कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५)
by महाकवि सोमदेव भट्ट
Source: कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1960 (origin)
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Read in contextषष्ठ लम्बक ६१ राजा कलिङ्गदत्त की कथा इसी बीच कथा की सन्धि में जो कुछ हुआ उसे सुनो। वितस्ता (झेलम) नदी के किनारे तक्षशिला नाम की नगरी थी। उस नगरी के भवनों की छाया वितस्ता के जल में प्रति बिम्बित होती थी॥१ ॥ उस प्रतिबिम्ब से ऐसा प्रतीत होता था कि मानो तक्षशिला पुरी की शोभा निरखने के लिए पातालपुरी ऊपर उठकर आ रही हो॥११॥ उस नगरी में सुगत (बुद्ध) का परम भक्त कलिङ्गदत्त नाम का राजा था जिसकी सारी प्रजा जिनभक्त (जैन) थी॥१२॥ वह नगरी ऊँचे-ऊँचे अनेक विहारों से ऐसी प्रतीत होती थी मानों ऊँचे शृंगों से यह घोषणा कर रही हो कि मेरे समान दूसरी नगरी संसार में नहीं है॥१३॥ राजा कलिङ्गदत्त पिता के समान प्रजा का केवल पालन ही नहीं करता था प्रत्युत गुरु के समान स्वयं ज्ञान का उपदेश भी करता था॥१४॥ उस नगरी में बौद्ध भिक्षुओं की पूजा में तत्पर वितस्तादत्त नाम का एक धनी वैश्य रहता था। उसका रत्नदत्त नामक एक युवा पुत्र था जो अपने पिता को पापी कहकर उससे चिढ़ता रहता था॥१५-१६॥ 'बेटा मेरी निन्दा क्यों करते हो'—इस प्रकार पिता के पूछने पर पुत्र उस पर आक्षेप करता हुआ बोला—॥१७॥ 'पिता तुम वैदिक धर्म को छोड़कर अधर्म का सेवन करते हो। ब्राह्मणों को छोड़कर भिक्षुओं की सदा पूजा किया करते हो॥१८॥ स्नान शौच आदि से हीन और अपने समय पर भोजन के लोभी शिखा और केशों को मुड़वाकर केवल कौपीन पहिननेवाले तथा विहारों (मठों) में स्थान मिलने के लोभ से सभी नीच जाति के व्यक्ति जिस बौद्धधर्म का ग्रहण करते हैं, उससे हमारा क्या प्रयोजन ?॥१९-२ ॥ ७६