कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५)
by महाकवि सोमदेव भट्ट
Source: कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1960 (origin)
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Read in contextपंचम लम्बक ५८७ और कुछ समय तक उसके गर्भांगार में रहकर फिर अपने मुंह उस महातपस्वी के पास लौट आया और आकर उसने डरते-डरते वह सारा वृत्तान्त उसे सुना दिया। यह सब सुनकर महातपस्वी बोला—॥२१८-२१९॥ 'भद्र ! तुमने जो कुछ किया अच्छा किया। किन्तु अब जाकर उस यक्षिणी का पेट फाड़कर शीघ्र ही उसके गर्भ को ले आओ॥२२० ॥ ऐसा कहकर और उस पूर्व प्रतिज्ञा का स्मरण कराकर साधक ने देवदत्त को फिर वहाँ भेजा और देवदत्त उस प्रेयसी के पास गया॥२२१॥ जब वह इस कर्म को करने में दुःखी होकर विद्युत्प्रभा के पास खड़ा हुआ तब वह स्वयं उससे कहने लगी— आर्यपुत्र तुम जिस लिए चिन्तित हो मुझे विदित है। तुम्हें जालपाद ने मेरा पेट फाड़कर मेरा गर्भ लाने के लिए कहा है। इसलिए तुम इस गर्भ को मेरा पेट फाड़कर खींच लो। नहीं तो मैं स्वयं यह कार्य करती हूँ। इसमें कुछ रहस्य है' ॥२२२-२२४॥ विद्युत्प्रभा के ऐसा कहने पर भी जब वह ब्राह्मण शक्तिदेव उसका पेट फाड़ने के लिए उद्यत न हुआ तब उसने स्वयं अपना पेट फाड़कर गर्भ को पेट से बाहर खींच लिया॥२२५॥ निकाले हुए गर्भ को आगे रखकर वह देवदत्त से कहने लगी— 'इस खानेवाले को विद्याधर बनाने के लिए इसे ले लो। मैं विद्याधरी होकर भी शाप से यक्षी बन गई थी। बस यहीं और इसी प्रकार मेरे शाप का अन्त था। मैं पूर्वजन्म की जाति का स्मरण करती हूँ ॥२ २६-२२७॥ अब मैं अपने स्थान को जाती हूँ और हम दोनों का फिर वहीं समागम होगा। इतना कहकर विद्युत्प्रभा अन्तर्धान हो गई ॥२२८॥ व्यथितहृदय देवदत्त भी उस गर्भ को लेकर उस साधक जालपाद के पास आया। आकर उसने उस गर्भ को उसे भेंट कर दिया॥ २२९॥ सज्जन लोग कठिनाई में भी केवल अपना पेट भरना ही नहीं जानते ॥२३ ०॥ उस महासाधक ने उसका मांस पकाकर उसका कुछ अंश भैरव को देने के लिए शक्तिदेव को जंगल में भेज दिया॥२३१॥ वन में बलि देकर लौटने पर जब शक्तिदेव ने देखा तब जालपाद उस सारे मांस को खा गया था॥२३२॥