BharatKosha
कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५)

कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५)

by महाकवि सोमदेव भट्ट

Source: कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1960 (origin)

DevanagariHindipublished876 pages

Page 656 of 876

Read in context
Page 656

[Header] षष्ठ लम्बक १०३

यह सुनकर वह कहने लगा—'बेटा! धर्म का एक ही रूप नहीं है। सार्वलौकिक धर्म पृथक् है और पारलौकिक धर्म पृथक् ॥२१॥ ब्राह्मण-धर्म भी यही है कि रागद्वेषहीनता सत्य प्राणिमात्र पर दया करना और जाति पांति के झूठे झगड़ों से वह रहित हो ॥२२॥ सभी जीवों पर अभय प्रदान करनेवाले इस बौद्ध सिद्धान्त को तुम किसी एक पुरुष के दोष से दूषित नहीं कर सकते ॥२३॥ उपकार करना धर्म है इसमें किसी का मतभेद नहीं है। प्राणियों को अभय प्रदान करने के अतिरिक्त और दूसरा कोई उपकार नहीं है, यह मेरा अपना विचार है ॥२४॥ इसलिए अहिंसा-प्रधान मांगल्यदायक इस सिद्धान्त में मेरा प्रेम है तो यह कौन-सा अधर्म है' ॥२५॥ पिता के इस प्रकार कहने पर भी वैश्यपुत्र न उसे स्वीकार नहीं किया। प्रत्युत अधिक निन्दा करने लगा ॥२६॥ तब उसके पिता ने खिन्न होकर धर्म का उपदेश करनेवाले राजा के सामने सारी बातें कह दीं ॥२७॥ राजा ने भी किसी समय युक्ति से उस वैश्यपुत्र को सभा में बुलाकर झूठा क्रोध प्रदर्शित करते हुए आदेश दिया कि 'मैंने सुना है, यह बनिये का बालक पापी और अति कुकर्मी है। इस लिए इस देशद्रोही को बिना विचारे ही आज मार डालो' ॥२८-२९॥ ऐसा कहते हुए राजा से उसके पिता ने प्राणदान की प्रार्थना की और राजा ने दो मास तक उस धर्माचरण के लिए निश्चित करके कहा कि 'इसके पश्चात् इसे फिर मेरे सम्मुख लाना' ऐसा कहकर उसके पिता को सौंप दिया ॥३०-३१॥ पिता से घर में लाया गया वह वैश्यपुत्र प्राणों के भय से सोचने लगा कि 'मैंने राजा का कौन-सा अपराध किया है जो वह मुझे दो महीने बाद फाँसी पर चढ़ा देगा। वह रात-दिन इसी सोच में नींद और भूख को भूलकर कुछ ही दिनों में अत्यन्त दुर्बल हो गया। दो महीने बीतने पर अत्यन्त दुर्बल और पीले पड़ हुए पुत्र को लेकर पिता राजा के पास गया ॥३२-३४॥