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कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५)

महाकवि सोमदेव भट्ट द्वारा

स्रोत: कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1960 (उद्गम)

DevanagariHindipublished876 पृष्ठ

३३३ कथासरित्सागर

३३३ कथासरित्सागर प्राप्तया सिद्धिरूत्येव शरदा दत्तसंभवः । दर्शयन्त्यातिसुगमं मार्गं स्वल्पाम्बुनिम्नगम् ॥६४॥ पूरयन्बहुनादाभिर्वाहिनीभिर्भुवस्तलम् । कुर्वन्नकाण्ड निर्बन्ध-वर्षा-समय-सम्भ्रमम् ॥६५॥ तदा स सैन्य-निर्घोष प्रतिशब्दकुलीकृताः । परस्परमिवान्वस्युस्तदागमभय दिशः ॥६६॥ ववृधुश्च हेमसन्नाहसम्भूतार्कप्रभा हयाः । तस्य नीराजनप्रीतपावकानुगता इव ॥६७॥ विरेजुर्वारणाश्चास्य सितध्वजचामराः । विगलद्गण्डसिन्दूरशोणदानजला पथि ॥६८॥ शरत्पाण्डुपयोवाहाः सधातुरसनिर्झराः । यात्रामुप्रेषिता भीतेरारभञ्जा इव भूधरैः ॥६९॥ नैवैष राजा सहते परेषां प्रसृतं महः । इतीव तच्छमूरणूरुकंतेजस्तिरोदधे ॥७०॥ पद्मातपत्रं च द्वे देव्यौ मार्गे समभिजग्मतुः । नृपं नयगुणाकृष्टे इव कीर्तिजयश्रियौ ॥७१॥ नमन्ताप पलायध्वमित्यूचु विन्ध्यपामिव । पवनाक्षिप्तविक्षिप्तैस्तस्य सन्नाहजांशुकेः ॥७२॥ एवं ययौ स दिग्भागान् पश्यन् फुल्लसिताम्बुजान् । महीमर्यमयोद्भ्रान्तक्षपोत्क्षिप्तफणानिव ॥७३॥ अत्रान्तरे च ते चारा धृतकापालिकव्रताः । योगन्धरायणादिष्टाः प्रापुर्वाराणसीं पुरीम् ॥७४॥ तेषां च कुहकाभिज्ञो ज्ञानित्वमुपदर्शयन् । सिद्ध्यि गुप्तोऽभवद्गोपास्तच्छिष्यतां ययुः ॥७५॥ आचार्योऽयं त्रिकालज्ञ इति व्याजह्रुश्च तम् । शिष्यास्ते स्थापयामासुर्भिक्षाक्षममितस्ततः ॥७६॥ यदुवाचाग्निदाहादि स ज्ञानी भावि पृच्छताम् । तच्छिष्यास्तत्तथा गुप्तं चक्रुस्तेन स पप्रथे ॥७७॥ रञ्जितं शुभ्रविद्यया च समग्रं नृपलक्षणम् । स्वीचक्रे स ह्यमप्येकं राजपुत्रमुपागतम् ॥७८॥

तृतीय लम्बक ११७

तृतीय लम्बक ११७ सफलता की दूती के समान आई हुई कशाओं और नदियों को सुखाकर१ मार्गों को सुखद और सुगम बनाती हुई शरद् ऋतु ने राजा को उत्साह प्रदान किया ॥६४॥ विविध प्रकार के शब्द करती हुई सेनाओं से भूतल को भरता हुआ और अकाल में ही वर्षा-काल का भ्रम करता हुआ वह राजा विजय के लिए अग्रसर हुआ ॥६५॥ उसकी सेना के महान् कलकल शब्द की प्रतिध्वनियों से मानों दिशाएँ परस्पर उसके आगमन की सूचनाएँ देने लगी ॥६६॥ सोने के साजों से सजे हुए, अतएव सूर्य की किरणों से चमकते हुए उसकी सेना के घोड़े ऐसे मालूम होते थे मानों नीराजन-विधि से प्रसन्न अग्नि का अनुगमन कर रहे हैं ॥६७॥ दोनों कानों के समीप झूलते हुए सफेद चामरों से शोभित और मस्तक पर लगे हुए सिन्दूर के कारण लाल मद-जल बहाते हुए उसके हाथी मार्ग में चलते हुए ऐसे भले मालूम होते थे मानों राजा के भय से डरे हुए पर्वतों ने शरत्कालीन श्वेत मेघ-खण्डों से मण्डित एवं धातु-रसों के झरने बहाते हुए अपने पुत्र सेना की सहायता के लिए भेजे हों ॥६८ ६९॥ यह राजा अपने सामने फैलते हुए दूसरे के तेज को सहन नहीं कर सकता। इसीलिए मानों सेना से उड़ी हुई धूल ने सूर्य के तेज को ढाँप दिया ॥७० ॥ राजा के पीछे-पीछे उसकी दोनों महारानियाँ इस प्रकार चल रही थीं मानों राजा की नीति और गुणों से आकृष्ट होकर कीर्ति और विजय-लक्ष्मी चल रही हों ॥७१॥ वायु से इधर-उधर उड़ाये जाते हुए सेना की ध्वजाओं के हत्थे मानों शत्रुओं को चेतावनी दे रहे थे कि या तो नम्र होकर अधीनता करो या भाग जाओ ॥७२॥ वह राजा खिले हुए श्वेत-कमलों से शोभित जल-स्थल के भू-भागों को शेषनाग के उठे हुए फनों के समान देखता हुआ जा रहा था ॥७३॥ इसी बीच यौगन्धरायण से प्रेषित गुप्तचर, कापालिक का वेश बनाकर, वाराणसी नगरी में पहुँचे ॥७४॥ उनमें एक मूढ़ भविष्य का हाल जाननेवाला क्षगी (ज्योतिषी) बन गया और दूसरे सब उसके शिष्य बन गये ॥७५॥ वे उसके शिष्य नगर में इधर-उधर घूमते हुए अपने गुरु के सम्बन्ध में यह प्रचार करते थे कि यह हमारा आचार्य निष्काङ्क्ष और केवल भिक्षा लेकर ही रहता है ॥७६॥ वह ज्ञानी गुरु पूछनेवालों को जो भविष्य में होनेवाली अग्निदाह आदि की बातें बताता था उसके शिष्य उन बातों को गुप्त रूप से स्वयं प्रचारित करके उसका यश बढ़ाते थे। इस प्रकार वह मिथ्या सिद्ध काशी नगरी में प्रसिद्ध सिद्ध बन गया। इस प्रकार उस सिद्ध ने एक छोटे-से चमत्कार से राजा के अत्यन्त प्यारे एक राजपुत्र को अपना उपासक बना लिया ॥७७-७८॥ १ देखिए रघु सर्ग ४ श्लो २४- सरितः कुर्वती गाधाः पथश्चाश्यान कर्दमान्। यात्रायै चोदयामास तं शक्तेः प्रथमं शरत्॥

१६८ कथासरित्सागर

१६८ कथासरित्सागर तन्मुखेनैव राज्ञश्च ब्रह्मदत्तस्य पृच्छतः । सोऽभूत्तमं रहस्यस्य प्राप्ते वत्सेशाविग्रहे ॥७९॥ अथास्य ब्रह्मदत्तस्य मन्त्री योगकरण्डकः । चकार वत्सराजस्य व्याजानागच्छतः पथि ॥८०॥ अदूपयत्प्रतिपथं विषादिद्रव्ययुक्तिभिः । वृक्षान् कुसुमवल्लीश्च तोयानि च तृणानि च ॥८१॥ विदधे विषकन्याश्च सन्त्य पन्थविलासिनीः । प्राहिणोत्पुरुषांश्चैव निद्रासु च्छद्मघातिनः ॥८२॥ तच्च विज्ञाय स शान्तिलिङ्गी चारो न्यवेदयत् । यौगन्धरायणायाशु स्वसहायमुखस्तदा ॥८३॥ यौगन्धरायणोऽप्येतद् बुद्ध्वा प्रतिपदं पथि। दूषितं तृणतोयादि प्रतियोगैरशोधयत् ॥८४॥ अपूर्वस्त्रीसमायोगं कटके निषिषेध च। अबधीद् वधकांस्तांश्च स्तब्धा सह समन्त्रता ॥८५॥ तद्बुद्ध्वा ध्वस्तमायं सन् सैन्यपूरितदिक्मुखम् । वत्सेश्वरं ब्रह्मदत्तो मेने दुर्जयमेव तम् ॥८६॥ सुमन्त्र्य दत्त्वा दूतं च शिरोविरचिताञ्जलिः । ततः स निकटीभूतं वत्सेशं स्वयमभ्यगात् ॥८७॥ वत्सराजोऽपि तं प्राप्तं प्रवृत्तोपायनं नृपम् । प्रीत्या सम्मानयामास शूरा हि प्रणतिप्रियाः ॥८८॥ वत्सराजस्य दिग्विजयकथा इत्थं तस्मिञ्जिते प्राचीं शमयन्नमयन् भूभून् । उन्मूल्यंश्च कठिनांश्चापात्यायुरिव द्रुमान् ॥८९॥ प्राप च प्रबलं प्राच्यं चलद्वीचीविघूर्णितम् । वङ्गावजयविभ्रासबपमाममिवाम्बुधिम् ॥९०॥ तस्य वेलातटान्तं च जयस्तम्भं चकार सः । पातालामययाच्छीर्षं नागराजमिवोद्गतम् ॥९१॥ १ तुलना कार्या— वङ्गानूत्खाय तरसा नेता नौ साधनोद्यतान्। निचखान जयस्तम्भान् गङ्गास्रोतोऽन्तरेषु सः॥ —रघुवंशे, ४ सर्गे।

तृतीय लम्बक १६९

तृतीय लम्बक १६९

उसी राजपुत्र के द्वारा राजा ब्रह्मदत्त की युद्ध-सम्बन्धी गति-विधियों का ज्ञान प्राप्त करना था ॥७९॥

तदनन्तर योग नामक ब्रह्मदत्त के मन्त्री ने जाते हुए वत्सराज के मार्ग में विविध प्रकार के विनाश के जाल बिछा दिये ॥८०॥

यात्रा में आनेवाली प्रत्येक सड़क पर आनेवाले पेड़, लताओं, कुँओं, तालाबों, घास, फूल आदि में जहरीले द्रव्यों का योग करा दिया ॥८१॥

वत्सराज की सेना में 'विषकन्या'¹ को बाजारू वेश्याओं के रूप में और रात में चोरी के आघात करनेवाले गुप्तचरों को वत्सराज की सेना में भेजा ॥८२॥

उस बनावटी सिद्ध कापालिक ने राजपुत्र से सारी बातें जानकर अपने सहायकों द्वारा यौगन्धरायण को शीघ्र सूचनाएँ प्रेषित कीं ॥८३॥

यौगन्धरायण जासूसों से यह सब जानकर मार्ग में विष से दूषित तृण, जल आदि का विपरीत योगों से शोधन कर देता था। उसने सेना-शिविर में आनेवाली अपूर्व स्त्रियों के वध की आज्ञा दे दी और गुप्त घातकों को सेनापति रुमण्वान् के साथ खोज-खोजकर मरवा डाला ॥८४-८५॥

यह जानकर कूटनीति के विफल होने पर ब्रह्मदत्त ने विशाल सेना के साथ सब दिशाओं को घेरकर आक्रमण करते हुए वत्सराज को अजेय समझा ॥८६॥

ऐसा सोचकर और मन्त्रियों से सम्मति करके सन्धि-दूत को भेजकर सिर पर अंजलि रखकर प्रणाम करता हुआ ब्रह्मदत्त निकट आये हुए वत्सराज के समीप स्वयं गया ॥८७॥

वत्सराज ने भी उपहार देकर स्वयं आये हुए राजा ब्रह्मदत्त का समुचित सम्मान किया क्योकि वीर पुरुष प्रणति से प्रसन्न हो जाते हैं ॥८८॥

वत्सराज के दिग्विजय की कथा

इस प्रकार, काशी-नरेश के विजित हो जाने पर पूर्व दिशा को शान्त करता हुआ, मृदु-नम्र राजाओं को सुराता हुआ और कठोर शत्रुओं को वृक्षों को वायु के समान उखाड़ता हुआ वत्सराज चलती हुई लहरों से घूरते हुए एवं वंग-देश के विजय त्रास से मानों काँपते हुए पूर्व समुद्र के तट पर पहुँचा ॥८९-९०॥

वत्सराज ने पूर्व समुद्र-तट पर एक जयस्तम्भ गाड़ दिया मानो पाताल के लिए अभय की प्रार्थना करने के निमित्त नागराज उठकर आया हो ॥९१॥


१. विषकन्याएँ दो प्रकार की होती हैं, एक तो ऐसे नक्षत्र या लग्न में उत्पन्न होती हैं कि जिनके सहवास से व्यक्ति तुरन्त मर जाता है। दूसरी, प्रारम्भ से ही विष खिलाकर कृत्रिम विषकन्याएँ बनाई जाती हैं, जिनके सम्पर्क में आते ही पुरुष की मृत्यु हो जाती है।—अनु. ४७

३७० कथासरित्सागर

३७० कथासरित्सागर अवनम्य करे दत्ते कलिङ्गैरग्रगेस्ततः । आरुरोह महेन्द्राद्रिं यशस्तस्य यशस्विनः ॥९२॥ महेन्द्राभिभवाद् भीतैर्विन्ध्यकूटैरिवागतैः । गजैर्जित्वाटवीं राज्ञां स ययौ दक्षिणां दिशम् ॥९३॥ तत्र चक्रे स निःसारपाण्डुरामपगर्जितान् । पर्वताश्रयिणः शत्रून् शरत्काल इवाम्बुदान् ॥९४॥ उल्लङ्घ्यमाना कावेरी तन समवकारिणा । चोलकदम्बरकीर्तिश्च कालुष्यं ययतुः समम् ॥९५॥ न परं मुरलानां स सेहे मूर्धसु नोन्नतिम् । करैराहन्यमानेषु यावत्कान्ताकुचष्वपि ॥९६॥ यत्तस्य सप्तधा भिन्नं पपुर्गोदावरीपयः । मातङ्गास्तन्मदम्भाजाद् सप्तधवामुपक्षितम् १ ॥९७॥ अषोत्तीर्य स वत्सेशो रेवामुज्जयिनीमगात् । प्रविषेश च तां चण्डमहासेनपुरस्कृतः ॥९८॥ स मास्यदृलथधम्मिल्लशोभाद् वैगुण्यशालिनाम् । मालवस्त्रीकटाक्षाणां ययौ पात्रेषु लक्ष्यत्ताम् ॥९९॥ तस्थौ च निर्वृतस्तत्र तथा श्वशुरसत्कृतः । विसस्मार यथाभीष्टामपि भोगान् स्वदेशजान् ॥१००॥ आसीद् वासवदत्ता च पितुः पार्श्वविवर्त्तिनी । स्मरन्ती बालभावस्य सौख्येऽपि विमना इव ॥१०१॥ राजा चण्डमहासेनस्तया तनयया यथा । तथैव पद्मावत्यापि नन्दति स्म समागतः ॥१०२॥ विश्रम्य च निशाः काश्चित्प्रीतो वत्सश्वरस्ततः । अन्वितः श्वशुरैः सैन्यैः प्रययौ पश्चिमां दिशम् ॥१०३॥ १ अनुयथेव समाना तत्तथैव प्रमुस्तुबुः—रघु ४ सर्गे ।

कलिङ्ग-देशों का राजाओं ने नम्र होकर कर दे देने पर (पराजित होकर अधीनता स्वीकार कर लेने पर) उस यशस्वी वत्सराज का यश महेन्द्र पर्वत पर चढ़ गया ॥९२॥ महेन्द्र पर्वत के अपमान से डरे हुए, अतएव अनुगमन करते हुए विन्ध्य-पर्वत के शिखरों के समान हाथियों से उस देश के राजाओं को जीतकर (वत्सराज) दक्षिण दिशा की ओर गया ॥९३॥ दक्षिण दिशा में शरत्काल के समान राजा ने मेघों के समान शत्रुओं का (दक्षिण के राजाओं को) निःसार और श्वेत बदनवाले गर्जना-रहित और पर्वतों पर आश्रय लेनेवाला बना दिया ॥९४॥ भीषण संघर्ष करनेवाले उस राजा उदयन ने कावेरी का उल्लङ्घन करके उसे और चोल देश के राजा की कीर्ति को कलुषित कर डाला अर्थात् चोल' राजा को पराजित कर दिया ॥९५॥ राजा उदयन ने करा से मारे हुए मुरल देश के राजाओं के सिरों की उन्नति का ही सहन नहीं किया प्रत्युत करा से विताड़ित उस देश की स्त्रियों की कुचोन्नति को भी सहन नहीं किया ॥९६॥ राजा उदयन के हाथियों ने सात धाराओं में विभक्त गोदावरी का जल पीया था उठ उन्होंने उस जल को मद के बहाने सात स्थानों से निकाल दिया³ ॥९७॥ दक्षिण-विजय करने के अनन्तर वत्सराज नर्मदा नदी को पार करके उज्जयिनी में आया । वहाँ उसके श्वशुर (वासवदत्ता के पिता) ने उसकी अगवानी की ॥९८॥ वहाँ राजा उदयन मालाओं से शिथिल केशपाशों से दूनी शोभा धारण करते हुए मालव रमणियों के कटाक्षों का लक्ष्य (शिकार) बन गया ॥९९॥ श्वशुर द्वारा सत्कार किया गया उदयन उज्जयिनी में कुछ दिनों तक ठहर गया । वहाँ उसकी ऐसी आवभगत हुई कि वह अपने घर के सुखों को भी भूल गया ॥१००॥ पिता की गोद में लोटती हुई वासवदत्ता अपने बाल्यकाल का स्मरण करके महारानी के सुख में भी निःस्पृह हो गई ॥१०१॥ राजा चण्डमहासेन भी जैसे वासवदत्ता से आनन्दित हुआ वैसे ही पद्मावती से भी आनन्द अनुभव करता था ॥१०२॥ कुछ रातें उज्जयिनी में व्यतीत करके, ससुर की सेनाओं से युक्त वत्सराज पश्चिम दिशा की ओर चला ॥१०३॥ १ देखिए परिशिष्ट । २ देखिए परिशिष्ट । ३ देखिए रघु० सर्ग ४—मसूयतेव तन्माला सप्तधैव प्रसुस्रुवुः ।

१७२ कथासरित्सागर

१७२ कथासरित्सागर तस्य खड्गरक्ता मून प्रतापानलधूमिका। यच्चक्रे लाट¹नारीणामश्रुकण्रुपा दृशः॥१०४॥ असौ मथितुमम्भोधि मा मामुन्मूलयिष्यति। इतीव सङ्गजाधूतवनोऽवेपत मन्दरः॥१०५॥ सत्य स कोऽपि तेजस्वी भास्वन्नादिविवस्वतः। प्रतीच्यामुदयं प्राप प्रकृष्टमपि यज्जयी॥१०६॥ छत कुबेरतिलकामलकासङ्गसङ्घसिनीम्। कैलासहाससुभगामाशामभिससार सः॥१०७॥ सिन्धुराज वशीकृत्य हरिसीग्यैरनुद्रुत । क्षपयामास च म्लेच्छांराघवो राक्षसानिव॥१०८॥ तुरुष्क²तुरगव्राता क्षुभ्यत्साम्बरिखोमद । तृष्णयन्नन्वटा वेलावनेषु दलशो ययुः॥१०९॥ गृहीतारिकट³ धीमान् पापस्य पुरुवोत्लम । राहोरिव स च्छिच्छेव पारसीकपते शिरः॥११०॥ हूणहानिस्रुतस्तस्य मुक्तरोधतविक्रूमला। कीर्तिद्वितीया गङ्गव विवचार हिमाचलम्॥१११॥ नदन्तीष्वस्य सेनासु भयस्तिमितविद्विष । प्रतीप शुश्रुवे नाद शैलरन्ध्रेषु कन्दरम्॥११२॥ अपच्छत्रेण शिरसा कामरूपेश्वरोऽपि तम्। मन्वन्विच्छायतां भेजे यत्तदा न तदद्भुतम्॥११३॥ तदुत्तरस्थितो नाम सम्राट् विववृतेऽथ सः। अङ्गिमिर्जङ्गम शल करीकृत्यापितैरिव॥११४॥ एव विजित्य वत्सशो वसुधां सपरिच्छदः। पद्मावतीपितु प्राप पुर मगधभूभृतः॥११५॥ मगधेशश्च देवीभ्यां सहितंऽस्मिन्नुपस्थिते। सारसबोडभूमिभ्याम्योस्नावति चन्द्र इव स्मरः॥११६॥ भविज्ञात्तस्थितामादौ पुनश्च व्यक्तिमागताम्। मने वासवदत्तां च सोऽधिकप्रणयास्पदम्॥११७॥ १ लाटविषय परिच्छेदे विवृतः। २ अयमपि परिच्छेदे विवृतः। ३ हरिवत्सराजचेत् सिन्धद्वविशेषणमिदम् वत्सवराजपक्षे गृहीत अरीनां कट येन, हरिपक्षेच-गृहीतं अरिः सुदर्शनं करे येन।

तृतीय लम्बक १७३

तृतीय लम्बक १७३ अवश्य ही राजा उदयन की तलवार उसके प्रतापानल की धूमरेखा के समान थी क्योंकि उसने लाट देश की स्त्रियों की आँखों को उमड़ते हुए आँसुओं से कङ्कण कर दिया था॥१४॥ यह राजा समुद्र-मन्थन के लिए कहीं मुझे उखाड़ न ले इसी भय से वायु से काँपते हुए पत्तोंवाला मन्दराचल पर्वत मानों काँपने लगा॥१५॥ राजा उदयन सचमुच सूर्य से विलक्षण कोई तेजस्वी है जिसका पश्चिम में उदय हुआ॥१६॥ पश्चिम-विजय करने पर राजा उदयन कुबेर से लक्षित अलका-नगरी से विभूषित कैलास के हास से सुन्दर उत्तर दिशा को चला॥१७॥ वहाँ पर घोड़ों की सेना से युक्त उदयन ने सिन्धुराज को वश में करके म्लेच्छों का इस प्रकार संहार किया जैसे राम ने राक्षसों का किया था। विक्षुब्ध समुद्र की लहरों के समान पारसी घोड़ों के झुण्ड उदयन के हाथी-रूपी तटवनों से जाकर टकराये॥ शत्रुओं से कर लेने वाले उस महापुरुष उदयन ने हाथ में चक्र लिये हुए विष्णु के समान पापी पारस के राजा का सिर राहु के समान काट डाला॥१८-११॥ हूणों का विनाश करनेवाले राजा उदयन की कीर्ति दूसरी गंगा के समान हिमाचल पर विचरण करने लगी॥११२॥ हिमाचल में कन्दराओं में भय से त्रस्त (छिपे हुए) शत्रुवाले राजा की सेना के कोलाहल की केवल प्रतिध्वनि ही सुन पड़ती थी॥११३॥ कामरूप (असाम) देश का राजा बिना छत्र के सिर से उसे (उदयन को) प्रणाम करता हुआ जो हतप्रभ हो गया वह आश्चर्य की बात नहीं॥११४॥ उस (कामरूप-नरेश) द्वारा जंगम पर्वतों के समान कर के रूप में दिये गये हाथियों के साथ सम्राट् उदयन दिग्विजय-यात्रा से लौट आया॥११५॥ वह वत्सराज इस प्रकार पृथ्वी को जीतकर सेना के साथ पद्मावती के पिता मगध नरेश के नगर (राजगृह) लौट आया॥११५॥ मगध-नरेश दोनों महारानियों के साथ उसे उपस्थित देखकर इस प्रकार प्रसन्न हुआ जैसे निशा में चाँदनी-युक्त चन्द्रमा के होने पर कामदेव प्रसन्न होता है॥११६॥ पहले छिपे रूप में और पश्चात् प्रकट रूप में स्थित वासवदत्ता को उसने नम्रता के कारण अधिक रूप में माना॥११७॥

१७४ कथासरित्सागर

१७४ कथासरित्सागर ततो मगधभूभृता सनगरण वनाचितः समग्रजनमानसैनुगतोऽनुरागागतः । निगीर्णवसुधातलो बलबरेण सावाणक जगाम विषयं निजं स किल वत्सराजो जयी ॥११८॥ इति महाकविश्रीसोमदेवभट्टविरचिते कथासरित्सागरे लावाणकलम्बके पञ्चमस्तरङ्गः । षष्ठस्तरङ्गः वत्सराजकथा (पूर्वानुवृत्ता) ततः स सेनाविश्रान्त्यै तत्र लावाणके स्थितः । रहस्युवाच वत्सदो राजा यौगन्धरायणम् ॥१॥ त्वद्बुद्ध्या निर्जिताः सर्वे पृथिव्यां भूभृतो मया । उपायस्वीकृतास्ते च नैव व्यभिचरन्ति मे ॥२॥ वाराणसीपतिस्तेषां ब्रह्मदत्तो दुराशयः । जाने व्यभिचरत्येको विश्वासः कुटिलद्रुपु कः ॥३॥ इति वत्सेश्वरेणोक्त आह यौगन्धरायणः । न राजन् ब्रह्मदत्तस्ते भूयो व्यभिचरिष्यति ॥४॥ आश्वस्तोपनतस्तेषां भृशं सम्मानितस्त्वया । शुभाचारस्य कः कुर्यादशुभं हि सचतनः ॥५॥ कुर्वीत वा यस्तस्यैव तदात्मन्यशुभं भवेत् । तथा च श्रूयतामत्र कथां ते वर्णयाम्यहम् ॥६॥ फलबूतोः कथा बभूव पद्मविषये पुरा कोऽपि द्विजोत्तमः । ख्यातिमानग्निदत्ताख्यो भूभृत्साप्रहार भुक् ॥७॥ तस्यैकः सोमदत्ताख्यः पुत्रो ज्यायानजायत । द्वितीयश्चाभवद् वडवानरदत्ताख्यया सुतः ॥८॥ १ राजभिः ब्राह्मणेभ्यो महाविद्वत्ताद्ध्ययसविधे दलक्त्वेन प्रदत्ता हप्त्टिमूविराहार इत्युच्यते । दक्षिणदेशेऽग्रहाराणां प्राचुर्यं वर्तते ।

तृतीय लम्बक १०५

तृतीय लम्बक १०५ तदनन्तर मगधवासियों के साथ मगध-नरेश द्वारा सत्कार किया गया स्नेहवश समस्त वर्गों से अभिनन्दित सेना के भार से समस्त पृथ्वी को वश में किये हुए विजयी सम्राट् उदयन अपने देश गया ॥११८॥ पञ्चम तरंग समाप्त षष्ठ तरंग वत्सराज की कथा (क्रमशः) विजय-यात्रा से थकी हुई सेना का विश्राम कराने के लिए लावानक में ठहरे हुए वत्सराज उदयन ने एक बार एकान्त में यौगन्धरायण से कहा ॥१॥ तुम्हारे बुद्धि-वैभव से मैंने पृथ्वी के सभी राजाओं को जीत लिया। उपाय से वश में किये गये वे राजा कभी विरोधी नहीं हो सकते ॥२॥ किन्तु वाराणसी का यह राजा ब्रह्मदत्त अब भी विरोध करता है। कुटिल मनुष्यों पर क्या विश्वास ? ॥३॥ वत्सराज के इस प्रकार कहने पर यौगन्धरायण ने कहा कि महाराज ! ब्रह्मदत्त अब फिर विरोध न करेगा ॥४॥ आक्रमण करके दबाया हुआ वह तुमसे अत्यधिक सम्मानित हुआ है। कौन ऐसा बुद्धि मान् होगा जो अपना भला करनेवाले के साथ बुरा बर्ताव करेगा ॥५॥ यदि करता भी है तो अपनी ही आत्मा का अकल्याण करता है। इस प्रसंग में एक कथा कहता हूँ सुनो ॥६॥ फलभूति की कथा प्राचीन काल में पद्म प्रदेश में प्रसिद्ध शाम्बवाला अग्निदत्त नाम का ब्राह्मण था जो राजा के द्वारा दान दिये गये अग्रहार¹ (ग्राम) से जीवन-निर्वाह करता था ॥७॥ उसका बड़ा लड़का सोमदत्त और छोटा वैश्वानरदत्त था ॥८॥ १ प्राचीन समय में राजा लोग ब्राह्मणों को जीवन निर्वाह के लिए जल-सिंचाई आदि सुविधावाली भूमि दान देते थे। उसे अग्रहार कहते हैं। दक्षिण-भारत में अब भी ऐसे सहस्रों अग्रहार मिलते हैं।

३७६ कथासरित्सागर

३७६ कथासरित्सागर आद्यस्तयोरभून्मूर्खः स्वाकृतिर्दुर्विनीतकः। अपरश्चाभवद् विद्वान्विनीतोऽध्ययनप्रियः ॥९॥ कृतदारावुभौ तौ च पितर्यस्तङ्गते ततः। तदीयस्याग्रहारावेर्धमर्धं विभेजतुः ॥१०॥ सन्मध्यात्स कनीयांश्च राज्ञा सम्मानितोऽभवत्। ज्येष्ठस्तु सोमदत्तोऽभूच्चपलः क्षत्रकर्मकृत् ॥११॥ एकदा मद्यगोष्ठीके शूद्रैः सह विलोक्य तम्। सोमदत्तं पितृसुहृद्विजः कोऽप्यवमब्रवीत् ॥१२॥ अग्निदत्तसुतो भूत्वा शूद्रवन्मूर्ख ! चेष्टसे। निजमवानुजं दृष्ट्वा राजपूल्यं न लज्जसे ॥१३॥ तच्छ्रुत्वा कुपितः सोऽथ सोमदत्तः प्रधाव्य तम्। विप्रं पादप्रहारेण बधानोज्झितगौरवः ॥१४॥ तत्र विप्रः स कृत्वाऽन्यान् साक्षिणस्तत्क्षणं द्विजान्। गत्वा पादाहतिक्रुद्धो राजानं तं व्यजिज्ञपत् ॥१५॥ राजापि सोमदत्तस्य बन्धाय प्राहिणोद् भटान्। ते च निर्गत्य तन्मित्रैर्जघ्निरे शस्त्रपाणिभिः ॥१६॥ ततो भूयो बलं प्रेष्यावष्टम्भस्याय भूपतिः। क्रोधान्धः सोमदत्तस्य शूलारोपणमादिशत् ॥१७॥ मारोप्यमाणः शूलायामथाकस्मात्स च द्विजः। प्रक्षिप्त इव केनापि निपपात ततः क्षितौ ॥१८॥ रक्षन्ति भाविकल्याणं भाग्यान्यत्र यतोऽस्य ते। अन्वीयुबुर्वधकाः पुनरारोपगोद्यताः ॥१९॥ तत्क्षणं श्रुतवृत्तान्तस्तुष्टो राजा कनीयसा। भ्रात्रास्य कृतविज्ञप्तिर्भयादनममोचयत् ॥२०॥ ततो मरणनिस्तीर्णः सोमदत्तो गृहं सह। गन्तुं राजावमानेन देशास्तरमियेय सः ॥२१॥ यदा च नैच्छन्गमनं समतास्तस्य बान्धवाः। त्यक्तराजाग्रहारार्थं प्रतिपेदे तदा स्थितिम् ॥२२॥ ततो भृत्यन्नराभावात्खतु स पश्ये कृणिम्। तद्योग्यां च भुवं द्रष्टुं सुमेरुञ्चटवीं ययौ ॥२३॥

तृतीय लम्बक १७७

तृतीय लम्बक १७७ उनमें ज्येष्ठ पुत्र सोमदत्त सुन्दर होने पर भी मूर्ख और उद्दण्ड था तथा छोटा पुत्र विद्वान् विनयी और अध्ययनप्रेमी था। दोनों विवाहित थे अतः पिता की मृत्यु हो जाने पर दोनों ने गाँव का आधा-आधा बाँट लिया ।।९-१० ।। दोनों में छोटा वैश्वानरदत्त विद्वान् होने के कारण राजा से सम्मानित था और बड़ा सोमदत्त उद्दण्ड एवं क्षत्रिय कर्म (लड़ने-भिड़ने) करनेवाला था ।।११।। एक बार मूर्ख द्यूतों के साथ गोष्ठी बनाकर बैठे हुए सोमदत्त को उसके पिता के किसी मित्र ने कहा हे मूर्ख ! अग्निदत्त के पुत्र होकर द्यूतों का-सा व्यवहार करते हो। राजा से सम्मानित अपने छोटे भाई को देखकर लज्जित नहीं होते ।।१२-१३।। यह सुनकर क्रुद्ध सोमदत्त ने दौड़कर उस ब्राह्मण को लात मारी ।।१४।। लात खाकर उस ब्राह्मण ने वहाँ बैठे हुए लोगों को गवाह बनाकर राजा के समीप आकर निवेदन किया ।।१५।। तब राजा ने सोमदत्त को बाँधकर लाने के लिए सिपाहियों को भेजा। सोमदत्त के मूर्ख मित्रों ने शस्त्रा से उन सिपाहियों को मारा ।।१६।। यह सुनकर क्रोध में राजा ने सेना के द्वारा पकड़वाकर उसे फाँसी की आज्ञा दे दी ।।१७।। सूली पर चढ़ा हुआ वह ब्राह्मण मानो किसी के द्वारा फेंका हुआ-सा पृथ्वी पर गिर पड़ा ।।१८।। भाग्य ही भविष्य में होनेवाले कल्याण की रक्षा करते हैं। उस फिर सूली पर चढ़ाने के लिए तैयार बधिक अन्धे हो गये। उसी समय उसके छोटे भाई के अनुनय-विनय करने पर राजा ने उसे फाँसी से छुड़ा दिया ।।१ ९ -२० ।। मृत्यु-मुख से छूटे हुए सोमदत्त ने राजा के द्वारा किये गये अपमान के कारण अपनी गृहस्थी के साथ उस देश को छोड़कर दूसरे देश जाने की इच्छा प्रकट की ।।२१।। जब उसके एकत्र हुए बन्धुओं ने उसे देश-त्याग के लिए मना किया तब उसने राजा के आधे ग्राम का अधिकार छोड़ दिया और वहीं रहने लगा ।।२२।। ग्राम छूट जाने न जीवन-निर्वाह का उपाय न देखकर उसने कृषि (खेती) करने का निश्चय किया और कृषि-योग्य भूमि ढूँढ़ने के लिए किसी शुभ दिन जङ्गल में गया ।।२३।। ४८

१७८ कथासरित्सागर

१७८ कथासरित्सागर तत्र लेभे शुभां भूमिं सम्भाव्य फलसम्पदम्। तन्मध्ये च महाभोगमश्वत्थतरुमैक्षत ॥२४॥ स कल्याणघनच्छायाच्छन्नसूर्यांशुशीतलम्। प्रावृट्कालमिवालोक्य कृष्यर्थी तोयमाप स ॥२५॥ योऽधिष्ठाताऽत्र तस्यैव भक्तोऽस्मीत्यभिधाय च। कृतप्रदक्षिणोऽश्वत्थवृक्षं तं प्रननाम स ॥२६॥ सयोग्याश्च बलीवर्दयुगं रचितमङ्गलः। कृत्वा बलिं सम्य तरोरारेभे कृषिमथ स ॥२७॥ तस्थौ तस्यैव चाधस्ताद्द्रुमस्य स दिवानिशम्। भोजनं तस्य चानिन्ये सत्रैव गृहिणी सदा ॥२८॥ काले तत्र च पक्वेषु तस्य सस्येष्वसञ्चितम्। सा भूमिः परराष्ट्रेण दैवादेत्य व्यलुण्ठ्यत ॥२९॥ ततः परबल याते नष्टे सस्ये च सत्त्ववान्। आश्वास्य रुदतीं भार्यां किञ्चिच्छेषे तदाब्रवीत् ॥३०॥ प्राग्वत्कृतबलिस्तस्थौ रात्रावथ तरोरधः। निसर्गः स हि धीराणां यदापद्यधिकं दृढाः ॥३१॥ अथ चिन्तावनिद्रस्य स्थितस्यैकाकिनो निशि। तस्यादश्वत्थतरोस्तस्मादुच्चचार सरस्वती ॥३२॥ भो सोमदत्त ! तुष्टोऽस्मि तव तद्गच्छ भूपतेः। आन्त्यप्रभसञ्ज्ञस्य राष्ट्रं धीरत्वशालिनः ॥३३॥ तत्र सस्थानवरत द्वारेवेशे महीपतेः। ब्रूषे पठित्वा सन्ध्याग्निहोत्रमन्त्रानिदं वचः ॥३४॥ फलभूतिरहं नाम्ना विप्रः शृणुत वच्मि यत्। भद्रकृत्प्राप्नुयाद् भद्रमभद्रं चाप्यभद्रकृत् ॥३५॥ एवं ब्रुवन् तत्र त्वं महतीमृद्धिमाप्स्यसि। सन्ध्याग्निहोत्रमन्त्रांश्च मत्त एव पठाधुना ॥३६॥ महं च यदा इत्युक्त्वा स्वप्रभावेण तत्क्षणम्। समध्याप्य च तान्मन्त्रान् खेटे वाणी तिरोदधे ॥३७॥ प्रातः स सोमदत्तश्च प्रतस्थे भार्यया सह। फलभूतिरिति प्राप्य नाम यदाहूतः श्रुतौ ॥३८॥ अतित्रम्राटवीम्तास्त्वा विषमाः परिवर्त्तिनीः। दुर्गा दृढ गत्प्राप प्रौढवर्णविषयं च सः ॥३९॥

तृतीय लम्बक ३७९

तृतीय लम्बक ३७९ जंगल में उसने अच्छी फसल होने योग्य एक भूमि देखी और उसके मध्य में बड़ी विस्तृत (लम्बी-चौड़ी) घनी छाया के कारण (सूर्य-किरणों को रोकने के कारण) शीतल एक पीपल के वृक्ष को वर्षाकाल के समान देखकर वह कृषक अत्यन्त सन्तुष्ट हुआ ॥२४-२५॥ तब सोमदत्त ने 'इस वृक्ष में रहनेवाला जो भी देवता है, मैं उसका भक्त हूँ' ऐसा कहकर वृक्ष की प्रदक्षिणा कर उसे प्रणाम किया ॥२६॥ तदनन्तर बैलों को जोड़कर मंगल के लिए पूजा-पाठ आदि करके और वृक्ष का प्रसाद चढ़ाकर उसने खेती प्रारम्भ कर दी ॥२७॥ खेती करता हुआ वह सोमदत्त उसी वृक्ष के नीचे दिन-रात रहने लगा। उसकी पत्नी प्रतिदिन उसे वहीं भोजन लाकर देती थी ॥२८॥ कुछ समय के बाद जब उसकी खेती पककर तैयार हुई, तो दूसरे राजा के राष्ट्र पर आक्रमण करने के कारण लूट ली गई। सब-मना के चले जाने पर और धन के नष्ट होने पर उसने रोती हुई पत्नी को समझा-बुझाकर कुछ बचा-खुचा अन्न समेट लिया ॥२९ १/२॥ और पहले के समान पीपल के वृक्ष में रहनेवाले देवता की बलि (प्रसाद) चढ़ाकर धैर्य के साथ वहीं रहन लगा क्योंकि धैर्यशाली जीव विपत्ति के समय स्वभावतः अधिक दृढ़ हो जाते हैं ॥३१॥ तदनन्तर एक दिन रात में चिन्ता से निद्रा न आने के कारण जागते हुए सोमदत्त ने पीपल के वृक्ष से निकली हुई यह वाणी सुनी—'हे सोमदत्त ! मैं तुम से प्रसन्न हूँ। तुम धीरकंट-देश में जादित्यप्रभ नामक राज्य के राष्ट्र में जाओ। उस राजा के द्वार पर निरन्तर सन्ध्या और अग्निहोत्र के मन्त्रों का पाठ करते हुए यह कहना कि मैं फलभूति नामक ब्राह्मण हूँ जो कहता हूँ उसे सुनिए— शुभ कार्य करनेवाला कल्याण प्राप्त करता है और अशुभ कार्यवारी अशुभ प्राप्त करता है। तुम्हें सन्ध्या और अग्निहोत्र के मन्त्र नहीं आते उन्हें अभी मुझसे पढ़ो मैं यक्ष हूँ। ऐसा कहकर यक्ष ने अपने प्रभाव से उसी समय मन्त्र पढ़ा दिये। मन्त्र पढ़ाकर वाणी लीन हो गई ॥३२-३६॥ प्रातःकाल सोमदत्त यक्ष द्वारा दिये गये फलभूति नाम को पाकर अपनी पत्नी के साथ धीरकंट-देश की ओर चल पड़ा। वह अगर बड़े-बड़े भीषण जंगलों को पारकर दुर्देव के साथ धीरकंट-देश में पहुँचा ॥३८ १/२॥

५८ कथासरित्सागर

५८ कथासरित्सागर तत्र सन्ध्याग्निकार्यादि पठित्वा द्वारि भूपतेः। ययावन्नाम सङ्ख्याप्य फलबूतिरिति स्वकम् ॥४०॥ सोऽवादीद् भद्रकृद् भद्रमभद्रं चाप्यभद्रकृत्। प्राप्नुयादिति लोकस्य कौतुकोत्पादकं वचः ॥४१॥ मुहुश्च तद्ब्रुवन्तं स तत्रादित्यप्रभो नृपः। बुद्ध्वा प्रवेशयामास फलबूतिं कुतूहली ॥४२॥ सोऽपि प्रवेद्य तस्याग्रे तदेव मुहुरब्रवीत्। जहास तेन स नृपस्तथा पार्श्वस्थितैः सह ॥४३॥ समान्तश्च वस्त्राणि दत्त्वा चाभरणानि सः। ग्रामान् राजा ददौ तस्मै न तोषो महतां मृषा ॥४४॥ एवं च तत्क्षणं प्राप गुह्यकानुग्रहेण सः। फलबूतिः कृशो भूत्वा विभूतिं भूरिदोषिताम् ॥४५॥ सदा तदेव च वदन् पूर्वोक्तं प्राप भूपतेः। बालक्रम्यमीश्वराणां हि विनोदरसिकं मनः ॥४६॥ क्रमाद्राजगृहे चास्मिन् राष्ट्रम्वन्तःपुरेषु च। राजप्रिय इति प्रीतिं बहुमानामवाप सः ॥४७॥ कदाचिच्च सोऽन्यया कृतकाटङ्कभागसः। आदित्यप्रभभूपाल सहसान्तःपुरं ययौ ॥४८॥ द्वाःस्थसम्भ्रमसाशङ्क प्रविश्यैव ददर्श सः। देवी देवासमम्यर्चा नाम्ना कुवलयावतीम् ॥४९॥ दिगम्बरामुक्तकेशीं निमीलितविलोचनाम्। स्फुरत्सिन्दूरतिलकां जपप्रस्फुटिताधरम् ॥५०॥ विविधवर्णकन्यस्तमहामण्डलमध्यगाम् । अमृक्सुरामहामांसकल्पितोग्रबलिक्रियाम् ॥५१॥ साऽपि प्रविष्टे नृपतौ सम्भ्रमाकम्पितांगुशः। तेन पृष्टा क्षणाद्वस्त्रमवोचद्याचिताभया ॥५२॥ तदेवोदयताभाप कृतवत्यस्मि पूजनम्। अत्र चागमवृत्तान्तं सिद्धिं च शृणु मे प्रभो ! ॥५३॥ कुवलयमालाकल्पिता वार्ता पुराहं पितृवेश्मस्था कन्या मधुमहोत्सवे। एवमुक्त्वा वयस्याभिः समत्प्रमोदानवर्तिनी ॥५४॥ अस्तीह प्रमदोद्याने तरुमण्डलमध्यगः। दृष्टप्रभाबो वरदो देवदेवो विनायकः ॥५५॥

तृतीय लम्बक ३८१

तृतीय लम्बक ३८१ वहाँ राजद्वार पर सन्ध्या अग्निहोत्र आदि के मन्त्र पढ़कर और अपना फलभूर्ति नाम सुनाकर बोला—'कल्याणकारी कल्याण प्राप्त करता है और अशुभकर्ता अशुभ प्राप्त करता है। कानों में आश्चर्य उत्पन्न करनेवाले ये वचन बोलने लगा ॥४०-४१॥ उसे बार-बार ऐसा कहते हुए सुनकर चकित हुए राजा आदित्यप्रभ ने उसे अन्दर बुलवाया ॥४२॥ वह फलभूर्ति भीतर राजा के समीप आकर भी बार-बार वही वाक्य कहने लगा जिसे सुनकर राजा और उसके समीप बैठे हुए व्यक्ति हँसने लगे। इस प्रकार प्रसन्न राजा ने उसे अच्छे-अच्छे वस्त्र गहने और अनेक गाँव पुरस्कार में दिये। बड़ों की प्रसन्नता झूठी (व्यर्थ) नहीं होती ॥४३-४४॥ इस प्रकार यश की कृपा से निर्धन फलभूर्ति ने राजा द्वारा दी गई विभूति प्राप्त की और सदा इसी प्रकार बकता हुआ राजा का प्रेमपात्र बन गया। राजाओं का मन विलास का सदा रसिक होता है। क्रमशः वह फलभूर्ति (सामग्रतः) धीरे-धीरे राज्य में रनिवास में और सर्वत्र ही राजप्रिय होने के कारण सम्मानित हुआ ॥४५-४७॥ किसी समय राजा आदित्यप्रभ वयस में शृंगार खेलकर एकाएक रनिवास में चला गया। द्वारपाल की घबराहट से शंकित राजा ने रानी के भवन में प्रवेश करते ही रानी कुवलयावली को देव-पूजा में संलग्न देखा ॥४८-४९॥ राजा ने वहाँ उठे हुए धूपाकाशी जालें सूँघे हुए, मोटा सिन्दूर का तिलक लगाये हुए, जप से फड़कते हुए ओष्ठावाली रंग-बिरंगे बड़े-से मण्डल के भीतर बैठी हुई तथा रक्त मद्य और नरमांस से उग्र बलि देती हुई नयी रानी को देखा ॥५०-५१॥ रानी भी राजा के सहसा आ जाने पर घबराहट में थोथी बहकने लगी राजा के पूछने पर अभय प्रार्थना करके बोली—'महाराज ! तुम्हारी उन्नति के लिए ही यह पूजन कर रही हूँ। इस पूजा की प्राप्ति और सिद्धि का वृत्तान्त सुनो ॥५२-५३॥ रानी कुवलयावली द्वारा कही गई कथा अपने पिता के घर में जब मैं कन्या (अविवाहिता) थी तब एक बार वसन्तोत्सव के समय कुल-उद्यान में बैठी हुई सखियों ने आकर कहा—'इस हमारे उद्यान में केतकी झुरमुट में सिद्धदाता वरदानी पद्मावती की मूर्ति है। वह भक्तों की मनोकामना पूर्ण करने ॥५४-५५॥

१८२ कथासरित्सागर

१८२ कथासरित्सागर तमुपागम्य भक्त्या स्वं पूजय प्रापितस्तदम् । येन निर्विघ्नमेवानु स्यादिष्टं पतिमाप्स्यसि ॥५६॥ ततस्तस्या यथाख्यात गच्छन्त्या मोदकतो मया । कया लब्धं भर्त्तारं हि विनायकमभूत्तया ॥५७॥ मया सा प्रत्यबोधाम्भो विमनायन्तथावदत् । तस्मिन्प्रवृत्तेन नास्ति सिद्धिः कार्येह कस्यचित् ॥५८॥ तथा भक्त्याथ तं चण्डयामा वधं गृहम् । इत्युक्त्वा स वयस्या मे वयामस्तथयन्निमाम् ॥५९॥ यक्षदत्तकथा पुरा पुरन्दरनये गणाग्य प्रागुदिष्यति । गान्धारवत्य तत तय च बभूवासुर ॥६०॥ प्राच्यवन्तममुष्य गन्धर्वाणां प्रियाम् । सोऽथ कृत्वा प्राप्य प्राय च सवत्स पतिम् ॥६१॥ ग्रामवत् गुणैर्युक्तं मन्दग्य च प्रीतिम् । स च गन्ध्यां निदद्ध्ये या तिल... गुणत्रयम् ॥६२॥ प्रमत्तस्यापिनो मा च कान्ताविष्टा चिद । द्विज प्रवासं पूर्वं मातङ्गाख्येति ददौ ॥६३॥ च सन्तर्पयेति मन्त्रप्रभावतो ददौ च । तत्र सञ्चारयन्मानं स चकार वपुष्मतः ॥६४॥ भीतासीत वधूहं तीर्थस्नानं जगुर्दृशा । ददातु गच्छतो यस्य दूतं दायान्प्रगृह्यते ॥६५॥ इत्थं स वयस्याभिः सन्तापवन्त... त्वा दृष्ट्वा स प्रमत्तश्च मातङ्गाख्यं पुरं गतः। प्रहस्यैतां रहिते च गुणवद्दारदारकः। अथ सा कस्य कन्यासौ मन्दबुद्धे कथं च सा। न्यहं यद वन्दितुं तीर्थं समं मया। भवितास्य सुता दूतं प्रत्याहवदतो जनैः। यद वन्दितुं तीर्थं विजयाख्यममुं सती। तत्र तस्य द्विजेन्द्रस्य सुतं रूपेणानिन्दितम्

कहकर सहेलियों ने मुझे यह कथा सुनाई ॥५८-५९॥

तृतीय स्तबक १८३ उनकी पूजा कर, तो अवश्य ही अपने अनुकूल पति को प्राप्त करेगी' ॥५६॥ यह सुनकर मैंने अपने स्वाभाविक भोलेपन से सखियों से पूछा कि क्या विनायक (गणेश) की पूजा से कुमारियाँ अपने योग्य पति को प्राप्त करती हैं? ॥५७॥ मेरे पूछने पर उन्होंने कहा- 'तुम क्या कह रही हो? उनकी पूजा के बिना किसी को कोई भी सिद्धि प्राप्त नहीं हो सकती। हम गणपति का प्रभाव तुम्हें बतलाती हैं सुनो।' ऐसा कहकर सहेलियों ने मुझे यह कथा सुनाई ॥५८-५९॥ गणपति की कथा प्राचीन काल में देवता लोग सेनापतित्व के लिए शिवजी के पुत्र को चाहते थे तारकासुर ने इन्द्र को भगा दिया और शिवजी ने कामदेव को दग्ध कर दिया। ऊर्ध्वरेता (आजन्म ब्रह्मचारी) अत्यन्त उग्र एवं लम्बी तपस्या में बैठे हुए शिवजी को पति के रूप में प्राप्त करने के लिए पार्वती ने तप किया और पुत्र की प्राप्ति एवं कामदेव का पुनर्जन्म माँगा किन्तु उसने कार्य-सिद्धि के लिए गणेशजी के पूजन का स्मरण नहीं किया ॥६०-६२॥ तब अपना अभीष्ट चाहनेवाली पार्वती से शिव ने कहा- 'प्रिये ! सबसे पहले प्रजापति ब्रह्मा के मन से काम देव उत्पन्न हुआ। वह उत्पन्न होते ही मद से बोला किसे उन्मत्त करूँ? तब प्रजापति ने उसका नाम कन्दर्प रख दिया और उससे बोले- 'बेटा तुम्हें अत्यन्त दर्प हो गया है तो एक त्रिनेत्र शिव से अपनी रक्षा करना। कहीं उनसे तुम्हारी मृत्यु न हो'। ब्रह्मा से इस प्रकार समझाया हुआ भी दुष्ट कामदेव मुझे क्षुब्ध करने के लिए आया और मैंने उसे दग्ध कर दिया। वह पुनः देह के साथ जीवित नहीं हो सकता ॥६३-६६॥ तुम्हें तो मैं अपनी ही शक्ति से पुत्र उत्पन्न कर दूंगा। साधारण सांसारिक जनों के समान मुझे कामदेव की प्रेरणा से प्रजोत्पादन-शक्ति की आवश्यकता नहीं है ॥६७॥ जब शिवजी पार्वती से इस प्रकार कह रहे थे तभी उनके सम्मुख ब्रह्मा इन्द्र के साथ प्रकट हुए। उन्होंने स्तुति करके शिवजी से तारकासुर से शान्ति के लिए प्रार्थना की। शिवजी ने भी पार्वती की कोख से सन्तान उत्पन्न करना स्वीकार किया ॥६८-६९॥

१८४ कथासरित्सागर

१८४ कथासरित्सागर अनुमेने च कामस्य जन्म पत्नि देहिनाम्। सङ्गविच्छेङ्करस्यार्थममूर्त्संन्यैव तद्गिरा ॥७०॥ ददौ च निजचित्तेऽपि सोऽवकाशं मनोभुवः । तेन तुष्टो ययौ धाता मुदं पाप च पार्वती ॥७१॥ ततो यातेषु दिवसेष्वेकदा रहसि स्थितः । सिषेवे सुरतक्रीडामुमया सह शङ्करः ॥७२॥ कुमारसम्भवकथा यदा नाभूद्रतस्तोष्य गतष्वब्दशतेष्वपि । तदा तदुपमर्देन चकम्पे भुवनत्रयम् ॥७३॥ ततो जगन्नाशभयाद्रतविघ्नाय धूर्जतेः । वह्निं स्मरन्ति स्म सुराः पितामहनिदेशतः ॥७४॥ सोऽप्यग्निः स्मृतमात्रः सन्नभ्युपेत्य मदनान्तकम्। मत्वा पलाय्य तैर्भ्यः प्रविवेश जलान्तरम् ॥७५॥ तत्तेजोदह्यमानाश्च तत्र भेका दिवौकसाम् । विचिन्वतां शशंसुस्तमग्निमन्तर्जलस्थितम् ॥७६॥ ततस्ताननभिव्यक्तवाचः शापेन तत्क्षणम् । मकान्कृत्वा तिरोभूय भूयोऽग्निमन्वर ययौ ॥७७॥ तत्र तं कोटरान्तस्थं देवाः शम्बूकरूपिणम् । प्रापुगशकाख्यातं स कयां दर्शनं ददौ ॥७८॥ कृत्वा जिह्वाविपर्यास शापेन शुकदन्तिनाम् । प्रविपेदे च देवानां स कायं तैः कृतस्तुतिः ॥७९॥ गत्वा च स्वोष्मणा सोऽग्निनिवार्य सुरताच्छिवम् । पापभीरया प्रणम्यास्र देवकार्यं व्यबवयत् ॥८०॥ शर्वोऽप्यारूढवेगोऽसौ तस्मिंस्वीयं स्वभावधे । तद्वि धारयितुं शक्तो न वह्निर्नाम्बिकापि वा ॥८१॥ न मया तनयस्त्वत्तः सम्प्राप्त इति भाविनीम् । खेदकोपाकुलां देवीमित्युवाच ततो हरः ॥८२॥ विघ्नोऽत्र तव जातोऽयं विना विघ्नेशपूजनम् । तदद्यम येनाशु बहुलो नो जनिता सुतः ॥८३॥

तृतीय लम्बक १८४

तृतीय लम्बक १८४

और ब्रह्मा के कहने पर प्राणियों के चित्त में कामदेव का जन्म होना भी स्वीकार किया जिससे सृष्टि का विच्छेद न हो। उन्होंने अपने चित्त में भी कामदेव का स्थान दिया। इससे प्रसन्न होकर ब्रह्मा चले गये और पार्वती प्रसन्न हुईं॥७०-७१॥

कुछ दिन व्यतीत होने पर एक बार एकान्त में शिव-पार्वती का समागम हुआ ॥७२॥

स्वामि कार्त्तिकेय की उत्पत्ति

सैंकड़ों वर्ष व्यतीत होने पर भी क्रीड़ा समाप्त न हुई प्रत्युत उससे तीनों लोक काँप गये। संसार के नाश के भय से शिव की क्रीड़ा में विघ्न डालने के लिए देवताओं ने ब्रह्मा की आज्ञा से अग्नि का स्मरण किया। स्मरण करते ही उपस्थित हुआ अग्नि शिवजी के भीषण क्रोध का स्मरण करके देवताओं से भागकर जल में जा छिपा ॥७३-७५॥

जल में अग्नि के ताप से तप्त हुए मेंढकों ने अग्नि को खोजते हुए देवताओं से जल में छिपे अग्नि का पता बता दिया ॥७६॥

अग्नि मेंढकों को अस्पष्ट वाणी-शक्ति हीन का शाप देकर और छिपकर मन्दराचल पर चला गया। वहाँ देवताओं ने वरुण के डर से शम्भूक (घाघा) के रूप में उस अग्नि को देखा। वहाँ उसने मन्दुक नाम से देवताओं को दर्शन दिया ॥७७-७८॥

अग्नि ने शुकों की जिह्वा का उलटा का रूप दिया और देवताओं के स्तुति करने पर अग्नि ने देवताओं के कार्य को स्वीकार कर लिया ॥७९॥

अग्नि ने जाकर अपनी प्रभों से शिवजी को काम-क्रीड़ा से विरत करके और प्रणाम करके देवताओं का कार्य निवेदन किया। प्रसन्न होकर शिवजी ने बहिर् में ही अपना वीर्य स्खलित कर दिया क्योंकि उसे पार्वती और अग्नि दोनों ही धारण करने में असमर्थ थे ॥८०-८१॥

'दैव मुझपर कुपित होकर पुत्र नहीं प्राप्त किया—'यह कहती हुई पार्वती को शिव ने कहा—॥८२॥

'इस वीर्य के बिन्दुओं (कणों) का गुहक के रूप में एक विघ्न-हर्ता उत्पन्न हुआ। इसलिए तपस्या पूरा होने पर भविष्य में हम दोनों का पुत्र उत्पन्न होगा' ॥८३॥ २४