कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५)
by महाकवि सोमदेव भट्ट
Source: कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1960 (origin)
पंचम लम्बक ५८७
पंचम लम्बक ५८७ और कुछ समय तक उसके गर्भांगार में रहकर फिर अपने मुंह उस महातपस्वी के पास लौट आया और आकर उसने डरते-डरते वह सारा वृत्तान्त उसे सुना दिया। यह सब सुनकर महातपस्वी बोला—॥२१८-२१९॥ 'भद्र ! तुमने जो कुछ किया अच्छा किया। किन्तु अब जाकर उस यक्षिणी का पेट फाड़कर शीघ्र ही उसके गर्भ को ले आओ॥२२० ॥ ऐसा कहकर और उस पूर्व प्रतिज्ञा का स्मरण कराकर साधक ने देवदत्त को फिर वहाँ भेजा और देवदत्त उस प्रेयसी के पास गया॥२२१॥ जब वह इस कर्म को करने में दुःखी होकर विद्युत्प्रभा के पास खड़ा हुआ तब वह स्वयं उससे कहने लगी— आर्यपुत्र तुम जिस लिए चिन्तित हो मुझे विदित है। तुम्हें जालपाद ने मेरा पेट फाड़कर मेरा गर्भ लाने के लिए कहा है। इसलिए तुम इस गर्भ को मेरा पेट फाड़कर खींच लो। नहीं तो मैं स्वयं यह कार्य करती हूँ। इसमें कुछ रहस्य है' ॥२२२-२२४॥ विद्युत्प्रभा के ऐसा कहने पर भी जब वह ब्राह्मण शक्तिदेव उसका पेट फाड़ने के लिए उद्यत न हुआ तब उसने स्वयं अपना पेट फाड़कर गर्भ को पेट से बाहर खींच लिया॥२२५॥ निकाले हुए गर्भ को आगे रखकर वह देवदत्त से कहने लगी— 'इस खानेवाले को विद्याधर बनाने के लिए इसे ले लो। मैं विद्याधरी होकर भी शाप से यक्षी बन गई थी। बस यहीं और इसी प्रकार मेरे शाप का अन्त था। मैं पूर्वजन्म की जाति का स्मरण करती हूँ ॥२ २६-२२७॥ अब मैं अपने स्थान को जाती हूँ और हम दोनों का फिर वहीं समागम होगा। इतना कहकर विद्युत्प्रभा अन्तर्धान हो गई ॥२२८॥ व्यथितहृदय देवदत्त भी उस गर्भ को लेकर उस साधक जालपाद के पास आया। आकर उसने उस गर्भ को उसे भेंट कर दिया॥ २२९॥ सज्जन लोग कठिनाई में भी केवल अपना पेट भरना ही नहीं जानते ॥२३ ०॥ उस महासाधक ने उसका मांस पकाकर उसका कुछ अंश भैरव को देने के लिए शक्तिदेव को जंगल में भेज दिया॥२३१॥ वन में बलि देकर लौटने पर जब शक्तिदेव ने देखा तब जालपाद उस सारे मांस को खा गया था॥२३२॥
५८८ कथासरित्सागर
५८८ कथासरित्सागर कथं सर्वं त्वया भुक्तमिति भ्रात्रास्य जल्पतः। जिह्वां¹ विद्याधरो भूत्वा जाल्पादः समुद्ययौ ॥२३३॥ व्योमश्यामखनिस्त्रिंशे² हारकेयूरराजिते। तस्मिन्नुत्पतिते सोऽथ देवदत्तो व्यचिन्तयत् ॥२३४॥ कष्टं कीदृगनेनाहं वञ्चितः पापबुद्धिना। यदि वात्यन्तमुग्धता न कस्य परिभूतये ॥२३५॥ तदेतस्यापकारस्य कथमद्य प्रतिक्रियाम्। कुर्यां विद्याधरीभूतमध्येनं प्राप्नुयां कथम् ॥२३६॥ तन्नास्त्युपायो बेतालसाधनादपरोऽत्र मे। इति निश्चित्य स ययौ रात्रौ पितृवनं ततः ॥२३७॥ तत्राहूय तरोर्मूले बेतालं नक्तंचरे। पूजयित्वाऽकरोत्तस्य नृमांसबलिस्तर्पणम् ॥२३८॥ अतृप्यन्तं च बेतालं तमन्यानयनासहम्। तर्पयिष्यन् स्वमांसानि च्छेत्तुमारभते स्म सः ॥२३९॥ तत्क्षणं च स बेतालो महासत्त्वमभाषत। सत्त्वेनानेन तुष्टोऽस्मि तव मा साहसं कृथाः ॥२४०॥ तद् भद्र किमभिप्रेतं तब यत्साधयामि ते। इत्युक्तवन्तं बेतालं स वीरः प्रत्युवाच तम् ॥२४१॥ विश्वस्तवञ्चको यत्र जाल्पादो धर्ती स्थितः। विद्याधरनिवासं तं नय तन्निग्रहाय माम् ॥२४२॥ तथेत्युक्तवता तेन बेतालेन स तत्क्षणात्। स्कन्धेऽधिरोप्य नभसा निन्ये वैद्याधरं पदम्³ ॥२४३॥ तत्रापश्यच्च तं जाल्पादं प्रासादवर्तिनम्। स विद्याधरराजत्वदृप्तं रत्नवासनस्थितम् ॥२४४॥ प्रतारयन्त तामेव सत्यविद्यापरीपदाम्। विद्युत्प्रभामनिच्छन्ती भार्यात्वे तत्प्रवृत्तिभिः ॥२४५॥
१ त्रुटितः। २ आराद्भावत् श्यामन्तः निस्त्रिंशः खड्गोयस्य सः। खड्गस्य श्यामो वर्णः कविसमय-प्रसिद्ध ३ दमप्रान्तम्। ४ श्यामम्।
पंचम लम्बक ५८९
पंचम लम्बक ५८९ 'तुमने अकेले ही सारा मांस क्यों खा लिया मेरे लिए क्यों नहीं रखा ? —शक्तिदेव के इस प्रकार कहते हुए ही वह कुटिल जालपाद विद्याधर बनकर आकाश में उड़ गया ॥२३३॥ आकाश के समान नीले रंग की तलवार लिये हुए और हार, केयूर से सुशोभित जालपाद के उड़ जाने पर देवदत्त सोचने लगा ॥२३४॥ दुःख है कि उस दुष्ट बुद्धि ने मुझे ठगा। सच है अत्यन्त सरलता किसे अपमानित नहीं करती ? ॥२३५॥ तो अब उसके इस अपकार का बदला मैं कैसे लूँ। विद्याधर बने हुए भी इसे किस प्रकार पकड़ लूँ ॥२३६॥ अब इसके लिए बेताल-साधना के अतिरिक्त और कोई मार्ग नहीं है यह मानकर वह रात को श्मशान में गया ॥२३७॥ यहाँ पर एक वृक्ष की जड़ में जाकर मनुष्य के मुख में नरमांस की बलि तथा तर्पण आदि करके उसने बेताल का आवाहन किया ॥२३८॥ उससे भी बेताल को तृप्त होते न देखकर उसकी तृप्ति के लिए वह अपना मांस काटने लगा। तब बेताल उस महान् आत्मावाले देवदत्त से कहने लगा—मैं तुम्हारे इतने ही साहस से प्रसन्न हूँ अब अधिक साहस न करो। तुम अपना अभीष्ट कार्य बताओ मैं उसे तुम्हारे लिए सिद्ध करूँ। बेताल के ऐसा कहने पर वह वीर देवदत्त बोला—विश्वासी व्यक्ति को ठगनेवाला मायक जालपाद जहाँ भी हो उस विद्याधरों के निवास-स्थान में तुम आज के लिए मुझे ले चलो ॥२३९-२४२॥ देवदत्त के ऐसा कहने पर वह बेताल उसी क्षण उसे कन्धे पर चढ़ाकर आकाश-मार्ग से विद्याधरों के लोक को ले गया ॥२४३॥ विद्याधरलोक के राजभवन में रत्न-सिंहासन पर बैठे हुए, विद्याधर-पद प्राप्त करके अभिमान से अन्ध एवं विद्याधरी पद को प्राप्त पत्नी विद्यन्माला को, उसके न चाहते हुए भी विविध प्रकार की बातों से उसे सुखी बनाने की चेष्टा करते हुए उसने जालपाद को देखा ॥२४४-२४५॥
५९२ कथासरित्सागर
यहाँ पृष्ठ का संपूर्ण पाठ प्रस्तुत है:
५९२ कथासरित्सागर इति दिव्यां गिरं श्रुत्वा पाटितोदरमाशु स। गर्भं तस्या समाकृष्य पाणिना पृष्ठतोऽग्रहीत् ॥२६०॥ गृहीतमात्रो जज्ञे च स खड्गस्तस्य हस्तगः। आकृष्टः सत्वतः सिद्धेः केशपाश इवायतः ॥२६१॥ ततो विद्याधरः क्षिप्रात्स विप्रः समजायत। बिन्दुरेखा च तत्काळमदर्शनमियाय सा॥२६२॥ तद्दृष्ट्वा च स गत्वैव दाशपुत्र्यै न्यवेदयत्। बिन्दुमत्यै द्वितीयायै पत्न्यै सर्वं तथाविधः ॥२६३॥ सा समाह वयं नाथ ! विद्याधरपतेः सुताः। तिस्रो भगिन्यः कनकपुरीत' शापतश्च्युता॥२६४॥ एका कनकरेखा सा वर्धमानपुरे त्वया। यस्या दृष्टः स शापान्तः सा च तां स्वां पुरीं गता ॥२६५॥ शापान्तो हीदृशस्तस्या विचित्रो विधियोगतः। अहमेव तृतीया च शापान्तस्त्वत्कृतेनैव मे॥२६६॥ मया चाद्यैव गन्तव्या नगरी सा निजा प्रिया। विद्याधरशरीराणि तत्रैवास्माकमासते ॥२६७॥ चन्द्रप्रभा च भगिनी ज्यायसी हि स्थिताऽत्र न। तदायाहि त्वमप्याशु खड्गसिद्धिप्रभावतः ॥२६८॥ तत्र ह्यस्मांश्चतस्रोऽपि भार्याः सम्प्राप्य चाधिकाः। वनस्थेनार्पिताः पित्रा पुरि राज्यं करिष्यसि ॥२६९॥ इति निजपरमार्थमुक्तवत्या सममनया पुनरेव बिन्दुमत्या। अथ कनकपुरीं स शक्तिदेवो गगनपथेन' तथेति तां जगाम ॥ २७० ॥ तस्यां च यानि योषिद्वपूंषि पर्यङ्कतल्यवर्त्तीनि। निर्जीवितान्यपश्यत्पूर्वं त्रिषु मण्डपेषु दिव्यानि ॥२७१॥ तानि यथावत् स्वात्मभिरनुप्रविष्टा स कनकरेखाद्या। प्राप्तो भूयः प्रणता मन्नाशीता निजप्रियास्तिस्र ॥२७२॥ तां च चतुर्थीमैक्षत तज्ज्येष्ठां रचितमङ्गलां तत्र। चन्द्रप्रभां पिबन्तीं चिरदर्शोत्कण्ठा दृष्ट्या ॥२७३॥
१ खड्गसिद्धेरवात्तस्य विद्याधरत्वं खेचरत्वञ्च सम्प्राप्तम्।
पंचम लम्बक ५९३
पंचम लम्बक ५९३ इस प्रकार दिव्यवाणी सुनकर शक्तिदेव ने उसका पेट फाड़कर गर्भ को गले से पकड़ा॥२१४॥ बिन्दुरेखा उसी समय अदृश्य हो गई और गर्भ को पकड़ते ही वह आत्मबल से प्राप्त सिद्धि के लम्बे केशपाश के समान तलवार बनकर उसके हाथ में रह गया। इस प्रकार, हाथ में तलवार के आते ही वह ब्राह्मण शक्तिदेव भी तुरन्त विद्याधर बन गया। यह सब दृश्य शक्तिदेव न पाकर अपनी दूसरी पत्नी धीवर कन्या बिन्दुमती से कहा। तब वह रहस्योद्घाटन करती हुई बताने लगी—'हे स्वामिन्! हम तीनों विद्याधरों के राजा की कन्याएँ तीन बहिनें हैं, जो शाप के कारण कनकपुरी से पतित हुई हैं॥२१५१-२१४॥ एक कन्या कनकरेखा नाम से वर्धमान नगर में राजकन्या हुई, जिसके शाप का अन्त तुमने स्वयं किया। वह अपनी नगरी को चली गई। दैवयोग से उसके शाप का अन्त ही ऐसा विचित्र था। मैं तीसरी बहिन हूँ। आज मेरे शाप का भी अन्त हो गया। आज ही मैं अपनी प्रिय नगरी को चली जाऊँगी। वहीं पर हमारे विद्याधर-शरीर सुरक्षित हैं॥२१५-२१७॥ हमारी बड़ी बहिन चन्द्रप्रभा भी वहीं है। अब तुम भी खड्गसिद्धि के प्रभाव से शीघ्र वहीं आओ॥२१८॥ तुम वहाँ हम चारों बहिनों को पत्नी-रूप में प्राप्त करके और बलशाली हमारे पिता का राज्य भी प्राप्त करके कनकपुरी का राज्य करोगे॥२१९॥ इस प्रकार अपनी वास्तविक स्थिति बतलानेवाली बिन्दुमती के साथ ही वह शक्तिदेव आकाश-मार्ग से कनकपुरी को गया॥२२०॥ उसने पहली बार उस राजभवन के तीनों मंदरों के भीतर पर्यंकों पर पड़े जो तीन निर्जीव शरीर देखे थे, अब वहाँ पहुँचने पर उनमें अपने-अपने जीवों के प्रवेश करने पर उनसे प्रणाम करती हुई तीनों पत्नियों को देखा॥२२१-२२२॥ तदुपरान्त उसने उनकी बड़ी बहिन चन्द्रप्रभा को भी देखा, जो चिरकाल के पश्चात् दर्शन मिलने के कारण उत्सुकतापूर्ण दृष्टि से आत्म-रचना स्पष्ट देख रही थी॥२२३॥ ७५
५१ कथासरित्सागर
५१ कथासरित्सागर दृष्ट्वैव च सवेतालोऽप्यभ्यधावत्स तं रुषा। हृप्यद्विद्युत्प्रभानेत्रचकोरामृतचन्द्रमाः ॥२४६॥ जासपादोऽपि सोऽकस्मातं दृष्ट्वैवागतं तथा। वित्रासाद् भ्रष्टनिस्त्रिंशो' निपपातासनाद् भुवि ॥२४७॥ देवदत्तोऽपि सखड्गं स लब्ध्वाप्यवधीन्न तम्। रिपुष्वपि हि भीतेषु सानुकम्पा महाशयाः ॥२४८॥ जिघांसन्तं च वेताल तं जगाद स तारयन्। पाखण्डिना किमेतेन कृपणेन हतेन नः॥२४९॥ स्थाप्यतां भुवि नीत्वाय सस्मारस्वनिलये त्वया। आस्तां तत्रैव भूयोऽपि याथ कापालिको वरम् ॥२५० ॥ इत्येव वदतस्तस्य देवदत्तस्य तत्क्षणम्। दिवोऽवतीर्य शर्वाणी देवी प्रत्यक्षतां ययौ ॥२५१॥ सा जगाद च तं प्रह्व पुत्र तुष्टास्मि तेऽधुना। अनन्यसदृशेनेह सत्त्वोत्कर्षेण सम्प्रति ॥२५२॥ तद्विद्याधरराज्यञ्च मया दत्तमिहैव ते। इत्युक्त्वापितविद्या सा देवी सद्यस्तिरोऽभवत् ॥२५३॥ जासपादश्च नीत्वैव वेतालेन स भूतले। विभ्रष्टसिद्धिर्निदधे नाशर्मस्थिरमुद्धये ॥२५४॥ देवदत्तोऽपि सहित स विद्युत्प्रभया तया। विद्याधराधिराज्यं तत्प्राप्य तत्र व्यजृम्भत ॥२५५॥ इत्याख्याय कथां पत्ये शक्तिदेवाय सत्वरा। सा बिन्दुरेखा भूयस्तं बभाषे मृदुभाषिणी ॥२५६॥ इतीदृशि भवन्त्येव कार्याणि तदिव मम। बिन्दुप्रत्युदितं गर्भं मुक्तशोकं विपाटय ॥२५७॥ शक्तिदेवस्य विद्याधरत्वप्राप्तिः इत्येव बिन्दुरेखायां वदन्त्यां पापशङ्किते। शक्तिदेवे च गगनादुदभूत्तत्र भारती ॥२५८॥ 'भो शक्तिदेव ! निश्शङ्कं गर्भोऽस्याः कृप्यतां त्वया। कष्ठे मुष्ट्या गृहीतो हि खड्गोऽसौ ते भविष्यति' ॥२५९॥ १ हस्तच्युत खङ्गः ।
पंचम लम्बक ५११
पंचम लम्बक ५११ उसे देखते ही मन्त्रमाता विद्युत्प्रभा के नेत्र-चकोरों के लिए चन्द्रमा के समान वह युवक देवदत्त वेताल के सहित जालपाद की ओर दौड़ पड़ा। जालपाद ने भी उसे अकस्मात् आये हुए देखकर, भय और व्याकुलता के कारण उसके हाथ से तलवार के गिर जाने पर वह सिंहासन से भूमि पर गिर पड़ा ॥ २४६-२४७॥ देवदत्त ने उसकी गिरी हुई तलवार को पाकर भी उसे मारा नहीं उदार पुरुष डरे हुए शत्रुओं पर भी दयालु होते हैं॥२४८॥ जालपाद को मारते हुए वेताल को भी उसने रोक कर कहा—'इस बेचारे पाखण्डी को मारने से क्या लाभ? इसे पृथ्वी पर ले जाकर इसी के घर में रख दो। यह पापी फिर यहाँ कापालिक-व्रत करता रहे तो ठीक है।॥२४९-२५०॥ इस प्रकार की घटना होने पर उसी क्षण देवी पार्वती स्वर्ग से उतरकर आई और देवदत्त से प्रेमपूर्वक कहने लगीं—'बेटा तेरे इस असाधारण भार्योत्कर्ष से मैं प्रसन्न हूँ। इसलिए अब मैं तुझे स्वयं विद्याधरराज्यपद और विद्याप्रदान करती हूँ' ॥२५१-२५२॥ इतना कहकर और देवदत्त को विद्या प्रदान कर देवी अन्तर्धान हो गई ॥२५३॥ जालपाद को वेताल ने लाकर भूमि पर पटक दिया और उसकी सिद्धि भ्रष्ट हो गई। सच है अधर्म की सम्पत्ति चिरकाल तक नहीं रह सकती ॥२५४॥ तदनन्तर देवदत्त विद्युत्प्रभा के साथ विद्याधर-राज्य प्राप्त करके सुखपूर्वक वहाँ रहने लगा और उन्नति करने लगा ॥२५५॥ मधुरभाषिणी बिन्दुलेखा इस प्रकार अपने पति शक्तिदेव को कथा सुनाकर फिर बोली— 'ये कार्य इस प्रकार के होते हैं। इसलिए, तुम भी बिन्दुमती के कहने के अनुसार मेरे चर्म को पेट फाड़कर निकाल लो' ॥२५६-२५७॥ शक्तिदेव द्वारा विद्याधरत्व की प्राप्ति बिन्दुमती के इस प्रकार कहने पर भी पाप की शंका करते हुए शक्तिदेव ने आकाशवाणी सुनी—'हे शक्तिदेव ! तुम बिना किसी शंका के चर्म को निकाल लो। उस चर्म के शिशु की गर्दन को मुट्ठी से पकड़ोगे तो वह खड्ग बन जायगा'॥२५८-२५९॥
इति दिव्यां गिरं श्रुत्वा पाटितोदरमाशु सः। गर्भं तस्याः समाकृष्य पाणिना कच्छपोऽग्रहीत् ॥२६०॥ गृहीतमात्रो जज्ञे च स खड्गस्तस्य हस्तगः। आकृष्टः सत्वरं सिद्धेः केशपाश इवायतः ॥२६१॥ ततो विद्याधरः क्षिप्रात्स विप्रः समजायत। बिन्दुरेखा च तत्कालमदर्शनमियाय सा ॥२६२॥ तद्दृष्ट्वा च स गत्वैव वाणपुत्रीं न्यवेदयत्। बिन्दुमत्यै द्वितीयस्यै पत्न्यै सर्वं यथाविध ॥२६३॥ सा तमाह वयं नाथ विद्याधरपतेः सुताः। तिस्रो भगिन्यः कनकपुर्याः शापवशच्युताः ॥२६४॥ एका कनकरेखा सा वर्धमानपुरे त्वया। यस्या दृष्टः स शापान्तः सा च तां स्वां पुरीं गता ॥२६५॥ शापान्तो हीदृशस्तस्या विचित्रो विधियोगतः। अहमेव तृतीया च शापान्तश्चाधुनैव मे ॥२६६॥ मया चाद्यैव गन्तव्या नगरी सा निजा प्रिया। विद्याधरशरीराणि तत्रैवास्माकमासते ॥२६७॥ चन्द्रप्रभा च भगिनी ज्यायसी हि स्थिताऽत्र नः। तदायाहि त्वमप्यद्य खड्गसिद्धिप्रभावतः ॥२६८॥ तत्र ह्यस्मांश्चतस्रोऽपि भार्याः सम्प्राप्य चार्थिकाः। अनन्येनापिताः पित्रा पुरि राज्यं करिष्यसि ॥२६९॥ इति निजपरमार्थमुक्तवत्या सममनया पुनरेव बिन्दुमत्या। अथ कनकपुरीं स शक्तिदेवो गगनपथेन तथेति सो जगाम ॥२७०॥ तस्यां च यानि योषिद्वपुषि पर्यङ्कतलवर्त्तीनि। निर्जीवितान्यपश्यत्पूर्वं त्रिषु मण्डपेषु दिव्यानि ॥२७१॥ तानि यथामत् स्वानमभित्रन्प्रविष्टा स कनकरेखाद्याः। प्राप्तो भूयः प्रणता अद्वादीता निजप्रियान्निस्त्र ॥२७२॥ तां च चतुर्थीमैक्षत तज्ज्येष्ठां रुचितमङ्गसां तत्र। चन्द्रप्रभां पिबन्तीं चिरदर्शनमोत्कया दृष्ट्या ॥२७३॥
१ तद्बुद्धिदर्शनान्न विद्याधरत्वं खेचरत्वञ्च सम्प्राप्तम्।
पञ्चम लम्बक १९३
पञ्चम लम्बक १९३ इस प्रकार दिव्यवाणी सुनकर शक्तिदेव ने उसका पेट फाड़कर गर्भ को गले से पकड़ा॥२६०॥ बिन्दुरेखा उसी समय अदृश्य हो गई और गर्भ को पकड़ते ही वह आत्मबल से प्राप्त सिद्धि के लम्बे केशपाश के समान तलवार बनकर उसके हाथ में रह गया। इस प्रकार, हाथ में तलवार के आते ही वह ब्राह्मण शक्तिदेव भी तुरन्त विद्याधर बन गया। यह सब दृश्य शक्तिदेव ने आकर अपनी दूसरी पत्नी धीवर-कन्या बिन्दुमती से कहा। तब वह रहस्योद्घाटन करती हुई बताने लगी—'हे स्वामिन् ! हम तीनों विद्याधरों के राजा की कन्याएँ तीन बहिनें हैं, जो शाप के कारण कनकपुरी से पतित हुई हैं॥२६१-२६४॥ एक कन्या कनकरेखा नाम से वर्धमान नगर में राजकन्या हुई, जिसके शाप का अन्त तुमने स्वयं देखा। वह अपनी नगरी को चली गई। दैवयोग से उसके शाप का अन्त ही ऐसा विचित्र था। मैं तीसरी बहिन हूँ। अब मेरे शाप का भी अन्त हो गया। आज ही मैं अपनी प्रिय नगरी को चली जाऊँगी। वहीं पर हमारे विद्याधर-शरीर सुरक्षित हैं॥२६५-२६७॥ हमारी बड़ी बहिन चन्द्रप्रभा भी वहीं है। अब तुम भी खड्गसिद्धि के प्रभाव से शीघ्र वहीं आओ॥२६८॥ तुम वहाँ हम चारों बहिनों को पत्नी-रूप में प्राप्त करके और चक्रवर्ती हमारे पिता का राज्य भी प्राप्त करके कनकपुरी का राज्य करिये॥२६९॥ इस प्रकार अपनी वास्तविक स्थिति बतलानेवाली बिन्दुमती के साथ ही वह शक्तिदेव आकाश-मार्ग से कनकपुरी को गया॥२७०॥ उसने पहली बार उस राजभवन में तीनों महलों के भीतर पलंगों पर पड़े जो तीन निर्जीव शरीर देखे थे अब वहाँ पहुँचने पर उनमें अपने-अपने जीवों के प्रवेश करने पर उसने प्रणाम करती हुई तीनों पत्नियों को देखा॥२७१-२७२॥ तदुपरान्त उसने उनकी बड़ी बहिन चन्द्रप्रभा को भी देखा, जो चिरकाल के पश्चात् दर्शन मिलने के कारण उत्सुकतापूर्ण दृष्टि से मंगल-रचना करके देख रही थी॥२७३॥ ७५
५९४ कथासरित्सागर
५९४ कथासरित्सागर स्वस्वनियोगव्यापृतपरिजनवनिनामिनन्दितागमम् । वासगृहान्तं प्राप्तश्चन्द्रप्रभया तया जगदे ॥२७४॥ या तत्र कनकरेखा राजसुता सुभग ! वर्धमानपुरे । दृष्टा भवता सायं भगिनी मे चन्द्ररेखेति ॥२७५॥ या दाधाधिपपुत्री विन्दुमती प्रथममुत्सङ्गरद्वीपे । परिणीताभूद्भवता शशिरेखा मत्सखी सेयम् ॥२७६॥ या तदनु बिन्दुरेखा राजसुता तत्र दानवानीता । शक्तिदेवस्य विद्याधरीभिः सह विवाहः भार्या च ते तदामूच्छशिखाप्रभा सेयमनुजा मे ॥२७७॥ तदिदानीमेहि वृतिभस्मत्पितुरन्तिकं सहास्माभिः । तेन प्रदत्ताश्चैता द्रुतमखिलाः परिणयस्वास्मान् ॥२७८॥ इति कुसुमशराज्ञासप्रगल्भं च तस्यां त्वरितमुदितवत्यामत्र चन्द्रप्रभायाम् । अपि चतसृभिरामैः साकमेतत्पितुस्त- न्तिकमनुजनन्तं शक्तिदेवो जगाम ॥२७९॥ स च चरणनताभिस्ताभिरभ्यथितोऽसौ दुहितृभिरखिलाभिर्दिव्यवाक्प्रेरितश्च । युगपदथ ददौ ताः शक्तिदेवाय तस्मै मुदितमविरलोपास्तत्र विद्याधरेन्द्रः ॥२८०॥ तदनु कनकपुर्यामृद्धमस्यां स्वराज्यं सपदि स विततार ख्याञ्च विद्याः समस्ताः । अपि च कृतिनमेनं शक्तिवर्म स्वनाम्ना व्यधित समुचितेन स्वेषु विद्याधरेषु ॥२८१॥ धन्यो न जेष्यति भवत्प्रभृतिप्रभावाद् वत्सेश्वरात् पुनरुदेष्यति चक्रवर्ती । युष्मासु योऽत्र नरवाहनदत्तनामा भावी विभुः स तव तस्य मतिं विदध्याः ॥२८२॥ इत्युपिबादन विससर्ज महाप्रभावो विद्याधराधिपतिरारमतपोबनात्तम् । सत्वरय मप्रियतमं निजराजधानीं जामातरं स शशिखण्डपशभिधानः ॥२८३॥
पञ्चम लम्बक ५१५
पञ्चम लम्बक ५१५ अपनी-अपनी ओर से चन्द्रप्रभा की सेवा में लगी हुई उसकी सेविकाओं द्वारा शक्तिदेव के आगमन पर प्रसन्नता प्रकट किये जाने के पश्चात् वह शक्तिदेव चन्द्रप्रभा के साथ उसके शयनागार में गया। वहाँ जाकर चन्द्रप्रभा ने उससे इस प्रकार कहा—'हे सौभाग्यशालिन् ! तुमने वर्धमान नगर में कनकरेखा नाम की जो राजकुमारी देखी थी वह चन्द्ररेखा नाम की मेरी बहिन है॥२७४-२७५॥ उत्स्थल द्वीप में तुमने जिस धीवर-कन्या बिन्दुमत्ती से विवाह किया था वह मेरी शशि- रेखा नाम की बहिन है॥२७६॥ उसके पश्चात् दानव द्वारा ले जाई गई बिन्दुरेखा नाम की जिस कन्या से तुमने विवाह किया था वह मेरी शशिप्रभा नाम की चौथी और छोटी बहिन है॥२७७॥ शक्तिदेव का विद्याधरियों के साथ विवाह अब तुम हम लोगों के साथ हमारे पिताजी के पास चलो और उनसे दी हुई हम चारों का विवाह अपने साथ कर लो॥२७८॥ इस प्रकार कामदेव की आज्ञा के समान गम्भीरतापूर्वक चन्द्रप्रभा के कहने पर उन चारों प्रियतमाओं के साथ वह शक्तिदेव शीघ्र ही वन के मध्य में स्थित उनके पिता के पास गया॥२७९॥ उनके पिता के चरणों पर प्रणाम करती हुई उन चारों कन्याओं द्वारा समस्त वृत्तान्त जानकर और आकाशवाणी से प्रेरित होकर एक साथ ही चारों कन्याओं को शक्तिदेव के लिए दे दिया॥२८०॥ तदुपरान्त विद्याधरों के उस राजा ने कनकपुरी में समस्त अपने राज्य को और अपनी सभी विद्याओं को भी उसे देकर, उस खड्ग और शक्तिदेव को अपना शक्तिवेग नाम भी देकर अपनी विद्याधर जाति में समुचित स्थान प्रदान किया॥२८१॥ और कहा—'तुम्हारा इतना अधिक प्रभाव होगा कि तुम्हें कोई जीत न सकेगा। वत्स- राज उदयन से नरवाहनदत्त नाम का जो पुत्र होगा वह तुम विद्याधरों का चक्रवर्ती राजा होगा। वह तुम्हारा भावी स्वामी है। इसलिए तुम उसे प्रणाम करना'॥२८२॥ ऐसा कहकर उस महाप्रभावशाली शशिध्वज नामक विद्याधरों के अधिपति ने शक्तिवेग (शक्तिदेव) का सत्कार करके उसकी चारों पत्नियों के साथ उस जामाता को संजोग से विदा करके राजधानी कनकपुरी को भेज दिया॥२८३॥
५९६ कथासरित्सागरे
५९६ कथासरित्सागरे अथ सोऽपि शक्तिवेगो राजा भूत्वा विवेश कनकपुरीम्। स्ववधूभिः सह गत्वा विद्याधरलोकवैजयन्तीं ताम्॥२८४॥ तस्यां तिष्ठन् कनकरचनाविस्फुरन्मन्दिराया- मत्योन्नत्याविष पदुपतत्पिण्डितार्कप्रभायाम्। वामाक्षीभिश्चतसृभिरसौ रत्नसोपानवापी हृद्योद्यानेष्वरभतरा निर्वृतिं प्रेयसीभिः॥२८५॥ इति कथित्वा चरितं निजमेव विचित्रमेष तत्कासम्। निजगाद शक्तिवेगो वाग्मी वत्सेश्वरं भूयः॥२८६॥ तं मां शशाङ्ककुलभूषण! शक्तिवेगं जानीह्युपागतमिमं खलु वत्सराज। उत्पन्नभाविनिज नूतनचक्रवर्ति युष्मत्सुताङ्घ्रियुगदर्शनसाभिलाषम् ॥२८७॥ इत्थं मयेह मनुजेन सतापि लब्धा विद्याधराधिपतिता पुरजित्प्रसादात्। गच्छामि चाहमधुना नृपते स्वधाम दृष्टं प्रभुर्भवतु भद्रमभङ्गुरं वः॥२८८॥ इत्युक्त्वा रचिताञ्जलौ च वदति प्राप्ताभ्यनुज्ञे तत स्तस्मिन्नुत्पतिते मृगाङ्कमहसि द्यो शक्तिवेगे क्षणात्। देवीभ्यां सहितः सबालतनयो वत्सेश्वरो मन्त्रिभि सार्धं कामपि तत्र संमदमयीं भेजे तदानीं दशाम्॥२८९॥ इति महाकविश्रीसोमदेवभट्टविरचिते कथासरित्सागरे चतुर्दारिकालम्बके तृतीयस्तरङ्गः। समाप्तोऽयं चतुर्दारिकालम्बकः पञ्चमः।
[Header] पंचम लम्बक ५९७
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वह शक्तिवेग भी अब राजा बनकर अपनी प्रियतमाओं के साथ विद्याधर-लोक की पताका के समान कनकपुरी में आ गया॥२८४॥ विद्याधराधिप वह शक्तिवेग मानों अत्यन्त ऊँची होने से नीचे गिरती हुई सूर्य-किरणों के समान सोने की रचना से चमचमाती हुई प्रासाद श्रृंखलाओंवाली कनकपुरी में उन चारों प्रियतमाओं के साथ रत्नजड़ित सीढ़ियोंवाली उद्यान-वावलियों में अत्यन्त मुग्ध और आनन्द लेने लगा॥२८५॥ वाक्पटु शक्तिवेग इस प्रकार अपना विचित्र चरित्र वत्सराज को सुनाकर फिर बोला-॥२८६॥ हे वत्स्य भूपाल वत्सराज तुम मुझ उसी शक्तिवेग को उत्पन्न हुए अपने नये चक्रवर्ती पुत्र के चरणकमलों के दर्शन का अधिकारी समझो॥२८७॥ इस प्रकार मनुष्य होकर भी मैंने शिवजी की कृपा से विद्याधरों की प्रभुता प्राप्त की है। अब मैं अपने स्थान को जाता हूँ। बाल-रामा का रक्षण कर लिया। आपका सर्वदा मंगल हो॥२८८॥ इस प्रकार प्रणाम कर जाने की आज्ञा प्राप्त करके चन्द्रमा के समान तेजस्वी शक्तिदेव के आकाश में उड़ जाने पर महारानियों मन्त्रियों और पिता के साथ वत्सराज ने अत्यन्त आनन्द का अनुभव किया॥२८९॥ तृतीय तरङ्ग समाप्त चतुर्दारिका नामक पंचम लम्बक समाप्त
मदनमञ्चुका नाम षष्ठो लम्बक
मदनमञ्चुका नाम षष्ठो लम्बक इदं गुरुगिरीन्द्रजाप्रणयमन्वरान्दोलना- त्पुरा किल कथामृतं हरमुखाम्बुधेरुद्गतम्। प्रसङ्ग रसयन्ति ये विगतविघ्नलब्धर्द्धयो धुरं दधति वैबुधीं भुवि भवप्रसादेन ते॥ प्रथमस्तरङ्ग तर्जयन्निव विघ्नौघानमितोन्नमितेन यः। मुहुर्विभाति शिरसा स पायाद् वो गजाननः ॥१॥ नमः कामाय यद्बाणपातैरिव निरन्तरम्। भाति कण्टकितं शम्भोरप्याश्लिङ्गितं वपुः ॥२॥ इत्यादि दिव्यचरितं कृत्वात्मानं किसान्यवत्। प्राप्तविद्याधरैश्वर्यो यदा मरुत् स्वयं जगौ ॥३॥ नरवाहनदत्तोऽत्र सपत्नीकैर्महर्षिभिः। पृष्टः प्रसङ्गे कुत्रापि तदिदं शृणुताधुना ॥४॥ नरवाहनदत्तस्य युवावस्था अथ संवर्ध्यमानोऽत्र पित्रा वत्सेश्वरेण सः। नरवाहनदत्तोऽभूद्व्युत्क्रान्ताष्टमवत्सरः ॥५॥ विनीयमानो विद्यासु क्रीडन्नुपवनेषु च। सह मन्त्रिसुतैरासीद्राजपुत्रस्तदा न सः॥६॥ देवी वासवदत्ता च राज्ञी पद्मावती तथा। आस्तामेकतमस्नेहात्तदेवाग्रे दिवानिशम् ॥७॥ आरोहद्गुणभङ्गेण रेजे सद्वंशजन्मना। आनीरापूर्यमाणेन वपुषा धनुषा च सः ॥८॥ पिता वत्सेश्वरश्चास्य विवाहादिमनोरथैः। आसन्नफलसम्पत्तिकामैः कालं निनाय तम् ॥९॥
मदनमञ्चुका नामक छठा लम्बक
मदनमञ्चुका नामक छठा लम्बक (मंगला-श्लोक का अर्थ प्रथम लम्बक के प्रथम तरंग के प्रारम्भ में देखें।) प्रथम तरंग ऊपर उठने और नीचे झुकते हुए मस्तक से विघ्नों के समूह को मानो दूर करते हुए गजानन आपकी रक्षा करें ॥१॥ उस कामदेव को नमस्कार है, जिसके बाणों के प्रहार से पार्वती द्वारा निरन्तर आलिङ्गित रहने पर भी शिवजी का शरीर सदा रोमाञ्चित रहता है ॥२॥ विद्याधरों का चक्रवर्ती साम्राज्य प्राप्त करके अपने को एक स्तम्भ व्यक्ति बनाकर नर वाहनदत्त ने वार्तालाप के प्रसंग में मरुभूति महर्षियों के पूछने पर प्रारम्भ से लेकर जिस प्रकार अपना चरित्र वर्णन किया अब उसे सुनो ॥३॥ पिता वत्सराज द्वारा पालन-पोषण करते हुए नरवाहनदत्त ने अपनी बाल्यावस्था के आठ वर्ष व्यतीत किये ॥४॥ नरवाहनदत्त की युवावस्था उस समय वह राजकुमार नरवाहनदत्त मन्त्रियों के पुत्रों के साथ विद्याओं की शिक्षा ग्रहण करता हुआ और उद्यानों में खेलता हुआ समय व्यतीत कर रहा था ॥५॥ रानी वासवदत्ता और रानी पद्मावती दोनों समान स्नेह से रात-दिन उसकी देखभाल करती रहती थीं ॥६॥ वह राजकुमार जन्म में प्राप्त होने हुए गुणों से तथा उच्च कुल में जन्म लेने के कारण उत्तरोत्तर गौरवान्वित और धीरे-धीरे शरीर से तथा (धनुःपक्ष में) चढ़ाई हुई प्रत्यञ्चा (गुण) से तथा श्रेष्ठ बाँस से निर्मित और धीरे-धीरे चढ़ाये जाते हुए धनुष से शोभित होने लगा ॥७-८॥ कुमार का पिता वत्सराज उदयन भी शीघ्र ही फल देने के कारण मनोहर और आकर्षक उसके विवाह आदि मनोरथों से अपना समय व्यतीत कर रहा था ॥ ९॥
६ कथासरित्सागर
६ कथासरित्सागर राज्ञः कलिङ्गदत्तस्य कथा अत्रान्तरे कथासन्धौ यद्वृत्तं तन्निशम्यताम्। आसीत्तक्षशिला¹ नाम वितस्तापुलिने पुरी ॥११०॥ तदम्भसि बभौ यस्याः प्रतिमा सौधसन्ततेः। पातालनगरीबाधस्तच्छामालोकनागता ॥१११॥ तस्यां कलिङ्गदत्ताख्यो राजा परमकौगतः²। अभूत्तारावरस्फीतजिनभक्ताखिलप्रजः³ ॥११२॥ रराज सा पुरी यस्य चैत्यरत्नैर्निरन्तरे। मत्तुल्या नाम नास्तीति मङ्क्ष्वङ्गैरिबोदिते ॥११३॥ प्रजानां न परं चक्रे यः पितेवानुपालनम्। यावद्गुरुरिव ज्ञानमपि स्वयमुपादिशत् ॥११४॥ तथा च तस्यां कोऽप्यासीन्नगर्यां सौगतो⁴ वणिक। धनी वितस्तादत्ताख्यो भिक्षुपूजैकतत्परः ॥११५॥ रत्नदत्ताभिधानश्च तस्याभूत्तनयो युवा। स च तं पितरं शश्वत्पापं कृत्याजुगुप्सत ॥११६॥ पुत्र निन्दसि कस्मान्मामिति पित्रा च तेन सः। पृच्छ्यमानो वणिक्पुत्रः सामर्षयूयमभाषत ॥११७॥ तात त्यक्तत्रयीधर्मेस्त्वमधर्मं निषेवसे। यद् ब्राह्मणान् परित्यज्य श्रमणांश्चाप्सदर्चसि ॥११८॥ स्नानादियन्त्रणाहीना स्वच्छालाधनलोलुपाः। अपास्तसन्धिस्याशेपकेशकौपीमसुस्थिताः ॥११९॥ विहारास्पदलोभाय सर्वेऽप्यधमजातयः। यमाधमन्ति धि तेन सौगतेन मयेन ते ॥१२०॥
१ पश्चिमोत्तरसीमाप्रान्ते प्रसिद्धा तक्षशिला नगरी साम्प्रतं पाकिस्तानप्रदेशे वर्तते Taxila नाम्ना प्रसिद्धा। अस्या विषये परिशिष्टे विस्तरं विवक्षितम्। २ तक्षशिलायां कदाचित् बौद्धधर्मस्य जैनधर्मस्य च प्रचुरः प्रचार आसीदित्यैति- हासिकानां मतम् तत् परिशिष्टे द्रष्टव्यम्। ३ जिनधर्मानुयायीत्यर्थः, ४ त्रयी-वेदत्रयी तत्प्रतिपादितो वैदिकधर्मः।
षष्ठ लम्बक ६१
षष्ठ लम्बक ६१ राजा कलिङ्गदत्त की कथा इसी बीच कथा की सन्धि में जो कुछ हुआ उसे सुनो। वितस्ता (झेलम) नदी के किनारे तक्षशिला नाम की नगरी थी। उस नगरी के भवनों की छाया वितस्ता के जल में प्रति बिम्बित होती थी॥१ ॥ उस प्रतिबिम्ब से ऐसा प्रतीत होता था कि मानो तक्षशिला पुरी की शोभा निरखने के लिए पातालपुरी ऊपर उठकर आ रही हो॥११॥ उस नगरी में सुगत (बुद्ध) का परम भक्त कलिङ्गदत्त नाम का राजा था जिसकी सारी प्रजा जिनभक्त (जैन) थी॥१२॥ वह नगरी ऊँचे-ऊँचे अनेक विहारों से ऐसी प्रतीत होती थी मानों ऊँचे शृंगों से यह घोषणा कर रही हो कि मेरे समान दूसरी नगरी संसार में नहीं है॥१३॥ राजा कलिङ्गदत्त पिता के समान प्रजा का केवल पालन ही नहीं करता था प्रत्युत गुरु के समान स्वयं ज्ञान का उपदेश भी करता था॥१४॥ उस नगरी में बौद्ध भिक्षुओं की पूजा में तत्पर वितस्तादत्त नाम का एक धनी वैश्य रहता था। उसका रत्नदत्त नामक एक युवा पुत्र था जो अपने पिता को पापी कहकर उससे चिढ़ता रहता था॥१५-१६॥ 'बेटा मेरी निन्दा क्यों करते हो'—इस प्रकार पिता के पूछने पर पुत्र उस पर आक्षेप करता हुआ बोला—॥१७॥ 'पिता तुम वैदिक धर्म को छोड़कर अधर्म का सेवन करते हो। ब्राह्मणों को छोड़कर भिक्षुओं की सदा पूजा किया करते हो॥१८॥ स्नान शौच आदि से हीन और अपने समय पर भोजन के लोभी शिखा और केशों को मुड़वाकर केवल कौपीन पहिननेवाले तथा विहारों (मठों) में स्थान मिलने के लोभ से सभी नीच जाति के व्यक्ति जिस बौद्धधर्म का ग्रहण करते हैं, उससे हमारा क्या प्रयोजन ?॥१९-२ ॥ ७६
६०२ कथासरित्सागर
६०२ कथासरित्सागर
तच्छ्रुत्वा स वणिक्प्राह न धर्मस्यैकरूपता । अन्यो लोकोत्तरः पुत्र ! धर्मोऽन्यः सार्वलौकिकः ॥२१॥ ब्राह्मण्यमपि तत्राहुर्मेद्याद्यविविवर्जनम् । सत्यं दया च भूतेषु न मृषा जातिविग्रहः ॥२२॥ किं च दर्शनमेतत्त्वं सर्वसत्त्वाभयप्रदम् । प्रायः पुरुषदोषेण न दूषयितुमर्हसि ॥२३॥ उपकारस्य धर्मत्वे विवादो नास्ति कस्यचित् । भूतेष्वभयदानेन नान्या चोपकृतिर्मम ॥२४॥ सर्वहिंसाप्रधानेऽस्मिन्वत्स मोक्षप्रदायिनि । दर्शनेऽप्रतिरतिध्ये मे तद्धर्मो ममात्र कः ॥२५॥ इति सञ्चोदितः पित्रा वणिक्पुत्रः प्रसह्य सः । न तथा प्रतिपेदे तन्निन्द्याम्यधिके पुनः ॥२६॥ ततः स तत्पिता खेदाद् गत्वा धर्मानुशासितुः । राज्ञः कलिङ्गदत्तस्य पुरतः सर्वमब्रवीत् ॥२७॥ सोऽपि राजा सभास्थाने युक्त्यानाय्य वणिक्सुतम् । नृपारचितकोपः सन्नवं वत्सारमन्वित् ॥२८॥ श्रुतं मया वणिक्पुत्र पापोऽयमसिदुष्कृती । निर्विचारं तदेषोऽद्य हन्यतां दण्डपूकः ॥२९॥ इत्यूचिवांस्ततः पित्रा कृतविज्ञापने किल । नृपतिर्धर्मपर्यायं द्वौ मासौ वधनिग्रहम् ॥३०॥ विविधार्ये तदन्ते च पुनरानयनाय च । रम्यैव तत्पितुर्हस्ते न्यस्तवस्तं वणिक्पुतम् ॥३१॥ सोऽपि पित्रा गृहं नीतो वणिक्पुत्रो भयाकुलः । किं मयापकृतं राज्ञो भवदिति विचिन्तयन् ॥३२॥ अशरणं डिमानानो मरणं भावि भावयन् । मनिद्रोऽपिनोऽगण्वन्तन्मरणौ न्पानितम् ॥३३॥ गता मासद्वये याते राज्ञाग्रे धृतराष्टृरः । पुनः स्वर्पाता सेनागौ वणिक्पुतुरनीयत ॥३४॥
षष्ठ लम्बक १०३
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यह सुनकर वह कहने लगा—'बेटा! धर्म का एक ही रूप नहीं है। सार्वलौकिक धर्म पृथक् है और पारलौकिक धर्म पृथक् ॥२१॥ ब्राह्मण-धर्म भी यही है कि रागद्वेषहीनता सत्य प्राणिमात्र पर दया करना और जाति पांति के झूठे झगड़ों से वह रहित हो ॥२२॥ सभी जीवों पर अभय प्रदान करनेवाले इस बौद्ध सिद्धान्त को तुम किसी एक पुरुष के दोष से दूषित नहीं कर सकते ॥२३॥ उपकार करना धर्म है इसमें किसी का मतभेद नहीं है। प्राणियों को अभय प्रदान करने के अतिरिक्त और दूसरा कोई उपकार नहीं है, यह मेरा अपना विचार है ॥२४॥ इसलिए अहिंसा-प्रधान मांगल्यदायक इस सिद्धान्त में मेरा प्रेम है तो यह कौन-सा अधर्म है' ॥२५॥ पिता के इस प्रकार कहने पर भी वैश्यपुत्र न उसे स्वीकार नहीं किया। प्रत्युत अधिक निन्दा करने लगा ॥२६॥ तब उसके पिता ने खिन्न होकर धर्म का उपदेश करनेवाले राजा के सामने सारी बातें कह दीं ॥२७॥ राजा ने भी किसी समय युक्ति से उस वैश्यपुत्र को सभा में बुलाकर झूठा क्रोध प्रदर्शित करते हुए आदेश दिया कि 'मैंने सुना है, यह बनिये का बालक पापी और अति कुकर्मी है। इस लिए इस देशद्रोही को बिना विचारे ही आज मार डालो' ॥२८-२९॥ ऐसा कहते हुए राजा से उसके पिता ने प्राणदान की प्रार्थना की और राजा ने दो मास तक उस धर्माचरण के लिए निश्चित करके कहा कि 'इसके पश्चात् इसे फिर मेरे सम्मुख लाना' ऐसा कहकर उसके पिता को सौंप दिया ॥३०-३१॥ पिता से घर में लाया गया वह वैश्यपुत्र प्राणों के भय से सोचने लगा कि 'मैंने राजा का कौन-सा अपराध किया है जो वह मुझे दो महीने बाद फाँसी पर चढ़ा देगा। वह रात-दिन इसी सोच में नींद और भूख को भूलकर कुछ ही दिनों में अत्यन्त दुर्बल हो गया। दो महीने बीतने पर अत्यन्त दुर्बल और पीले पड़ हुए पुत्र को लेकर पिता राजा के पास गया ॥३२-३४॥
आत्मापि विस्मृतो भीत्या मम का स्वशनं कथा॥३६॥
राजा तं च तथाभूतं वीक्ष्यापन्नमभाषत। किमीदृक्त्वं कृशीभूतं किं रुद्धं ते मयाशनम्॥३५॥ तच्छ्रुत्वा स वणिक्पुत्रो राजानं तमभाषत। आत्मापि विस्मृतो भीत्या मम का स्वशनं कथा॥३६॥ युष्मदादिष्टनिधनश्रवणात् प्रभृति प्रभो!। मृत्युमायान्तमायान्तमन्वहं चिन्तयाम्यहम्॥३७॥ इत्युक्तवन्तं तं राजा स वणिक्पुत्रमब्रवीत्। बोधितोऽसि मया वत्स युक्त्या प्राणभयं स्वतः॥३८॥ ईदृगेव हि सर्वस्य जन्तोर्मृत्युभयं भवेत्। तद्रक्षणोपकाराच्च धर्मः कोऽभ्यधिको वद॥३९॥ तदेतत्तव धर्माय मुमुक्षायै च दर्शितम्। मृत्युभीतो हि यतते नरो मोक्षाय बुद्धिमान्॥४०॥ असौ न गर्हणीयोऽयमेतद्धर्मा पिता त्वया। इति राजवचः श्रुत्वा प्रह्वोऽवादीद् वणिक्सुतः॥४१॥ धर्मोपदेशाद्देवेन कृती तावदहं कृतः। मोक्षायेच्छा प्रजाता मे तमप्युपदिश प्रभो!॥४२॥ तच्छ्रुत्वा तं वणिक्पुत्रं प्राप्ते तत्र पुरोत्सवे। तैलपूर्णं करे पात्रं दत्त्वा राजा जगाद सः॥४३॥ इदं पात्रं गृहीत्वा त्वमेहि भ्रान्त्वा पुरीमिमाम्। तैलबिन्दुनिपातश्च रक्षणीयस्त्वया सुत!॥४४॥ निपतिष्यति यद्येकस्तैलबिन्दुरितस्तव। सद्यो निपातिष्यन्ति त्वामेते पुरुषास्ततः॥४५॥ एवं विलोक्त्वा व्यसृजत् भ्रमाय वणिक्सुतम्। उत्खातखड्गान् पुरुषान् दत्त्वा पश्चात्स भूपतिः॥४६॥ वणिक्पुत्रोऽपि स भयाद्ग्रंस्तैस्तत्सबन्धुभिर्। पुरीं तामभितो भ्रान्त्वा दृष्ट्वाहागादृपान्तिकम्॥४७॥ नृपोऽप्यन्यसितानीतं दृष्ट्वा तमम्यधात्। कच्चित्पुरभ्रमेऽप्यद्य दृष्टोऽत्र भ्रमता त्वया॥४८॥ तच्छ्रुत्वा स वणिक्पुत्रः प्रोवाच रचिताञ्जलिः। यत्सत्यं न मया देव दृष्टं किञ्चिन्न च श्रुतम्॥४९॥