कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५)
महाकवि सोमदेव भट्ट द्वारा
स्रोत: कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1960 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंतृतीय स्तबक १८३ उनकी पूजा कर, तो अवश्य ही अपने अनुकूल पति को प्राप्त करेगी' ॥५६॥ यह सुनकर मैंने अपने स्वाभाविक भोलेपन से सखियों से पूछा कि क्या विनायक (गणेश) की पूजा से कुमारियाँ अपने योग्य पति को प्राप्त करती हैं? ॥५७॥ मेरे पूछने पर उन्होंने कहा- 'तुम क्या कह रही हो? उनकी पूजा के बिना किसी को कोई भी सिद्धि प्राप्त नहीं हो सकती। हम गणपति का प्रभाव तुम्हें बतलाती हैं सुनो।' ऐसा कहकर सहेलियों ने मुझे यह कथा सुनाई ॥५८-५९॥ गणपति की कथा प्राचीन काल में देवता लोग सेनापतित्व के लिए शिवजी के पुत्र को चाहते थे तारकासुर ने इन्द्र को भगा दिया और शिवजी ने कामदेव को दग्ध कर दिया। ऊर्ध्वरेता (आजन्म ब्रह्मचारी) अत्यन्त उग्र एवं लम्बी तपस्या में बैठे हुए शिवजी को पति के रूप में प्राप्त करने के लिए पार्वती ने तप किया और पुत्र की प्राप्ति एवं कामदेव का पुनर्जन्म माँगा किन्तु उसने कार्य-सिद्धि के लिए गणेशजी के पूजन का स्मरण नहीं किया ॥६०-६२॥ तब अपना अभीष्ट चाहनेवाली पार्वती से शिव ने कहा- 'प्रिये ! सबसे पहले प्रजापति ब्रह्मा के मन से काम देव उत्पन्न हुआ। वह उत्पन्न होते ही मद से बोला किसे उन्मत्त करूँ? तब प्रजापति ने उसका नाम कन्दर्प रख दिया और उससे बोले- 'बेटा तुम्हें अत्यन्त दर्प हो गया है तो एक त्रिनेत्र शिव से अपनी रक्षा करना। कहीं उनसे तुम्हारी मृत्यु न हो'। ब्रह्मा से इस प्रकार समझाया हुआ भी दुष्ट कामदेव मुझे क्षुब्ध करने के लिए आया और मैंने उसे दग्ध कर दिया। वह पुनः देह के साथ जीवित नहीं हो सकता ॥६३-६६॥ तुम्हें तो मैं अपनी ही शक्ति से पुत्र उत्पन्न कर दूंगा। साधारण सांसारिक जनों के समान मुझे कामदेव की प्रेरणा से प्रजोत्पादन-शक्ति की आवश्यकता नहीं है ॥६७॥ जब शिवजी पार्वती से इस प्रकार कह रहे थे तभी उनके सम्मुख ब्रह्मा इन्द्र के साथ प्रकट हुए। उन्होंने स्तुति करके शिवजी से तारकासुर से शान्ति के लिए प्रार्थना की। शिवजी ने भी पार्वती की कोख से सन्तान उत्पन्न करना स्वीकार किया ॥६८-६९॥