भारतकोश
कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५)

कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५)

महाकवि सोमदेव भट्ट द्वारा

स्रोत: कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1960 (उद्गम)

DevanagariHindipublished876 पृष्ठ

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तृतीय लम्बक १२५ मुँह से आग की ज्वाला उगलते हुए उसके कन्धे पर बैठकर साधक प्रव्राजक राजकुमारी को लाने के लिए आकाश-मार्ग से चला ॥१६५॥ विदूषक यह सारी घटना देखकर सोचने लगा कि मेरे जीते-जी यह राजकुमारी का वध कैसे करेगा ? ॥१६६॥ इसलिए मैं तबतक यहीं ठहरता हूँ जबतक वह नीच आता है। ऐसा सोचकर वह वहीं छिपा रहा ॥१६७॥ इस प्रकार आकाश में उड़ता हुआ प्रव्राजक खिड़की के रास्ते से राजकुमारी के भवन में जा पहुँचा ॥१६८॥ उसने उसे इस प्रकार पकड़ा जिस प्रकार अंधकारपूर्ण आकाश में कान्ति फैलानेवाली शशिकला को राहु पकड़ता है ॥१६९॥ इतने में ही अरे बाप ! अरी मां ! इस प्रकार चिल्लाती हुई राजकन्या को लिये हुए वह नीच आकाश से नीचे उतरा। उस बैताल (मुर्दे) को उसी प्रकार छोड़कर कन्या को लेकर देवी की मूर्ति के समीप पहुँचा ॥१७०-१७१॥ वह जब राजकुमारी का वध करने के लिए तैयार हुआ इतने में ही तलवार खींचे हुए विदूषक भी मन्दिर में घुसा और बोला—'ओ पापी ! मालती के फूल को पत्थर से पीसना चाहता है जो इस कोमल कन्या पर शस्त्र प्रहार करना चाहता है' ॥१७२-१७३॥ ऐसा कहकर और उसकी जटा पकड़कर विदूषक ने साधक संन्यासी का वध कर डाला और भय से काँपती हुई एवं अत्यन्त सिकुड़ती हुई राजकन्या को धीरज बँधाया ॥१७४ १७५॥ वह सोचने लगा कि अब इसे (राजकुमारी को) फिर रतिवास में कैसे पहुँचाऊँ ? ॥१७६॥ इतने में ही आकाशवाणी हुई—'हे विदूषक ! तुमने इस प्रव्राजक को मारा है इसे यह बैताल और सरसों सिद्ध थे ॥१७७॥ इसीलिए इसकी पृथ्वी का राज्य और राजकुमारी को प्राप्त करने की इच्छा उत्पन्न हो गई थी। किन्तु आज यह ठगा गया ॥१७८॥ इसलिए हे वीर ! तुम उसके सरसों के दाने ले लो इससे केवल एक आज की रात तुम्हारी आकाश में गति हो जायगी' ॥१७९॥