कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५)
by महाकवि सोमदेव भट्ट
Source: कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1960 (origin)
पंचम लम्बक ५४१
पंचम लम्बक ५४१ 'हे महामना ! इसे लेकर मेरे साथ आओ। इस प्रकार दूर बैठी हुई स्त्री बोली-॥१८४॥ यह सुनकर उसका पीछा करते हुए उसने समीप ही एक वृक्ष के नीचे बैठी हुई, दिव्य रूप- वाली और रत्नों के आभूषणों से चमकती हुई, अनेक स्त्रियों से घिरी हुई और आसन पर बैठी हुई एक स्त्री को देखा ॥१८५॥ मरुभूमि में कमलिनी के समान उस स्थान (श्मशान) पर ऐसी स्त्री का रहना सम्भव नहीं था। उस स्त्री के द्वारा ले जाया गया अशोकदत्त उस बैठी हुई सुन्दरी के पास जाकर बोला-'मैं मनुष्य-मांस बेचता हूँ ले लो' ॥१८६-१८७॥ तब वह दिव्य रमणी बोली कि 'हे महापुरुष ! इसे किस मूल्य पर बेचते हो' ? ॥१८८॥ तब वीर अशोकदत्त ने हाथ में लिये हुए एक पायजेब दिखाकर कहा-'जो इसके ही समान दूसरी पायजेब मुझे देगा उसे दूंगा। यदि वह है, तो ले लो' ॥१८९॥ यह सुनकर वह बोली-'हाँ इसी का जोड़ा दूसरा पायजेब मेरे पास है। यह मेरा ही पायजेब तूने छीना है॥१९०॥ मैं वही स्त्री हूँ जिसे तुमने शूली में बिंधे हुए उस मनुष्य के पास उस दिन देखा था। इस समय दूसरा रूप बदलने के कारण तूने मुझे नहीं पहिचाना ॥१९१-१९२॥ तो अब मांस लेकर क्या होगा मैं जो कहती हूँ वह करो तो इसी के समान दूसरा पायजेब तुम्हें दूँगी' ॥१९३॥ इस प्रकार कहे गये उस वीर ने उसकी बात स्वीकार करके कहा-'जो तू कहेगी वह उसी समय करूँगा' ॥१९४॥ अशोकदत्त और विद्युत्प्रभा की विवाह-कथा तब उस दिव्य स्त्री ने उससे अपने मन की बात इस प्रकार कही-'हे धर्म सारथी ! हिमालय के शिखर पर विचर नाम का एक नगर है। वहाँ पर स्तम्भजिह्व नाम का एक राक्षसराज है। मैं उसकी विद्युत्प्रभा नाम की पत्नी हूँ और इच्छानुसार रूप धारण करनेवाली हूँ॥१९५-१९६॥ वह मेरा पति एक कन्या के उत्पन्न होने पर संग्रामस्फोट नाम के राक्षसराज द्वारा युद्ध में मारा गया ॥१९७॥
५४२ कथासरित्सागर
५४२ कथासरित्सागर ततो निजपुरं सम्मे प्रभुणा तेन तुष्यता। प्रदत्तं तेन च सुखं स्थितास्मि ससुताधुना ॥१९८॥ सा च मदुहितेदानीमारूढा नवयौवनम्। तत्रवीरप्राप्तिचिन्ता च मम मानसम् ॥१९९॥ अतस्त्वया समं राज्ञा यान्तं त्वाममुना पथा। दृष्ट्वा मक्तं चतुर्दश्यामिक्षस्वाहमचिन्तयम् ॥२००॥ अयं भव्यो युवा वीरो योग्यो म दुहितुः पतिः। तदेतत्प्राप्तये कश्चिदुपायः किं न कल्प्यते ॥२०१॥ इति सङ्कल्प्य याचित्वा शूलविद्धवरोमिषात्। जलं मह्यं श्मशानं त्वमानीतोऽभूमैंया मृषा ॥२०२॥ मायादर्शितरूपादिप्रपञ्चालीकवादिनी। विप्रलब्धवती चास्मि तत्र त्वां क्षणमात्रकम् ॥२०३॥ आकर्षणाय भूपस्ते युक्त्या चक्रे स्वनूपुरम्। संत्यज्य शृङ्खलापाशमिव याता ततोऽप्यहम् ॥२०४॥ अद्य यत्न मया प्राप्तो भवांस्तद्गृहमेरथ न। भजस्व मे सुतां किं च गृहाणापरनूपुरम् ॥२०५॥ इत्युक्तः स निशाचर्या तथेत्युक्त्वा तया सह। वीरो गगनमार्गेण तरित्वा तत्पुरं ययौ ॥२०६॥ सौवर्णं तदपश्यच्च शृङ्गे हिमवतः पुरम्। प्रभोष्यन्नदविभास्तमर्कबिम्बमिवापरम् ॥२०७॥ रक्षोधिपसुतां तत्र नाम्ना विद्युत्प्रभां स ताम्। स्वसाहसमहासिद्धिमिव मूर्त्तमवाप्तवान् ॥२०८॥ तया च सह तत्रैव कञ्चित्कालमुवास सः। अशोकतः प्रियया बद्धूविभवनिर्वृतः ॥२०९॥ ततो जगाद तां बन्धूं मह्यं तद्देहि नूपुरम्। यतः सम्प्रति गन्तव्या पुरी वाराणसः मया ॥२१०॥ तत्र ह्येतत्प्रविज्ञातं स्वयं नरपतेः पुरः। एकरत्ननूपुरस्पर्द्धिद्वितीयमयनं मया ॥२११॥ इत्युक्ता तेन सा स्वच्यूद्वितीयं च स्वनूपुरम्। तस्मै दत्त्वा पुनश्चक्रं सुवर्णकमलं ददौ ॥२१२॥
पंचम लम्बक ५४५
पंचम लम्बक ५४५ तब हमारे स्वामी कपालस्फोट ने प्रसन्न होकर हमारा नगर मुझे दे दिया। उसमें मैं अपनी कन्या के साथ आनन्द से रहती हूँ॥१९८॥ इस समय मेरी कन्या नयी चढ़ी जवानी पर है। उसके लिए किसी उत्कृष्ट वीर वर की प्राप्ति की चिन्ता मुझे सता रही है। इसीलिए उस दिन चतुर्दशी की रात को राजा के साथ आते हुए तुम्हें देखकर मैं यहाँ रुक गई और सोचने लगी कि यह भव्य सुन्दर वीर और युवा मेरी कन्या के लिए योग्य पति है। अतः इसकी प्राप्ति के लिए कोई उपाय क्यों न करूँ ॥१९९-२ १०॥ ऐसा सोचकर शूली से बिंधे मनुष्य के बहाने झूठे ही त्रस फैलाकर मैं तुझे श्मशान के बीच लाई॥२ १॥ माया से दिखाये गये रूप आदि के झूठे प्रपंच से झूठ बोलकर मैंने कुछ समय के लिए तुझे धोखा दिया॥२ २॥ तुम्हारा फिर से आकर्षण करने के लिए जान-बूझ कर अपन एक पायजेब को छोड़कर मैं चली गई॥२ ४॥ आज इस रूप में तुम्हें पुनः प्राप्त किया है, तो अब तुम मेरे घर जाकर मेरी कन्या का उपभोग करो और दूसरा पायजेब भी ले जाओ' ॥२ ५॥ राक्षसी के इस प्रकार कहने पर वह वीर उसकी बात को स्वीकार करके उसी की सिद्धि के प्रभाव से आकाश-मार्ग द्वारा उसके नगर में गया ॥२ ६॥ उसने हिमाचल के शिखर पर सोने के चमकते हुए नगर का इस प्रकार देखा मानो आकाश- गमन की श्रान्ति को मिटाने के लिए अचल सूर्यबिम्ब स्थित हो गया हो॥२ ७॥ वहाँ पर उसने राक्षसराज की विद्युत्प्रभा नाम की कन्या को भी प्राप्त किया जो उसके साहस की साक्षात् सिद्धि के समान थी ॥२ ८॥ उसके साथ कुछ समय तक वहीं रहकर अशोकदत्त सास की सम्पत्ति का सुख प्राप्त करता रहा ॥२ ९॥ कुछ समय बीतने पर उसने सास से कहा—'मुझे वह पायजेब दो अब मैं वाराणसी नगर जाऊँगा। वहाँ मैंने राजा के सामने तुम्हारा एक पायजेब लाने की प्रतिज्ञा की है। दामाद के इस प्रकार कहने पर उसकी सास ने दूसरा पायजेब भी उसे दे दिया और साथ ही एक सोने का कमल भी उसे दिया॥२१०-२१२॥
५४४ कथासरित्सागर
५४४ कथासरित्सागर प्राप्ताम्बुनूपुरस्तस्मात्स पुराभिययौ ततः। अशोकदत्तो वचसा नियम्यागमनं पुनः॥२१३॥ तया स्वयञ्च चाकाशपथेन पुरमेव सम्। श्मशानं प्रापितः सोऽभून्निजसिद्धिप्रभावतः॥२१४॥ तन्मूले च तत्रैव स्थित्वा सा स ततोऽब्रवीत्। सदा कृष्णचतुर्दश्यामिक्ष रात्रावुपम्यहम्॥२१५॥ तस्यान्निशि च भूयोऽपि त्वमप्यसि यदा यदा। तदा तदा वटतरोर्मूलात् प्राप्स्यसि मामितः॥२१६॥ एतच्छ्रुत्वा तथेत्युक्त्वा सामामन्त्र्य निशाचरीम्। अशोकदत्त स ततो ययौ तावत्पितुर्गृहम्॥२१७॥ कनीयः सुतविश्लेपदुःसहगुर्व्यथायिना। तादृशा तन्नवासेन पितरौ तत्र दुःखितौ॥२१८॥ अतर्कितागतो यावदानन्दयति तत्क्षणात्। तावत् स बुद्ध्वा श्वशुरस्तम्भावास्याययौ नृपः॥२१९॥ स तं साहसिकस्पर्शभीतेरिव सकण्टकैः। अङ्गैः प्रणतमालिङ्ग्य मुमुदे भूपतिश्चिरम्॥२२०॥ ततस्तेन समं राज्ञा विवेश नृपमन्दिरम्। अशोकदत्त स तदा प्रमोदो मूर्तिमानिव॥२२१॥ ददौ राज्ञे स संयुक्तं तद्दिव्यं नूपुरद्वयम्। कुर्व्वन्निव सवृवीर्य्यस्तुतिं झणझणारवैः॥२२२॥ अर्पयामास तच्चास्मै कान्तं कनकपङ्कजम्। रक्षःकोषश्रियः हस्ताल्लीलाम्बुजमिवोद्धृतम्॥२२३॥ पृष्टोऽथ कौतुकात्तन राज्ञा देवीयुतेन सः। अवर्णयद्यथावृत्तं स्वं कर्णानन्ददायि तत्॥२२४॥ विचित्रचरितोल्लेखचमत्कारितचेतनम्। प्राप्यते किं यशः क्षुद्रमनङ्गीकृत्य साहसम्॥२२५॥ एवं वदंस्ततस्तेन जामाता कृतकृत्यताम्। मेने स राजा देवी च प्राप्तनूपुरयुग्मका॥२२६॥ उत्सवातोद्यनिर्ह्रादि तदा राजगृहं च तत्। अशोकदत्तस्य गुणानुद्गायदिव निर्भरम्॥२२७॥
पंचम लम्बक ५४५
पंचम लम्बक ५४५ अशोकदत्त पुनः आने का निश्चय करके आभूषण और कमल लेकर उस नगर से निकला और उस भास ने अपनी सिद्धि द्वारा आकाश-मार्ग से उसे उसी श्मशान में पहुँचा दिया ॥२१४॥ उसी वृक्ष की जड़ में बैठकर वह उससे फिर कहने लगी कि मैं सदा कृष्णपक्ष की चतुर्दशी की रात्रि में यहाँ आती हूँ। इसलिए तू उस दिन रात को जब-जब यहाँ आयेगा तब-तब मुझे इसी वटवृक्ष के नीचे पायेगा ॥२१५-२१६॥ ऐसा सुनकर और 'ठीक है' ऐसा कहकर, उस राक्षसी से विदा लेकर अशोकदत्त अपने पिता के घर आया ॥२१७॥ छोटे लड़के के (विजयदत्त के) वियोग-दुःख को दूना करनेवाले अशोकदत्त के वियोग से उसके माता-पिता अत्यन्त दुःखी हो गये थे ॥२१८॥ जब अशोकदत्त ने अचानक आकर अपने माता-पिता को सुखी किया तब यह समाचार सुनकर उसका श्वसुर राजा भी वहीं आ गया ॥२१९॥ वहाँ आकर महासिंह के स्पर्श से मानो डरे हुए, अतएव रोमांचितयुक्त अंगों से राजा ने प्रणाम करते हुए अशोकदत्त को लिपटा लिया ॥२२०॥ तब अशोकदत्त राजा के साथ राजभवन में गया। वहाँ जाकर उसने मूर्तिमान् आनन्द के समान पायजेब का जोड़ा और लक्ष्मी के क्रीड़ा-कमल के समान वह सुन्दर स्वर्ण-कमल उसने राजा को समर्पित किया ॥२२१-२२३॥ कुछ समय के अनन्तर रानी के साथ बैठे हुए राजा ने कौतूहलवश पूछे गये अशोकदत्त ने कानों को आनन्द देनेवाले अपने वृत्तान्त को विस्तार के साथ सुनाया ॥२२४॥ साहस बिना किये विविध प्रकार के उपभोग से चेतना को चमत्कृत करनेवाला स्वरूप फल प्राप्त नहीं होता ॥२२५॥ इस प्रकार कहते हुए राजा और रानी उन जामाता से अपने को धन्य-धन्य समझने लगे ॥२२६॥ द्वार में बजनेवाला घण्टा और दीवाल मूर्द्धनरत्न राजभवन मानो अशोकदत्त के गुणों का गान कर रहा था ॥ २२७॥ ६९
५४४ कथासरित्सागर
५४४ कथासरित्सागर अन्येद्युश्च स राजा तत् स्वकृते सुरसद्मनि। हेमाब्जं स्थापयामास रुद्रोप्यकलशोपरि ॥२२८॥ उभो कलशपद्मौ च शुशुभाते सितारुणौ। यशः प्रतापाविव तौ भूपालाशोकदत्तयोः ॥२२९॥ तादृशो च विलोक्यैतौ स हर्षोत्फुल्ललोचनः। राजा माहेश्वरीं भक्तिरसावेशदमाप तत् ॥२३०॥ अहो विभाति पद्मने युक्तेोऽयं कलशोऽमुना। भूतिशुभ्रः कपर्दीव जटाजूटेन बभ्रुना ॥२३१॥ अन्विष्येद्द्वितीयं चेदीदृशं कनकाम्बुजम्। अस्मापयिष्यतामस्मिन् द्वितीयं कलशेऽपि तत् ॥२३२॥ इति राजवचः श्रुत्वाशोकदत्तस्ततोऽब्रवीत्। आनेष्यामहम्मम्भोजं द्वितीयमपि देव ते ॥२३३॥ तच्छ्रुत्वा न ममायेन पङ्कजेन प्रयोजनम्। अलं ते साहसेनेति राजापि प्रत्युवाच तम् ॥२३४॥ दिवसध्वेषु यातेषु हेमाब्जहरणैषिणि। अशोकदत्ते सा भूयोऽप्यागात्कृष्णचतुर्दशी ॥२३५॥ तस्यां चास्य सुवर्णाब्जवाञ्छां बुद्ध्वा भयादिव। द्युसद्स्वर्णकमल यातेऽस्तशिखरं रवौ ॥२३६॥ सन्ध्यारुणा प्रपिशितग्रासगर्भाविब क्षणात्। तमोरक्षःसु धावत्सु घूमधूम्रेषु सर्वतः ॥२३७॥ स्फुरद्दीपावलीदन्तमालाभास्वरभीषणे । जृम्भमाणे महारौद्रे निशानक्तञ्चरीमुखे ॥२३८॥ प्रसुप्तराजपुत्रीकात्स्वैरं निर्गत्य मन्दिरात्। अशोकदत्तः स ययौ श्मशानं पुनरेव तत् ॥२३९॥ तत्र तस्मिन्वटतरोर्मूलं तां पुनरागताम्। ददर्श राक्षसीं स्वेधू विहितस्वागतादराम् ॥२४०॥ तया च सह भूयस्ताङ्गमत्तन्निकेतनम्। स युवा हिमवच्छृङ्गं मार्गोन्मुखवधूर्जनम् ॥२४१॥ कञ्चित्कालमथ दध्वा तत्र स्थित्वाप्रवीच्च ताम्। स्वम् देहि द्वितीयं म कुतश्चित् कनकाम्बुजम् ॥२४२॥
पंचम लम्बक ५४७
पंचम लम्बक ५४७ दूसरे दिन राजा ने अपने पूजा-गृह में उस स्वर्ण-कमल को चाँदी के कलश में स्थापित कर दिया॥२२८॥ श्वेत और रक्त वे दोनों कलश और पद्म इस प्रकार शोभित हो रहे थे मानों राजा और अशोकदत्त के क्रमशः यश और प्रताप हों॥२२९॥ उसकी अनुपम शोभा देखकर शिवभक्त राजा ने हर्ष से आँखें फाड़ते हुए भक्तिरस के आवेश में कहा—'अहा ! इस स्वर्ण-कमल से यह कलश ऊँचा होकर ऐसा प्रतीत हो रहा है, जैसे हिम-धवल शिवजी अपने लाल-पीले जटाभार से ऊँचे और शोभित होते हैं' ॥२३०-२३१॥ यह सुनकर अशोकदत्त ने कहा —'महाराज ! मैं आपके लिए दूसरा कमल भी ला दूँगा। तब उत्तर देते हुए राजा ने उससे कहा—'मुझे दूसरे कमल की आवश्यकता नहीं तुम साहस न करो'॥२३२-२३४॥ कुछ दिन व्यतीत होने पर भी अशोकदत्त की दूसरे स्वर्ण-कमल को लाने की इच्छा बनी रही। इतने में ही कृष्ण चतुर्दशी आ गई॥२३५॥ उस दिन अशोकदत्त की स्वर्ण-कमल लाने की इच्छा जानकर, आकाश-सरोवर के स्वर्ण कमल सूर्य के भय से अस्त हो जाने पर, सन्ध्या के समान लाल मेघ-रूपी मांस का ग्रास करने के गर्व से मानों तम-रूपी धूएँ से धूमिल राक्षसों के इधर-उधर दौड़-धूप करने पर चमकती हुई दीपमाला- रूपी दाँतों की पंक्ति से भीषण अति भीषण रात्रि राक्षसी के मुँह के खुलने पर वह अशोकदत्त शयन करती हुई राजपुत्रीवाले अपने भवन से चुपचाप निकलकर फिर उसी श्मशान में जा पहुँचा ॥२३६-२३९॥ वहाँ पर उसने उसी वटवृक्ष की जड़ में बैठी हुई और स्वागत करती हुई अपनी राक्षसी सास को देखा॥२४०॥ तदनन्तर वह युवक उसके साथ फिर हिमालय-शिखर पर स्थित उसके घर पर गया जहाँ उसकी पत्नी उसकी प्रतीक्षा कर रही थी ॥२४१॥ कुछ समय तक अपनी पत्नी के साथ वहाँ निवास करके अशोकदत्त अपनी सास से बोला कि 'मुझे दूसरा स्वर्ण-कमल दो' ॥२४२॥
५४८ कथासरित्सागर
५४८ कथासरित्सागर सच्छङ्खा साप्यवादीत् कुतोऽन्यत् पङ्कजं मम। एतत्कपालस्फोटस्य विद्यतेऽस्मत्प्रभो सरः॥२४३॥ यत्रेतादृशानि जायन्ते हेमाम्बुजानि समन्ततः। तस्मात्तदेकं मद्भर्त्रे प्रीत्या पश्च स दत्तवान्॥२४४॥ एव तयोक्ते सोऽवादीत्तर्हि तन्मां सरोवरम्। नय यावत्स्वयं तस्मान्दादास्ये कनकम्बुजम्॥२४५॥ न शक्यमेतद्रक्षोभिर्भीषणैस्तद्धि रक्ष्यते। एवं निषिद्धोऽपि तया निर्बन्धं न स तं जहौ॥२४६॥ ततः कथमपिच्छीतश्च तया गत्वा ददर्श तम्। दूरात् सरोवरं दिव्यं शृङ्गाग्रिकटकाश्रितम्॥२४७॥ छन्नं निरन्तरोद्दण्डदीप्तहेमसरोरुहैः। सततोन्मुखतापीतसर्वन्ताकर्प्रभैरिव ॥२४८॥ गत्वैव तत्र यावन्न पद्मान्यवचिनोति सः। तावद्रक्षिणो घोरा रुधुस्तं निशाचराः॥२४९॥ सशस्त्रः सोऽवधीत्पञ्च मानान् याम ये पलाय्य च। गत्वा कपालस्फोटाय स्वामिने तन्न्यवेदयन्॥२५०॥ स तच्छ्रुत्वैव कुपितस्तत्र रक्षःपतिः स्वयम्। आजगामाथोवदत्त तमपश्यत्लुच्छिताम्बुजम्॥२५१॥ कथं भ्राता ममाधोकदत् सोऽयमिहागतः। इति प्रत्यभ्यजानाच्च तत्क्षणं स सविस्मयः॥२५२॥ ततः शस्त्रं समुत्सृज्य हर्षबाष्पाप्लुतेक्षणः। धावित्वा पादयोः सद्यः पतित्वा च जगाद तम्॥२५३॥ अहम् विजयदत्ताख्यः सोदर्यः स तवानुजः। जातो द्विजवरस्योभौ गोविन्दस्वामिनः सुतौ॥२५४॥ इयच्चिरं च जातोऽहं दैवादीदृङ्निशाचरः। चिताकपालदस्र्मात् कपालस्फोटनामकः॥२५५॥ त्वद्दर्शनादिदानीं न ब्राह्मण्यं संस्मृतं मया। गतं च राक्षस्यं मे माहात्म्याद्विजपुत्रनम्॥२५६॥
यह सुनकर बहू कहने लगी कि 'मेरे पास दूसरा स्वर्ण-कमल कहाँ है। यह हमारे राजा कपालस्फोट का सरोवर वीज रहा है, उसमें इस प्रकार के स्वर्ण-कमल होते हैं। उन्हीं में से एक कमल राजा ने मेरे पति को प्रेम से दिया था॥२४३-२४४॥ सास के ऐसा कहने पर अशोकदत्त ने कहा—'तब तुम मुझे उस सरोवर पर ले चलो। मैं स्वयं स्वर्णकमल ले लूँगा'॥२४५॥ उसकी सास ने उससे कहा—'यह सम्भव नहीं है। बड़े-बड़े भीषण राक्षस उस सरोवर की रक्षा करते हैं।' इस प्रकार सास द्वारा निषेध करने पर भी उसने अपना हठ नहीं छोड़ा॥२४६॥ तब किसी प्रकार उस सास द्वारा वहाँ न जाय जान पर उसने दिव्य स्वर्ण-कमलों से युक्त और हिमालय की ऊँची चोटी पर स्थित उस सरोवर को देखा॥२४७॥ वह सरोवर, सूर्य की किरणों का निरन्तर पान करने के कारण सूर्य की प्रभा के समान चमकते हुए ऊँचे-ऊँचे एवं विकसित स्वर्ण-कमलों से ढका हुआ था॥२४८॥ वहाँ जाकर जब वह कमलों को चुनने लगा तब भयानक रक्षक राक्षसों ने उसे रोका॥२४९॥ तब अशोकदत्त ने भी शस्त्र निकालकर उन्हें मारना प्रारम्भ किया। फलतः कुछ राक्षस भय से भागकर अपने स्वामी कपालस्फोट के पास पहुँचे और उन्होंने उससे निवेदन किया॥२५०॥ यह सुनकर क्रोध से भरे हुए राक्षसराज ने स्वयं आकर टूटे हुए स्वर्ण-कमलों के साथ अशोकदत्त को देखा॥२५१॥ उसने आश्चर्य के साथ अपने भाई को पहचानकर सोचा कि 'यह मेरा भाई अशोक- दत्त यहाँ कैसे आ गया'॥२५२॥ तब हर्ष के आँसुओं से भरी हुई आँखोंवाला वह राक्षसराज शस्त्र को फेंककर दौड़कर उसके पैरों पर पड़कर कहने लगा— मैं विजयदत्त नाम का तुम्हारा छोटा सहोदर भाई हूँ। हम दोनों ब्राह्मणश्रेष्ठ गोविन्दस्वामी के पुत्र हैं। दैववश मैं इतने दिनों तक राक्षस बन गया था। चिता में पड़े हुए कपाल (सिर) को फोड़ने के कारण मेरा नाम कपालस्फोट पड़ गया। इस समय तुम्हारे दर्शन से मुझे ब्राह्मणत्व का स्मरण हो आया और अज्ञान से बुद्धि को ढक देनेवाला मेरा राक्षसपन अब मुझसे निकल गया॥२५३-२५६॥
५५ कथासरित्सागर
५५ कथासरित्सागर एव विजयदत्तस्य वक्षः परिरभ्य सः । यावत्क्षालयतीबाङ्गं राक्षसीभावरूपितम् ॥२५७॥ अशोकदत्तो बाष्पाम्बुपूरैस्तावदबातरत् । प्रज्ञाजिकौशिको नाम विद्याधरगुरुर्द्विवः ॥२५८॥ स तौ डाक्यूपयेत्यैव भ्रातरौ गुरुरब्रवीत् । यूयं विद्याधराः सर्वे शापादतां दशां गताः ॥२५९॥ अधुना च स शापो वः सर्वेषां क्षान्तिमागतः । तद्गृहीत निजा विद्या बन्धुसाधारणीरिमाः ॥२६०॥ व्रजतं च निजं धाम स्वीकृतस्वजनौ युवाम् । इत्युक्त्वा दत्तविद्योऽसौ सयार्धामुनयो गुरुः ॥२६१॥ तौ च विद्याधरीभूतौ प्रबुद्धौ जग्मतुस्ततः । व्योम्ना तद्धिमवच्छृङ्गं गृहीतकनकाम्बुजौ ॥२६२॥ तत्र बाधोकदत्तस्तां रक्षःपतिसुतां प्रियाम् । उपागात् साप्यभूत्क्षीणशापा विद्याधरी तदा ॥२६३॥ तया च साकं सुवृक्षा भ्रातरौ तावुभावपि । वाराणसीं प्रयततुः क्षणाद्गगनगामिनी ॥२६४॥ तत्र चोपेत्य पितरौ विप्रयोगाग्निसंतापितौ । निर्वापयन्ता सद्यो दर्शनामृतवर्षिणौ ॥२६५॥ अदेहभेदेऽप्यापन्नन्तधिब्रजमान्तरौ च तौ । न पित्रोरेव लोकस्याप्युत्सवाय बभूवतुः ॥२६६॥ चिराद् विजयदत्तश्च गाडमालिङ्ग्यतः पितुः । भुजमभ्यमिवार्यर्थं मनोरथमपूरयत् ॥२६७॥ सतस्तत्रैव तद्बुद्ध्वा प्रतापमुकुटोऽपि सः ॥ अमोघदत्तश्वशुरो राजा हर्षादुपागमौ ॥२६८॥ : तत्सत्कृतश्च तद्राजधानीं सोत्कण्ठितप्रियाम् । मगोकदत्त स्वजने सार्धं बद्धोत्सवामगात् ॥२६९॥ ददौ च कनकाब्जानि राज्ञ तस्मै बहूनि सः । सभ्यर्थिताधिकप्राप्तिहृष्टः सोऽप्यभवन्नृपः ॥२७०॥ ततो विजयदत्तं च सर्वैश्चत्र स्थितेषु च । पिता पप्रच्छ गोविन्दस्वामी साश्चर्यकौतुकः ॥२७१॥
पंचम लम्बक ५५१
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इस प्रकार कहते हुए विजयदत्त को छाती से चिपकाकर अशोकदत्त ने अपनी अश्रु-धाराओं से जबतक उसके राक्षस-भाव से दूषित शरीर को धो डाला। इतने में ही प्रलम्बोष्ठिक नामक विद्याधरों के गुरु आकाश-मार्ग से उतरकर उन दोनों भाइयों से बोले—'तुम सभी विद्याधर हो। शाप के कारण इस दशा को प्राप्त हुए हो। अब तुमलोगों का वह शाप समाप्त हो गया है। अतः अब तुम अपनी विद्याओं को ले लो और अपने बन्धु विद्याधरों की श्रेणी में मिल जाओ। अब अपने स्थान को जाओ और अपने बन्धु-बान्धवों को स्वीकार करो'। उसने ऐसा कहकर और विद्या देकर गुरु चले गये ॥२५७—२६१॥
तदनन्तर उन्होंने अपने को पहिचाना और वे दोनों विद्याधर हो गये और स्वर्ग-कमलों को लेकर विद्या के प्रभाव से आकाश-मार्ग द्वारा हिमालय-शिखर-स्थित अपने स्थान को चले गये ॥२६२॥
वहाँ पर अशोकदत्त राक्षसराज की पुत्री अपनी पत्नी के पास गया। फलतः वह भी विद्याधरी हो गई ॥२६३॥
उस सुनयना के साथ वे दोनों भाई आकाश-मार्ग से क्षण-भर में वाराणसी आ गये ॥२६४॥
वहाँ आकर वियोग की अग्नि में तपे हुए माता-पिता को अपने दर्शन-रूपी अमृत-वर्षा से उन्होंने शान्त किया ॥२६५॥
शरीर का भेद न होने पर भी उसी शरीर में दूसरे जन्म का अनुभव करते हुए वे दोनों न केवल माता-पिता के ही प्रत्युत सारी जनता के लिए प्रसन्नता देनेवाले हुए ॥२६६॥
विजयदत्त को बहुत दिनों के पश्चात् प्राप्त करने पर प्रगाढ़ आलिङ्गन करते हुए उनके पिता का मनोरथ पूर्ण हुआ ॥२६७॥
वाराणसी का राजा और अशोकदत्त का श्वशुर प्रतापकूट भी यह समाचार सुनकर प्रसन्न होकर वहाँ आ गया ॥२६८॥
उनके द्वारा सम्मानित अशोकदत्त उजाड़ा न सुन्दर वाराणसी नगरी में गया जहाँ उसकी पत्नी राजकुमारी उत्सुक हो उसकी प्रतीक्षा कर रही थी ॥२६९॥
राजभवन में राजा को उपहार में बहुत-से स्वर्ग-कमल दिये। इच्छा से भी अधिक कमलों के मिलने से राजा अत्यधिक प्रसन्न हुआ॥ ७ ॥
एकबार परिवार के साथ बैठे हुए गोविन्दस्वामी ने आश्चर्य के साथ विजयदत्त से पूछा—॥२७०॥
५५४ कथासरित्सागर
५५४ कथासरित्सागर तदा विद्याधरगुरोर्विद्यां प्राप्य भविष्यथ। पुनर्विद्याधरो युक्तो शापमुक्तौ स्वबन्धुभिः॥२८६॥ एवं तैर्मुनिभिः शप्तौ जातावावामुभाविह। वियोगोऽत्र यथाभूत्तत्सर्वं विदितं च नः॥२८७॥ इदानीं पद्मदूतोश्च स्ववधूसिद्धिप्रभावतः। यक्षपतेः पुरं गत्वा प्राप्तोऽस्य चानुजो मया॥२८८॥ तत्रैव च गुरोः प्राप्य विद्यां प्रज्ञप्तिकोदिकात्। सद्यो विद्याधरीभूय यथ क्षिप्रमिहागता॥२८९॥ इत्युक्त्वा पितरौ च तौ प्रियतमां तां चारुमूर्जां भूपतेः। सद्यः शापतमोविमोक्षमुदितो विद्याविधेयैर्निजः॥ तैस्तैः सभ्यमभूद् विचित्रचरितः सोऽशोकदत्तस्तदा। यन्ते सद्यदि प्रबुद्धमनसोऽजायन्त विद्याधराः॥२९०॥ ततस्तमामन्त्र्य नृपं स साकं मातापितृभ्यां दयिताद्वयेन। उत्पत्य धन्यो निजचक्रवर्तिधाम द्युमार्गेण जयी जगाम॥२९१॥ राज्ञाश्लेष्य समाज्ञां प्राप्य च तस्मादशोकवेग इति। नाम स बिभ्रत् सोऽपि च तद्भ्राता विजयवेग इति॥२९२॥ विद्याधरवरतरुणौ स्वजनानुगतावुभौ निजनिवासम्। गोविन्दकूटसञ्ज्ञकमचलवरं भ्रातरौ ययतुः॥२९३॥ सोऽप्याश्चर्यवशः प्रतापकूटो वाराणसीभूपतिः स्वस्मिन् दैवकृते द्वितीयकलशन्यस्तैकहेमाम्बुजः। तद्धंसैरपरे सुवर्णकमलरम्यस्थितय्यम्बक- स्तात्सम्बन्धमहत्तया प्रमुदितो मेने कृतार्थं कुलम्॥२९४॥ एवं दिव्या कारणानावतीर्णा जायन्तेऽस्मिञ्जन्तवो जीवलोके। सत्त्वोत्साहो स्वोचितौ ते वभागा दुष्प्रापामप्यर्थसिद्धिं लभन्ते॥२९५॥ तत्सत्त्वसागर ! भवामपि कोऽपि जाने देवांश एव भविता च यथेष्टसिद्धिः। प्रायः क्रियासु महतामपि दुश्चरासु घोरसाहता कथयति प्रकृतेर्विशेषम्॥२९६॥ सापि त्वदीप्सिता ननु दिव्या राजारमजा कनकरेखा। सामान्यथा हि वाञ्छति कनकपुरीदर्शिनं वरं द्विपठिम्। २९७॥
पंचम लम्बक ५५५
पंचम लम्बक ५५५ उस समय विद्याधरों के गुरु से विद्या प्राप्त करके तुम दोनों शाप से मुक्त होकर पुनः विद्याधर बनोगे॥२८६॥ इस प्रकार उन मुनियों से होकर शापित हम दोनों यहाँ मनुष्य-योनि में उत्पन्न हुए। यहाँ हम सातों का कैसे वियोग हुआ यह सब आपको ज्ञात ही है॥२८७॥ इस समय स्वर्ण-कमल लाने के कारण गाय के प्रभाव से शंखराज के नगर में जाकर मैंने इस छोटे भाई को प्राप्त किया॥२८८॥ और वहीं गुरु प्रभातिकौशिक से विद्याएं प्राप्त करके पुनः विद्याधर होकर शीघ्र यहाँ आये ॥२८९॥ शाप-रूपी अन्धकार के दूर हो जाने से प्रसन्न मनोरथदत्त ने इस प्रकार माता-पिता का तथा अपनी राजकुमारी पत्नी का अपनी विद्या की विशेषता से विद्या-प्रदान करके सभी को विचित्र चरित्र-वाला विद्याधर बना दिया ॥२ ॥ तब वह राजा प्रतापमुकुट से मिलकर माता-पिता दोनों प्रियतमाओं और भाई के साथ वह भव्य मनोरथदत्त आकाश-मार्ग से उड़कर अपने चक्रवर्ती स्थान को गया ॥२९१॥ वहाँ जाकर और वहाँ से आज्ञा प्राप्त करके उसने अपना नाम मनोजवेग और छोटे भाई का नाम विजयवेग रखा ॥२९२॥ वे दोनों सुन्दर विद्याधर तरुण भाई, अपने बन्धु-बान्धवों से मिलकर गोविन्दकूट नामक अपने निवासस्थान को गये ॥२९३॥ अपने देव-मन्दिर में दूसरे कमल में भी एक स्वर्ग कमल रखकर और अशोकदत्त द्वारा प्रदत्त अन्य स्वर्ण-कमलों से शिवजी की पूजा करके अपनी कन्या के महान् सम्बन्ध से वह काशिराज प्रतापमुकुट भी अत्यन्त प्रसन्न और पवित्र हुआ॥२९४॥ इसी प्रकार दिव्य व्यक्ति किसी प्रकार शाप आदि किन्हीं कारणों से जीवलोक में जन्म लेते हैं और अपने स्वरूप के अनुसार बल और उत्साह धारण करते हुए दुष्प्राप्य कार्यों में भी सफलता प्राप्त करते हैं॥२९५॥ इसलिए हे रूप के समुद्र ! मैं समझता हूँ कि तुम भी अपने अपराध सिद्ध अथवा किसी देवता के अंश हो। उच्च व्यक्तियों का कठिन-से-कठिन कार्यों में उत्साहित होना उनके स्वभाव की महत्ता को प्रकट करता है ॥२९६॥ वह तुम्हारी प्यारी राजकुमारी भी अवश्य दिव्य रही है। नहीं तो वह कन्या कनकपुरी देखनेवाले पति को ही क्यों चाहती? ॥२९७॥
५५२ कथासरित्सागर
५५२ कथासरित्सागर तदा श्मशाने यामिन्यां राक्षसत्व गतस्य मे। अभवत्कीदृशो वत्स वृत्तान्तो वर्ण्यतामिति॥२७२॥ छतो विजयदत्तस्त यमाचे तात! चापलात्। प्रस्फोटितचितादीप्तकपालोऽह विधेषंघात्॥२७३॥ मुखप्रविष्टया सद्यस्तद्दक्षाशष्टया तदा। रक्षोभूतस्त्वया तावद्दृष्टो मायाविमोहित ॥२७४॥ 'कपालस्फोट' इत्येव नाम कृत्वा हि राक्षसैः। ततोऽन्यैर्बहुमाहूतस्तन्मध्ये मिश्रितोऽभवम्॥२७५॥ तैश्च नीतो निजस्यास्मि पाश्वं रक्षपते क्रमात्। सोऽपि दृष्ट्वैव मां प्रीत सेनापत्य न्ययोजयत्॥२७६॥ तत कदाचिद् गन्धर्वनिभियोक्तु मदन सः। गतो रक्षपतिस्तत्र सग्रामे निहतोऽरिभिः॥२७७॥ तथैव प्रतिपन्न च तद्भूत्यम॑म शासनम्। ततोऽहं रक्षसां राज्यमकार्ष तत्पुरे स्थित ॥२७८॥ तत्राकस्माच्च युष्माञ्जन्हेतो प्राप्तस्य दश्वमात्। आयस्याशोकदत्तस्य प्रशान्ता सा दशा मम॥२७९॥ अनन्तर यथास्माभि शापमोक्षवशाद्निजाः। विद्या प्राप्तास्तथाऽयो च कृत्स्नमावेदयिष्यति॥२८०॥ एव विजयदत्तेन तेन तत्र निवेदिते। अशोकदत्त स तथा तथामूलादवर्णयत्॥२८१॥ पुरा विद्याधरो सन्तौ गगनाद् गाङ्गयाथमे। भावां स्नान्ती¹ रपश्याव गङ्गायां मुनिकन्यका ॥२८२॥ तुल्याभिलाषास्ताश्चान वाञ्छन्तौ सहसा रहः। बुद्ध्वा तद्वन्धुभि क्रोधाच्छप्तौ स्वो दिव्यवृष्टिभि ॥२८३॥ पापाचारौ प्रजापर्वा मर्त्ययोनौ युवामुभौ। तथापि विप्रयोगाच्च विचित्रो वो भविष्यति॥२८४॥ मानुपागोचर यदा विप्रकृष्टेऽप्युपागतम्। एक दृष्ट्वा द्वितीयो वो यदा प्रज्ञानमाप्स्यति॥२८५॥ १ स्नानमाचरन्तीः।
पञ्चम लम्बक ५५३
पञ्चम लम्बक ५५३ 'बेटा उस समय श्मशान में रात के समय जब तू राक्षस बन गया था तब क्या हुआ बताओ' ॥२७२॥ तब विजयदत्त ने कहा—'पिताजी मैंने बाल-स्वभाव-सुलभ चंचलता से चिता में जलते हुए कपाल को दैववश फोड़ डाला ॥२७३॥ उससे निकली हुई चर्बी की धारा जब मेरे मुख में पड़ी, तब माया से मूढ़ मैं उसी समय राक्षस बन गया ॥२७४॥ तदनन्तर दूसरे राक्षसों ने मेरा नाम कपालस्फोट रखकर अपनी मंडली में बुलाया और मैं भी उसमें सम्मिलित हो गया ॥२७५॥ वे लोग मुझे अपने साथ राक्षसों के राजा के समीप ले गये। उसने मुझे देखकर प्रसन्नता प्रकट की और मुझे अपना सेनापति बना दिया ॥२७६॥ उसके पश्चात् एक बार राक्षसराज ने घमंड में आकर गन्धर्वों पर चढ़ाई कर दी और वह स्वयं युद्ध में मारा गया ॥२७७॥ तब से उसके सेवकों ने मेरा शासन स्वीकार किया और मैंने उसके नगर में रहकर राक्षसों पर राज्य किया ॥२७८॥ वहाँ पर अकस्मात् सोन के कमल लाने के लिए जाय हुए आर्य (बड़े भाई) अशोकदत्त के दर्शन से वह मेरी राक्षसी दशा समाप्त हो गई ॥२७९॥ उसके पश्चात् शाप से मोक्ष होने पर हमलोगों ने अपनी विद्याएँ जैसे प्राप्त कीं यह सब आर्य अशोकदत्त आपको सुनावेंगे' ॥२८०॥ विजयदत्त के इस प्रकार कहने पर अशोकदत्त ने सारी कथा प्रारम्भ से सुनाई —॥२८१॥ पूर्वकाल में हम दोनो विद्याधर थे। उस समय हम दोनों ने गालव मुनि के आश्रम में गंगा स्नान करती हुई मुनि-कन्याओं को देखा ॥२८२॥ समान अभिलाषावाली उन कन्याओं को चाहते हुए हम लोग एकान्त स्थान ढूँढ़ने लगे। दिव्य दृष्टिवाले हमारे गन्धुओ ने इस रहस्य को जानकर हमें शाप दिया ॥२८३॥ 'तुम दोनों पापाचारी मनुष्य-योनि में उत्पन्न होओ। उस योनि में भी तुम दोनो का विचित्र वियोग होगा ॥२८४॥ मनुष्यों से अगम्य दूर देश में एक-दूसरे को देखकर अपने तत्त्व को जानोगे ॥२८५॥
५५४ कथासरित्सागरे
५५४ कथासरित्सागरे तदा विद्याधरगुरोर्विद्यां प्राप्य भविष्यथ । पुनर्विद्याधरौ युक्तौ शापमुक्तौ स्वबन्धुभिः ॥२८६॥ एव तैर्मुनिभिः शाप्तौ जातावावामुभाविह । वियोगोऽत्र मयाभूतस्तत्सर्वं विदितं च वः ॥२८७॥ इदानीं पश्चहेतोश्च स्वभूसिद्धिप्रभावतः । रक्षःपतेः पुरं गत्वा प्राप्तोऽय सानुजो मया ॥२८८॥ तत्रैव च गुरोः प्राप्य विद्याः प्रज्ञप्तिकौशिकात् । सद्यो विद्याधरीभूय वय क्षिप्रमिहागताः ॥२८९॥ इत्युक्त्वा पितरौ च तौ प्रियतमां तां चात्मजां भूपतेः । सद्यः शापसमोविमोक्षमुदितो विद्याविशैर्निजैः ॥ तैस्तैः सम्भ्रमजद् विचित्रचरितः सोऽशोकदत्तस्तदा । येनते सपदि प्रबुद्धमनसोऽजायन्त विद्याधराः ॥२९०॥ ततस्तमामन्त्र्य नृपं स सार्द्धं मातापितृभ्यां दयिताद्वयेन । उत्पत्य धन्यो निजचक्रवर्त्तिधाम द्युमार्गेण जवी जगाम ॥२९१॥ तत्रावलोक्य तमाज्ञां प्राप्य च तस्मादशोकवेग इति । माम् स बिभ्रत् सोऽपि च सद्भ्राता विजयवेग इति ॥२९२॥ विद्याधरवरतरुणौ स्वजनानुगतावुभौ निजनिवासम् । गोविन्दकूटसंज्ञकमचलवरं भ्रातरौ ययतुः ॥२९३॥ सोऽप्यादश्चर्यवशाः प्रतापमुकुटो वाराणसीभूपतिः स्वस्मिन् ददृशुस्त द्वितीयकलशम्यस्तैर्महेभाम्ययुजः । तद्वर्तंग्परे सुवर्णकमलरम्याश्चित्सम्भ्रम्बक- स्तत्सम्बन्धमहत्तया प्रमुदितो मने कृतार्थं कुलम् ॥२९४॥ एव दिव्या कारमनावतीर्णा जायन्तेऽस्मिञ्जन्तवो जीवलोक । गत्त्वाऽवगाहो स्वोचितीं च दद्यामा बुध्यात्मप्यधमिरित भ्रमन्ते ॥२९५॥ तत्तपस्यसागर ! भवानपि कोऽपि जाने देवादा एव भविता च ययत्नसिद्धिः । प्रायः श्रियाम् महतामपि दुष्टरगणु मोग्माहृताः क्षययन्ति प्रशस्तशेषेवम् ॥२९६॥ गापि स्वस्त्रीजिता मनु श्रिया राजाम्रजा कनकरखा । धामाय्या द्वि वाञ्छन्ति कनधपुरेण निन कथं द्विपत्तिम् । २९७॥
पंचम लम्बक ५५५
पंचम लम्बक ५५५ उस समय विद्याधरों के गुरु से विद्या प्राप्त करके तुम दोनों शाप से मुक्त होकर पुनः विद्याधर बनोगे॥२८६॥ इस प्रकार उन मुनियों से होकर शापित हम दोनों यहाँ मनुष्य-योनि में उत्पन्न हुए। यहाँ हम दोनों का जैसे वियोग हुआ यह सब आपको ज्ञात ही है॥२८७॥ इस समय स्वर्ण-कमल लाने के कारण सास के प्रभाव से राक्षसराज के नगर में जाकर मैंने इस छोटे भाई को प्राप्त किया॥२८८॥ और वहीं गुरु प्रज्ञप्तिकौशिक से विद्याएं प्राप्त करके पुनः विद्याधर होकर शीघ्र यहाँ आये॥२८९॥ शाप-रूपी अन्धकार के दूर हो जाने से प्रसन्न अशोकदत्त ने इस प्रकार माता-पिता को तथा अपनी राजकुमारी पत्नी को अपनी विद्या की विशेषता से विद्या-प्रदान करके सभी को विचित्र चरित्र-वाला विद्याधर बना दिया॥२९०॥ तब वह राजा प्रतापमुकुट से मिलकर माता-पिता दोनों प्रियतमाओं और भाई के साथ वह धन्य अशोकदत्त आकाश-मार्ग से उड़कर अपने चक्रवर्ती स्थान को गया॥२९१॥ वहाँ जाकर और वहाँ से आज्ञा प्राप्त करके उसने अपना नाम जयाग्रवेग और छोटे भाई का नाम विजयवेग रखा ॥२९२॥ वे दोनों सुन्दर विद्याधर, सदन भाई, अपने बन्धु-बान्धवों से मिलकर गोविन्दकूट नामक अपने निवासस्थान को गये॥२९३॥ अपने देव-मन्दिर में दूसरे कलश में भी एक स्वर्ण-कमल रखकर और अशोकदत्त द्वारा प्रदत्त अन्य स्वर्ण-कमलों से शिवजी की पूजा करके अपनी कन्या के महान् सम्बन्ध से वह काशिराज प्रतापमुकुट भी अत्यन्त प्रसन्न और चकित हुआ॥२९४॥ इसी प्रकार दिव्य व्यक्ति किसी प्रकार शाप आदि किन्हीं कारणों से जीवलोक में जन्म लेते हैं और अपने स्वरूप के अनुरूप बल और उत्साह धारण करते हुए दुष्प्राप्य कार्यों में भी सफलता प्राप्त करते हैं॥२९५॥ इसलिए हे बल के समुद्र ! मैं समझता हूँ कि तुम भी अपने मनोरथ सिद्ध करनेवाले किसी देवता के अंश हो। उच्च व्यक्तियों का कठिन-से-कठिन कार्यों में उत्साहित होना उनके स्वभाव की महत्ता को प्रकट करता है॥२९६॥ यह तुम्हारी प्यारी राजकुमारी भी अवश्य दिव्य स्त्री है। नहीं तो वह कन्या कनकपुरी देखनेवाले पति को ही क्यों चाहती ? ॥२९७॥
५५८ कथासरित्सागर
५५८ कथासरित्सागर ततः सत्यव्रतोऽप्यावीदसौ देवो वटद्रुमः। अस्याहुः सुमहावर्त्तमधस्ताद् वडवामुखम् ॥११०॥ एतं च परिखृत्यैव प्रदेशमिह गम्यते । अत्रावर्त्ते गतानां हि न भवत्यागमः पुनः ॥१११॥ इति सत्यव्रते तस्मिन् ब्रुवाणेवाम्बुवेगतः । तस्यामेव प्रवृत्तं गन्तु तद्वहण दिशि ॥११२॥ तद्दृष्ट्वा शक्तिदेवं स पुनः सत्यव्रतोऽब्रवीत् । ब्रह्मन् ! विनाशकालोऽय ध्रुवमस्माकमागतः ॥११३॥ यदकस्मात् प्रवहण पश्यात्रैव प्रमात्यदः । शक्यत नैव रोद्धु च कथमप्यधुना मया ॥११४॥ तदावर्त्ते गभीरेऽत्र वयं मृत्योरिवामने । क्षिप्ता एवाम्बुनाकृष्य कर्मनैव¹ बलीयसा ॥१५॥ एतच्च नव मे दुःख शरीर कस्य हि स्थिरम् । दुःख तु यन्न सिद्धिस्ते कृच्छेऽपि मनोरथः ॥११६॥ तद्यावद् वारयाम्येतन्मुहुः प्रवहण मनाक् । तावदस्यावलम्बस्वा शाखां वटतरोबृंहम् ॥११७॥ कदाचिज्जीवितोपायो भवेद् भव्याहृतेस्तव । विधिविलासानम्भोधेण तरङ्गानूको हि तकयेत् ॥११८॥ इति सत्यव्रतस्यास्य धीरसत्त्वस्य जल्पतः । बभूव निकटे तस्य तरो प्रवहण ततः ॥११९॥ तत्क्षण स कृतोत्कारः शक्तिदेवो विसम्भसः । पुप्लुवामग्रहच्छाखां तस्याम्बितटशाखिनः ॥१२०॥ सत्यव्रतस्तु बहुता देहेन वहनेन च । परार्थकल्पितनाम विवेश वडवामुखम् ॥१२१॥ शक्तिदेवश्च शाखाभिः पूरिताशस्य तस्य सः । आश्रित्यापि तरो शाखां निराशः समचिन्तयत् ॥१२२॥ न तावत्सा च कनकपुरी दृष्टा मया पुरी। अपदे नद्यता सावहाधग्ग्रोऽप्यय नाशितः ॥१२३॥ यदि वा सततन्न्यस्तपदा सर्वस्य मूर्धनि । काम भगवती कम भज्यते भवितव्यता ॥१२४॥ १ भाग्येनेत्यर्थः ।
पंचम लम्बक ५५१
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यह सुनकर सत्यव्रत ने कहा—यह वटवृक्ष रूपी देवता है। इसके नीचे आनवाले आवर्त्त (भँवर) को बड़वानल (समुद्री अग्नि) का मुँह बताते हैं। इसीलिए नाववाले उस स्थान को छोड़कर चलते हैं क्योंकि उस भँवर में पड़े हुए नाव फिर लौटते नहीं ॥१०-११॥ जबतक सत्यव्रत इस प्रकार कह ही रहा था इतने में ही उसकी नाव पानी के वेग से उसी ओर बढ़ गई ॥१२॥ यह देखकर सत्यव्रत न शक्तिदेव से फिर कहा—'ब्राह्मण देवता ! हमारे विनाश का समय आ गया है ! ॥१३॥ क्योंकि यह नाव अकस्मात् उसी ओर बही जा रही है। इसे अब मैं किसी तरह भी नहीं रोक सकता ॥१४॥ हम लोग मृत्यु-मुख के समान इस गहरे भँवर में पड़ गये हैं। हमें बलवान् कर्म के समान वेगवान् जल ने इसमें ढकेल दिया है ॥१५॥ मुझे मृत्यु का दुःख नहीं है किसका शरीर अमर रहा है? दुःख केवल इसी बात का है कि इतना कष्ट उठाने पर भी तुम्हारे कार्य म सफलता न मिली ॥१६॥ मैं भरसक नाव को कुछ हटाने का यत्न कर रहा हूँ। तुम शीघ्र ही इस वटवृक्ष की शाखा को पकड़ने का यत्न करना ॥१७॥ तुम भव्य (सुन्दर) आकृतिवाले हो। सम्भव है तुम्हारा कल्याण हो। दैव के विधानों और सुदृढ़ तरंगों को कौन जान सकता है ॥१८॥ धैर्यशाली सत्यव्रत के इस प्रकार कहने पर नाव वटवृक्ष के पास आ गई। उसी समय शक्तिदेव ने बिना व्याकुलता के उछलकर वटवृक्ष की एक मोटी शाखा पकड़ ली ॥१९-२० ॥ किन्तु सत्यव्रत परोपकार के लिए निर्मित नाव से और अपने शरीर से बड़वानल के मुख में चला गया ॥२१॥ शक्तिदेव भी शाखाओं से आशा को पूर्ण करनेवाले उस वृक्ष की शाखा पर आश्रय पाकर, निराश हो सोचने लगा। मैंने कनकपुरी अभी तक नहीं देखी और ऐसे अवसर पर धीवरराज सत्यव्रत को खो दिया। सभी के सिर पर पैर रखकर खड़ी भवितव्यता (होनहार) को कौन मिटा सकता है ॥२२-२४॥
५५६ कथासरित्सागर
५५६ कथासरित्सागर
इति रहसि निशम्य विष्णुदत्तात् सरसकथाप्रकरं स शक्तिदेवः। भुवि कनकपुरीवलोकनेऽपी धृतिमवलम्ब्य निनाय च त्रियामाम् ॥१९८॥ इति महाकविश्रीसोमदेवभट्टविरचिते कथासरित्सागरे चतुरदारिका लम्बके द्वितीयस्तरङ्गः।
तृतीयस्तरङ्गः शक्तिदेवस्य कनकपुरीं प्रति प्रस्थानम् ततस्तत्रोत्स्यरुद्वीपे प्रभाते तं मठस्थितम्। शक्तिदेवं स दाशेन्द्रं सत्यव्रत उपाययौ ॥१॥ स च प्राक्प्रतिपन्नं सङ्घपेटयनमभाषत। प्रह्लांस्त्वदिष्टसिद्धयर्थमुपायश्चिन्तितो मया ॥२॥ अस्ति द्वीपवरं मध्ये रत्नकूटाख्यमम्बुधेः। कृतप्रतिष्ठस्तत्रास्ते भगवान्हरिरम्बिनः॥३॥ आषाढशुक्लद्वादश्यां तत्र यात्रोत्सवे मुदा। आयान्ति सर्वद्वीपेभ्यः पूजाय यत्नतो जनाः ॥४॥ तत्र ज्ञायत कनकपुरी सा जातुचित् पुरी। तदेहि तत्र गच्छावः प्रत्यासन्ना हि सा तिथिः ॥५॥ इति सत्यव्रतेनोक्तं शक्तिदेवस्तथेति सः। जग्राह हृष्टं पाथेयं विष्णुदत्तोपकल्पितम् ॥६॥ ततो वहनमारुह्य स सत्यव्रतढौकितम्। तेनैव साकं त्वरितं प्रायाद् वारिधिवर्त्मना ॥७॥ गच्छंश्च तत्र स द्वीपनि भनक्ते'ऽम्बुतालप । सत्यव्रतं तं पप्रच्छ क्षणमारतया स्थितम् ॥८॥ इतो दूरं महाभोगं किमेतद्दृश्यतेऽम्बुधौ। यदृच्छाप्रोत्सृगतोदप्रसपक्षगिरिविभ्रमम् ॥९॥
१ समुद्रे 'हैल'प्रभृतयो हीनकुत्सा मत्स्या भवन्तीति प्रसिद्धिः।