कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५)
महाकवि सोमदेव भट्ट द्वारा
स्रोत: कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1960 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंतृतीय लम्बक ३७९ जंगल में उसने अच्छी फसल होने योग्य एक भूमि देखी और उसके मध्य में बड़ी विस्तृत (लम्बी-चौड़ी) घनी छाया के कारण (सूर्य-किरणों को रोकने के कारण) शीतल एक पीपल के वृक्ष को वर्षाकाल के समान देखकर वह कृषक अत्यन्त सन्तुष्ट हुआ ॥२४-२५॥ तब सोमदत्त ने 'इस वृक्ष में रहनेवाला जो भी देवता है, मैं उसका भक्त हूँ' ऐसा कहकर वृक्ष की प्रदक्षिणा कर उसे प्रणाम किया ॥२६॥ तदनन्तर बैलों को जोड़कर मंगल के लिए पूजा-पाठ आदि करके और वृक्ष का प्रसाद चढ़ाकर उसने खेती प्रारम्भ कर दी ॥२७॥ खेती करता हुआ वह सोमदत्त उसी वृक्ष के नीचे दिन-रात रहने लगा। उसकी पत्नी प्रतिदिन उसे वहीं भोजन लाकर देती थी ॥२८॥ कुछ समय के बाद जब उसकी खेती पककर तैयार हुई, तो दूसरे राजा के राष्ट्र पर आक्रमण करने के कारण लूट ली गई। सब-मना के चले जाने पर और धन के नष्ट होने पर उसने रोती हुई पत्नी को समझा-बुझाकर कुछ बचा-खुचा अन्न समेट लिया ॥२९ १/२॥ और पहले के समान पीपल के वृक्ष में रहनेवाले देवता की बलि (प्रसाद) चढ़ाकर धैर्य के साथ वहीं रहन लगा क्योंकि धैर्यशाली जीव विपत्ति के समय स्वभावतः अधिक दृढ़ हो जाते हैं ॥३१॥ तदनन्तर एक दिन रात में चिन्ता से निद्रा न आने के कारण जागते हुए सोमदत्त ने पीपल के वृक्ष से निकली हुई यह वाणी सुनी—'हे सोमदत्त ! मैं तुम से प्रसन्न हूँ। तुम धीरकंट-देश में जादित्यप्रभ नामक राज्य के राष्ट्र में जाओ। उस राजा के द्वार पर निरन्तर सन्ध्या और अग्निहोत्र के मन्त्रों का पाठ करते हुए यह कहना कि मैं फलभूति नामक ब्राह्मण हूँ जो कहता हूँ उसे सुनिए— शुभ कार्य करनेवाला कल्याण प्राप्त करता है और अशुभ कार्यवारी अशुभ प्राप्त करता है। तुम्हें सन्ध्या और अग्निहोत्र के मन्त्र नहीं आते उन्हें अभी मुझसे पढ़ो मैं यक्ष हूँ। ऐसा कहकर यक्ष ने अपने प्रभाव से उसी समय मन्त्र पढ़ा दिये। मन्त्र पढ़ाकर वाणी लीन हो गई ॥३२-३६॥ प्रातःकाल सोमदत्त यक्ष द्वारा दिये गये फलभूति नाम को पाकर अपनी पत्नी के साथ धीरकंट-देश की ओर चल पड़ा। वह अगर बड़े-बड़े भीषण जंगलों को पारकर दुर्देव के साथ धीरकंट-देश में पहुँचा ॥३८ १/२॥