BharatKosha
कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५)

कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५)

by महाकवि सोमदेव भट्ट

Source: कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1960 (origin)

DevanagariHindipublished876 pages

Page 646 of 876

Read in context
Page 646

पञ्चम लम्बक १९३ इस प्रकार दिव्यवाणी सुनकर शक्तिदेव ने उसका पेट फाड़कर गर्भ को गले से पकड़ा॥२६०॥ बिन्दुरेखा उसी समय अदृश्य हो गई और गर्भ को पकड़ते ही वह आत्मबल से प्राप्त सिद्धि के लम्बे केशपाश के समान तलवार बनकर उसके हाथ में रह गया। इस प्रकार, हाथ में तलवार के आते ही वह ब्राह्मण शक्तिदेव भी तुरन्त विद्याधर बन गया। यह सब दृश्य शक्तिदेव ने आकर अपनी दूसरी पत्नी धीवर-कन्या बिन्दुमती से कहा। तब वह रहस्योद्घाटन करती हुई बताने लगी—'हे स्वामिन् ! हम तीनों विद्याधरों के राजा की कन्याएँ तीन बहिनें हैं, जो शाप के कारण कनकपुरी से पतित हुई हैं॥२६१-२६४॥ एक कन्या कनकरेखा नाम से वर्धमान नगर में राजकन्या हुई, जिसके शाप का अन्त तुमने स्वयं देखा। वह अपनी नगरी को चली गई। दैवयोग से उसके शाप का अन्त ही ऐसा विचित्र था। मैं तीसरी बहिन हूँ। अब मेरे शाप का भी अन्त हो गया। आज ही मैं अपनी प्रिय नगरी को चली जाऊँगी। वहीं पर हमारे विद्याधर-शरीर सुरक्षित हैं॥२६५-२६७॥ हमारी बड़ी बहिन चन्द्रप्रभा भी वहीं है। अब तुम भी खड्गसिद्धि के प्रभाव से शीघ्र वहीं आओ॥२६८॥ तुम वहाँ हम चारों बहिनों को पत्नी-रूप में प्राप्त करके और चक्रवर्ती हमारे पिता का राज्य भी प्राप्त करके कनकपुरी का राज्य करिये॥२६९॥ इस प्रकार अपनी वास्तविक स्थिति बतलानेवाली बिन्दुमती के साथ ही वह शक्तिदेव आकाश-मार्ग से कनकपुरी को गया॥२७०॥ उसने पहली बार उस राजभवन में तीनों महलों के भीतर पलंगों पर पड़े जो तीन निर्जीव शरीर देखे थे अब वहाँ पहुँचने पर उनमें अपने-अपने जीवों के प्रवेश करने पर उसने प्रणाम करती हुई तीनों पत्नियों को देखा॥२७१-२७२॥ तदुपरान्त उसने उनकी बड़ी बहिन चन्द्रप्रभा को भी देखा, जो चिरकाल के पश्चात् दर्शन मिलने के कारण उत्सुकतापूर्ण दृष्टि से मंगल-रचना करके देख रही थी॥२७३॥ ७५