भारतकोश
कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५)

कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५)

महाकवि सोमदेव भट्ट द्वारा

स्रोत: कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1960 (उद्गम)

DevanagariHindipublished876 पृष्ठ

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षष्ठ लम्बक ७१५ कलिङ्गसेना भी नये बाह्य भवन में जाकर अपना मनोरथ सिद्ध समझकर अत्यन्त प्रसन्न हुई॥७३॥ बुद्धिमान् यौगन्धरायण भी राजभवन से तुरन्त अपने घर जाकर इस प्रकार सोचने लगा। समय व्यतीत करना ही अधुना कार्य का प्रतिकार है। पहले समय में ब्रह्महत्या के भय से इन्द्र के भाग जाने पर देवराज्य प्राप्त करके नहुष राजा ने इन्द्राणी को प्राप्त करना चाहा था। तब देवगुरु बृहस्पति ने शरण में आई हुई इन्द्राणी की यही कहकर नहुष से रक्षा की थी कि 'आज आवेगी कल आवेगी'। इसी बीच राजा नहुष ब्राह्मणों के शाप से नष्ट हो गया और इन्द्र पुनः देवराज बन गया। इसी प्रकार मुझे भी कलिङ्गसेना के लिए राजा का समय टालते रहना चाहिए ॥७४-७८॥ ऐसा सोचकर सभी पण्डितों से सम्मति करके उसने एक लम्बी अवधि के पश्चात् लग्न निर्धारणने का गुप्त परामर्श किया ॥७९॥ तदनन्तर महारानी वासवदत्ता ने आई हुई कलिङ्गसेना का समाचार जानकर मन्त्री यौगन्धरायण को अपने भवन में बुलवाया ॥८०॥ वासवदत्ता के घर में जाकर और प्रणाम करते हुए यौगन्धरायण से रोती हुई वासवदत्ता कहने लगी—'आर्य तुमने पहले ही मुझसे कहा था कि देवि मेरे रहते हुए पद्मावती के सिवा दूसरी सौत तुम्हारी नहीं होगी। अब देखो यह कलिङ्गसेना भी आज विवाहित हो जायगी। यह अत्यन्त रूपवती है और राजा उसके प्रति अत्यन्त आसक्त हैं। अतः तुम अब झूठे बन और मैं मरी अर्थात् आत्महत्या करूँगी' ॥८१-८३॥ यह सुनकर मन्त्री यौगन्धरायण वासवदत्ता से कहने लगा—'देवि धैर्य रखो। मेरे जीने भी यह कैसे हो सकता है? किन्तु तुम्हें इस सम्बन्ध में राजा का विरोध न करना चाहिए। प्रत्युत धैर्य के साथ अनुकूलता ही प्रकट करनी चाहिए ॥८४-८५॥ प्रतिकूल चलने से रोगी वैद्य के वश में नहीं आता। शान्तिपूर्वक रोगी की अनुकूल चिकित्सा करने पर ही वह उसके वश में आता है ॥८६॥ मनुष्य विपरीत क्रिया द्वारा अपने उद्योग या व्यसन से दूर नहीं होता। इसलिए पास आये हुए राजा को तुम सरल भाव से अपनी भावना को छिपाकर विविध प्रकार से सेवा करना ॥८७-८८॥

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