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कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५)

कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५)

by महाकवि सोमदेव भट्ट

Source: कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1960 (origin)

DevanagariHindipublished876 pages

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मदनमञ्चुका नामक छठा लम्बक (मंगला-श्लोक का अर्थ प्रथम लम्बक के प्रथम तरंग के प्रारम्भ में देखें।) प्रथम तरंग ऊपर उठने और नीचे झुकते हुए मस्तक से विघ्नों के समूह को मानो दूर करते हुए गजानन आपकी रक्षा करें ॥१॥ उस कामदेव को नमस्कार है, जिसके बाणों के प्रहार से पार्वती द्वारा निरन्तर आलिङ्गित रहने पर भी शिवजी का शरीर सदा रोमाञ्चित रहता है ॥२॥ विद्याधरों का चक्रवर्ती साम्राज्य प्राप्त करके अपने को एक स्तम्भ व्यक्ति बनाकर नर वाहनदत्त ने वार्तालाप के प्रसंग में मरुभूति महर्षियों के पूछने पर प्रारम्भ से लेकर जिस प्रकार अपना चरित्र वर्णन किया अब उसे सुनो ॥३॥ पिता वत्सराज द्वारा पालन-पोषण करते हुए नरवाहनदत्त ने अपनी बाल्यावस्था के आठ वर्ष व्यतीत किये ॥४॥ नरवाहनदत्त की युवावस्था उस समय वह राजकुमार नरवाहनदत्त मन्त्रियों के पुत्रों के साथ विद्याओं की शिक्षा ग्रहण करता हुआ और उद्यानों में खेलता हुआ समय व्यतीत कर रहा था ॥५॥ रानी वासवदत्ता और रानी पद्मावती दोनों समान स्नेह से रात-दिन उसकी देखभाल करती रहती थीं ॥६॥ वह राजकुमार जन्म में प्राप्त होने हुए गुणों से तथा उच्च कुल में जन्म लेने के कारण उत्तरोत्तर गौरवान्वित और धीरे-धीरे शरीर से तथा (धनुःपक्ष में) चढ़ाई हुई प्रत्यञ्चा (गुण) से तथा श्रेष्ठ बाँस से निर्मित और धीरे-धीरे चढ़ाये जाते हुए धनुष से शोभित होने लगा ॥७-८॥ कुमार का पिता वत्सराज उदयन भी शीघ्र ही फल देने के कारण मनोहर और आकर्षक उसके विवाह आदि मनोरथों से अपना समय व्यतीत कर रहा था ॥ ९॥