कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५)
by महाकवि सोमदेव भट्ट
Source: कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1960 (origin)
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Read in contextपञ्चम लम्बक ५१५ अपनी-अपनी ओर से चन्द्रप्रभा की सेवा में लगी हुई उसकी सेविकाओं द्वारा शक्तिदेव के आगमन पर प्रसन्नता प्रकट किये जाने के पश्चात् वह शक्तिदेव चन्द्रप्रभा के साथ उसके शयनागार में गया। वहाँ जाकर चन्द्रप्रभा ने उससे इस प्रकार कहा—'हे सौभाग्यशालिन् ! तुमने वर्धमान नगर में कनकरेखा नाम की जो राजकुमारी देखी थी वह चन्द्ररेखा नाम की मेरी बहिन है॥२७४-२७५॥ उत्स्थल द्वीप में तुमने जिस धीवर-कन्या बिन्दुमत्ती से विवाह किया था वह मेरी शशि- रेखा नाम की बहिन है॥२७६॥ उसके पश्चात् दानव द्वारा ले जाई गई बिन्दुरेखा नाम की जिस कन्या से तुमने विवाह किया था वह मेरी शशिप्रभा नाम की चौथी और छोटी बहिन है॥२७७॥ शक्तिदेव का विद्याधरियों के साथ विवाह अब तुम हम लोगों के साथ हमारे पिताजी के पास चलो और उनसे दी हुई हम चारों का विवाह अपने साथ कर लो॥२७८॥ इस प्रकार कामदेव की आज्ञा के समान गम्भीरतापूर्वक चन्द्रप्रभा के कहने पर उन चारों प्रियतमाओं के साथ वह शक्तिदेव शीघ्र ही वन के मध्य में स्थित उनके पिता के पास गया॥२७९॥ उनके पिता के चरणों पर प्रणाम करती हुई उन चारों कन्याओं द्वारा समस्त वृत्तान्त जानकर और आकाशवाणी से प्रेरित होकर एक साथ ही चारों कन्याओं को शक्तिदेव के लिए दे दिया॥२८०॥ तदुपरान्त विद्याधरों के उस राजा ने कनकपुरी में समस्त अपने राज्य को और अपनी सभी विद्याओं को भी उसे देकर, उस खड्ग और शक्तिदेव को अपना शक्तिवेग नाम भी देकर अपनी विद्याधर जाति में समुचित स्थान प्रदान किया॥२८१॥ और कहा—'तुम्हारा इतना अधिक प्रभाव होगा कि तुम्हें कोई जीत न सकेगा। वत्स- राज उदयन से नरवाहनदत्त नाम का जो पुत्र होगा वह तुम विद्याधरों का चक्रवर्ती राजा होगा। वह तुम्हारा भावी स्वामी है। इसलिए तुम उसे प्रणाम करना'॥२८२॥ ऐसा कहकर उस महाप्रभावशाली शशिध्वज नामक विद्याधरों के अधिपति ने शक्तिवेग (शक्तिदेव) का सत्कार करके उसकी चारों पत्नियों के साथ उस जामाता को संजोग से विदा करके राजधानी कनकपुरी को भेज दिया॥२८३॥