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कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५)

महाकवि सोमदेव भट्ट द्वारा

स्रोत: कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1960 (उद्गम)

DevanagariHindipublished876 पृष्ठ

षष्ठ लम्बक ७०५

षष्ठ लम्बक ७०५ पञ्चम तरङ्ग कलिङ्गसेना और सोमप्रभा की कथा (चालू) तदनन्तर दूसरे दिन प्रातःकाल आई हुई सहेली सोमप्रभा से विश्वस्त बातें करती हुई कलिङ्गसेना कहने लगी ॥१॥ मेरा पिता मुझे प्रसेनजित् को अवश्य दे देगा यह निश्चित है। यह मैंने अपनी माता से सुना है और तूने उस वृद्ध प्रसेनजित् को देखा है ॥२॥ वत्सराज को तो रूप (सुन्दरता) में जैसा तूने वर्णित किया है कि उसने कानों के मार्ग से प्रवेश करके मेरा हरण कर लिया है ॥३॥ इसलिए पहले मुझे प्रसेनजित् को दिखाओ। और, मुझे वहाँ भी ले चलो जहाँ वत्सराज है। पिता से क्या प्रयोजन और माता से भी क्या करना है ॥४॥ इस प्रकार कहती हुई उत्कंठित कलिङ्गसेना को सोमप्रभा ने कहा—'यदि चलना है तो यन्त्रचालित आकाशयान से चलें ॥५॥ किन्तु तुम अपने वस्त्र आभूषण और सबलों को साथ ले लो क्योंकि वत्सराज को देखकर फिर तुम लौट न सकोगी ॥६॥ फिर तुम माता-पिता को न देखोगी और न उन्हें स्मरण ही करोगी अर्थात् सब भूल जाओगी ॥७॥ और हे सखि न मैं ही तुम्हारे पति के घर आऊँगी'। यह सुनकर आँसू बहाती हुई राज- कुमारी सखी से बोली ॥८॥ 'मेरी प्यारी सखी यदि ऐसा है, तो तुम वत्सराज को ही यहाँ ले आओ। मैं तेरे बिना यहाँ एक क्षण भी न ठहर सकूँगी ॥९॥ क्या चित्रलेखा ने उपाय करके अनिरुद्ध को उषा के पास नहीं ला दिया था ? इस कथा को जानती हुई भी तुम मुझसे सुनो ॥१०॥ उषा और अनिरुद्ध की कथा उषा के नाम से प्रसिद्ध बाणासुर की कन्या थी। उसने गौरी की आराधना की और गौरी ने उसे पति-प्राप्ति का वरदान दिया ॥११॥ 'कि स्वप्न में तुम जिसका संग प्राप्त करोगी वही तुम्हारा पति होगा' ॥१२॥ तब उसने एकबार देवकुमार के समान किसी को स्वप्न में देखा। गान्धर्व विधि से उसके साथ विवाह आदि किया और प्रातःकाल उठी ॥१३॥ उठने पर स्वप्न में देखे हुए उस पति को न देखकर और सम्भोग के लक्षणों को देखकर गौरी के वर को स्मरण करके वह आतंक और भय से व्याकुल हो गई ॥१४॥ ८९

७६ कथासरित्सागर

७६ कथासरित्सागर ताम्यन्ती च ततः सा तं स्वप्ने दृष्ट्वा प्रियं विना। पृच्छन्त्यै चित्रलेखायै सख्यै सर्वं शशंस तत्॥१५॥ सापि नामाद्यभिज्ञानं न किञ्चित्तस्य जानती। योगेश्वरी चित्रलेखा तामुपायममब्रवीत् ॥१६॥ सखि देवीवरस्यायं प्रभावोऽत्र किमुच्यते। किं त्वभिज्ञानशून्यस्ते सोऽन्वेष्टव्यः प्रियः कथम्॥१७॥ परिजानासि चेत् ते ससुरासुरमानुषम्। जगल्लिखामि तन्मध्यं तं मे दर्शय येन सः॥१८॥ आनीयते मयेत्युक्ता सा तथेत्युदिते तया। चित्रलेखा क्रमाद् विश्वमलिखद् वर्णवर्तिभिः॥१९॥ तत्रोषा सोऽयमित्यस्या हृष्टाङ्गुल्या सकम्पया। द्वारवत्यां यदुकुलादमिरुद्धमदर्शयत्॥२०॥ चित्रलेखा ततोऽवादीत् सखि धन्यासि यत्त्वया। भर्त्तानिरुद्धः प्राप्तोऽयं पौत्री भगवतो हरेः॥२१॥ योजनानां सहस्रेषु षष्टौ वसति स त्वितः। तच्छ्रुत्वा साधिकौत्सुक्यवशात्तामब्रवीदुषा॥२२॥ माद्य चेत्सरिस तस्याङ्गं अये श्रीखण्डशीतलम्। तदत्युद्दामकामान्निर्दग्धां विद्धि मां मृताम्॥२३॥ श्रुत्वैतच्चित्रलेखा सा तामाश्वास्य प्रियां सखीम्। तदैवोत्पत्य नभसा ययौ द्वारवतीं पुरीम्॥२४॥ ददर्श च पृथुशृङ्गेमन्दिरेरत्नमम्यगाम्। कुर्वती त पुन क्षिप्यमन्त्राञ्चितित्तरभ्रमम्॥२५॥ तस्यां सुप्तं निशि प्राप्य सानिरुद्धं विबोध्य च। उषाऽनुरागं त तस्मै शशंस स्वप्नदर्शनात् ॥२६॥ आदाय भारतरूपस्त्वप्नवृत्तान्तमेव सम्। सोऽतं सिद्धिप्रभावेण क्षणेनैवाययौ ततः॥२७॥ एत्य चावेक्षमाणायास्तस्याः सख्याः सबर्मना। प्रावेशयदुपायास्तं गुप्तमन्तःपुरं प्रियम्॥२८॥ १ स्वप्नन्तमेवानिरुद्धं समागमत् चित्रलेखेति ज्ञायते।

षष्ठ लम्बक ७७

षष्ठ लम्बक ७७ स्वप्न में देखे हुए पति को न पाकर व्याकुल हुई। इसीलिए पूछती हुई सखी से चित्रलेखा ने और, सब समाचार कह दिया॥१५॥ योगेश्वरी चित्रलेखा भी उसके नाम-धाम आदि का परिचय न जानती हुई उषा को इस प्रकार कहने लगी॥१६॥ 'हे सखि यह देवी पार्वती के वर का प्रभाव है। इसमें क्या कहा जा सकता है। किन्तु परिचय से रहित वह तेरा प्रियतम कैसे खोजा जा सकता है? ॥१७॥ 'यदि तू उसे नहीं पहचानती है तो मैं संसार के सुन्दर देवताओं असुरों और मनुष्यों के चित्र बनाती हूँ उनमें तू मुझे उसे पहचान कर दिखा ॥१८॥ 'मैं उसे लाती हूँ।' ऐसा कहने पर चित्रलेखा ने क्रमशः रंग की कूँचियों से सभी सुन्दर व्यक्तियों के चित्र लिखे॥१९॥ तब उषा ने काँपती हुई अँगुली से द्वारकापुरी के यदुवंशीय अनिरुद्ध को पहचान कर दिखाया ॥२०॥ यह देखकर चित्रलेखा बोली—'सखि तू धन्य है, जो तूने भगवान् कृष्ण के पौत्र अनिरुद्ध को अपना पति प्राप्त किया॥२१॥ वह यहाँ से साठ हजार योजन (२४ कोस) की दूरी पर है। यह सुनकर अधिक उत्कण्ठा के वश होकर उषा बोली॥२२॥ 'सखि यदि आज मैं उसकी चंदन के समान शीतल गोद में न बैठी तो अति प्रचंड कामाग्नि से मुझे दग्ध समझो। अर्थात् मर जाऊँगी' ॥२३॥ यह सुनकर चित्रलेखा सखी उषा को धैर्य देकर आकाश में उड़कर द्वारावती नगरी में पहुँची॥२४॥ उसने समुद्र के मध्य ऊँचे-ऊँचे भवनों से शोभित द्वारकापुरी को देखा जो पर्वत-शिखरों के समान ऊँचे भवनों से समुद्र-मन्थन करने के लिए पुनः समुद्र में फेंके हुए मन्दराचल के शिखर का भ्रम उत्पन्न कर रही थी॥२५॥ उस चित्रलेखा ने वहाँ रात में शयन करते हुए अनिरुद्ध को जगाकर, उसके प्रति स्वप्न देखने से उत्पन्न हुए गाढ़े अनुराग का परिचय दिया ॥२६॥ उसी प्रकार के स्वप्न देखने में उत्कण्ठित अनिरुद्ध को लेकर वह योगेश्वरी चित्रलेखा सिद्धि के प्रभाव से रात भर में बाण-नगरी में आ गई॥२७॥ यहाँ लाकर अनिरुद्ध को उसका पथ निहारती हुई उषा के महल में युक्ति द्वारा पहुँचा दिया॥२८॥ १ भागवत के अनुसार चित्रलेखा सोये अनिरुद्ध को शोणस्तन से उड़ा ले गई थी।

७८ कथासरित्सागर

७८ कथासरित्सागर

सा दृष्ट्वैवानिरुद्धं समुपा साक्षादुपागतम्। अमृतांशुमिवाम्भोधिबेला नाङ्गेष्ववर्तत ॥२९॥ ततस्तेन समं तस्यौ सखीवत्तेन तत्र सा। जीवितेनेव मूर्तेन वल्लमेन यमासुखम् ॥३०॥ सम्मानात् पितर चास्याः शुद्ध बाणं जिगाय सः। अनिरुद्धः स्ववीर्येण पितामहबलेन च ॥३१॥ ततो द्वारवतीं गत्वा तावभिनन्दतू उभौ। उषानिरुद्धौ भ्राजते गिरिजाशङ्कराविव ॥३२॥ इत्युपायाः प्रियोऽङ्गेव मेलितश्चित्रलेखया। त्वं सप्रभाबाप्यधिका ततोऽपि सखि मे मता ॥३३॥ तममानय वत्सैशमिह मास्म चिरं कृथाः। एव कलिङ्गसेनातः श्रुत्वा सोमप्रभाब्रवीत् ॥३४॥ चित्रलेखा सुरस्त्री सा समत्क्षिप्यानयत्परम्। मानुषी किं विदध्यात् परस्परधि कुर्वती ॥३५॥ सत्वं नयामि तत्रैव यत्र वत्सेश्वरः सस्ति। प्राप्तप्रसेनजित तं से दर्शयित्वा त्वदर्शिनम् ॥३६॥ इति सोमप्रभोक्ता सा तथेत्युक्त्वा तया सह।

कलिङ्गसेनाया कौशाम्बीयात्रा

कलिङ्गसेना सस्कृप्तं मायायन्त्रविमानकम् ॥३७॥ तदेवारुह्य नमसा सकोपा सपरिच्छदा। हृतप्रास्थामिका प्रायात् पित्रोरविदिता ततः ॥३८॥ न हि पश्यति तुङ्गं वा दवभ्रं वा स्त्रीजनोऽग्रतः। स्मरेण नीतः परमां धारां वाजीव सादिना ॥३९॥ श्रावस्तीं प्राप्य पूर्वं च तं प्रसनजित नृपम्। मृगयानिर्गतं दूराज्जरा पाण्ड ददर्श सा ॥४०॥ श्वाद् व्रजास्मादिति तां दूरादिव निषेधतः। उडूयमानेन मुहुश्चामरेणोपलक्षिताम् ॥४१॥ सोऽयं प्रसनजिद्राजा पित्रास्मै स्वां प्रदिसिता। पश्येति सामप्रभया दर्शितं सोपहामया ॥४२॥

उषा साक्षात् आते हुए अनिरुद्ध को देखकर इस प्रकार अपने अंगों से बाहर हो गई जिस प्रकार चन्द्र-दर्शन से समुद्र की बेला अपनी सीमा से बाहर हो जाती है ॥२९॥ तदनन्तर उषा मन्त्री द्वारा दिये गये मूर्तिमान् जीवन के समान उस प्राणप्यारे अनिरुद्ध के साथ सुखपूर्वक रहने लगी ॥३०॥ इस बात को जानकर वृद्ध बाणासुर को अनिरुद्ध ने अपने तथा अपने पितामह श्रीकृष्ण के बल से जीत लिया ॥३१॥ तदनन्तर अभिप्रेतशरीर ये दोनों द्वारकापुरी में जाकर पार्वती और शंकर के समान प्रसिद्ध हुए ॥३२॥ इस प्रकार उषा को सखी चित्रलेखा ने शीघ्र ही उसके प्रियतम से उसे मिला दिया था। हे सखि मैं तुम्हें चित्रलेखा से भी अधिक प्रभावशालिनी समझती हूँ ॥३३॥ इसलिए उस वत्सराज को यहाँ ले आओ। विलम्ब न करो। कलिङ्गसेना से ऐसा सुन कर सोमप्रभा बोली—॥३४॥ 'वह चित्रलेखा देवस्त्री थी इसलिए दूसरे पुरुष को उठा लाई किन्तु पर-पुरुष का स्पर्श भी न करनेवाली मैं यह कार्य कैसे कर सकती हूँ ॥३५॥ इसलिए तुझे ही वहाँ ले जाती हूँ जहाँ वत्सराज है। उससे पहले मैं तुम्हें माँगनेवाले प्रसेनजित् को भी दिखा दूँगी' ॥३६॥ कलिङ्गसेना की कौशाम्बी-यात्रा इस प्रकार सोमप्रभा से कही गई कलिङ्गसेना उसकी बात को मानकर उसके साथ माया- यन्त्र-चालित आकाशयान से अपने सामान और अंतरंग सेवकों के साथ माता-पिता से छिपकर चली गई ॥३७-३८॥ सच है कामदेव द्वारा वेगवती धारा में पहुँचाई गई स्त्रियाँ ऊँचा-नीचा नहीं देखतीं जिस प्रकार सरपट चाल से चलते हुए घोड़े का सारथी ऊँचा-नीचा नहीं देख पाता ॥३९॥ पहले श्रावस्ती नगरी में पहुँचकर शिकार के लिए निकले हुए और वृद्धावस्था से पीले पड़े हुए प्रसेनजित् को उसने दूर से ही देखा ॥४०॥ उस राजा के दोनों ओर डुलाये जाते हुए चँवर, मानों सोमप्रभा को 'इस वृद्ध से दूर रहो'—इस प्रकार कहकर दूर से ही निषेध कर रहे थे ॥४१॥ हँसती हुई सोमप्रभा ने कलिङ्गसेना से उस राजा को दिखाते हुए कहा—'देखो यही वह वृद्ध प्रसेनजित् राजा है। जिसे तुम्हारा पिता तुम्हें दे रहा है ॥४२॥

जरयाय वृतो राजा का वृणीतेऽपरा त्वमुम्। तदितः सखि शीघ्रं मां नय वत्सेश्वरं प्रति ॥४३॥ इति सोमप्रभां प्रोक्त्वा तत्क्षण सा तया सह। कलिङ्गसेना व्योम्नैव कौशाम्बी नगरीं ययौ ॥४४॥ तत्रोद्यानगत सा तं वत्सेशं सख्युदीरितम्। ददर्श दूरात् सोत्कण्ठा चकोरीवामृतत्विषम् ॥४५॥ सा तद्वुत्फुल्लया दृष्ट्या दृश्यस्तेन च पाणिना। प्रविष्णोऽथ पथानेन मामत्रेत्यब्रवीदिव ॥४६॥ सखि सङ्गमयाद्यैव वत्सराजेन मामिह। एनं विलोक्य हि स्थातुं न शक्ता क्षणमप्यहम् ॥४७॥ इति चोक्तवतीं सा या सखी सोमप्रभाब्रवीत्। अद्याशुभं मया किञ्चिन्निमित्तमुपलक्षितम् ॥४८॥ तदिदं दिवस तूष्णीमुद्यानेऽस्मिन्नलक्षिता। अधितिष्ठस्व मा कार्षी सखि दूरं गतागतम् ॥४९॥ प्रातरागत्य युक्तिं वा घटयिष्यामि सङ्गमे। अधुना गन्तुमिच्छामि भर्तुश्चित्तगृहे गृहम् ॥५०॥ इत्युक्त्वा तामवस्थाप्य ययौ सोमप्रभा ततः। वत्सराजोऽपि चोद्यानात् स्वमन्दिरमवाविशत ॥५१॥ ततः कलिङ्गसेना सा तत्रस्था स्वमहत्तरम्। यथा सर्वं स्वसन्देशं गत्वा वत्सेश्वरं प्रति ॥५२॥ प्राहिणोल्लाङ्घिनिपिच्छापि स्वसख्या शकुनज्ञया। स्वतन्त्रार्थमनवाञ्छो युवतीनां मनोरमः ॥५३॥ स च गत्वा प्रतीहारमुखेनावद्य तत्क्षणम्। महत्तर प्रविष्टोऽथ वत्सराजं व्यजिज्ञपत् ॥५४॥ राजन्नस्ति नृदस्तस्य रागस्तत्प्रणिधापने। सुता कलिङ्गसेनाख्या श्रुत्वा स्वां रूपसम्पदम् ॥५५॥ स्वयंवरार्थमिह ते सम्प्राप्ता त्यक्तबान्धवा। मायायन्त्रविमानेन सानुगा व्योमगामिना ॥५६॥ आनीता गन्धचारिण्या सख्या सोमप्रभाह्वया। मद्यामुद्यानलग्ना न लङ्घयेदथार्यया ॥५७॥ तया विज्ञापनायाः प्रेषितः स्वीकुरुष्व ताम्। युवयोरस्तु यागार्थं कौमुदीवन्यायिव ॥५८॥

षष्ठ लम्बक ७११ 'यह राजा जराक्रान्त (बुढ़ावस्था से घिरा हुआ) है। अब इसे कौन दूसरी स्त्री वरेगी ? इसलिए सखि मुझे यहाँ से शीघ्र वत्सराज की ओर ले चल' ॥४३॥ सोमप्रभा से इस प्रकार कहकर कलिङ्गसेना उसी समय कौशाम्बी नगरी को गई ॥४४॥ वहाँ पर उद्यान में बैठे हुए और सोमप्रभा द्वारा दिखाये गये वत्सराज को उसने ऐसे देखा जैसे चकोरी चन्द्रमा को देखती है ॥४५॥ कलिङ्गसेना खिली हुई आँखों से उसे देखती हुई हृदय पर हाथ रखकर मानों यह कहने लगी कि 'यह आँखों के मार्ग से यहाँ कैसे घुस गया है ?' ॥४६॥ 'यदि आज ही तू मुझे इससे मिला दे। मैं इसे देखकर अब एक क्षण भी नहीं ठहर सकती' ॥४७॥ कलिङ्गसेना के ऐसा कहने पर सोमप्रभा बोली- आज मैंने कुछ अशुभसूचक शकुन देखा है ॥४८॥ इसलिए आज के दिन तुम इस उद्यान में छिप कर रहो। अति दूर तक जाना-आना न करना। एक ही स्थान पर चुपचाप बैठी रहो ॥४९॥ प्रातःकाल आकर तुम दोनों को मिलाने का कोई उपाय करूंगी। अपने स्वामी के हृदय की घर में बनी हुई है सखी ! मैं तो अभी अपना घर जाना चाहती हूँ ॥५०॥ ऐसा कहकर और उसे उद्यान के एकान्त स्थान में ठहराकर सोमप्रभा चली गई। और वत्सराज भी उद्यान से भवन को चला गया ॥५१॥ तब शकुन जाननेवाली सखी सोमप्रभा से रोके जाने पर भी कलिङ्गसेना ने अपने प्रतीहार को वास्तविक बातें बताकर वत्सराज के पास सन्देश देकर भेजा और निवेदन किया—॥५२-५४॥ हे राजन् ! तक्षशिला के राजा कलिङ्गदत्त की कन्या कलिङ्गसेना तुम्हें अत्यधिक सुन्दर समझकर अपने बन्धु-बान्धवों को छोड़कर, यन्त्रचालित विमान से अपने अनुचरों के साथ तुम्हारा स्वयं वरण करने के लिए आई है। उसे मयासुर की आकाशचारिणी कन्या और नल- कूबर की स्त्री सोमप्रभा ने यहाँ पहुँचाया है। उस राजकुमारी ने मुझे आपसे यह निवेदन करने। के लिए भेजा है कि आप उसे स्वीकार करें। चन्द्र और चन्द्रिका के समान तुम दोनों का सुन्दर समागम हो' ॥५५-५८॥

४१२ कथासरित्सागर

४१२ कथासरित्सागर एव महत्तराच्छ्रुत्वा तं सद्येत्यभिनन्द्य च। प्रहृष्टो हेमवस्त्राद्यैर्वत्सराजोऽभ्यपूजयत् ॥५९॥ आहूय चाब्रवीन्मित्रमुख्यं यौगन्धरायणम्। राज्ञः कलिङ्गदत्तस्य ख्यातरूपा क्षितौ सता ॥६०॥ स्वयं कलिङ्गसेनाख्या वरणाय ममागता। तद्ब्रूहि शीघ्रमत्यन्त्यां कदा परिणयामि ताम् ॥६१॥ महामन्त्रिणो यौगन्धरायणस्य कूटनीतिचक्रम् इत्युक्तो वत्सराजेन मन्त्री यौगन्धरायणः। अस्यायतिहितापेक्षी क्षणमेवमचिन्तयत् ॥६२॥ कलिङ्गसेना या तावत्ख्यातरूपा जगत्त्रये। नास्त्यन्या तादृशी तस्यै स्पृहयन्ति सुरा अपि ॥६३॥ तां लब्ध्वा वत्सराजोऽयं सर्वमन्यत्परित्यजेत्। देवी वासवदत्ता च ततः प्राणैर्वियुज्यते ॥६४॥ नरवाहनदत्तोऽपि नश्येद्राजसुतस्ततः। पद्मावत्यपि तत्स्नेहाद्देवी जीवति दुष्करम् ॥६५॥ ततश्चण्डमहासेनप्रद्योतौ पितरौ द्वयोः। देव्योर्विमुञ्चत प्राणात् विकृतिं वापि गच्छतः ॥६६॥ एवं च सर्वनाशः स्यान्न च युक्तं निषेधनम्। राज्ञोऽस्य व्यसनं यस्माद् वारितस्याधिकीभवेत् ॥६७॥ तस्मान्नुप्रवेशस्य सिद्धयै कालं हराम्यहम्। इत्यालोच्य स वत्सेशं प्राह यौगन्धरायणः ॥६८॥ देव धन्योऽसि यस्यैषा स्वयं ते गृहमागता। कलिङ्गसेना भृत्यत्वं प्राप्तश्चतत्पिता नृपः ॥६९॥ तत्ख्या गणकान् पृष्ट्वा सुलग्नेऽस्या यथाविधि। कार्यः पाणिग्रहो राज्ञो बृहतो दुहिता ह्यसौ ॥७०॥ अद्यास्या दीयतां साधुयोग्यं वासगृहं पृथक्। दासीदासा विमृग्यन्तां वस्त्राण्याभरणानि च ॥७१॥ इत्युक्तो मन्त्रिममुख्येन वत्सराजस्तथेति तत्। प्रहृष्टहृदयः सर्व्वं सविदार्य्य चकार सः ॥७२॥

पष्ठ लम्बक ११०

पष्ठ लम्बक ११० मन्त्रिसेना व प्रतीहार से घिर गुप्तचर और अपना मन्त्रणागृह बनाकर मन्त्रणा करने लगा और शकुन्त कन्याहरण आदि आख्यान से उसका समाधान-सत्कार किया ॥ ६६ ॥ और मन्त्री यौगन्धरायण को समझाकर कहा—'पृथ्वी में अपनी सुन्दरता से जिन अत्यन्त प्रसिद्ध कन्याओं का कवियों द्वारा गायन किया गया है। मेरा स्मरण करने के लिए उनमें से तुम (एक) उत्तम कन्या खोजकर (मुझे) लाओ जिससे मैं उसका परिणय करूँ ।' ॥ ६७ ॥ ॥ ६७ ॥ इति यौगन्धरायण का राजनैतिक षड्यन्त्र राजा से इस प्रकार कहा गया यौगन्धरायण राजा के भावी कल्याण की चिन्ता करता हुआ अपने घर के लिए प्रस्थान लगा—॥ ६८ ॥ सिंहवर्मन् की पुत्री पद्मावती का समाचार पाकर वह (मन्त्री यौगन्धरायण) विचारने लगा—'इस समय इस विषय में केवल यह (पद्मावती) ही विचारणीय है। उन दोनों की अत्यन्त मैत्री है॥ ६९ ॥' ...

७१४ कथासरित्सागर

७१४ कथासरित्सागर कलिङ्गसेना च ततः प्रविश्या वासवेश्म तत्। स्वमनोरथमासन्नं मत्वा प्राप परां मुदम् ॥७३॥ यौगन्धरायणः सोऽपि क्षणाद्राजकुलात्ततः। निर्गत्य स्वगृहं गत्वा धीमानेवमचिन्तयत् ॥७४॥ प्रायोऽशुभस्य कार्यस्य कालद्वारः प्रतिक्रिया। तथा च वृत्रशत्रौ प्राग्ब्रह्महत्यापलायिते ॥७५॥ देवराज्यमवाप्तेन नहुषेणामियाचिता। रक्षिता देव गुरुणा शची शरणमार्थिता ॥७६॥ अद्य प्राप्स्यति त्वामित्युक्त्वा कालहारतः। यावत्स भ्रष्टो नहुषो हुङ्काराद् ब्रह्मणापतत् ॥७७॥ प्राप्तश्च पूर्ववच्छक्रः स पुनर्वैराजताम्। एवं कलिङ्गसेनार्थे कालः क्षेप्यो मया प्रभोः ॥७८॥ इति सञ्चिन्त्य सर्वेषां गणकानां स सन्विदम्। दूरलग्नप्रदानाय मन्त्री गुप्तं व्यघातयत् ॥७९॥ अथ विज्ञाय वृत्तान्तं देव्या वासवदत्तया। आहूय स महामन्त्री स्वमन्दिरमनीयत ॥८०॥ तत्र प्रविष्टं प्रणतं रुदती सा जगाद तम्। आर्य! पूर्वं त्वयोक्तं मे यथा देवि मयि स्थिते ॥८१॥ पद्मावत्या ऋते मान्या सपत्नी ते भविष्यति। कलिङ्गसेनाप्यथैषा पश्येह परिणेष्यते ॥८२॥ सा च रूपवती तस्यामार्यपुत्रश्च रज्यति। अतो वितथवादी त्वं जातोऽहं च मृताधुना ॥८३॥ तच्छ्रुत्वा तामवोचत्स मन्त्री यौगन्धरायणः। धीरा भव क्व ह्येतद्देवि स्यान्मम जीवतः ॥८४॥ त्वया तु नात्र कर्तव्या राज्ञोऽस्य प्रतिकूलता। प्रत्युतावलम्ब्य धीरत्वं दर्शनीयानुकूलता ॥८५॥ नातुष्टः प्रतिकूलोक्तैर्वशो वैद्यस्य वर्तते। वर्तते स्वनुकूलोक्तौ साम्नैवाचरतः क्रियाम् ॥८६॥ प्रतीपं कृष्यमाणो हि नोत्तरेदुत्तरोत्तरः। वाह्यमानोऽनुकूलस्तु नोद्योगान् व्यसनात्तथा ॥८७॥ अतः समीपमायान्तं राजानं त्वमविक्रिया। उपचारैरुपचरेः संवृत्याकारमात्मनः ॥८८॥

षष्ठ लम्बक ७१५

षष्ठ लम्बक ७१५ कलिङ्गसेना भी नये बाह्य भवन में जाकर अपना मनोरथ सिद्ध समझकर अत्यन्त प्रसन्न हुई॥७३॥ बुद्धिमान् यौगन्धरायण भी राजभवन से तुरन्त अपने घर जाकर इस प्रकार सोचने लगा। समय व्यतीत करना ही अधुना कार्य का प्रतिकार है। पहले समय में ब्रह्महत्या के भय से इन्द्र के भाग जाने पर देवराज्य प्राप्त करके नहुष राजा ने इन्द्राणी को प्राप्त करना चाहा था। तब देवगुरु बृहस्पति ने शरण में आई हुई इन्द्राणी की यही कहकर नहुष से रक्षा की थी कि 'आज आवेगी कल आवेगी'। इसी बीच राजा नहुष ब्राह्मणों के शाप से नष्ट हो गया और इन्द्र पुनः देवराज बन गया। इसी प्रकार मुझे भी कलिङ्गसेना के लिए राजा का समय टालते रहना चाहिए ॥७४-७८॥ ऐसा सोचकर सभी पण्डितों से सम्मति करके उसने एक लम्बी अवधि के पश्चात् लग्न निर्धारणने का गुप्त परामर्श किया ॥७९॥ तदनन्तर महारानी वासवदत्ता ने आई हुई कलिङ्गसेना का समाचार जानकर मन्त्री यौगन्धरायण को अपने भवन में बुलवाया ॥८०॥ वासवदत्ता के घर में जाकर और प्रणाम करते हुए यौगन्धरायण से रोती हुई वासवदत्ता कहने लगी—'आर्य तुमने पहले ही मुझसे कहा था कि देवि मेरे रहते हुए पद्मावती के सिवा दूसरी सौत तुम्हारी नहीं होगी। अब देखो यह कलिङ्गसेना भी आज विवाहित हो जायगी। यह अत्यन्त रूपवती है और राजा उसके प्रति अत्यन्त आसक्त हैं। अतः तुम अब झूठे बन और मैं मरी अर्थात् आत्महत्या करूँगी' ॥८१-८३॥ यह सुनकर मन्त्री यौगन्धरायण वासवदत्ता से कहने लगा—'देवि धैर्य रखो। मेरे जीने भी यह कैसे हो सकता है? किन्तु तुम्हें इस सम्बन्ध में राजा का विरोध न करना चाहिए। प्रत्युत धैर्य के साथ अनुकूलता ही प्रकट करनी चाहिए ॥८४-८५॥ प्रतिकूल चलने से रोगी वैद्य के वश में नहीं आता। शान्तिपूर्वक रोगी की अनुकूल चिकित्सा करने पर ही वह उसके वश में आता है ॥८६॥ मनुष्य विपरीत क्रिया द्वारा अपने उद्योग या व्यसन से दूर नहीं होता। इसलिए पास आये हुए राजा को तुम सरल भाव से अपनी भावना को छिपाकर विविध प्रकार से सेवा करना ॥८७-८८॥

७१६ कथासरित्सागर

७१६ कथासरित्सागर कलिङ्गसेनास्वीकारं श्रद्दध्यात्तस्य साम्प्रतम्। ब्रूहि मुग्धाणा राज्यस्य महाये तत्पितर्यपि ॥८९॥ एवं कृते च माहात्म्यगुणं दृष्ट्वा परं तव। प्रवृद्धस्नेहदाक्षिण्यो राजासौ भवति त्वयि ॥९०॥ मत्वा कलिङ्गसेनां च स्वाधीनां नोत्सुको भवेत्। वार्यमाणस्य वाञ्छा हि विषयेष्वभिवर्धते ॥९१॥ देवी पद्मावती चैतच्छिक्षणीया स्वयानघे। एवं स राजा कार्येऽस्मिन्कालक्षेपं सहेत न ॥९२॥ अतः परं च जानेऽहं पदयेयुक्तिरुत्तरम्। सङ्कटे हि परीक्ष्यन्ते प्राज्ञा शूराश्च सङ्गरे ॥९३॥ तद्देवि मा विषण्णा भूरिति देवीं प्रबोध्य ताम्। तथादृतोक्तिः स ययौ ततो यौगन्धरायणः ॥९४॥ वत्सेश्वरश्च तदहर्न दिवा न रात्रौ देव्योर्द्वयोरपि स वासगृहं जगाम। तादृक्स्वयंवररसापनमत्कलिङ्ग- सेनासमाननवसंगमसोत्सुचेताः ॥९५॥ रात्रिं च दुर्लभरसोत्सुकतातिगाढ- चिन्तामहोत्सवमयीमिव तां ततस्ते। निन्युः स्वसद्मसु पृथक्पृथगेव देवी वत्सेशतत्सचिवमुख्यकलिङ्गसेनाः ॥९६॥ इति महाकविश्रीसोमदेवभट्टविरचिते कथासरित्सागरे मदनमञ्चुका लम्बके पञ्चमस्तरङ्गः। षष्ठस्तरङ्गः कलिङ्गसेनायाः कथा यौगन्धरायणस्य कूटनीतिप्रपञ्चः ततः प्रतीक्षमाणं तं वत्सराजमुपेत्य सः। यौगन्धरायणो धूर्तः प्रातर्मन्त्री व्यजिज्ञपत् ॥१॥ 'भगवन् कलिङ्गसेनाया देव्यस्य च शुभावहम्। विवाह मङ्गलायेह किं नाद्यैव विलोक्यते ॥२॥ १ प्राचीनपुस्तकेऽस्माच्छ्लोकात्पूर्वं राजन् ! कलिङ्गदत्तस्य राज्ञस्तत्कलिकालतो इत्यधिकः पाठः समुपलभ्यते।

षष्ठ लम्बक ७१७

षष्ठ लम्बक ७१७ इस समय कलिङ्गसेना की स्वीकृति को भी सादर मान लेना। यह भी कहना कि उसके पिता कलिङ्गरत राजा की सहायता से राज्य की वृद्धि ही होगी ॥८९॥ ऐसा करने पर तुम्हारे हृदय की उदारता और महत्ता से बढ़ हुए स्नेहवाला राजा तुम्हारी ओर आ जायगा ॥९०॥ और कलिङ्गसेना को स्वाधीन (स्वतन्त्र) समझकर उसके प्रति वह उत्सुक न होगा। विषयों से रोके जाते हुए व्यक्ति की इच्छा विषयों की ओर ही अधिक दौड़ती है ॥९१॥ रानी पद्मावती को भी इसी प्रकार, शिक्षा देना। इस प्रकार, तुम लोगों से सँभाला हुआ राजा हमारे द्वारा किये जाते हुए विलम्ब को सहन कर लेगा ॥९२॥ इससे अधिक मैं नहीं जानता। अब मेरी बुद्धि का बल देखो। सङ्कट-काल में बुद्धिमान् और युद्ध-काल में शूरवीर की परीक्षा होती है ॥९३॥ इसलिए हे देवि खिन्न न होओ। इस प्रकार, रानी को समझाकर और अपनी बातों का समर्थन प्राप्त कर यौगन्धरायण चला गया ॥९४॥ स्वयंवर के रस से अभिभूत होकर बालवाली ऐसी कलिङ्गसेना के प्रथम समागम के लिए उत्कण्ठित चित्तवाला वत्सराज उस दिन न दिन में और न रात में ही किसी भी रानी के भवन में गया ॥९५॥ और उधर, कलिङ्गसेना ने भी यह रात दुर्लभ रस प्राप्त करने की उत्सुकता गम्भीर चिन्ता और महोत्सव के स्मरण में व्यतीत की ॥९६॥ पंचम तरङ्ग समाप्त षष्ठ तरंग कलिङ्गसेना की कथा (चालू) मन्त्री यौगन्धरायण का कूटनीति-प्रपञ्च तदनन्तर, दूसरे दिन प्रातःकाल प्रतीक्षा करते हुए वत्सराज से धूर्त (चतुर) मन्त्री यौगन्धरायण ने जाकर निवेदन किया—'महाराज आपके लिए कल्याणदायक कलिङ्गसेना का विवाह-महोत्सव आज ही क्यों न देख लिया जाय' ॥१ २॥

७१८ कथासरित्सागर

७१८ कथासरित्सागर तच्छ्रुत्वा सोऽब्रवीद्राजा ममाप्येवं हृदि स्थितम् । तां बिना हि मुहूर्तं मे स्थातुं न सहते मनः ॥३॥ इत्युक्त्वैव स तत्कालं प्रतीहारं पुरःस्थितम् । आदिश्यानाययामास गणकान् सरलाक्षयः ॥४॥ तेन पृष्टा महामन्त्रिपूर्वस्थापितसंविदः । ऊचुर्लग्नोऽनुकूलोऽस्ति राज्ञो मासेषु षट्स्वितः ॥५॥ तच्छ्रुत्वैव मृषा कोपं कृत्वा यौगन्धरायणः । अज्ञा इमे धिगित्युक्त्वा राजानं निपुणोऽब्रवीत् ॥६॥ योऽसौ ज्ञानीति देवेन पूजितो गणकः पुरा । स नागतोऽद्य तं पृष्ट्वा यथायुक्तं विधीयताम् ॥७॥ एतन्मन्त्रिवचः श्रुत्वा वत्सेशो गणकं तदा । तमप्यानाययामास दोलारूढेन चेतसा ॥८॥ सोऽप्यस्य कालहाराय स्थितसंवित्तथैव तम् । लग्नं पृष्टोऽब्रवीद्ध्यात्वा षण्मासान्ते व्यवस्थितम् ॥९॥ ततो राजानमद्विग्न इव यौगन्धरायणः । जगाद देव कर्तव्यं किमत्राविधीयतामिति ॥१०॥ राजाप्युक्तः सुरुग्नेयी स विमृश्य ततोऽभ्यधात् । कलिङ्गसेना प्रष्टव्या सा त्रिमाहेत्यवेक्ष्यताम् ॥११॥ सञ्छ्र्त्वा स तथेत्युक्त्वा गृहीत्वा गणकद्वयम् । पार्श्वं कलिङ्गसेनाया ययौ यौगन्धरायणः ॥१२॥ तया कृतादरो दृष्ट्वा तद्रूपं स व्यचिन्तयत् । प्राप्येमां व्यसनाद्राजा सर्वं राज्यं त्यजेदिति ॥१३॥ उवाच चैनामुद्वाहलग्नं ते गणकैः सह । निर्द्धातुमागतोऽस्म्येतैस्त्वं मद्य तन्निषेव्यताम् ॥१४॥ तच्छ्रुत्वा जन्मऋक्षं तस्याः परिजनोदितम् । गणकास्ते मृषा कृत्वा विचारं मन्त्रिसंविदा ॥१५॥ लग्नं तमेव तत्रापि मासषट्कान्तवर्त्तिनम् । नातीतः पुरोऽस्तीति वदन्तः पुनरभ्यधुः ॥१६॥

षष्ठ लम्बक ७१९

षष्ठ लम्बक ७१९ यह सुनकर राजा ने कहा— 'मेरे मन में भी यही है। उसके बिना मैं घड़ी भर भी नहीं रह सकता' ॥१३॥ ऐसा कहकर उस मन्द स्वभाववाले राजा ने सामने खड़े हुए प्रधान द्वारपाल को आज्ञा देकर गणकों (ज्योतिषियों) को बुलवाया ॥१४॥ महामन्त्री द्वारा पहले से ही सिद्ध किये गये उन गणकों ने राजा के पूछने पर कहा कि 'महाराज के लिए यात्रा में छः महीने के बाद (पश्चात्) अनुकूल लग्न आता है' ॥१५॥ यह सुनकर कृत्रिम क्रोध प्रकट करता हुआ मन्त्री यौगन्धरायण 'ये मूर्ख हैं' ऐसा कहकर राजा से कहने लगा—"जिस गणक को महाराज ने 'ज्ञानी है'—तथा कहकर सम्मानित किया था वह आज नहीं आया। महाराज उसे बुलाकर पूछें" ॥१६-७॥ तब मन्त्री की बात सुनकर वत्सराज ने संताप—भर चित्त से उस ज्योतिषी को बुलवाया ॥१८॥ समय लाभ के षड्यन्त्र में मन्त्री यौगन्धरायण उसे भी पहले ही सम्मन्त्रित कर चुका था अतः उसने भी राजा के लग्न पूछने पर छह मास के पश्चात् का समय ही बतलाया ॥ ॥ तब व्याकुल भाव प्रकट करते हुए यौगन्धरायण ने राजा से कहा—'महाराज अब आदेश दीजिए कि क्या किया जाय' ॥१ ॥ उस विपत्तिकाल पर भी शुभ लग्न का चाहनेवाला राजा कुछ सोचकर कहने लगा— कलिंग सेना से भी पूछना चाहिए वह क्या सम्मति है देना ॥१२॥ 'जो आज्ञा' ऐसा कहकर और गणकों को साथ लेकर मन्त्री यौगन्धरायण कलिङ्गसेना के पास गया ॥१३॥ उसके द्वारा स्वागत-सत्कार किया गया यौगन्धरायण उसके रूप को देखकर सोचने लगा कि इसे प्राप्त कर राजा दुःसह व्यसन में पड़ हुआ राज्य छोड़ देगा ॥१४॥ और उसने कहा — 'मैं तुम्हारा विवाह-लग्न स्थिर करने के लिए गणकों के साथ आया हूँ। अतः तुम अपना जन्म-नक्षत्र बताओ' ॥१५॥ कलिङ्गसेना के सेवकों द्वारा जन्म-नक्षत्र बताने पर पहले ही सम्मन्त्रित हुए गणकों ने अपना विचार प्रकट कहा कि 'लग्न छह महीने के पश्चात् मिलता है, इससे पूर्व नहीं। यही बात फिर उसने भी कही' ॥ १६॥

७२० कथासरित्सागर

७२० कथासरित्सागर श्रुत्वा दूरतरं तं च रुन्मनाविघ्नचेतसि । ततः कलिङ्गसेनायां समहत्तरकोऽभ्यधात् ॥१७॥ प्रेक्ष्यो लग्नोऽनुकूलः प्रायेन स्यादेतयोः शुभम् । यावत्कालं हि दम्पत्यो र्कि चिरेणाचिरेण वा ॥१८॥ एतन्महत्तरवचः श्रुत्वा सर्वेऽपि तत्क्षणम् । सदुक्तमेवमेवैतदिति तत्र बभाषिरे ॥१९॥ यौगन्धरायणोऽप्याह हा कुलघ्ने कृते च न । कलिङ्गवतः सम्बन्धी राजा शेषं व्रजेदिति ॥२०॥ ततः कलिङ्गसेनापि सर्वांस्तानवशा सती । यथा भवन्तो जानन्तीत्युक्त्वा सज्जी बभूव सा ॥२१॥ तदेव च वचस्तस्या गृहीत्वामन्त्र्य तां ततः । यौगन्धरायणो राज्ञः पार्श्वं सगणको ययौ ॥२२॥ तत्र तस्मै तदाधाय वत्सेशाय तथैव सः । युक्त्या च तमवस्थाप्य स जगाम निजं गृहम् ॥२३॥ सिद्धकालातिपातश्च कार्यशेषाय तत्र सः । योगेश्वराख्यं सुहृदं सस्मार ब्रह्मराक्षसम् ॥२४॥ स पूर्वप्रतिपन्नस्तं स्वैरं ध्यानादुपस्थितः । राक्षसो मन्त्रिणं नत्वा किं स्मृतोऽस्मीत्यवोचत ॥२५॥ ततः स मन्त्री तस्मै तं कृत्स्नं व्यसनं प्रभोः । कलिङ्गसेनावृत्तान्तमुक्त्वा भूयो जगाद तम् ॥२६॥ कालो मया हृतो मित्र तमद्ये त्वं स्वमुचितं । युक्तं कलिङ्गसेनायाः प्रच्छन्नोऽन्यां निरूपयेः ॥२७॥ विद्याधरादयस्तां हि छन्नं वाञ्छन्ति निश्चितम् । यतोऽन्या तादृशी नास्ति रूपेणास्मिञ्जगत्त्रये ॥२८॥ अतः केनापि सिद्धेन सह विद्याधरेण वा । गच्छेद्विसा यदि तच्च त्वं पश्येस्तदमङ्गलं भवेत् ॥२९॥ अन्यरूपागतश्चात्र लक्ष्यस्ते दिव्यकामुकः । स्वापकाले यतो दिव्याः सुप्ताः स्वे रूप आसते ॥३०॥ एवं स्वदृष्टितस्तस्या दोषोऽस्माभिर्विलोक्यते । तस्यां राजा विरज्येच्च तत्कार्यं निर्वहेच्च न ॥३१॥

षष्ठ लम्बक ७२१

षष्ठ लम्बक ७२१ कलिङ्गसेना के बहुत लम्बे समय बाद का लग्न सुन व्याकुल होने पर उसके प्रतीहार ने कहा—॥१७॥ 'सबसे पहले शुभ लग्न देखना चाहिए, जिससे कि उन दोनों (दम्पति) का कल्याण हो। विलम्ब और शीघ्रता का उतना महत्त्व नहीं ॥१८॥ वृद्ध प्रतीहार के वचन सुनकर सभी उपस्थित लोगों ने उसकी बात का समर्थन करते हुए कहा कि इन्होंने ठीक ही तो कहा है॥१९ ॥ यौगन्धरायण ने भी कहा कि 'यदि अशुभ लग्न में विवाह हुआ तो हमारे सम्बन्धी कलिङ्गदत्त को भी खेद होगा' ॥२० ॥ तब कलिङ्गसेना भी विवश होकर बोली—'जैसा आप सब लोग उचित समझें करें'— इतना कहकर वह चुप हो गई ॥२१॥ कलिङ्गसेना की इस बात को सुनकर और उससे जाने की आज्ञा प्राप्त कर मन्त्री यौगन्धरायण गणकों के साथ राजा के पास गया ॥२२॥ वहाँ जाकर वत्सराज से उसी प्रकार सब निवेदन करके और उसे युक्तिपूर्वक समझा बुझाकर वह अपने घर गया ॥२३॥ समय व्यतीत करने की उसकी योजना सफल होने पर और अवशिष्ट कार्य की सिद्धि के लिए उसने अपने मित्र योगेश्वर नामक ब्रह्मराक्षस को बुलाया ॥२४॥ वह ब्रह्मराक्षस पहले से ही सिद्ध था अतः उसके ध्यान करते ही उपस्थित हो गया ॥२५॥ राक्षस ने मन्त्री को प्रणाम करते हुए पूछा कि 'मुझे क्यों स्मरण किया है'? ॥२६॥ तब मन्त्री यौगन्धरायण ने राजा को विरक्ति देनेवाले कलिङ्गसेना के समस्त वृत्तान्त को कहकर फिर कहा—'मित्र मैंने समय तो टाल दिया है। अभी छह् महीने हैं। इस बीच छिपे छिपे कलिङ्गसेना का हाल-चाल देखा ॥२७॥ विद्याधर सिद्ध आदि भी उसे निश्चित रूप से चाहते हैं। कारण यह कि तीनों लोकों में उसके समान सुन्दरी कुमारी नहीं है ॥२८॥ यदि वह किसी सिद्ध या विद्याधर के साथ सङ्गम करे तो तुम देखना इससे हमारा शुभ होगा ॥ ॥ रूप परिवर्तन कर आये हुए दिव्य प्राणियों का भी ध्यान रखना क्योंकि दिव्य व्यक्ति रूप परिवर्तित करने पर भी शयन करने के समय अपने वास्तविक रूप में आ जाते हैं ॥३० ॥ इस प्रकार तुम्हारी आँखों से हम उसके दोष देख सकेंगे। इससे राजा को उनके प्रति वैराग्य उत्पन्न हो जायगा और हमारा कार्य सिद्ध हो जायगा ॥३१॥ ९१

७२२ कथासरित्सागर

७२२ कथासरित्सागर इत्युक्तो मन्त्रिणा तेन सोऽब्रवीद् ब्रह्मराक्षसः। युक्त्याहमेव किं नैतां ध्वंसयामि निहन्मि वा ॥३२॥ तच्छ्रुत्वैव महामन्त्री तं स यौगन्धरायणः। उवाच नैतत्कर्तव्यमधर्मो हि महान् भवेत् ॥३३॥ यश्च धर्ममबाधित्वा स्वेन संसरते पथा। तस्योपयाति साहाय्यं स एवाभीष्टसिद्धिषु ॥३४॥ सतस्याः स्वोत्थितो दोषः प्रेक्षणीयस्त्वया सखे। येनास्माभिर्भवन्मैत्र्या राजकार्यं कृतं भवेत् ॥३५॥ इति मन्त्रिवरादिष्टः स गत्वा ब्रह्मराक्षसः। गृहं कलिङ्गसेनाया योगच्छन्न प्रविष्टवान् ॥३६॥ अत्रान्तरे सखी तस्याः सा मयासुरपुत्रिका। आगात्कलिङ्गसेनायाः पार्श्वं सोमप्रभा पुनः ॥३७॥ सा पृष्ट्वा रात्रिवार्त्तां तां मुक्तवधूं मयात्मजा। राजपुत्रीमुवाचैव तस्मिन् सुष्वति राक्षसे ॥३८॥ अद्य पूर्वाह्ण एवाहं विचिन्त्य त्वामिहागता। छन्ना स्थिताऽभवत्पार्श्वे दृष्ट्वा यौगन्धरायणम् ॥३९॥ श्रुतश्च युष्मदालापः सर्वं चावगतं मया। तत्किं त्वया ह्य एवैतदारब्धं मन्निषिद्धया ॥४०॥ भव्यपोह्यानिमित्तं हि कार्यं यत्क्रियते सखि। तदनिष्टाय कल्पेत तथा चेमां कथां शृणु ॥४१॥ विष्णुदत्तस्यतत्सप्तसहयात्रिविप्राणाञ्च कथा अन्तर्वेद्या¹मभूत्पूर्वं वसुदत्त इति द्विजः। विष्णुदत्ताभिधानश्च पुत्रस्तस्योदपद्यत ॥४२॥ स विष्णुदत्तो वयसा पूर्णषोडशवत्सरः। गन्तुं प्रवृत्तो विद्याप्राप्तये वलभीं पुरीम् ॥४३॥ मिलन्ति स्म च तस्यान्ये सप्त विप्रसुताः समाः। सप्तापि ते पुनर्मूर्खाः स विद्वान् सत्कुलोद्गतः ॥४४॥ १ अन्तर्वेदी।

षष्ठ लम्बक ७२१

षष्ठ लम्बक ७२१ मन्त्री के इस प्रकार कहने पर, वह ब्रह्मराक्षस बोला—'मैं किसी उपाय से उसे क्यों न नष्ट कर दूँ या मार डालूँ ? ॥३२॥ यह सुनकर महामन्त्री यौगन्धरायण बोला—'ऐसा न करना चाहिए क्योंकि इससे महान् अधर्म होगा' ॥३३॥ जहाँ धर्म की रक्षा करते हुए मनुष्य अपने इच्छानुसार चलता है या कार्य करता है वहाँ पर धर्म ही उसकी सहायता करता है ॥३४॥ इसलिए मित्र तुम उसके निजी दोष को न देखो जिससे कि मैं तुम्हारी मित्रता के कारण राजा का कल्याण-कार्य सिद्ध कर सकूँ ॥३५॥ मन्त्री द्वारा इस प्रकार आदेश देने पर ब्रह्मराक्षस कलिगसेना के भवन में जाकर छिपकर बैठ गया ॥३६॥ इसी बीच कलिङ्गसेना की सखी मयासुर की पुत्री सोमप्रभा उसके पास फिर आई ॥३७॥ उसके कलिङ्गसेना से रात की बात पूछने पर ब्रह्मराक्षस के सुनते हुए कलिङ्गसेना ने सारा वृतान्त मयासुर की पुत्री को सुनाया जिसे ब्रह्मराक्षस सुन रहा था ॥३८॥ तब सोमप्रभा बोली—'आज मैं दिन के प्रथम प्रहर में ही तेरे पास आ गई थी किन्तु तुम्हारे पास यौगन्धरायण को देखकर छिपी रही ॥३९॥ उस तुम्हारी बातचीत तथा और सब कुछ मैंने जान लिया। मेरे मना करने पर भी तूने हठ ही यह कार्य क्यों कर डाला ? ॥४०॥ बिना समझे-बूझे और बिना कारण जो कार्य किया जाता है उसमें अनिष्ट ही होता है। उदाहरण के लिए इस प्रसंग की एक कथा सुनो' ॥४१॥ विष्णुदत्त और उसके सात साथियों की कथा प्राचीन समय में अन्तर्वेदी देश में समुद्रदत्त नाम का एक ब्राह्मण रहता था। उसके पुत्र का नाम विष्णुदत्त था ॥४२॥ वह विष्णुदत्त जब पूरे सोलह वर्ष की अवस्था का था तब विद्या-प्राप्ति के लिए वलभीपुरी में जाने के लिए तैयार हुआ। साथ जाने के लिए उसे और भी सात ब्राह्मण-पुत्र मिले। वे सातों मूर्ख थे। केवल विष्णुदत्त ही उनमें बुद्धिमान् और सद्गुणोपेत बालक था ॥४३-४४॥

७२४ कथासरित्सागर

७२४ कथासरित्सागर कृत्स्वान्योन्यपरित्यागशपथं तैः समं सतः। विष्णुदत्त प्रतस्थे स पित्रोरविदितो निशि॥४५॥ प्रस्थितश्चाग्रतोऽकस्मादनिमित्तमुपस्थितम् । दृष्ट्वा सोऽत्र वयस्यांस्तान् सहप्रस्थायिनोऽभ्यधात् ॥४६॥ अनिमित्तमिदं हन्त युक्तमद्य निवर्तितुम्। पुनरेव प्रयास्यामः सिद्धये शकुनान्विताः ॥४७॥ तच्छ्रुत्वैव ससायस्तं मूर्खाः सप्तापि तेऽब्रुवन्। मृषा मा जीगणः शङ्कां नह्यतो बिभिमो वयम् ॥४८॥ त्वं चेद्बिभेषि तन्मा गा वयं यामोऽधुनैव तु। प्रातर्विदितवृत्तान्ता नास्मांस्त्यक्ष्यन्ति बान्धवाः ॥४९॥ इत्युक्तवद्भिरग्रैस्तैः साकं क्षपद्वयन्वितः। विष्णुदत्तो ययावेव स स्मृत्वाष्टहरं हरिम् ॥५०॥ राज्यान्ते च विलोक्याम्यदनिमित्तं पुनर्वदन्। मूर्खैस्तैः सखिभिः सर्वैः स एवं निरभर्त्स्यत ॥५१॥ एतदेवानिमित्तं न किमन्येनाप्यभीरुणा। यत्त्वमस्माभिरानीतः काकशङ्की पदे पदे ॥५२॥ इत्यादि भर्त्सनां कृत्वा गच्छद्भिस्तैः समं च सः। विवशः प्रययौ विष्णुदत्तस्तूष्णीं बभूव च ॥५३॥ नोपदेशो विधातव्यो मूर्खस्य स्वाभिचारिणः। सत्कारोऽन्धकरस्येव तिरस्कारकरो हि सः॥५४॥ एको बहूनां मूर्खाणां मध्ये निपतितो बुधः। पङ्क पायस्तरङ्गाणामिव क्लिश्यते ध्रुवम्॥५५॥ तस्मादेषां न वक्तव्यं मया भूयो हिताहितम्। तूष्णीमेव प्रयात्तव्यं विधि र्धेयो विधास्यति ॥५६॥ इत्याद्याकलयन्मूर्खैः प्रक्रमस्तैः समं पथि। विष्णुदत्तो दिनस्यान्ते शबरग्राममाप सः ॥५७॥ तत्र श्रान्त्वा निशि प्राप तरुप्याधिष्ठितं स्त्रिया। गृहमर्कं ययाचे च निवासं सोऽत्र तां स्त्रियम् ॥५८॥ तया दत्तेऽववरके सहाम्यैस्तैर्विवेश सः। सखिभिस्ते च सप्तापि तत्र निद्रां शणं ययुः ॥५९॥