सा। देवी वासवदत्ता तामानायायात्मनोऽन्तिकम् ॥९७॥ तत्र धात्र्या भृशामस्तां वत्सराजो ददर्श ताम्। यौगन्धरायणावाप्तं वत्सेर्दीपशिखामिव ॥९८॥ दृष्ट्वा चादृष्टपूर्वं सतस्या नेत्रामृतं वपुः। रतिरैवायमथैवेदमिति मेने न तत्र कः ॥९९॥ ततश्चानाययामास दत्त्वा वागम्बराद्यथ। मन्दारपुष्पसान्द्रं जगच्चत्राशयः सुतं ॥१००॥ गोत्रं बाल्येऽमृगाम्भानां नीत्वा मन्मथमन्मथम्। तामाप्यप्रभा गौरीमिव दृष्ट्वा रराध प्रभाम् ॥१०१॥ सापि तं बालनयनं पश्यन्ती विस्मयानना। न तृप्तिमापयो बालो वियोगे चामृतविग्रम् ॥१०२॥
षष्ठ लम्बक ७८९
षष्ठ लम्बक ७८९ कुछ समय के अनन्तर उस यक्ष पति के मरने पर यह स्त्री भी सती हो गई और उसी के तप के प्रभाव से वह यक्ष पुनः निष्पाप होकर अपने पूर्व पद को प्राप्त कर सका ॥८९॥ इस प्रकार, निरपराध देवता अयोनिज होकर कारणवश दैवमाया से भूतल में अवतार लेते हैं ॥९०॥ नरवाहनदत्त और मदनमंचुका का बाल्य-विलास हे राजन् ! तेरा और इसका कुल क्या। कलिङ्गसेना की यह देवताओं द्वारा निर्मित पुत्री तेरे पुत्र की पत्नी है। यौगन्धरायण ने ऐसा कहने पर राजा उदयन तथा वासवदत्ता ने इस बात को हृदय में स्थान दिया ॥९१-९२॥ तदनन्तर मुख्यमन्त्री के चले जाने पर राजा उदयन तथा वासवदत्ता ने पान (मद्यपान) आदि मनोविनोदों से उस दिन को सुखपूर्वक व्यतीत किया ॥९३॥ कुछ दिनों के व्यतीत होने पर मोह से अपने पूर्वजन्म की स्मृति को भूली हुई कलिङ्गसेन की कन्या अपनी रूप-सम्पत्ति के साथ बड़ी होने लगी ॥९४॥ मदनवेग नामक विद्याधर की कन्या होने के कारण माता तथा अन्य लोगों ने उसका नाम मदनमंचुका रख दिया ॥९५॥ उस कन्या ने संसार की सभी सुन्दरी कन्याओं के रूप को ले लिया था अन्यथा उसके सामने वे सब विरूप कैसे हो जातीं ? ॥९६॥ उसे अत्यन्त रूपवती सुनकर कौतुक के कारण रानी वासवदत्ता ने एक बार अपने पास बुलवाया। वहाँ पर धात्री (धाई) के मुँह से चिपकी हुई उसे राजा और यौगन्धरायण आदि ने भी कमलदीपक की बत्ती की शिखा (लौ) के समान देखा ॥ ९७-९८॥ उसके अपूर्व रूप और आँखों में अमृत-वर्षा करनेवाले शरीर को देखकर, यह रति ही अवतीर्ण हुई है, ऐसा सभी ने माना ॥९९॥ तब रानी ने संसार के नेत्रों के उत्सव देनेवाले अपने पुत्र नरवाहनदत्त को बुलवाया ॥१००॥ खिले हुए मुख-कमलवाले बालक नरवाहनदत्त ने उस कन्या को इस प्रकार देखा जैसे सरोवर, प्रातःकालीन नवीन सूर्य-रश्मियों को निहारता है ॥१०१॥ वह कन्या मदनमंचुका भी आँखों को आनन्द देनेवाले नरवाहनदत्त को देखती हुई उसी प्रकार अतृप्त रह गई जैसे चकोरी चन्द्रमा को देखते रहने पर भी तृप्त नहीं होती ॥१०२॥
७९ कथासरित्सागर
७९ कथासरित्सागर ततः प्रभृति तौ बालाविप स्मातुं न शेकतुः। दृष्टिपाशैरिवानद्धौ पुष्पभूतावपि क्षणम्॥१०३॥ दिनैर्निश्चित्य सम्बन्धं देवनिर्मितमेव सुः। विवाहविषये बुद्धिं व्यधाद्वत्सेश्वरस्तयोः॥१०४॥ कलिङ्गसेना तच्छ्रुत्वा ननन्द च ददौ च सा। नरवाहनदत्तस्मिञ्जामातृप्रीतितो धृतिम्॥१०५॥ सम्मन्त्र्य मन्त्रिभिः सार्धं तत्तद्दक्षाकारवत् पृथक्। वत्सराजः स्वपुत्रस्य तस्य स्वमिव मन्दिरम्॥१०६॥ नरवाहनदत्तस्य यौवराज्याभिषेकः ततः सम्मृत्य सम्भारानथ राजा स कालवित्। यौवराज्येऽभ्यषिञ्चत्तं दृष्टदृष्टान्यगुणग्रहम्॥१०७॥ पूर्वं तस्यापतन्मूर्ध्नि पित्रोरानन्दबाष्पजम्। ततः श्रौतमहान्त्रपूतं सतीर्थजं पयः॥१०८॥ अभिषेकाम्बुभिस्तस्य धौते वदनपङ्कजे। चित्रं निर्मलतां प्रापुर्मुखानि ककुभामपि॥१०९॥ मङ्गल्यमाल्यपुष्पेषु तस्य क्षिप्तेषु मातृभिः। मुमोष दिव्यमाल्याद्यद्रूपं चौरपि तत्क्षणम्॥११०॥ देवदुन्दुभिनिह्रादिसर्घमेव जजृम्भिरे। आनन्दतूर्येमिथोपप्रतिशब्दा नभस्तले॥१११॥ प्रणनामाभिषिक्तं तं युवराजं न तत्र कः। स्वप्रभावादृते शैनेवोभनाम सदा हि सः॥११२॥ ततो वत्सेश्वरस्तस्य सूनोर्भक्तिसखीन् सतः। स्वमन्त्रिपुत्रानाहूय सचिवत्वे समादिशत्॥११३॥ यौगन्धरायणसुतं मन्त्रित्वे मरुभूतिकम्। सेनापत्ये हरिशिखं न्यव्यसनयं ततः॥११४॥ रुमन्वत्सुतं क्रीडासखीत्वे तु तपन्तकम्। गोमुखं च प्रतीहारपुरायामित्यकारयत्॥११५॥ पीठाङ्गिरये च पूर्वेक्तावुभौ पिङ्गलिकापुत्रौ। सैन्धानरः शान्तिनामः भ्रातृपुत्रो पुरोधसः॥११६॥
षष्ठ लम्बक ७९१
षष्ठ लम्बक ७९१ परस्पर दर्शन के अनन्तर वे दोनों बालक होने पर भी स्थिर न रह सके। यद्यपि वे दोनों अलग-अलग थे किन्तु दृष्टिपाश से बँधे हुए, अतएव एक थे ॥१ ३॥ यह देखकर वत्सराज ने उन दोनों के सम्बन्ध को देवताओं द्वारा निश्चित किया हुआ समझकर विवाह करने की इच्छा की ॥१ ४॥ कलिङ्गसेना यह जानकर प्रसन्न हुई और नरवाहनदत्त को जामाता के प्रेम से देखने लगी ॥१ ५॥ तब वत्सराज ने मन्त्रियों से सम्मति करके अपने पुत्र के लिए अपने ही राजभवन के समान भवन का निर्माण कराया ॥१ ६॥ नरवाहनदत्त का यौवराज्याभिषेक समयज्ञ राजा ने सब सामान एकत्र करके प्रशंसनीय गुणोंवाले कुमार नरवाहनदत्त का यौवराज्य (युवराज) पद पर अभिषेक कर दिया ॥१ ७॥ अभिषेक के समय उस युवराज के शिर पर पहले माता-पिता के आनन्दाश्रु गिरे तदनन्तर वेद-मन्त्रों से पवित्र तीर्थों का जल गिरा ॥१ ८॥ अभिषेक के जल से उसके मुख-कमल के घुल जाने पर, दिशाओं के मुंह भी घुल गये यह आश्चर्य है ! ॥१ ९॥ माताओं द्वारा उसके गले में मङ्गल-मालाएँ पहनाने पर, आकाश ने भी उसी क्षण दिव्य पुष्पों और मालाओं की वर्षा की ॥११ ॥ हर्ष से बजनेवाले देवताओं के वाद्यों की स्पर्धा में मानों आनन्द-वाद्यों के शब्द आकाश में गूँजने लगे ॥१११॥ अभिषेक किए हुए उस युवराज को किसने प्रणाम नहीं किया ? केवल अपने प्रभाव के अतिरिक्त इसी कारण वह ऊँचा उठा ॥११२॥ तब वत्सराज उदयन ने युवराज के बालमित्र अपने मन्त्रियों के पुत्रों को बुलाकर उन्हें युवराज के मन्त्रियों का पद दे दिया ॥११३॥ यौगन्धरायण के पुत्र मरुभूति को मुख्य मंत्री रुमण्वान् के पुत्र हरिशिख को प्रधान सेनापति वसन्तक के पुत्र तपन्तक को विनोद-मन्त्री और इत्यक के पुत्र गोमुख को प्रधान द्वारपाल बना दिया ॥११४ ११५॥ वीर-पिङ्गलिका के पुत्र तथा पुरोहित के भतीजे वैश्वानर तथा शान्तिसोम को युवराज पुरोहित नियुक्त किया ॥११६॥
इत्याज्ञाप्तेषु पुत्रस्य साचिव्ये तेषु भूभृता। गगनादुदभूद् वाणी पुष्पवृष्टिपुरःसरा ॥११७॥ सर्वार्थसाधका एते भविष्यन्त्यस्य मन्त्रिणः। शरीरावयवनिर्भिन्नोऽस्य गोमुखस्तु भविष्यति ॥११८॥ इत्युक्तो दिव्यया वाचा हृष्टो वत्सेश्वरश्च सः। सर्वान्सम्मानयामास वस्त्रैराभरणैश्च तान् ॥११९॥ अनुजीविषु यत्किञ्चन वसु वर्षति राजनि। दरिद्रशब्दस्यैकस्य नासीत्तत्रार्थसङ्गतिः ॥१२०॥ पवनोल्लासिताक्षिप्तपताकापटपङ्क्तिभिः । आहूतेरिव सापूरि नर्तकीचारणैः पुरी ॥१२१॥ आगाद् वैद्याधरी साक्षाल्लक्ष्मीस्तस्यैव भाविनी। कलिङ्गसेना जामातुरुत्सवेऽत्र भविष्यति ॥१२२॥ ततो वासवदत्ता च सा च पद्मावती तथा। हर्षेण ननृतुस्तिस्रो मिलिता इव शक्तयः ॥१२३॥ मारुतान्दोलितलताः प्रनृत्यन्निव सर्वतः। उद्यानतरवोऽप्यत्र चेतनेषु कथैव का ॥१२४॥ ततः कृताभिषेकः सन्नारुह्य जयकुञ्जरम्। नरवाहनदत्तः स युवराजो विनिर्ययौ ॥१२५॥ अवाकीर्यत धोत्क्षिप्तैर्नेत्रैर्ह्रसितारुणैः। पौरस्त्रीभिः स नीलाम्बुजाजपद्माब्जसिप्रमैः ॥१२६॥ दृष्ट्वा च तत्पुरीपूज्यदेवता बन्दिमागधैः। स्तूयमानः ससचिवः स विवेश स्वमन्दिरम् ॥१२७॥ तत्र दिव्यानि भोग्यानि तथा पानान्युपाहरत्। कलिङ्गसेना तस्यादौ स्वविभूत्यधिकानि सा ॥१२८॥ ददौ तस्मै सुवस्त्राणि दिव्यान्याभरणानि च। समन्त्रिसचिभृत्याय जामातृस्नेहकातरा ॥१२९॥ एवं महोत्सवेनासावमृतास्वादसुन्दरः। एषां वत्सेश्वरादीनां सर्वेषां वासरो ययौ ॥१३०॥ ततो निशायां प्राप्तायां सुतोद्वाहविधायिनी। कलिङ्गसेना सम्मन्त्र्य तां सा सोमप्रभां सखीम् ॥१३१॥
षष्ठ लम्बक ७९३
षष्ठ लम्बक ७९३ राजा द्वारा इस प्रकार युवराज के मन्त्रियों के नियुक्त किये जाने पर आकाश से पुष्पवृष्टि के साथ दिव्यवाणी हुई कि 'ये सभी मन्त्री इसके अभिन्नहृदय मित्र होंगे किन्तु गोमुख इसके शरीर से भी भिन्न न होगा' ॥११७-११८॥ इस प्रकार दिव्यवाणी से कहा गया वत्सराज अत्यन्त प्रसन्न हुआ और वस्त्र-आभूषण आदि से उसने सबका सम्मान किया ॥११९॥ उस राजा उदयन के सेवकों पर धन की वर्षा करने पर दरिद्र शब्द के केवल अर्थ की ही संगति नहीं रही¹ ॥१२० ॥ वायु द्वारा आन्दोलित अतएव फड़फड़ाती हुई पताकाओं के वस्त्रों की पंक्ति से मानो यह नगरी निमन्त्रित नर्तकियों और चारणों से भर गई थी ॥१२१॥ होनेवाले कलिङ्गसेना के जामाता के इस महोत्सव में मानो विद्याधरों की राजलक्ष्मी स्वयं आ गई ॥१२२॥ तदनन्तर रानी वासवदत्ता पद्मावती तथा कलिङ्गसेना ये तीनों मिलकर सम्मिलित धत्तियों के समान नाचने लगी ॥१२३॥ वायु द्वारा आन्दोलित लताएं चारों ओर नृत्य कर रही थीं और उद्यानों के वृक्ष इस नृत्य में भाग ले रहे थे। चेतन प्राणियों की तो बात ही क्या है ? ॥१२४॥ अभिषिक्त युवराज नरवाहनदत्त जयकुंजर पर चढ़कर बाहर निकला और नागरिक स्त्रियों के नीलकमल रूपी-लावे (धान के खीलों) की अंजुलियों के समान नील श्वेत और लाल नेत्रों से ढक दिया गया ॥१२५ १२६॥ युवराज सवारी से मयर-देवता का दर्शन करता हुआ एवं बन्दियों और सूतों से स्तुति किया जाता हुआ अपने मन्त्रियों के साथ युवराज-भवन में गया ॥१२७॥ वहां पर सबसे पहले कलिङ्गसेना ने अपने वैभव से भी बढ़कर भोजन-पान की दिव्य वस्तुओं से उनका स्वागत किया और जामाता के स्नेह से गद्गद होकर विविध प्रकार के वस्त्र और आभूषण मन्त्रियों-सहित युवराज को दिये ॥१२८ १२९॥ इस प्रकार, अमृतास्वाद के समान सुन्दर महोत्सव का यह दिवस वत्सराज आदि सबने सुख के साथ व्यतीत किया ॥१३० ॥ रात होने पर कन्या के विवाह के लिए विचार-विमर्श करने के लिए कलिङ्गसेना ने अपनी प्राणप्यारी सखी सोमप्रभा का स्मरण किया ॥१३१॥ १ अर्थात् राज्य में कोई दरिद्र न रह गया।—अनु १
७९४ कथासरित्सागर
७९४ कथासरित्सागर एतया स्मृतमात्रा सा मयासुरसुता तदा । भव्यां भर्त्ता महामानी जगाद नलकूबरः ॥१३२॥ कलिङ्गसेना त्वामद्य सोत्सुका स्मरति प्रिये । तद्गच्छ दिव्यमुद्यानं कुरु चैतत्सुताकृते ॥१३३॥ इत्युक्त्वा भावि भूतं च कथयित्वा च तद्गतम् । तत्रैव प्रेषयामास पत्नीं सोमप्रभां पतिः ॥१३४॥ सा चागत्य चिरोत्कण्ठाकृतकण्ठग्रहां सखीम् । कलिङ्गसेनां कुशलं पृष्ट्वा सोमप्रभाब्रवीत् ॥१३५॥ विद्याधरेण तावत्त्वं परिणीता महद्धिना । अवतीर्णा रतिस्ते च सुता शार्वानुग्रहात् ॥१३६॥ कामावतारस्यैषा च वत्सेशात्मसम्भवन् । नरवाहनदत्तस्य पूर्वभार्या विनिर्मिता ॥१३७॥ विद्याधराधिराज्यं स दिव्यं कल्पं करिष्यति । तस्यैषान्यावरोधानां मूर्ध्नि माया भविष्यति ॥१३८॥ त्वं चावतीर्णा भूलोके शक्रशापच्युताप्सराः । निष्पन्नकार्यशेषा च शापमुक्तिमवाप्स्यसि ॥१३९॥ एतन्मे सर्वमाख्यातं भर्त्रा ज्ञानवता सखि । तस्माच्चिन्ता न ते कार्या भावि सर्वं शुभं तव ॥१४०॥ अहं चेह करोम्येषा दिव्यं स्वतनयाकृते । उद्यानं नास्ति पाताले न भूमौ यन्न वा दिवि ॥१४१॥ इत्युक्त्वा दिव्यमुद्यानं सा निर्माय स्वमायया । कलिङ्गसेनामामन्त्र्य सोत्कां सोमप्रभा ययौ ॥१४२॥ ततो निशि प्रभातायामकस्मात्सम्पूर्णं दिवः । भूमाविव च्युतं लोको ददर्शोद्यानमत्र सत् ॥१४३॥ शुश्राव राजा वत्सैशः सभार्यः सचिवैः सह । नरवाहनदत्तश्च सानुगोऽत्र समाययौ ॥१४४॥ ददृशुस्ते तमुद्यानं सदा पुष्पफलद्रुमम् । नानामणिमयस्तम्भभित्तिभूभागवापिकम् ॥१४५॥ सुवर्णवर्णविहगं दिव्यसौरभमारुतम् । देवादेशावतीर्णं वत्स्वर्गास्तरमिव क्षितौ ॥१४६॥
षष्ठ लम्बक ७१५
षष्ठ लम्बक ७१५ कलिङ्गसेना द्वारा स्मरण की गई मयासुर की कन्या सोमप्रभा को उसके महाज्ञानी पति नलकुबर ने कहा—॥१३२॥ 'प्यारी आज कलिङ्गसेना अत्यन्त उत्कण्ठा से तेरा स्मरण कर रही है इसलिए जाओ और उसके लिए दिव्य उद्यान बनाओ' ॥१३३॥ ऐसा कहकर और कलिङ्गसेना के सम्बन्ध में भूत और भविष्य का वर्णन करके सोमप्रभा को उसके पति ने तुरन्त भेज दिया ॥१३४॥ वह सोमप्रभा भी आकर चिर-उत्कंठा से गल मिलती हुई कलिङ्गसेना से कुशल-समाचार पूछने के उपरान्त कहने लगी—॥१३५॥ 'तू अत्यन्त धनी विद्याधर के साथ विवाहित हुई है और शिवजी की कृपा से तेरे यहाँ रति ने अवतार लिया है ॥१३६॥ तेरी यह कन्या वत्सराज के यहाँ उत्पन्न हुए कामदेव के अवतार नरवाहनदत्त की पूर्व जन्म की पत्नी है ॥१३७॥ वह नरवाहनदत्त दिव्य कल्प वर्षों तक विद्याधरों पर राज्य करेगा और तुम्हारी कन्या उसके यहाँ के स्त्री-समाज में सर्वमान्य और सम्राज्ञी बनी रहेगी ॥१३८॥ तू भी इन्द्र के शाप से भूलोक में पतित पूर्व जन्म की अप्सरा है और कुछ शेष कार्यों को समाप्त करके मुक्ति प्राप्त करेगी ॥१३९॥ हे सखि यह सब मेरे ज्ञानी पति ने मुझे बताया है। और मैं तुम्हारी कन्या के लिए एक उद्यान बना देती हूँ। ऐसा उद्यान पाताल पृथ्वी और स्वर्ग में कहीं भी नहीं होगा' ॥१४०-१४१॥ ऐसा कहकर और अपनी माया से दिव्य उद्यान का निर्माण करके उत्कण्ठित कलिङ्गसेना से पूछकर सोमप्रभा चली गई ॥१४२॥ तदनन्तर प्रातःकाल होते ही लोगों ने उस उद्यान को इस प्रकार देखा मानो स्वर्ग का नन्दन-वन अकस्मात् यहाँ उतर पड़ा हो ॥१४३॥ इस समाचार को सुनकर वत्सराज अपनी पत्नियों और मन्त्रियों-सहित वहाँ आया। युवराज नरवाहनदत्त भी अपने साथियों के साथ वहाँ गया ॥१४४॥ राजा ने वहाँ उस उद्यान को देखा जिसमें सदा फल और फूल देनेवाले वृक्ष लगे हुए थे। विविध प्रकार के मणिरत्न-समूहों द्वारा चबूतरा और बावलियों से वह शोभित था। उसमें स्वर्णिम पक्षी विहार कर रहे थे। दिव्य सुगन्धवाली वायु बह रही थी। यह सब देखकर ऐसा प्रतीत होता था कि मानो देवताओं की आज्ञा से पृथ्वी पर दूसरे स्वर्ग का निर्माण किया गया हो ॥१४५-१४६॥
७९६ कथासरित्सागर
७९६ कथासरित्सागर दृष्ट्वा तदद्भुतं राजा किमेतदिति पृष्टवान्। कलिङ्गसेनामातिथ्यमग्र्यं वत्सेश्वरस्तदा ॥१४७॥ सा प्रत्युवाच सर्वेषु शृण्वत्सु नृपतिं च तम्। विश्वकर्मावतारोऽस्ति मयो नाम महासुरः ॥१४८॥ युधिष्ठिरस्य यश्चक्रे पुरं रम्यं च दक्षिण। तस्य सोमप्रभा नाम तनयास्ति सखी मम ॥१४९॥ तया रात्राविहागत्य मत्समीपं स्वमायया। प्रीत्या कृतमिदं दिव्यमुद्यानं मत्सुताकृते ॥१५०॥ इत्युक्त्वा यच्च सख्यास्या मूर्त्तं माभ्युदितं तया। तत्तथैवोक्तमित्युक्त्वा तदा सर्वं शशंस सा ॥१५१॥ ततः कलिङ्गसेनोक्तिं ससंवादामवेक्ष्य_ताम्। निरस्तसंशयाः सर्वे तोषं तत्रातुलं ययुः ॥१५२॥ कलिङ्गसेनातिथ्येन निनाय दिवसं च तत्। उद्यानेनैव वत्सेशो भार्या पुत्रादिभि सह ॥१५३॥ अन्येद्युर्निर्गतो द्रष्टुं देवं देवकुले च सः। ददर्श नृपतिर्बह्वी सुवस्त्राभरणाः स्त्रियः ॥१५४॥ का यूयमिति पृष्टाश्च तेन तास्तं वभाषिरे। वयं विद्याः कलाश्चैतास्त्वत्पुत्रार्थमिहागताः ॥१५५॥ गत्वा विशाम स्तस्तान्तरित्युक्त्वा तास्तिरोऽभवन्। सविस्मयः स राजापि वत्सेशोऽभ्यन्तरं ययौ ॥१५६॥ तत्र वासवदत्तायै देव्यै मन्त्रिगणाय च। तच्छशंसाम्यनन्दंस्ते देवानुग्रह च तम् ॥१५७॥ ततो राजनिवेशनं वीणा वासवदत्तया। नरवाहनदत्तेऽत्र प्रविष्टे जगृहे क्षणात् ॥१५८॥ वादयन्तीं ततस्तां च मातरं विनयेन सः। राजपुत्रोऽब्रवीद् वीणा च्युता स्थानादसाविति ॥१५९॥ त्वं वाद्य गृहाणैतामिति पित्रोदितेऽथ सः। वीणामवादयत् कुर्वन् गन्धर्वानपि विस्मितान् ॥१६०॥ एवं सर्वासु विद्यासु कलासु च परीक्षितः। पित्रा यावद् वृतस्ताभिः स्वयं सर्वं विवेद सः ॥१६१॥
षष्ठ लम्बक ७९७
षष्ठ लम्बक ७९७ उस अद्भुत उद्यान को देखकर वत्सराज ने स्वागतातिथ्य में व्यग्र कलिङ्गसेना से पूछा कि 'यह सब क्या है ? ॥१४७॥ तब कलिङ्गसेना सबके सामने राजा से बोली—'महाराज ! विश्वकर्मा का अवतार मयासुर नाम का एक महान् असुर है, जिसने इन्द्र की आज्ञा से युधिष्ठिर का सुन्दर नगर बनाया था। सोमप्रभा नाम की उसी की कन्या मेरी सखी है। उसने रात में मेरे पास आकर अपनी माया के और अपने ही प्रेम से मेरी कन्या के लिए यह उद्यान बनाया है' ॥१४८-१५०॥ ऐसा कहकर, और भी सहेली ने भूत एवं भविष्य की जो बातें बताई थीं राजा को उसी प्रकार सुना दीं ॥१५१॥ तब सभी ने कलिङ्गसेना की बात को प्रामाणिक मानकर, संशय-रहित होकर परम हर्ष और विश्वास प्रकट किया ॥१५२॥ वत्सराज ने वह समस्त दिन अपनी स्त्री और पुत्र आदि के साथ कलिङ्गसेना के स्वागत में ही व्यतीत किया ॥१५३॥ दूसरे दिन देव-मन्दिर में दर्शन के लिए गये राजा ने सुन्दर और बहुमूल्य वस्त्राभरणों से अलंकृत स्त्रियों को देखा ॥१५४॥ 'तुम सब कौन हो'—राजा के इस प्रकार पूछने पर वे स्त्रियाँ कहने लगीं—'हम सब विद्याएँ और कलाएँ हैं और तुम्हारे पुत्र के लिए यहाँ आई हैं ॥१५५॥ अब जाकर उसी में प्रवेश करती हैं, इतना कहने के उपरान्त वे सब अन्तर्धान हो गईं और आश्चर्यचकित राजा भी मन्दिर के भीतर गया ॥१५६॥ उसने वहाँ जाकर यह वृत्तान्त अपनी रानियों और मन्त्रियों को सुनाया। सब उसे देवता का अनुग्रह समझकर उसका अभिनन्दन करने लगे ॥१५७॥ तदनन्तर राजा की आज्ञा से वासवदत्ता ने भी वीणा उठाई और राजकुमार नरवाहनदत्त ने मन्दिर में प्रवेश किया ॥१५८॥ वीणा बजाती हुई माता से राजकुमार ने नम्रतापूर्वक कहा—'तुम्हारी वीणा स्थान (स्वर-स्थापन की मात्रा) से भ्रष्ट हो रही है ॥१५९॥ तदनन्तर तू इसे ले और बजा' पिता की आज्ञा पाकर वीणा बजाते हुए राजकुमार ने गन्धर्वो को भी विस्मित कर दिया ॥१६०॥ इस प्रकार, सभी विद्याओं और कलाओं में पिता द्वारा परीक्षित राजकुमार ने उत्तीर्णता प्राप्त की। वह स्वयं सब कुछ जान गया था ॥१६१॥