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कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५)

by महाकवि सोमदेव भट्ट

Source: कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1960 (origin)

DevanagariHindipublished876 pages

५७२ कथासरित्सागर

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५७२ कथासरित्सागर गच्छंश्चिराच्च सम्प्राप जलधेः पुलिनस्थितम्। तद्विटङ्कपुरं नाम नगरं पुनरेव सः ॥११५॥ तत्रापश्यच्च वणिजं तं सम्मुखमुपागतम्। येन साकं गतस्याब्धिं पोतमादावभज्यत ॥११६॥ सोऽयं समुद्रदत्त स्यात् क्व च पतितोऽम्बुधौ। उत्तीर्णोऽथ न वा चित्रमहमवे मिदर्शनम् ॥११७॥ इत्यालोच्य स यावत्तमभ्येति वणिजं द्विजः। तावत्स स परिज्ञाय हृष्टः कण्ठेऽग्रहीद् वणिक् ॥११८॥ अनेषीच्च निजं गेहं कृतातिथ्यश्च पृष्टवान्। पोतमग्ने त्वमम्भोधावे कथमत्तीर्णवानिति ॥११९॥ क्षपितवोऽपि वृत्तान्तं तथा च कृत्स्नमब्रवीत्। यथा मत्स्यनिगीर्णः प्रागुत्स्थलोद्वीपमाप सः ॥१२० ॥ अनन्तरं च तमपि प्रत्यपृच्छद् वणिग्वरम्। क्व तदा त्वमप्यब्धिमुत्तीर्णो वर्ण्यतामिति ॥१२१॥ अथाब्रवीत्सोऽपि वणिक् सवाहं पतितोऽम्बुधौ। दिनत्रयं भ्रमन्नासमकं फलहकं श्रितः ॥१२२॥ ततस्तेन पथाऽकस्मादेकं वहनमागतम्। तत्रस्थैश्चाहमाक्रन्दन् दृष्ट्या चात्रारोपितः ॥१२३॥ मारूढञ्चात्र पितरं स्वमपश्यमहं तदा। गत्वा द्वीपान्तरं पूर्वं चिरात्तत्कालमागतम् ॥१२४॥ स मां दृष्ट्वा परिज्ञाय कृतकण्ठग्रहः पिता। स्वमपृच्छद् वृत्तान्तमहं चैव तमब्रुवम् ॥१२५॥ चिरकालप्रयातेऽपि तात त्वय्यनुपागते। स्वधमं इति वाणिज्यं स्वयमस्मि प्रवृत्तवान् ॥१२६॥ ततो द्वीपान्तरं गच्छंस्तह वहनभङ्गतः। अधाम्बुधौ निमग्नः सन् प्राप्य युष्माभिरित्युभूत् ॥१२७॥ एवं मयोक्तस्तातो मां सोपालम्भमभाषत। आरोहसि किमर्थं त्वमीदृशान् प्राणसंशयान् ॥१२८॥ धनमस्ति हि मे पुत्र! स्थितश्चाहं तदर्जने। पश्यानीतं मयेदं ते वहनं हेमपूरितम् ॥१२९॥ इत्युक्त्वाश्वास्य तेनैव वहनेन निजं गृहम्। विटङ्कपुरमानीतस्तेनेवेदमहं ततः ॥१३ ०॥

पंचम लम्बक ५७३

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[Header] पंचम लम्बक ५७३

चलते-चलते वह बहुत विलंब से समुद्र-तट पर स्थित उस विटंकपुर नगर में फिर पहुँचा ॥११८॥ विटंकपुर में उसने सामने आये हुए उस बनिये को देखा जिसके साथ पहली बार जाने पर समय में जहाज टूट गया था। यह तो वही समुद्रदत्त है जो समुद्र में गिरकर भी बाहर कैसे निकल पाया यह आश्चर्य है ! अथवा इसमें आश्चर्य ही क्या ? मैं ही इसका प्रत्यक्ष उदाहरण हूँ। ऐसा सोचकर उस ब्राह्मण ने बनिये के पास जाते ही उसे अपना परिचय दिया। बनिये ने उसे गले लगाकर हर्ष प्रकट किया और उसे अपने घर लेजाकर स्वागत-सत्कार करने के पश्चात् पूछा कि नाव के टूटने पर तुम समुद्र से कैसे पार हुए। उत्तर में शक्तिदेव ने अपना सारा वृत्तान्त उसे सुना दिया कैसे कि मत्स्य के निगले जाने पर उत्स्थल-द्वीप में वह पहुँचा था॥११९-१२० ॥ अपना समाचार सुनाकर शक्तिदेव ने भी उस वैश्य से पूछा कि तुम कैसे समुद्र से बच निकले सुनाओ ॥१२१॥ बनिये ने अपना वृत्तान्त सुनाते हुए उससे कहा—'उस समय समुद्र में गिर जाने पर मैं एक काष्ठपट्ट (तख्ते) के सहारे तीन दिनों तक समुद्र में ही चक्कर काटता रह गया॥१२२॥ तीसरे दिन उसी मार्ग से एक नाव आई। उसमें बैठे हुए लोगों ने मुझे चिल्लाते हुए देखकर उस पर चढ़ा लिया॥१२३॥ उस पर चढ़कर मैंने उसमें अपने पिता को बैठा हुआ पाया, जो बहुत दिनों से गये हुए थे और किसी दूसरे द्वीप से आ रहे थे ॥१२४॥ मेरे पिता ने मुझे देखकर और गले लगाकर रोते हुए मेरा वृत्तान्त पूछा और मैंने सब बताया ॥१२५॥ मैंने उनसे कहा पिताजी बहुत दिन व्यतीत होने पर और आपके न लौटने पर मैं अपना कर्तव्य समझ कर व्यापार में लग गया॥१२६॥ इसी प्रसंग में दूसरे द्वीप को जाते हुए, नाव के टूट जाने से मैं समुद्र में गिरा और आप लोगों ने आकर मेरा उद्धार किया॥१२७॥ तब मेरे पिता ने मुझसे कहा—'मेरे रहते हुए तुम इस जीवन के सन्देह में पड़ जानेवाले कार्यों में क्यों लगते हो ? देखो मैं इस जहाज को सोने से भरा हुआ लाया हूँ ऐसा कहकर धैर्य देते हुए वे मुझे घर ले आये" ॥१२८-१३१ ॥

५७४ कथासरित्सागर

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५७४ कथासरित्सागर इत्येतद् वणिजस्तस्माच्छक्तिदेवो निशम्य स। विरम्य च त्रियामां तामन्येद्युस्तमपोचत् ॥१३१॥ गन्तव्यमुत्स्थलद्वीप सार्थवाह! पुनर्मया। तत्कथं तत्र गच्छामि साम्प्रतं कथ्यतामिति ॥१३२॥ गन्तुं प्रवृत्तास्तत्राद्य मदीया व्यवहारिणः¹। तद्यानपात्रमारूह्य श्रयातु सह तैर्भवान् ॥१३३॥ इत्युक्तस्तेन वणिजा स तस्तद्व्यवहारिभिः। साकं तदुत्स्थलद्वीपं शक्तिदेवो ययौ ततः ॥१३४॥ यः स बन्धुर्महात्मा मे विष्णुदत्तोऽत्र तिष्ठति। प्राग्वत्तस्यैव निकटं वस्तुमिच्छामि तन्मठम् ॥१३५॥ इति सम्प्राप्य च द्वीप तंत्कालं च विचिन्त्य सः। विपणीमध्यमार्गेण गन्तुं प्रावर्तत द्विजः ॥१३६॥ तावच्च तत्र दैवात्तं दृष्ट्वा दाशपतेः सुताः। सत्यव्रतस्य तस्यारात् परिज्ञायैवमब्रुवन् ॥१३७॥ तातेन सार्क कनकपुरीं लिन्प्सुस्तिस्त्वया। अह्यप्रगास्त्वमेकश्च कथमत्रागतो भवान् ॥१३८॥ शक्तिदेवस्ततोऽवादीदम्बुराशौ स वः पिता। पतितोऽम्बुभिराकष्टवहनो वडवामुखे ॥१३९॥ तच्छ्रुत्वा दाशपुत्रास्ते क्रुद्धा भृत्यान्बभाषिरे। बध्नीतेनं दुरात्मानं हतोऽनेन स नः पिता ॥१४०॥ अन्यथा कथमेकस्मिन् सति प्रवहणे द्वयोः। वडवाग्नौ पतेदेको द्वितीयश्चोत्तरे ततः ॥१४१॥ तदेष चण्डिका देव्याः पुरस्तात् पितृघातकः। अस्माभिरुपहन्तव्यः श्वः प्रभाते पशूकृतः ॥१४२॥ इत्युक्त्वा दाशपुत्रास्ते भृत्यान्बवन्ध्वैव तं तदा। शक्तिदेवं ततो निन्युर्मयङ्कश्चण्डिकामृहम् ॥१४३॥ शवरूपबलितानेकजीवं प्रबिततोवरम्। कथदृष्टाबलीवन्स्तमाळ मृत्योरिवाननम् ॥१४४॥ १ व्यापारिणः। २ अपशुरपि पशूक्तः कृत इतिभावः।

पंचम लम्बक ५७५

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पंचम लम्बक ५७५ वैश्य का समाचार सुनकर शक्तिदेव ने रात को वहीं विश्राम किया और दूसरे दिन उससे कहा— हे व्यापारी मुझे पुनः उत्पस्थल-द्वीप जाना है। सो बताओ मुझे कैसे जाना चाहिए' ॥१३१-१३२॥ वैश्य ने कहा, —'आज ही मेरे व्यापारी वैश्य वहाँ जाने के लिए तैयार हैं तुम उन्हीं के जहाज पर चढ़कर वहाँ जाओ' ॥१३३॥ इस प्रकार उस वैश्य द्वारा वहाँ जाने की सारी व्यवस्था कर देने पर, शक्तिदेव उन्हीं के साथ उत्पलक-द्वीप को गया ॥१३४॥ वहाँ जाकर उसने निश्चय किया कि यहाँ जो मेरा भाई विष्णुदत्त रहता है वह अत्यन्त उदार है पहले उसी के मठ में निवास के लिए जाना चाहिए ॥१३५॥ ऐसा सोचकर वह ब्राह्मण बाजार के बीच से वहाँ जाने लगा ॥१३६॥ इसी बीच दैवयोग से सत्यव्रत नामक निषादराज के पुत्रों ने उसे देखा और पहिचान कर इस प्रकार पूछा —॥१३७॥ 'हे ब्राह्मण तुम तो कनकपुरी को ढूँढ़ते हुए मेरे पिता के साथ यहाँ से गये थे। अब तुम अकेले कैसे आ गये ? ॥१३८॥ तब शक्तिदेव ने कहा—'वह तुम्हारा पिता समुद्री भँवर द्वारा नाव को अपनी ओर खींच लेने पर बड़वानल के मुँह में जा गिरा' ॥१३९॥ यह सुनकर धीवर के पुत्र क्रुद्ध हो गये और उन्होंने अपने सेवकों से कहा— 'इस दुष्ट को बाँध लो। इसने हमारे पिता को मार डाला है ॥१४०॥ अन्यथा एक ही नाव पर एक साथ यात्रा करते हुए कैसे एक व्यक्ति बड़वानल में गिर गया और एक बच गया ॥१४१॥ इसलिए अपने पिता के इस हत्यारे को हम कल प्रातःकाल चंडिका देवी के सामने पशु की तरह इसका बलिदान करेंगे ॥१४२॥ इस प्रकार कहकर धीवर-पुत्रों ने नौकरों से उसे बँधवाकर चंडिका के मन्दिर में पहुँचा दिया ॥१४३॥ वह चंडिका-मन्दिर, निरन्तर प्राणियों को निगलनेवाला विशाल उदरवाला और लटकते हुए घंटे-रूपी दाँतोंवाला मानो मौत का प्रत्यक्ष मुँह था ॥१४४॥

५७६ कथासरित्सागर

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५७६ कथासरित्सागर

तत्र बद्धः स्थितो रात्रौ शशयानः स्वजीवित। स शक्तिदेवो देवीं तां चण्डीमेवं व्यजिज्ञपत् ॥१४५॥ 'बालार्कबिम्बनिभया भगवति मूर्त्या त्वया परित्रातम्। निर्भरपीतप्रविसृतरुग्दानवकण्ठरुधिरयेव जगत् ॥१४६॥ सं मां सततप्रणतं निष्कारणविधुरवर्गहस्तगतम्। रक्षस्व सुदूरागतमिष्टजनप्राप्तितृष्णया वरदे ! ॥१४७॥ इति देवीं स विज्ञप्य प्राप्य निद्रां कथञ्चन। अपश्यद्योषितं स्वप्ने तद्गर्भगृहनिर्गताम् ॥१४८॥ सा दिव्याकृतिरभ्येत्य सद्येव जगाद तम्। भो शक्तिदेव ! मा भैषीर्न तेऽनिष्टं भविष्यति ॥१४९॥ अस्येषां दासपुत्राणां नाम्ना विन्दुमती । स्वसा। सा प्रातर्वीक्ष्य कन्या त्वां भर्तृत्वेऽभ्यर्थयिष्यति ॥१५०॥ तच्च त्वं प्रतिपद्येथाः सैव त्वां मोचयिष्यति। न चा सा धीवरी सा हि दिव्या स्त्री शापतःच्युता ॥१५१॥ एतच्छ्रुत्वा प्रबुद्धस्य तस्य नेत्रामृतच्छटा। प्रभाते दाशकन्या सा तद्देवीगृहमाययौ ॥१५२॥ जगादे चैनमभ्येत्य निर्वेदात्साममुत्सुका। इतोऽहं मोचयामि त्वां तत्कुरुष्वेप्सितं मम ॥१५३॥ भ्रातॄणां सम्मता ह्येते प्रत्याख्याता वरा मया। त्वयि दृष्टे तु मे प्रीतिः सञ्जाता तद्द्‌भजस्व माम् ॥१५४॥ इत्युक्तः स तया बिन्दुमत्या दाशेन्द्रकन्यया। शक्तिदेवः स्मरन् स्वप्नं हृष्टस्तत्तथ्यपद्यत ॥१५५॥ तयैव मोचितस्तां च सुमुखीं परिणीतवान्। स्वप्नलब्धाम्बिकादेवीऋतुभिर्विहितेप्सिताम् ॥१५६॥ तस्थौ च सुखसिद्धयेव तत्र पुष्यकरुम्भया। रूपान्तरोपागतया स तया सह दिव्यया ॥१५७॥ एकदा हर्म्यपृष्ठस्थो धृतगोमांसभारकम्। मार्गगतं स चण्डालं दृष्ट्वा तामब्रवीत् प्रियाम् ॥१५८॥ वन्द्यास्त्रिजगतोऽप्येता याः कृशोदरि धेनवः। तासां पिशितमश्नाति पश्यायं पापकृत्कथम् ॥१५९॥

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वहाँ बाँधकर रखा गया शक्तिदेव अपने जीवन में संशय करता हुए चण्डिका की स्तुति करने लगा—॥१४५॥ 'हे भगवति भरपेट पिये हुए दैत्य के रुधिर समानों उदय होते हुए सूर्य-बिम्ब के समान वर्णवाली (अपनी) मूर्ति से तुमने संसार की रक्षा की है। इसलिए निरन्तर प्रणाम करते हुए, बिना कारण ही पामरों के हाथों में पड़े हुए और प्रेमी जनों की प्राप्ति के लिए दूर देश से आये हुए मेरी रक्षा करो'॥१४६ १४७॥ शक्तिदेव इस प्रकार देवी की स्तुति करके सो गया। उसने स्वप्न में देखा कि उस मन्दिर के गर्भगृह से एक दिव्य स्त्री निकली और उस पर मानों दया करती हुई कहने लगी— 'हे शक्तिदेव तेरा अनिष्ट नहीं होगा ॥१४८ १४९॥ इन धीवर-पुत्रों की बिन्दुमती नाम की बहिन है। वह अभी कुमारी है। प्रातःकाल तुझ देखकर अपना पति बनाने के लिए तुमसे प्रार्थना करेगी॥१५० ॥ तुम उसे स्वीकार कर लेना वही तुम्हें छुड़वा देगी। वह निषाद-जाति की कन्या नहीं है प्रत्युत शाप के प्रभाव से पतित दिव्य-स्त्री है"॥१५१॥ यह सुनकर शक्तिदेव के जागने पर प्रातःकाल ही आँखों में अमृत वर्षा करनेवाली धीवर कन्या उस देवी-मन्दिर में आई॥१५२॥ वह धीवर-कन्या शक्तिदेव के समीप आकर और अपना परिचय देकर उत्सुकता के साथ कहने लगी—'मैं तुम्हें छोड़वा दूँगी पर प्रतिज्ञा करो कि तुम मेरी इच्छा पूरी करोगे। मेरे विवाह के लिए मेरे भाइयों द्वारा सम्मत और लाये गये सभी वरों को मैंने अस्वीकृत कर दिया है किन्तु तुम्हे देखकर मुझे तुम पर प्रेम हो गया है इसलिए मुझे स्वीकार करो ॥१५३ १५४॥ धीवर-राज की कन्या बिन्दुमती के इस प्रकार कहने पर अपने स्वप्न को स्मरण करते हुए शक्तिदेव ने उसके प्रस्ताव को प्रसन्नतापूर्वक स्वीकार कर लिया। और, इसी प्रतिज्ञा पर छुड़ाये गये उसने बिन्दुमती से विवाह भी कर लिया क्योंकि स्वप्न में चंडिका का आदेश पाकर उसके भाई बहिन की इच्छा से सम्मत हो गये थे॥१५५ १५६॥ पुण्य से प्राप्त की हुई सिद्धि के समान दूसरा रूप धारण की हुई उस दिव्य रमणी बिन्दु मती के साथ वह वहीं रहने लगा। एक बार भवन की छत पर उमा के साथ बैठे हुए शक्तिदेव ने सिर पर गोमांस का बोझ उठाये हुए और मार्ग पर चलते हुए एक चांडाल को देखकर अपनी पत्नी से पूछा—॥१५७-१५८॥ हे कृशोदरि, जो गाय तीनों लोकों के लिए वन्दनीय है उसका मांस यह पापी कैसे खाता है ? ॥१५९॥ ७३

५७८ कथासरित्सागर

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५७८ कथासरित्सागर

सम्प्रहृष्टा साप्यवादात्तं पतिं बिन्दुमती तदा । अचिन्त्यमार्यपुत्रैतत्पापमत्र किमुच्यते ॥ १६०॥ अहं गवां प्रभावेण स्वल्पादप्यपराध्यतः ॥ जाता दाशकुलेऽमुष्मिन् का स्वेतस्यात्र निष्कृतिः ॥ १६१॥ एवमुक्तवतीमेव शक्तिदेवो जगाद ताम्। चित्रं ब्रूहि प्रिये ! का त्वं दाशजन्म कथं च ते ॥ १६२॥ अभिनिर्बध्यतश्चैवं पृच्छन्तं तमुवाच सा। वदामि गोप्यमप्येतद् वचनं मे करोषि चेत् ॥ १६३॥ बाढं प्रिये ! करोमीति तेनोक्ते सपथोत्तरम्। सा सर्वं जगादेदमादौ तावत् समीहितम् ॥ १६४॥ बिन्दुमती कथा अस्मिन् द्वीपे द्वितीयापि भार्या ते भविताधुना। सा चार्यपुत्र न चिरादमृतगर्भा भविष्यति ॥ १६५॥ अष्टमे गर्भमासे च पाटयित्वोदरं त्वया। तस्याः स गर्भः क्रष्टव्यो नैव कार्या घृणात्र च ॥ १६६॥ एवमुक्तवती तस्मिन् किमेतदिति विस्मिते। ससद्गुणे च भूयः सा दाशेन्द्रतनयाब्रवीत् ॥ १६७॥ इत्येतत्तव कर्तव्यं हेतोः कस्यापि मद्बचः। अथेदं शृणु या चाहं दाशजन्म यथा च मे ॥ १६८॥ अहं जन्मान्तरेऽभूवं कापि विद्याधरी पुरा। महर्षेस्तोक्ते च शापेन परिभ्रष्टास्मि साम्प्रतम् ॥ १६९॥ विद्याधरत्वे च यदा छित्त्वा दन्तैरयोजयम्। वीणासु तन्त्रीस्तेनेह जाताहं दाशवेश्मनि ॥ १७०॥ तदेवं वदने स्पृष्टे शुक्रेण स्नायुना गवाम्। ईदृश्यधोगतिः का तु वार्ता तन्मांसभक्षणे ॥ १७१॥ इत्येवं कथयन्त्यां च तत्र तस्यां ससम्भ्रमम्। एकोऽभ्युपेत्य तद् भ्राता शक्तिदेवमभाषत ॥ १७२॥ उत्तिष्ठ सुमहानेष कुतोप्युत्थाय सूकरः। हतानेकजनो दर्पादितोऽभिमुखमागतः ॥ १७३॥ तच्छ्रुत्वा साञ्जवीर्येश्च गत्वेव स स्वहर्म्यतः। मारुह्य शक्तिहस्तोऽश्वमपावृतपुरं प्रति ॥ १७४॥

पंचम लम्बक ५७१

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पंचम लम्बक ५७१ यह सुनकर बिन्दुमती अपने पति से कहने लगी— आर्यपुत्र गोमांस-भक्षण का पाप तो अविचिन्त्य है, इस विषय में यहाँ क्या कहा जा सकता है। मैं गायों के ही थोड़े-से अपराध के कारण धीवरों के कुल में जन्मी। अब इससे कब उद्धार होगा यह पता नहीं ॥१६०-१६१॥ ऐसा कहती हुई पत्नी से शक्तिदेव बोला— आश्चर्य है प्रिये ! तुम कौन हो और इस धीवर के कुल में तुम्हारा जन्म कैसे हुआ? ॥१६२॥ इस प्रकार अत्यन्त आग्रह के साथ पूछते हुए शक्तिदेव से उसने कहा—'यह अत्यन्त गोपनीय बात है। यदि तुम मेरी बात मानो तो मैं तुमसे कहती हूँ' ॥१६३॥ तब शक्तिदेव के शपथ खाकर उसे गुप्त रखने की प्रतिज्ञा करने पर, उस बिन्दुमती ने प्रारम्भ से इस प्रकार उसे बताया ॥१६४॥ बिन्दुमती की कथा 'इस द्वीप में तुम्हारी एक दूसरी पत्नी भी होगी और वह शीघ्र ही गर्भवती हो जायगी ॥१६५॥ गर्भ के आठवें महीने में तुम्हें उसका पेट फाड़कर उस गर्भ को निकालना पड़ेगा और इस कार्य में तुम्हें घृणा न करनी होगी' ॥१६६॥ धीवर-कन्या के इस प्रकार कहने पर शक्तिदेव अत्यन्त आश्चर्य-चकित हुआ और घृणा प्रकट करने लगा। यह देखकर धीवर-कन्या ने फिर उससे कहा—'यह कार्य किसी गुप्त कारण से तुम्हें करना ही पड़ेगा। अब सुनो मैं कौन हूँ और धीवर जाति में मेरा जन्म कैसे हुआ? ॥१६७-१६८॥ 'मैं पहले जन्म में विद्याधरी थी। इस समय शाप से पतित होकर मर्त्यलोक में मेरा जन्म हुआ है॥१६९॥ विद्याधर जन्म में मैंने वीणा के तारों को दाँतों से तोड़कर जोड़ा था इसी से धीवर कुल में मेरा जन्म हुआ ॥१७० ॥ इस प्रकार गाय के मृत चमड़े को दाँतों से छूने पर जब मेरी इस प्रकार अधोगति हुई तब मांस-भक्षण की तो बात ही क्या कही जा सकती है ॥१७१॥ उसके ऐसा कहते हुए मध्य में ही उसका एक भाई आकर शक्तिदेव से बोला—'उठो देखो यह शूकर उठकर अनन्त मत्स्यों को मारता हुआ इधर ही सामने आ गया है' ॥१७२-१७३॥ यह सुनकर वह शक्तिदेव अपने भवन से उतरकर घोड़े पर सवार होकर और हाथ में शक्ति (शस्त्र) लिये हुए शूकर की ओर दौड़ा ॥१७४॥

५८ कथासरित्सागर

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५८ कथासरित्सागर प्रजहार च दृष्ट्वैव तस्मिन्नीरेऽभिधावति। पलाय्य व्रणित सोऽपि वराहः प्राविशद् बिलम् ॥१७५॥ शक्तिदेवोऽपि तत्रैव तदन्वपी प्रविश्य च। क्षणादपश्यत् सावासमुद्यानगहनं महत् ॥१७६॥ तत्रस्थश्च ददर्शासौ कन्यामत्यमृताकृतिम्। ससम्भ्रममुपायातां प्रीत्येव वनदेवताम् ॥१७७॥ तामपृच्छच्च कस्यासि ! का त्वं किं सम्भ्रमश्च ते। तच्छ्रुत्वा सापि सुमुखी तमवं प्रत्यभाषत ॥१७८॥ अस्ति दक्षिणविछनायो नृपतिश्चण्डविक्रमः। तस्याहं विन्दुरेखाख्या सुता सुभगकन्यका ॥१७९॥ इहाकस्माच्च पापो मां दैत्यो ज्वलितलोचनः। अपहृत्य च्छलेनाद्य पितुरानीतवान् गृहात् ॥१८०॥ स चामिषार्थी वाराहं रूपं कृत्वा बहिर्गतः। विद्धोऽद्य क्षुधार्त्तः सन् शक्त्या वीरेण केनचित् ॥१८१॥ विद्धमात्रं प्रविश्येह पञ्चत्वमागतश्च सः। तद्वधूतितकौमारा पश्चाद्बाह्य च निर्गता ॥१८२॥ तच्छ्रुत्वा शक्तिदेवस्तामूचे कस्तर्हि सम्भ्रमः। मयैव स वराहो हि हत शक्त्या नृपात्मजे ॥१८३॥ तत साप्यवदत्तर्हि ब्रूहि मे को भवानिति। विप्रोऽहं शक्तिदेवाख्य इति प्रत्यब्रवीच्च सः ॥१८४॥ सहि त्वमेव मे भर्तेत्युचितं स तया वृतः। ततस्यादाय तां धीरो बिलद्वारेण निर्ययौ ॥१८५॥ गृहं गत्वा च भार्यायै बिन्दुमत्यै निवेद्य तत्। तच्छङ्कितं कुमारीं तां बिन्दुरेखामुपोढवान् ॥१८६॥ ततस्तस्य द्विभार्यस्य शक्तिदेवस्य तिष्ठतः। तत्रैका बिन्दुरेखा सा भार्या गर्भमधारयत् ॥१८७॥ अष्टमे गर्भमासे च तस्या स्वैरमुपेत्य तम्। आद्या बिन्दुमती भार्या शक्तिदेवमुवाच सा ॥१८८॥ वीर ! तत्स्मर यन्मह्यं प्रतिश्रुतमभूत्त्वया। सोऽयं द्वितीयभार्याया गर्भमासोऽष्टमस्तव ॥१८९॥

पंचम लम्बक ५८१

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पंचम लम्बक ५८१ उसने भागते हुए सूअर पर प्रहार किया। आहत सूअर भी भागकर अपने बिल में चला गया॥१७५॥ उसे ढूँढ़ता हुआ वह शक्तिदेव भी बिल में घुसा और अन्दर जाकर क्षण-भर में उसने सुन्दर बने हुए निवास-गृहवाले एक वन उद्यान को देखा॥१७६॥ वहाँ जाकर उसने अद्भुत स्वरूपवाली और घबराई हुई एक कन्या को प्रेम से स्वागत के लिए आई हुई, साक्षात् वनदेवी के समान देखा॥१७७॥ और उससे पूछा—'कल्याणमयी तू कौन है? और तुझे इतनी व्याकुलता क्यों है? यह सुनकर वह सुन्दरी उससे इस प्रकार कहने लगी—॥१७८॥ 'हे सुन्दर! दक्षिण-देश में चंडविक्रम नाम का एक राजा है। मैं उसी की कन्या हूँ। मेरा नाम बिन्दुरेखा है। यह पापी दैत्य छलकर मुझे पिता के घर से हरण करके यहाँ ले आया है॥१७९-१८०॥ वह दैत्य मांस-भक्षण के लिए सूअर का रूप धारण करके बाहर गया। किसी से शक्ति द्वारा आहत होने पर वह मूर्च्छा यहाँ आकर मर गया। इसीलिए मैं भी घर से बाहर निकलकर भाग आई हूँ किन्तु मेरी कुमारावस्था को उसने दूषित (नष्ट) नहीं किया है'॥१८१-१८२॥ यह सुनकर शक्तिदेव ने उससे कहा—'तब चिन्ता की क्या बात है? हे राजपुत्रि मैंने ही शक्ति से इस सूअर को मारा है'॥१८३॥ तब वह कन्या कहने लगी कि तुम कौन हो यह बताओ। उत्तर में उसने कहा— 'मैं शक्तिदेव नामक ब्राह्मण हूँ'॥१८४॥ कन्या ने कहा—'तब तू ही मेरा स्वामी है।' उसके ऐसा कहने पर शक्तिदेव उसे लेकर बिल-मार्ग से बाहर निकल आया॥१८५॥ तदनन्तर उस कन्या को ले जाकर अपनी पत्नी बिन्दुमती को सौंप दिया। और, पत्नी के विश्वास दिलाने पर शक्तिदेव ने उस कन्या से पाणिग्रहण कर लिया॥१८६॥ तत्पश्चात् दो पत्नियोंवाले शक्तिदेव के वहाँ रहते हुए एक पत्नी गर्भवती हो गई इस गर्भ का अष्टम मास निकट आने पर शक्तिदेव की पहली पत्नी बिन्दुमती उसके पास जाकर धीरे-से कहने लगी—'वीर, उस बात का स्मरण करो जो तुमने पहले मुझसे प्रतिज्ञा की थी तुम्हारी दूसरी भार्या को आठ महीने का गर्भ हो गया है॥१८७-१८९॥

५८२ कथासरित्सागर

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५८२ कथासरित्सागर सद्गत्वा गर्भमेतस्या विपाद्योर्ध्वमाहर। अनतिक्रमणीयं हि निजं सत्यवचस्तव ॥१९०॥ एवमुक्तस्तया शक्तिदेवः स्नेहकृपाकुलः। प्रतिज्ञापरतन्त्रश्च क्षणमासीदनुत्तरः ॥१९१॥ जातोद्वेगश्च निर्गत्य बिन्दुरेखान्तिकं ययौ। सापि खिन्नमुपायान्तं तं विलोक्यैवमब्रवीत् ॥१९२॥ आर्यपुत्र! विषण्णोऽसि किमद्य ननु वेद्म्यहम्। बिन्दुमत्य नियुक्तरत्वं गर्भस्योत्पाटने मम ॥१९३॥ तच्च तेऽवश्यकर्तव्यं कार्यं किञ्चिद्धि विद्यते। नृशंसता न मास्त्यत्र काचिन्मा घृणां कृपा ॥१९४॥ देवदत्तब्राह्मणस्य कथा तथाहि शृणु नामात्र देवदत्तकथामिमाम्। पुरामूद्धरिदत्ताख्यः कम्बुकाख्ये पुरे द्विजः ॥१९५॥ तस्य च श्रीमतः पुत्रः कृतविद्योऽपि शैशवे। देवदत्ताभिधानोऽभूद्द्यूतैकव्यसनी युवा ॥१९६॥ द्यूतहारितवस्त्रादिर्गन्तुं नालं पितुर्गृहम्। एकदा च विवेशैकः स शून्यं देवतागृहम् ॥१९७॥ तत्र चापश्यदेकाकी साधितानेक कार्मणम्। जपन्तं जालपादाख्यं महाव्रतिनमेककम् ॥१९८॥ चकार च शनैस्तस्य प्रणाममुपगम्य सः। तेनाप्यपास्तमौनेन स्वागतेनाभ्यनन्द्यत ॥१९९॥ स्थितः क्षणाच्च तेनैव पृष्टो वैधुर्यकारणम्। शशंसास्मै स्वविपदं व्यसनक्षीणवित्तताम् ॥२००॥ ततस्तं स जगादैवं देवदत्तं महाव्रती। नास्ति व्यसनिनां वत्स! भुवि पर्याप्तये धनम् ॥२०१॥ इच्छा च विपदं हर्तुं यदि ते कुरु मद्वचः। विद्याधरत्वं प्राप्तं यत् कृतः परिकरो मया ॥२०२॥ तत्साधय त्वमप्येतन्मया सह सुलक्षण! मच्छासनं तु पाल्यं तन्नश्यन्तु विपदस्तव ॥२०३॥ १ विविधकाम्यनानावशां तावकम् ।

पंचम लम्बक ५८१

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पंचम लम्बक ५८१ इसलिए अब तुम उसके पास जाकर उसका पेट फाड़कर लाओ। अब तुम्हें अपनी कही हुई सत्य बात से विचलित न होना चाहिए'॥१९० ॥ पत्नी के द्वारा इस प्रकार कहा गया शक्तिदेव प्रेम और दया से व्याकुल तथा प्रतिज्ञा से पराधीन होकर कुछ देर चुप रहा॥१९१॥ कुछ क्षण आवेश में आकर और वहाँ से निकलकर वह बिन्दुरेखा के पास गया। बिन्दु- रेखा ने उसे दुःखी और चिन्तित होकर अपने पास आते हुए देखकर कहा—'आर्यपुत्र आज दुःखी क्यों हो? यह मैं जानती हूँ कि तुम्हें बिन्दुमंती ने मेरा गर्भ फाड़ने के लिए कहा है। यह कार्य तुम्हें अवश्य करना चाहिए। उससे कुछ काम बनेगा इसमें कुछ भी क्रूरता नहीं है। इसलिए घृणा न करो'॥१९२-१९४॥ देवदत्त ब्राह्मण की कथा 'हे नाथ इस सम्बन्ध में मैं तुम्हें देवदत्त की कथा कहती हूँ सुनो—प्राचीन समय में कम्बुक नामक नगर में हरिदत्त नाम का एक ब्राह्मण था। उस धनी ब्राह्मण का देवदत्त नामक एक पुत्र हुआ जो बाल्यावस्था में ही विद्वान् होकर भी युवावस्था में जूए का व्यसनी हो गया था॥१९५-१९६॥ एक बार जूए में अपने कपड़े तक हार जाने के कारण वह अपने पिता के घर न जा सका और लज्जित होकर वह एक देवमन्दिर में जाकर ठहरा॥१९७॥ वहाँ मन्दिर में अकेले उसने अनेक सामग्रियों को एकत्र करके एकान्त में जप करते हुए महाव्रती जाह्नपाद नामक तपस्वी को देखा॥१९८॥ देवदत्त धीरे से उसके पास जाकर प्रणाम करके बैठा। जाह्नपाद ने भी मौन त्यागकर उसका प्रेमपूर्ण वचनों से स्वागत किया॥१९९॥ कुछ समय बैठने के पश्चात् व्रती जाह्नपाद ने उसकी चिन्ता और दुर्दशा का कारण पूछा। उसके पूछने पर देवदत्त ने अपनी दुर्दशा का कारण जूए के व्यसन में धन का नष्ट हो जाना बताया॥२००॥ तब महातपस्वी जाह्नपाद ने कहा—'बेटा व्यसनियों के लिए पृथ्वी में पूरा धन ही नहीं है'॥२०१॥ यदि तुम मेरी बात मानो तो मेरी इच्छा तुम्हारा कष्ट दूर करने की है। मैंने अपनी साधना से जैसे विद्याधरत्व प्राप्त किया है और सिद्धि प्राप्त की है, उसे तुम भी मेरे साथ प्राप्त करो किन्तु मेरी आज्ञा का पालन करना होगा। तुम्हारी सब विपत्तियां दूर हो जायेंगी'॥२०२-२०३॥

५८४ कथासरित्सागर

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५८४ कथासरित्सागर इत्युक्तो व्रतिना तेन प्रतिश्रुत्य १ तथेति तत्। स देवदत्तस्तत्पार्श्वे सदैव स्थितिमग्रहीत् ॥२०४॥ अन्येद्युश्च श्मशानान्ते गत्वा वटतरोरधः। विधाय रजनीं पूजां परमान्नं निवेद्य च॥२ ५॥ बलीन्दिक्षु च विक्षिप्य सम्पादिततदर्चनः। तं पार्श्ववर्तिनं विप्रमुवाच स महाव्रती ॥२ ६॥ एवमेव त्वया कार्यमिह प्रत्यहमर्चनम्। विद्युत्प्रभे गृहाणेमां पूजामित्यभिधायिना ॥२०७॥ अतः परं न जानेऽहं सिद्धिस्त्वैव ध्रुवावयोः। इत्युक्त्वा स ययौ तेन समं स्वनिलयं व्रती ॥२०८॥ सोऽपि नित्यं तरोस्तस्य मूलं गत्वा समर्च तत्। देवदत्तोऽर्चनं चक्रे तथैव विधिना ततः ॥२०९॥ एकदा च सपर्यान्ते द्विधाभूतात्तरोस्ततः। अकस्मात्पश्यतस्तस्य दिव्या नारी विनिर्ययौ ॥२१ ॥ एह्यस्मत्स्वामिनी भद्र ! वक्ति त्वामिति वादिनी। सा तं प्रवेशयामास तस्यैवाभ्यन्तरं तरोः ॥२११॥ स प्रविश्य ददर्शात्र दिव्यां मणिमयं गृहम्। पर्यङ्कवर्त्तिनीमेकां तत्र चान्तर्वरस्त्रियम् ॥२१२॥ रूपिणी सिद्धिरस्माकमियं स्यादिति स क्षणात्। यावद्व्यवस्यति तावत्सा कृतातिथ्या वराङ्गना ॥२१३॥ रणिताभरणैरङ्गैर्विहितस्वागतैरिव । उत्थाय निजपर्यङ्के तमुपावेशयत् स्वयम् ॥२१४॥ जगाद च महाभाग ! सुता यक्षपतेरहम्। कन्या हि रत्नवर्यस्य ख्याता विद्युत्प्रभाख्यया ॥२१५॥ आराधयच्च मामेष बालपादो महाव्रती। यस्यार्थसिद्धिर्देवास्मि त्वं प्राणेष्वपि मे प्रभुः ॥२१६॥ तस्माद् दृष्टानुरागिण्याः कुरु पाणिग्रहं मम। इत्युक्तः स तया चक्रे देवदत्तस्तथेति तत् ॥२१७॥ १ स्वीकृत्येति भावः २ परमान्नं तु पायसम् इत्यमरः।

पंचम लम्बक ५८५

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पंचम लम्बक ५८५ तपस्वी साम्बन द्वारा इस प्रकार कहे गये देवदत्त ने उसकी बात स्वीकार कर ली और तब से उसी के पास रहने लगा॥२४॥ महाव्रती जालपाद ने दूसरी रात्रि में श्मशान के पास जाकर वटवृक्ष के नीचे पूजा करके खीर और नैवेद्य चढ़ाकर दिशाओं को बलि फेंकते हुए पूजा की और साथ में बैठे हुए देवदत्त से कहा—॥२५-२६॥ देवदत्त तुम्हें भी प्रतिदिन इसी प्रकार पूजन करना चाहिए और पूजा करके कहना चाहिए, विद्युत्प्रभे ! इस पूजा को ग्रहण करो॥२७॥ इससे आगे मैं नहीं जानता। किन्तु हम दोनों को सिद्धि अवश्य मिलेगी। इतना कहकर वह तपस्वी उसको साथ लेकर अपने घर लौट आया॥२८॥ वह ब्राह्मण देवदत्त भी प्रतिदिन उस वटवृक्ष के नीचे जाकर उसी विधि से पूजन करने लगा॥२९॥ एक दिन देवदत्त के पूजा कर लेने के उपरान्त उस वृक्ष के तने को बीच से फाड़कर सहसा एक दिव्यस्त्री निकली॥२१०॥ वह कहने लगी—हे भले आदमी ! मेरी स्वामिनी तुम्हें बुलाती है। इस प्रकार कहकर उसे वह वृक्ष के अन्दर ले गई॥२११॥ देवदत्त ने अन्दर जाकर मणियों से निर्मित एक सुन्दर भवन देखा और उसके भीतर पर्यंक पर बैठी हुई एक सुन्दरी स्त्री देखी। उसे देखकर देवदत्त सोचने लगा सम्भव है यही हमारी मूर्तिमती सिद्धि हो। जबतक वह ऐसा सोचता है तबतक वह सुन्दरी रमणी उसका आतिथ्य करके शुम्भ्रायमान आभूषणों से सुशोभित अंगों से उसका स्वागत करती हुई कहने लगी— 'मैं रत्नपर्व नामक यक्ष की पुत्री विद्युत्प्रभा हूँ। इस महाव्रती जालपाद ने मेरी आराधना की है, उसको मैं भ्रष्टसिद्धि देनेवाली हूँ। किन्तु तुम तो मेरे प्राणों के भी स्वामी हो॥२१२-२१६॥ इसलिए बेअन्ते भाव से प्रेम करनेवाली मुझसे तुम पाणिग्रहण कर लो। उसके इस प्रकार कहने पर देवदत्त ने उससे विवाह कर लिया॥२१७॥ ७४

५८६ कथासरित्सागर

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५८६ कथासरित्सागर स्थित्वा च कञ्चित्काल स गर्भभारे तया धृते। जगाम पुनरागन्तुं तं महाव्रतिन प्रति॥२१८॥ शशंस च यथावृत्तं स तस्मै सभयं ततः। सोऽप्येवमात्मसिद्धयर्थी जगादैनं महाव्रती॥२१९॥ भद्र! साधु कृतं किं तु गत्वास्या यक्षयोषितः। विपाट्योदरमाकृष्य शीघ्रं गर्भं तमानय॥२२०॥ इत्युक्त्वा स्मारयित्वा च व्रतिना पूर्वसङ्गरम्¹। प्रेषितस्तेन भूयस्तां देवदत्तोऽप्यगात् प्रियाम्॥२२१॥ तत्र तिष्ठति यावच्च तद्विभावनदुर्मनाः। तावद् विद्युत्प्रभा सा तं यक्षी स्वयमभाषत॥२२२॥ आर्यपुत्र ! विषण्णोऽसि किमर्थं विदितं मया। आदिष्टं जारुपादेन सन्न मद्गर्भपाटनम्॥२२३॥ तदुद्गर्भमेतमाकर्षं पाटयित्वा ममोदरम्। न चेत् स्वयं करोम्येतत्कार्यं ह्यस्त्यत्र किञ्चन॥२२४॥ एव तयोक्त स यदा कर्तुं तन्नाशकद् द्विजः। तदाकृष्टवती गर्भं सा स्वयं पाटितोदरा॥२२५॥ तं च कृच्छ्रं पुरस्कृत्यस्त्वा देवदत्तं तमभ्यधात्। भोक्तुर्विद्याधरत्वस्य कारणं गृह्यतामयम्॥२२६॥ अहं च शापाद्यक्षीत्वे जाता विद्याधरी सती। अयमीवृक्ष शापान्तो मम जातिस्मरा ह्यहम्॥२२७॥ इदानीं यामि धाम एवं सङ्गमश्चावयोः पुनः। तत्रैवेत्यभिधायैषा क्वापि विद्युत्प्रभा ययौ॥२२८॥ देवदत्तोऽपि तं गर्भं गृहीत्वा खिन्नमानसः। जगाम जारुपादस्य सस्य स व्रतिनोऽन्तिकम्॥२२९॥ उपानयच्च तं गर्भं तस्मै सिद्धिप्रदायिनम्। भजन्त्यारम्भमरित्वा हि दुर्लभंऽपि न साधकः॥२३०॥ सोऽपि तत्पाचयित्वैव गर्भमांसं महाव्रती। व्यमुञ्चद्वदतं तं भैरवाङ्गाहतञ्जबीम्॥२३१॥ ततो दप्तवस्त्रियाविदेत्य पश्यति स द्विजः। तावन्मांसमशेषं तद् व्रतिना तेन भक्षितम्॥२३२॥


१ महासाहसं कार्यमिति पूर्वप्रतिज्ञाम्।

पंचम लम्बक ५८७

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पंचम लम्बक ५८७ और कुछ समय तक उसके गर्भांगार में रहकर फिर अपने मुंह उस महातपस्वी के पास लौट आया और आकर उसने डरते-डरते वह सारा वृत्तान्त उसे सुना दिया। यह सब सुनकर महातपस्वी बोला—॥२१८-२१९॥ 'भद्र ! तुमने जो कुछ किया अच्छा किया। किन्तु अब जाकर उस यक्षिणी का पेट फाड़कर शीघ्र ही उसके गर्भ को ले आओ॥२२० ॥ ऐसा कहकर और उस पूर्व प्रतिज्ञा का स्मरण कराकर साधक ने देवदत्त को फिर वहाँ भेजा और देवदत्त उस प्रेयसी के पास गया॥२२१॥ जब वह इस कर्म को करने में दुःखी होकर विद्युत्प्रभा के पास खड़ा हुआ तब वह स्वयं उससे कहने लगी— आर्यपुत्र तुम जिस लिए चिन्तित हो मुझे विदित है। तुम्हें जालपाद ने मेरा पेट फाड़कर मेरा गर्भ लाने के लिए कहा है। इसलिए तुम इस गर्भ को मेरा पेट फाड़कर खींच लो। नहीं तो मैं स्वयं यह कार्य करती हूँ। इसमें कुछ रहस्य है' ॥२२२-२२४॥ विद्युत्प्रभा के ऐसा कहने पर भी जब वह ब्राह्मण शक्तिदेव उसका पेट फाड़ने के लिए उद्यत न हुआ तब उसने स्वयं अपना पेट फाड़कर गर्भ को पेट से बाहर खींच लिया॥२२५॥ निकाले हुए गर्भ को आगे रखकर वह देवदत्त से कहने लगी— 'इस खानेवाले को विद्याधर बनाने के लिए इसे ले लो। मैं विद्याधरी होकर भी शाप से यक्षी बन गई थी। बस यहीं और इसी प्रकार मेरे शाप का अन्त था। मैं पूर्वजन्म की जाति का स्मरण करती हूँ ॥२ २६-२२७॥ अब मैं अपने स्थान को जाती हूँ और हम दोनों का फिर वहीं समागम होगा। इतना कहकर विद्युत्प्रभा अन्तर्धान हो गई ॥२२८॥ व्यथितहृदय देवदत्त भी उस गर्भ को लेकर उस साधक जालपाद के पास आया। आकर उसने उस गर्भ को उसे भेंट कर दिया॥ २२९॥ सज्जन लोग कठिनाई में भी केवल अपना पेट भरना ही नहीं जानते ॥२३ ०॥ उस महासाधक ने उसका मांस पकाकर उसका कुछ अंश भैरव को देने के लिए शक्तिदेव को जंगल में भेज दिया॥२३१॥ वन में बलि देकर लौटने पर जब शक्तिदेव ने देखा तब जालपाद उस सारे मांस को खा गया था॥२३२॥

५८८ कथासरित्सागर

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५८८ कथासरित्सागर कथं सर्वं त्वया भुक्तमिति भ्रात्रास्य जल्पतः। जिह्वां¹ विद्याधरो भूत्वा जाल्पादः समुद्ययौ ॥२३३॥ व्योमश्यामखनिस्त्रिंशे² हारकेयूरराजिते। तस्मिन्नुत्पतिते सोऽथ देवदत्तो व्यचिन्तयत् ॥२३४॥ कष्टं कीदृगनेनाहं वञ्चितः पापबुद्धिना। यदि वात्यन्तमुग्धता न कस्य परिभूतये ॥२३५॥ तदेतस्यापकारस्य कथमद्य प्रतिक्रियाम्। कुर्यां विद्याधरीभूतमध्येनं प्राप्नुयां कथम् ॥२३६॥ तन्नास्त्युपायो बेतालसाधनादपरोऽत्र मे। इति निश्चित्य स ययौ रात्रौ पितृवनं ततः ॥२३७॥ तत्राहूय तरोर्मूले बेतालं नक्तंचरे। पूजयित्वाऽकरोत्तस्य नृमांसबलिस्तर्पणम् ॥२३८॥ अतृप्यन्तं च बेतालं तमन्यानयनासहम्। तर्पयिष्यन् स्वमांसानि च्छेत्तुमारभते स्म सः ॥२३९॥ तत्क्षणं च स बेतालो महासत्त्वमभाषत। सत्त्वेनानेन तुष्टोऽस्मि तव मा साहसं कृथाः ॥२४०॥ तद् भद्र किमभिप्रेतं तब यत्साधयामि ते। इत्युक्तवन्तं बेतालं स वीरः प्रत्युवाच तम् ॥२४१॥ विश्वस्तवञ्चको यत्र जाल्पादो धर्ती स्थितः। विद्याधरनिवासं तं नय तन्निग्रहाय माम् ॥२४२॥ तथेत्युक्तवता तेन बेतालेन स तत्क्षणात्। स्कन्धेऽधिरोप्य नभसा निन्ये वैद्याधरं पदम्³ ॥२४३॥ तत्रापश्यच्च तं जाल्पादं प्रासादवर्तिनम्। स विद्याधरराजत्वदृप्तं रत्नवासनस्थितम् ॥२४४॥ प्रतारयन्त तामेव सत्यविद्यापरीपदाम्। विद्युत्प्रभामनिच्छन्ती भार्यात्वे तत्प्रवृत्तिभिः ॥२४५॥


१ त्रुटितः। २ आराद्भावत् श्यामन्तः निस्त्रिंशः खड्गोयस्य सः। खड्गस्य श्यामो वर्णः कविसमय-प्रसिद्ध ३ दमप्रान्तम्। ४ श्यामम्।

पंचम लम्बक ५८९

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पंचम लम्बक ५८९ 'तुमने अकेले ही सारा मांस क्यों खा लिया मेरे लिए क्यों नहीं रखा ? —शक्तिदेव के इस प्रकार कहते हुए ही वह कुटिल जालपाद विद्याधर बनकर आकाश में उड़ गया ॥२३३॥ आकाश के समान नीले रंग की तलवार लिये हुए और हार, केयूर से सुशोभित जालपाद के उड़ जाने पर देवदत्त सोचने लगा ॥२३४॥ दुःख है कि उस दुष्ट बुद्धि ने मुझे ठगा। सच है अत्यन्त सरलता किसे अपमानित नहीं करती ? ॥२३५॥ तो अब उसके इस अपकार का बदला मैं कैसे लूँ। विद्याधर बने हुए भी इसे किस प्रकार पकड़ लूँ ॥२३६॥ अब इसके लिए बेताल-साधना के अतिरिक्त और कोई मार्ग नहीं है यह मानकर वह रात को श्मशान में गया ॥२३७॥ यहाँ पर एक वृक्ष की जड़ में जाकर मनुष्य के मुख में नरमांस की बलि तथा तर्पण आदि करके उसने बेताल का आवाहन किया ॥२३८॥ उससे भी बेताल को तृप्त होते न देखकर उसकी तृप्ति के लिए वह अपना मांस काटने लगा। तब बेताल उस महान् आत्मावाले देवदत्त से कहने लगा—मैं तुम्हारे इतने ही साहस से प्रसन्न हूँ अब अधिक साहस न करो। तुम अपना अभीष्ट कार्य बताओ मैं उसे तुम्हारे लिए सिद्ध करूँ। बेताल के ऐसा कहने पर वह वीर देवदत्त बोला—विश्वासी व्यक्ति को ठगनेवाला मायक जालपाद जहाँ भी हो उस विद्याधरों के निवास-स्थान में तुम आज के लिए मुझे ले चलो ॥२३९-२४२॥ देवदत्त के ऐसा कहने पर वह बेताल उसी क्षण उसे कन्धे पर चढ़ाकर आकाश-मार्ग से विद्याधरों के लोक को ले गया ॥२४३॥ विद्याधरलोक के राजभवन में रत्न-सिंहासन पर बैठे हुए, विद्याधर-पद प्राप्त करके अभिमान से अन्ध एवं विद्याधरी पद को प्राप्त पत्नी विद्यन्माला को, उसके न चाहते हुए भी विविध प्रकार की बातों से उसे सुखी बनाने की चेष्टा करते हुए उसने जालपाद को देखा ॥२४४-२४५॥

५९२ कथासरित्सागर

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यहाँ पृष्ठ का संपूर्ण पाठ प्रस्तुत है:

५९२ कथासरित्सागर इति दिव्यां गिरं श्रुत्वा पाटितोदरमाशु स। गर्भं तस्या समाकृष्य पाणिना पृष्ठतोऽग्रहीत् ॥२६०॥ गृहीतमात्रो जज्ञे च स खड्गस्तस्य हस्तगः। आकृष्टः सत्वतः सिद्धेः केशपाश इवायतः ॥२६१॥ ततो विद्याधरः क्षिप्रात्स विप्रः समजायत। बिन्दुरेखा च तत्काळमदर्शनमियाय सा॥२६२॥ तद्दृष्ट्वा च स गत्वैव दाशपुत्र्यै न्यवेदयत्। बिन्दुमत्यै द्वितीयायै पत्न्यै सर्वं तथाविधः ॥२६३॥ सा समाह वयं नाथ ! विद्याधरपतेः सुताः। तिस्रो भगिन्यः कनकपुरीत' शापतश्च्युता॥२६४॥ एका कनकरेखा सा वर्धमानपुरे त्वया। यस्या दृष्टः स शापान्तः सा च तां स्वां पुरीं गता ॥२६५॥ शापान्तो हीदृशस्तस्या विचित्रो विधियोगतः। अहमेव तृतीया च शापान्तस्त्वत्कृतेनैव मे॥२६६॥ मया चाद्यैव गन्तव्या नगरी सा निजा प्रिया। विद्याधरशरीराणि तत्रैवास्माकमासते ॥२६७॥ चन्द्रप्रभा च भगिनी ज्यायसी हि स्थिताऽत्र न। तदायाहि त्वमप्याशु खड्गसिद्धिप्रभावतः ॥२६८॥ तत्र ह्यस्मांश्चतस्रोऽपि भार्याः सम्प्राप्य चाधिकाः। वनस्थेनार्पिताः पित्रा पुरि राज्यं करिष्यसि ॥२६९॥ इति निजपरमार्थमुक्तवत्या सममनया पुनरेव बिन्दुमत्या। अथ कनकपुरीं स शक्तिदेवो गगनपथेन' तथेति तां जगाम ॥ २७० ॥ तस्यां च यानि योषिद्वपूंषि पर्यङ्कतल्यवर्त्तीनि। निर्जीवितान्यपश्यत्पूर्वं त्रिषु मण्डपेषु दिव्यानि ॥२७१॥ तानि यथावत् स्वात्मभिरनुप्रविष्टा स कनकरेखाद्या। प्राप्तो भूयः प्रणता मन्नाशीता निजप्रियास्तिस्र ॥२७२॥ तां च चतुर्थीमैक्षत तज्ज्येष्ठां रचितमङ्गलां तत्र। चन्द्रप्रभां पिबन्तीं चिरदर्शोत्कण्ठा दृष्ट्या ॥२७३॥


१ खड्गसिद्धेरवात्तस्य विद्याधरत्वं खेचरत्वञ्च सम्प्राप्तम्।

पंचम लम्बक ५९३

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पंचम लम्बक ५९३ इस प्रकार दिव्यवाणी सुनकर शक्तिदेव ने उसका पेट फाड़कर गर्भ को गले से पकड़ा॥२१४॥ बिन्दुरेखा उसी समय अदृश्य हो गई और गर्भ को पकड़ते ही वह आत्मबल से प्राप्त सिद्धि के लम्बे केशपाश के समान तलवार बनकर उसके हाथ में रह गया। इस प्रकार, हाथ में तलवार के आते ही वह ब्राह्मण शक्तिदेव भी तुरन्त विद्याधर बन गया। यह सब दृश्य शक्तिदेव न पाकर अपनी दूसरी पत्नी धीवर कन्या बिन्दुमती से कहा। तब वह रहस्योद्घाटन करती हुई बताने लगी—'हे स्वामिन्! हम तीनों विद्याधरों के राजा की कन्याएँ तीन बहिनें हैं, जो शाप के कारण कनकपुरी से पतित हुई हैं॥२१५१-२१४॥ एक कन्या कनकरेखा नाम से वर्धमान नगर में राजकन्या हुई, जिसके शाप का अन्त तुमने स्वयं किया। वह अपनी नगरी को चली गई। दैवयोग से उसके शाप का अन्त ही ऐसा विचित्र था। मैं तीसरी बहिन हूँ। आज मेरे शाप का भी अन्त हो गया। आज ही मैं अपनी प्रिय नगरी को चली जाऊँगी। वहीं पर हमारे विद्याधर-शरीर सुरक्षित हैं॥२१५-२१७॥ हमारी बड़ी बहिन चन्द्रप्रभा भी वहीं है। अब तुम भी खड्गसिद्धि के प्रभाव से शीघ्र वहीं आओ॥२१८॥ तुम वहाँ हम चारों बहिनों को पत्नी-रूप में प्राप्त करके और बलशाली हमारे पिता का राज्य भी प्राप्त करके कनकपुरी का राज्य करोगे॥२१९॥ इस प्रकार अपनी वास्तविक स्थिति बतलानेवाली बिन्दुमती के साथ ही वह शक्तिदेव आकाश-मार्ग से कनकपुरी को गया॥२२०॥ उसने पहली बार उस राजभवन के तीनों मंदरों के भीतर पर्यंकों पर पड़े जो तीन निर्जीव शरीर देखे थे, अब वहाँ पहुँचने पर उनमें अपने-अपने जीवों के प्रवेश करने पर उनसे प्रणाम करती हुई तीनों पत्नियों को देखा॥२२१-२२२॥ तदुपरान्त उसने उनकी बड़ी बहिन चन्द्रप्रभा को भी देखा, जो चिरकाल के पश्चात् दर्शन मिलने के कारण उत्सुकतापूर्ण दृष्टि से आत्म-रचना स्पष्ट देख रही थी॥२२३॥ ७५